बाजार की जरूरतों के लिए रानी पद्मावती जैसी धीर-गंभीर रानी को क्यों बाजारू बना रहे हो ?

ब्लॉग : कुमार प्रियांक (यूनाइटेड हिन्दी) :- जयपुर में ‘पद्मावती’ की शूटिंग कर रहे थे संजय लीला भंसाली। अब जबरदस्ती का मसाला डालने के लिए संभवतः अलाउद्दीन ख़िलजी और रानी पद्मावती के प्रेम प्रसंग को दिखा रहे हैं उसमें। बीच में राणा रतन सिंह को पता नहीं कहाँ गायब कर दिए हैं..??!!

भैया, जब ऐतिहासिक तथ्यों पे फ़िल्म बना रहे हो, तो उसमें बाजार की जरूरतों के लिए रानी पद्मावती जैसी धीर-गंभीर रानी को क्यों बाजारू बना रहे हो..?? फिर अब ऐसे में अभी तो सिर्फ करणी सेना आगे आई है, जरूरत पड़ी तो अखिल भारतीय महासभा भी उठ खड़ी होगी..!!

रणबीर सिंह जैसे बाँके जवान और दीपिका पादुकोण जैसी खूबसूरत हीरोइन की आपसी केमिस्ट्री तो फिर भी समझ आती है, उनके आपसी प्रेम-प्रसंग को भुनाने के लिए इन्ही दोनों को फ़िल्मी पर्दे पर क्रमशः अलाउद्दीन ख़िलजी व पद्मावती बना दिए..और अब हंगामा होगा तो तड़ से कहेंगे कि मोदी राज में असहिष्णुता बढ़ रही..!! क्रिएटिव फ्रीडम का मतलब बाजार से किसी तरह भी पैसा कमाने के लिए कुछ भी दिखाना नहीं होता है..!!

उधर दूसरी तरफ़ एक असमी फ़िल्म डायरेक्टर ने हिंदी फिल्मों की वजह से उनकी असमी फ़िल्म थिएटर से हटाने के चलते सीधे उल्फा के उग्रवादी नेता परेश बरुआ से ही फेसबुक पर अपील कर दी..और म्यांमार में छुपे परेश बरुआ ने लोकल चैनल पर खुद की धमकी भी प्रसारित करवा दी..!!

सच्चाई तो यही है कि ये अधिकाँश फ़िल्म वाले कोई सकारात्मक सन्देश देने की बजाए सिर्फ मसाला बेच कर बाजार से येनकेन-प्रकारेण पैसा निकालना जानते हैं। फ़िल्म “पीके” में आमिर खान शिवलिंग पर दूध चढ़ाने को संसाधनों की बरबादी बताते हैं। तो फिर क्यों नहीं कोई उनकी फिल्में चोरी से डाउनलोड करके देखे और जो महँगे होते सिनेमा हॉल में जाने से बेहतर उतने रूपये किसी जरूरतमन्द अपाहिज को दे दे..!!

उसी फ़िल्म में खुद के मज़हब में निहित कमियाँ बताने में कोताही कर गए क्योंकि उनको पता था कि फिर फ़िल्म की बैंड बज जानी थी..इसलिए जो कमजोर कड़ी है, उसकी सहिष्णुता का फायदा उठाकर शिव जी का मजाक बनाएँ..!!

हमारे देश के संविधान में हर किस्म की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर कुछ युक्तियुक्त निर्बन्धन है..जिसका पालन किया जाना चाहिए, वरना समाज में फिर असहिष्णुता का माहौल बनेगा जो देश की क़ानून-व्यवस्था में दिक्कतें पैदा करेगा..!! अतः सरकार को चाहिए कि समय रहते इस तरह के व्यावसायिक फिल्मकारों को कड़ा सन्देश दिया जाए जो ऐतिहासिक या फिर धार्मिक तथ्यों व परम्पराओं के साथ निज स्वार्थ हेतु छेड़छाड़ करते हैं..!!

पहले ही वामपंथी इतिहासकारों ने अपने आकाओं को खुश करने व खुद संस्थागत अड्डाओं पर बैठ कर मुफ़्त की रोटी तोड़ने के लिए देश की गौरवपूर्ण सभ्यता व सांस्कृतिक इतिहास के साथ काफी छेड़छाड़ कर कबाड़ा कर रखा है..!!

अब समय आ गया है कि इन ऐतिहासिक त्रुटियों को भी दूर किया जाए और तमाम ऐतिहासिक स्थलों तथा ऐतिहासिक पुस्तकों का निष्पक्ष व तार्किक अध्ययन किया जाए, न कि पूर्वाग्रहपूर्ण। इस निमित्त ऐतिहासिक स्थलों की क्षैतिज व उर्द्धवाधर खुदाई को और भी विस्तृत किया जाए। एक गौरवपूर्ण इतिहास किसी भी देश के नागरिकों का आत्मसम्मान बढ़ाने में सहायक होता है, जो प्रकारांतर से देश के वर्तमान व भविष्य को सुधारने में भी मदद देता है..!!

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