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मेरे घर से 4-5 किलोमीटर की परिधि में नोएडा, कोंडली, दल्लूपुरा जैसे इलाक़े पड़ते हैं। इनकी सड़कों पर गाड़ी चलाते वक़्त रास्ते में एक लावारिस चीज़ का दिखना बड़ी सामान्य सी बात है। गाय। सॉरी गौमाता!

कोंडली से होते हुए जिस रास्ते से मैं आनन्द विहार अक्सर जाता रहता हूँ, वहाँ भैंसों के कई तबेले हैं। भैंसों को वहाँ आराम से बैठे, चारा खाते देखा जा सकता है। आपने भी देखा होगा कि कैसे भैंसों को उनके तबेले वाले सुबह-सुबह झुंड की तरह घुमाने ले जाते हैं। वे मस्त घूमती हैं। सड़क पर पूँछ उठाकर गोबर करती हुई जाती हैं। आप सुबह नोएडा की तरफ़ निकलिए, वहाँ भी यही नज़ारा देखने को मिलेगा।

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भैंसों को लेकर कोई सामाजिक व राजनीतिक द्वंद्व भारतीय समाज में देखने को नहीं मिल रहा। हालाँकि वे भी कटती-मरती हैं। हम सब उसी का दूध पीकर गाली देने, मारने-पीटने वाले बने हैं।

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गौमाता जैसा महत्व नहीं होने के बावजूद उनका जीवन उससे कहीं बेहतर बीत रहा है। मुसीबत तो बेचारी गौमाता की है। उसे लेकर कुछ लोग मरने-मारने को उतारू हैं, लेकिन उसे पूछ कोई नहीं रहा। वह लावारिस घूम रही थी, घूम रही है। कूड़े के ढेर से पॉलीथीन खाकर अपना पेट भर रही थी, भर रही है। चलते ट्रैफ़िक में बीच सड़क पर आपने हमेशा गाय बैठी देखी होगी, भैंस तो शायद ही कभी। क्यों?

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इस क्यों पर थोड़ा सोचिए भाई। गौपुत्रों को उसे जानवर कहा जाना भी बर्दाश्त नहीं, लेकिन हक़ीक़त यह है कि उसकी हालत जानवर से बदतर है। ख़ैर, यह विडियो एक बार फिर देख लीजिए।

इस वाक़िए ने पहलेपहल बदन में सिरहन पैदा कर दी थी। बावजूद इसके मैं इस तालिबानी विडियो पर नहीं लिखने वाला था। पहली नज़र में गौरक्षकों की गुंडागर्दी वाला वाक़िआ ही लगा। लेकिन बाद में नई जानकारियाँ सामने आईं और इस घटना  पर जो दलितों ने किया उसने मेरी उंगलियाँ कीबोर्ड पर नचा दीं। दलितों ने गुजरात गौरक्षा अभियान की चमड़ी उधेड़ दी है। वे चारों दलित शायद अभी तक बेड पर ही पड़े हैं, लेकिन उनके लोगों ने पूरा गुजरात सिर पर उठा लिया है।

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मैंने अपने कुछ साथियों के विचार देखे। उनका कहना था कि अगर ऐसा विरोध मुसलमानों ने किया होता तो बड़ा बवाल हो गया होता। बात तो सही है, लेकिन इस घटना की प्रकृति और समाज में दलित स्थिति को देखते हुए मुझे लगता है कि इस तरह का विरोध केवल दलित ही कर सकते थे। हाँ, मुसलमान गाय पालते ज़रूर हैं। लेकिन मैं उनसे यह कतई नहीं कहूंगा कि अपने लोगों की पिटाई के बदले वे गौपालन बंद कर दें और गौमाताओं को वैसे ही लावारिस छोड़ दें, जैसा उसके दुलारे छोड़ देते हैं। वैसे ही इन बेचारियों की संख्या सड़कों पर बहुत ज़्यादा है, और हो जाएगी।

