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एक तुलनात्मक सर्वेक्षण

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इस पोस्ट को विषय की शरूआत करने से पहले एक महत्वपुर्ण घटना को बॅकग्राउंड मे रखना चाहुंगा। रक्षा मंत्रालय द्वारा जुलाई 1983 मे बडे अरमानों के साथ शुरू की गयी यह महत्वाकांक्षी त्रिशुल एन्टी-मिसाईल मिसाईल परीयोजना को आखिर में 24 वर्षों के बाद नवम्बर 2006 में DRDO शस्त्र अनुसंधान संस्था ने एक अधिसुचना देते हुए अपने कार्यक्रम को फ्लोप बता कर अधिकृत रूप से बंद कर दीया । साथ मे हमारी नौसेना ने लंबे इंतजार के बाद थक हार कर अपनी जरूरत को पूरी करने के लिये इजरायेल से “बराक” मिसाईल खरीदने के लिये ऑर्डर बुक किया। आयाती मिसाईलों के पिछे किये गये आसमानी खर्च के लिये विरोधपक्ष ने रक्षा मंत्रालय और सरकार को आडे हाथों लिया ! इस आरोप-प्रत्यारोप के आवाज मे DRDO को मिली असफलता के कारण का विश्लेशण तो हुआ ही नही और असल कारण दब गया ।

DRDO मे शस्त्र उत्पादन की क्षमता नही है एसा नही है। दुनिया के सबसे कार्यक्षम और सबसे सस्ते शस्त्र बनाने का रेकॉर्ड आज DRDO के नाम दर्ज है । लेकिन सरकारी अंकुश मे रहने की वजह से उसकी मंथर कार्यप्रणाली का संक्रमण भी DRDO को लगा हुआ है । बाबुशाही, अमलदारशाही, बजट कटौती, राजकरण, प्रोजेक्ट सॅबोटॅशन आदी कई चक्रव्युह के भेदन करने मे हर प्रोजेक्ट कछुए की गती से चलता है परिणामवश शस्त्रों के मामले मे आधुनिक रहने वाली हमारी सेना को विदेशी शस्त्रों की खरीद के अलावा कोई चारा नही रहता ।

::::: DRDO (1958) भारत V/S DARPA (1958) अमेरीका :::::

शस्त्रों के मामले मे स्वावलंबी होने के शुभ हेतु से भारत ने 1958 में DRDO का गठन किया उसी तरह उसी वर्ष 1958 में ही अमेरीका ने DARPA (Defense Advanced Research Project Agency) नामक संस्था का गठन किया । DRDO की तरह इस संस्था का मुख्य काम देश के लिये आधुनिक हथियार तैयार करना था । अमेरीकान सरकार ने इस लिये एक निश्चित राशि का वार्षिक बजट स्विकृत कर दीया । बजट की राशी अच्छी खासी थी । फीर भी ज्यादा से ज्यादा राशी सिर्फ रिसर्च और डॅवलपमेंट के लिये खर्च हो इस हेतु से संस्था के संचालकों ने एक मस्त तरकिब आजमायी । निष्णांत टॅक्निश्यनों की वेतनभोगी टीम तैयार संस्था का प्रशासन खर्च बढाने की बजाय रिसर्च का काम आउटसोर्स करके निजी कंपनीयों को सौंप दीया और साथ मे यह शर्त रखी के निर्धारीत बजट और समय मे और निर्धारीत गुणवत्ता के साथ हर परीयोजना पार होनी चाहिये । लडाकु विमान, मिसाईल, रॉकेट लॉन्चर्स, गॅटलिंग गन, जैसे शस्त्र उपरांत स्टॅल्ध टॅक्नोलोजी, फॅज्ड एयर रॅडार, हायपरसॉनिक विमान, पायलट रहीत ड्रोन विमान, GPS, परमाणु धमाके और हमले को पहचान लेने वाले यंत्र और उपग्रह जैसे नही नही तो लगभग 200 से ज्यादा प्रॉजेक्टस् आज तक आऊटसोर्सिंग करके सफलता पुर्वक पार किये है । DARPA मे तो आज मात्र 240 लोगों का ही स्टाफ है । जिसमें 130 स्टाफ वैज्ञानिक कक्षा का है । बाकि का स्टाफ रिसर्च और टॅक्निकल कक्षा का है । वेतन भोगी लोगों का जमघट टालने के हेतु से DARPA हर रिसर्च प्रोजेक्ट के लिये जरूरी निष्णांतों को मात्र कॉन्ट्राक्ट के रूप मे लेता है । इस तरह से पैसों की बचत भी होती है और काम में कार्यक्षमता भी मिलती है । इस संस्था की वजह से अमेरीका दुनिया का एकमात्र No. 1 एक्सपोर्टर देश बना है ।

