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पुराणों में वर्णित पुनर्जन्म की कथा – 2 , देवर्षि नारद के पूर्व जन्म

अकेले श्रीमद्भागवत ग्रंथ में ही नारदजी के कई पूर्व जन्मों का वर्णन आया है। भागवत के 7 वें स्कन्ध 15 वें अध्याय में वे युधिष्ठिर से कहते हैं कि ‘मैं पूर्व महाकल्प में एक गन्धर्व था। उस समय मेरा नाम उपबर्हण था और गन्धर्वगण मेरा बड़ा सम्मान करते थे। मैं देखने में बहुत ही सुन्दर था तथा मेरे शरीर से एक प्रकार की दिव्य सुगन्ध निकलती रहती थी। एक बार देव सत्र में मुझे भगवद्-गुणगान के लिये बुलाया गया। पर मैं वहां अप्सराओं के सात संसारी गीतों को गाते हुए पहुंचा। इससे रुष्ट होकर प्रजापतियों ने मुझे शूद्रयोनि में जन्म लेने का शाप दे दिया। उन लोगों के कारण मैं दासी पुत्र हो गया। (भागवत 7|15|69-73)

‘पर भगवत्कृपा से उस जन्म में बाल्यकाल में कुछ ऐसा संयोग बन गया कि मैं चातुर्मास्य में एक जगह ठहरे हुए महात्माओं की सेवा में लग गया। मैं बालोचित चाञ्चल्यसे दूर रहकर उन महात्माओं की सेवा में लगा रहता। मेरे स्वभाव से वे मुनिजन बहुत प्रसन्न हो गये। इस प्रकार उनकी सेवा, उच्छिष्ट भोजन तथा सम्पर्क के द्वारा उनके समीप बैठकर नित्य श्रेष्ठ ज्ञान-वैराग्ययुक्त उनके मुख से हरिकथा सुनते-सुनते मेरा हृदय शुद्ध हो गया। चातुर्मास्य के अन्त में चलने के समय उन्होंने उस दिव्य ज्ञान का मुझे उपदेश भी कर दिया, जिससे विश्व मायामय एवं तदनन्तर भगवद् रुप दिखने लग जाता है। 

आगे पढ़े >> भी लेख जारी है….. 

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