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इस देश में धर्म तो सनातन है। हजारों वर्षो से चला आ रहा है। उसको ही आज हिन्दू धर्म का जामा पहना दिया गया। नया शब्द चल पड़ा-हिन्दुत्व। धर्म की आड़ में हिन्दुत्व राजनीति का अखाड़ा बन गया। धीरे-धीरे प्रत्येक धर्म-समुदाय में राजनीति प्रवेश कर गई। जहां हजारों वर्षो में धार्मिक पर्वो-परम्पराओं को लेकर कभी राजनीति नहीं हुई, वहीं आज जैन पर्व पर लगी मांस की बिक्री पर रोक में राजनीति घुस गई। कुछ लोग तो इतने आक्रामक हो गए मानो स्वयं हिंसक हों। मांस के प्रति उनके मन में इतना राग, कि सभी धार्मिक सहिष्णुता द्वेष में बदल गई। मुम्बई में तो मानो कोहराम ही मच गया।

क्या इस कोहराम के पीछे जैन समुदाय था? क्या सरकार का आदेश सत्तर वर्षो में पहली बार आया? क्या आदेश जारी करने वाली पार्टी-भाजपा-के साथ शिवसेना भागीदार नहीं थी? तब क्या उद्धव ठाकरे का ऎलान राजनीति नहीं थी? क्यों एक-एक करके भाजपा शासित प्रदेशों में ही मांस-ब्रिकी पर निषेध लागू होने के समाचार टीवी पर चलाए जा रहे हैं? क्या गैर-भाजपा शासित राज्यों में ऎसे आदेश जारी नहीं हुए अथवा वहां कोई राजनीति नहीं हुई? ऎसा लगता है कि बिहार चुनाव के मद्देनजर यह एक जैन कार्ड हिन्दू-मुस्लिम विभाजन को गहरा करने की नीयत से फैंका गया। बिहार के बाद आगे के महीनों में बंगाल, केरल, तमिलनाडु और असम में विधानसभा चुनाव होने हैं। शिवसेना वहां होगी ही नहीं। उसने अपने ही निर्णय को अपने पांव पर दे मारा।

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