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यही लावारिस जानवर अगर मर जाए तो कोई ‘बेटा’ अपनी ‘माता’ का क्रियाक्रम तो दूर उसके शव को ठिकाने लगाने भी नहीं आता। उसकी लाश सड़ न जाए और कोई बीमारी ने फैले इसलिए समाज के वंचित तबक़े, यानी दलितों को मजबूरी में उसकी लाश को ठिकाने लगाने का काम लंबे समय से करना पड़ता रहा है। ऐसी कई मजबूरियाँ हैं, जिन्हें अन्जाम देने के लिए दलित-पिछड़े-आदिवासी सदियों से मजबूर ही रहे हैं। यह गौरक्षा के नाम पर लफ़ंडरों को खुला छोड़ देने और गुंडागर्दी करने की आज़ादी देने का शौक नहीं है।

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लेकिन गुजरात में पहले से मरी हुई गाय की खाल उतार रहे दलितों की बेरहमी से पिटाई करना गौभक्तों को बहुत भारी पड़ गया है। वे उन गुंडों से कहते रहे कि उन्होंने गाय को नहीं मारा, लेकिन गुंडे फिर गुंडे हैं। ऐंठ में उन्होंने इन दलितों को आधा नंगा कर किसी धातू (शायद ऐल्युमिनियम) के डंडे से बीच शहर पीट डाला। वे पिटते रहे और देश के जागरूक लोग देखते रहे। लेकिन अब शायद वे सोच रहे होंगे कि उन्होंने ग़लत छत्ते में हाथ डाल दिया है। यह आंदोलन अभी तक रुका नहीं है। इस मुद्दे पर कुछ दिन पहले संसद में शरद यादव बहुत अच्छा बोले, आपको उन्हें सुनना चाहिए। फिर आगे की बात।

गुजरात में जिस तरह का विरोध हुआ वैसा मैंने पहले नहीं देखा। राज्य के कई सरकारी दफ़्तरों के आगे मरी गौमाताओं के शवों को दलितों ने डाल दिया। कह दिया है, ये जिनकी माताएँ हैं, वे आएँ और ख़ुद देख लें कि इनका क्या करना है। माताओं को उठाने कोई गौभक्त या गौरक्षक दल सामने नहीं आया है। आएगा भी नहीं। क्योंकि उनका काम गौमाता की रक्षा करना है, उसका जीवन बेहतर करना या उसे सम्मान सहित जलाने का नहीं है। यह तो निचले तबक़े के लोगों का काम है। यानी कि यह नीच काम है। अब अगर मैं यह कहूँ कि मरने के बाद गौमाता भी नीच हो जाती है क्या, तो कई लोग कॉमेंट बॉक्स में गालियाँ लिखने लगेंगे। लेकिन मैं बता दूँ कि अगर दलित यह काम न करें तो दूर किसी गौमाता के शव से आने वाली बदबू से नाक के नथूने फूलने पर यही लोग बोलेंगे, ‘हाय-हाय कितनी गंदी बदबू है!’

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इस आंदोलन से एक बात याद आई। महाड़ के चवदार तालाब पर जब डॉ. बीआर आंबेडकर ने क़रीब चार हज़ार दलितों की मौजूदगी में पानी पीकर एक ‘अपवित्र’ प्रथा को तोड़ा तो उस समय के सनातनियों ने बाक़ायदा योजना बनाकर अलग-अलग जगहों पर कम संख्या का फ़ायदा उठाते हुए दलितों को बुरी तरह पीटा। वजह बताने की ज़रूरत नहीं कि क्यों। लेकिन आंबेडकर ने दलितों में चेतना तो जगा ही दी थी। लिहाज़ा उन्होंने भी सनातनियों को सबक़ सिखाने की ठान ली और योजना बनाने लगे। लेकिन अपने लोगों की बुरी हालत देखने के बाद भी ग़ुस्साए आंबेडकर ने सबको धैर्य रखने को कहा और किसी भी तरह की हिंसा करने से मना किया। सनातनियों में लट्ठ बजाने की ठानने वाले उन दलितों में बड़ी संख्या उन सेनानियों की थी जो अफ़ग़ान युद्ध और लड़ाइयों के कई और मोर्चों पर बहादुरी दिखाकर लौटे थे। अगर आंबेडकर ने उन्हें नहीं रोका होता तो…

