बाजार की जरूरतों के लिए रानी पद्मावती जैसी धीर-गंभीर रानी को क्यों बाजारू बना रहे हो ?

कर्नल टॉड का कहना है… कर्नल टॉड ने बियाना के युद्घ पर प्रकाश डालते हुए लिखा है:- ‘‘बाबर दिल्ली का राज्य प्राप्त करके बड़ी बुद्घिमानी के साथ सैनिक शक्तियों का संगठन करता रहा और उसके पश्चात पंद्रह सौ सैनिकों की एक सेना लेकर संग्राम सिंह से युद्घ करने के लिए वह आगरा और सीकरी से रवाना हुआ। राजस्थान के लगभग सभी राजा और मेवाड़ राज्य के सामंत अपनी सेनाएं लेकर चित्तौड़ में पहुंच गये। सबके साथ राणा संग्रामसिंह बाबर से युद्घ करने के लिए चित्तौड़  से आगे बढ़ा। कार्तिक महीने की पंचमी संवत 1584 सन 1528 ई. को राजपूत सेना ने बयाना पहुंचकर बाबर की सेना का रास्ता रोका और खानवा नामक स्थान के मैदान में संग्रामसिंह की सेना ने बादशाह बाबर की फौज का सामना किया। दोनों ओर से संग्राम अचानक हो गया। राजपूतों की विशाल सेना के द्वारा बाबर की फौज लगभग सारी काट डाली गयी। राजपूतों की शक्तिशाली सेना के सामने बाबर की फौज बुरी तरह से प्रभावित हुई। राजपूतों की विशाल सेना के द्वारा जिस प्रकार बाबर के सैनिक मारे गये और दो बार बाबर संग्रामसिंह के मुकाबले में पराजित हो चुका था उसके कारण बाबर की सेना का साहस पूर्णत: शिथिल पड़ गया।’’

कर्नल टाड हमें आगे बताते हुए स्पष्ट करता है कि राणा संग्राम सिंह को बाबर की पराजित सेना का पीछा करके उसे समाप्त कर देना चाहिए था। उसी के शब्दों में ‘‘बाबर की सैनिक निर्बलता का राणा संग्राम सिंह ने कोई  लाभ नही उठाया, नही तो उसने तातारी सेना का सर्वनाश करके बादशाह बाबर को सरलता से भारत के बाहर निकाल दिया होता।’’

राणा के पश्चात चला उत्तराधिकार का युद्ध

राणा संग्राम सिंह की मृत्यु के पश्चात उसके उत्तराधिकार का युद्घ आरंभ हो गया। कर्नल टॉड का कथन है कि-‘‘राणा संग्राम सिंह के भी अनेक रानियां थीं। राणा के मरने के पश्चात सभी रानियां अपने-अपने लडक़ों को राज्य सिंहासन पर बिठाने का प्रयास करने लगीं। एक रानी ने तो अपने लडक़े को उत्तराधिकारी बनाने के लिए यहां तक किया कि उसने बादशाह बाबर के साथ मेल कर लिया। उसका विश्वास था कि इस मेल के फलस्वरूप मेरे लडक़े को चित्तौड़ के राज्यसिंहासन पर बैठने का सौभाग्य प्राप्त होगा। अपने इस उद्देश्य की पूत्ति के लिए उसने बाबर को प्रसन्न करने के लिए भरपूर चेष्टा की। इसके लिए उसने रणथंभौर का प्रसिद्घ दुर्ग और विजय में पाये हुए मालवा राज्य के बादशाह का ताज भी बाबर को भेंट में देना निश्चित किया।’’

चित्तौड़ का गौरव होने लगा धूमिल

इस प्रकार मेवाड़ के गौरव के सूर्य राणा संग्राम सिंह के निधन के उपरांत चित्तौड़ राज्य ग्रहण का शिकार होने लगा। जिस गौरव को पीढिय़ों के संघर्ष के उपरांत राणा संग्राम सिंह और उनके पूर्ववत्र्तियों ने प्राप्त किया था, वह अपने ही लोगों के कलह और कटुता के कारण अब कलंकित हो रहा था। राणा की विभिन्न रानियों से उसके कुल सात पुत्र थे। इन सातों में से सबसे बड़े दो पुत्रों का देहांत हो गया था। ऐसी परिस्थितियों में तीसरे स्थान के पुत्र का राजा बनना निश्चित हुआ, जिसका नाम राणा रतन सिंह था।

दामोदर लाल गर्ग ने राणा संग्राम सिंह की मृत्यु तिथि 30 जनवरी 1528 बतायी है, और राणा रतन सिंह के राज्यारोहण की तिथि 5 फरवरी 1528 बतायी है। राणा रतन सिंह 1528 ई. में चित्तौड़ के सिंहासन पर बैठा। राणा रतन सिंह को अपने पिता से उत्तराधिकार में राज्यादि के ऐश्वर्य के अतिरिक्त मातृभूमि के ऋण से उऋण होने के लिए स्वतंत्रता प्रेमी भावना भी यथावत प्राप्त हुई थी, जिसे राणा भली प्रकार जानता था।

मेवाड़ का शासक बनना उस समय बहुत ही गौरव की बात होती थी। कुछ सीमा तक कई विषयों में तो भारत के कितने ही शासक राणा परिवार की ओर बड़ी आशा पूर्ण दृष्टि से देखा करते थे, और उसे अपने समस्त राजपरिवारों का सिरमौर भी स्वीकार करते थे। राणा संग्राम सिंह ने मेवाड़ के गौरव को और भी अधिक बढ़ा दिया था। इसलिए राणा रतनसिंह का उत्तरदायित्व और भी अधिक बढ़ गया था।

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