इसके विरूध्ध मे देशभर में 50 लॅबोरॅटरीयां और 30000 से ज्यादा का वेतनभोगी (Permanent) स्टाफ रखने वाली DRDO का नमुना भी देखते है । 1958 मे अपने गठन के बाद इस संस्था ने कई परियोजनायें सफलतापुर्वक पुरी की है । त्रिशुल, आकाश मिसाईल, अर्जुन टॅन्क, तेजस विमान, कावेरी जॅट एंजीन, पिनाका रॉकेट जैसी कई परीयोजनायें दशकों से अटकी रही या है । रिसर्च और डॅवलपमॅंट के नाम पर आज तक 60000 करोड से अधिक का खर्च हो चुका है । इसके बावजुद आजतक बहुत कम शस्त्रों को हमारी नौसेना वायुसेना या थलसेना ने स्विकृती दी है या उसे शामिल किया है। कुछ ना कुछ टॅक्निकल कारण निकाल के उसे फिर से अनुसंधान के लिये भेजा जाता है ।

DRDO अगर DARPA की प्रणाली अपना ले और बॅस्ट निष्णांतों को कॉन्ट्राक्ट के मानक पर ले कर हर टॅक्निकल कमियां दुर की जा सकती है पर अफसोस के एसी मुक्त विचारधारा DRDO अपनाती नही है या तो सरकार द्वारा उसे अपनाने की मनाई फरमाइ गयी है । उदार आर्थिक निती के भाग रूप सरकार ने कई क्षेत्रों मे निजी कंपनीयों को प्रवेश छुट दी है । सबसे आदर्श उदाहरण इन्फोर्मेशन टॅक्नोलोजी और टॅलिकॉम क्षेत्र का है । Tata, Reliance, Infosys, Wipro, HCL जैसी निजी कंपनीयोंने प्रवेश लेते ही आज भारत सॉफ्टवॅयर निर्यात कर के अरबों डॉलर प्राप्त करने लगा ।

यह स्थिती क्या स्वदेशी शस्त्रों के मामले मे खडी नही की जा सकती ? क्यों नही ? शस्त्र उत्पादन का कॉन्ट्राक्ट पाने के लिये अनेक भारतिय कंपनीयां उत्सुक है और सरकार के दरवाजे पर दस्तक भी दे रही है । सरकार को सिर्फ दरवाजा खोलने की जरूरत है ।

इस दौरान हमारे और आपके भाग्य में विदेशी शस्त्रों की शोपिंग का वार्षिक 10 अरब डॉलर का बिल भरना ही लिखा है । मोदी जी ने कहा था के “मै भारत को शस्त्र खरीदने वाला नही शस्त्र बेचने वाला देश बनाना चाहता हु” लेकिन देखते है आगे क्या होता है ।

किसी जानेमाने आंतरराष्ट्रिय अर्थशास्त्री ने कहा था के भारत एक पिंजरे मे बंद शेर है और बस पिंजरा खोलने की देर है ।

संकलन – राहुल नानजी सावला

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