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उसी आंबेडकर की यादगार बुद्ध भूषण प्रेस और आंबेडकर भवन को चोरी-चुपके देर रात ढाह दिया जाता है तो दलित अपने ‘मुक्तिदाता’ के लिए डेढ़ लाख की संख्या में इकट्ठा होकर विरोध करते हैं। हालाँकि नैशनल मीडिया के लिए यह कोई ख़बर नहीं थी। ‘दलित एकता’ की यही चेतना उनमें कांशीराम ने जगाई।

अपने नायक की विरासत को बचाने उमड़ा ‘दलित सैलाब’।
अपने नायक की विरासत को बचाने उमड़ा ‘दलित सैलाब’।

आज दलितों के पास आंबेडकर और कांशीराम सा कोई व्यक्ति नहीं है। लेकिन उनमें आत्मसम्मान जगाने का काम तो ये दोनों कर ही गए। गुजरात आंदोलन इसका सुबूत है। अपने साथ हो रही ज़्यादतियों पर आख़िरकार उनका गु़स्सा फूटा है। और ऐसे ही नहीं फूटा है। आप ख़बरें पढ़ कर देखें। इस घटना पर कई हैरान करने वाले तथ्य सामने आए हैं। मुख्यमंत्री आनंदीबेन पटेल ने 9 दिन बाद जब पीड़ितों की ख़ैर-ख़बर ली तो वहाँ मौजूद एक दलित ने बताया कि जब बाज़ार में अपनी पत्नी के लिए गिफ़्ट लेने गया तो कैसे पुलिसवाले ने पहले उससे उसकी जाति पूछी और फिर उसे बुरी तरह पीटा। अब पुलिस पीटती है तो सिर्फ़ हाथ-पैर, डंडे से ही नहीं पीटती। मुँह से भी ‘पीटती’ है। और हमारे समाज का मुँह जो है उसके अंदर ‘कूड़ा’ भरा हुआ है। ऊना की घटना पर यह तथ्य भी सामने आया कि पुलिस ने घटना जानकारी मिलने के बाद कार्रवाई के नाम इन लोगों को ही गौरक्षकों के हवाले कर दिया। नतीजा सामने है।

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आंबेडकर ने कहा, ‘शिक्षित बनो, संगठित रहो, संघर्ष करो।’ जो अद्वितीय काम दलित, पिछड़ों और अति पिछड़ों के लिए आंबेडकर करके गए, आज उसका फल यह है कि दलित समाज का एक हिस्सा शिक्षित है और देश के मध्यमवर्ग में शामिल है। सामाजिक कुरीतियों के चलते इनका स्तर क्या है, यह अलग विषय है। लेकिन अपने साथ हो रहे भेदभाव और अन्याय के ख़िलाफ़ संगठित होकर संघर्ष करने की भावना उनमें धधक रही है यह गुजरात आंदोलन से साबित हो गया है।

तस्वीर: नैशनल दस्तक से साभार।
तस्वीर: नैशनल दस्तक से साभार।

गुजरात आंदोलन में कुछ दलितों ने ज़हर खाकर आत्महत्या करने की कोशिश की। एक की मौत भी हो गई। हिंसा भी हुई है जिसकी मैं घोर निन्दा करता हूँ। न तो उन्हें ज़हर खाने की ज़रूरत है और न ही हिंसा करने की। इन दोनों ही रास्तों से समस्या का हल नहीं निकलता। आंदोलन का मक़सद सत्ता, समाज और मीडिया को अपने वजूद और उसके ज़िन्दा होने का आभास कराना था जो उन्होंने अकेले बिना किसी की सहायता के करके दिखाया है। शुरुआत में इस घटना को मीडिया के एक तबक़े ने ही दिखाया। उसमें भी न्यूज़ पैकेजिंग के नाम पर विडियो पर वॉइस ऑवर चला दिया गया, ड्यूटी ख़त्म हो गई। उसके अगले ही दिन से जो विरोध दलितों ने शुरू किया उसकी रिपोर्टिंग करना नैशनल मीडिया ने शुरुआत में करना ज़रूरी नहीं समझा। अपने लोगों की पीड़ा पर जब उन्होंने पूरे गुजरात में तांडव मचा दिया और हिंसा की घटनाएँ सामने आईं, तब लोकतंत्र के सारे चौथे खंभों में करंट पहुँच गया।

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नौ दिन कहाँ थे ये लोग?
नौ दिन कहाँ थे ये लोग?

देश के बड़े नेताओं की अकड़ी हुई गर्दन में हमेशा की तरह बड़ा बवाल कटने के बाद लचीलापन आया है। एक-एक कर सब उन पीड़ितों की सूजी पीठों पर अपने नाम का ठप्पा लगाने पहुँच रहे हैं, उनका आराम ‘हराम’ कर रहे हैं। सत्ता की मलाई में सने और राजनीति के कीचड़ में धँसे दलित नेताओं की बेशर्मी निराश करती है। जिन लोगों को जातिवाद का शिकार बता-बताकर ये नेता उठे हैं, उन लोगों को बीच सड़क पर बेइज़्ज़त कर पीटा गया और ये कुछ नहीं बोले। वे अकेले उन्हीं सड़कों पर संघर्ष करते रहे, कोई कथित दलित नेता आगे नहीं आया। बात हिंसा तक पहुँच गई, तब जाकर इनकी और मीडिया की आँख खुली।

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दलित नेता भी संघर्ष में साथ नहीं।
दलित नेता भी संघर्ष में साथ नहीं।

लेकिन गुजरात और महाराष्ट्र से उठी दलित पुकार ने बता दिया है कि अब उन्हें किसी बड़े-छोटे, मोटे-पतले नेता की ज़रूरत नहीं है। वे अपनी लड़ाई ख़ुद लड़ सकते हैं। आरक्षण का विरोध होता है, लोग उससे अपनी नफ़रत दिखाते हैं, मर्यादित-अमर्यादित विरोध करते हैं, दलितों की तरफ़ से कोई बवाल नहीं होता। पुणे स्थित उनके महानायक का भवन तोड़ दिया जाता है तो वे कोर्ट जाते हैं। आंबेडकर-कांशीराम की मूर्तियाँ तोड़े जाने की ख़बरें अक्सर आती रही हैं, कोई हिंसा नहीं होती। लेकिन गौरक्षा की आड़ में गुंडे उन्हें आधा नंगा कर बुरी तरह पीटेंगे, बीच शहर शर्मसार करेंगे और वे चुप रह जाएंगे यह संभव नहीं है। आप उन्हें ब्रह्मा के शरीर के नीचे से पैदा होने वाला बताएंगे, उन्हें मंदिर में घुसने नहीं देंगे, उनसे टट्टियाँ साफ़ करवाएंगे, उनके बच्चों से स्कूलों में झाड़ू लगवाएंगे, पेट के लिए जो दोयम दर्जे का काम वे मजबूरी में कर रहे हैं वो करने से भी रोकेंगे और फिर उन्हें जूते भी मारेंगे, और वे सहते रहेंगे, यह अब संभव नहीं है।

डिसक्लेमर : ऊपर व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं
लेखक –  दुष्यंत कुमार ( पत्रकार बनने का भूत सवार है। लेखन में रुचि है इसलिए क़लम के माहिरों का पीछा करते रहता हूं ताकि अपनी क़लम की नोक पैनी कर सकूं। किसी भी ज्वलंत विषय पर जल्दी कमेंट करने से बचता हूं। निष्पक्षता से प्रेम है। एनबीटी ऑनलाइन से पत्रकारिता को समझने की एक नई शुरुआत की है। इससे पहले फ़ोकस न्यूज़ में बतौर ट्रेनी काम किया। फ़िलहाल अपने बारे में बताने के लिए इससे ज़्यादा कुछ नहीं है। )
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