loading...

IndiaTv231391_IndiaTva725bb_screen4

loading...

न्यायाधीश को कौटिल्य अर्थशास्त्र में धर्मस्थ की संज्ञा दी गयी है। दण्डनीति धर्म पर आधारित होनी चाहिए। कानून सबके लिए समान हो। चाहे वह राजा का बेटा हो या आम आदमी, किसी अपराध के लिए जो दण्ड निर्धारित हो, वह सबके ऊपर समान रूप से लागू हो। अभियुक्त को अपने बचाव का पूरा अवसर दिया जाए। गवाहों के बयान उसकी उपस्थिति में हो, अभियोग सिद्ध होने पर सजा अवश्य दी जाए। गवाह झूठा बयान दे तो उसे भी सजा दी जाए, निर्दोष को न फांसा जाए। गलत इल्जाम लगाने वाले से जुर्माना वसूल किया जाए और निर्दोष को जो नुकसान हुआ हो उसकी भरपाई की जाए। न्यायाधीश उन्हीं लोगों को बनाया जाए जो कानून के जानकार हों, ईमानदार और स्वच्छ छवि के हों साथ ही साथ निर्भीक हो, सही निर्णय दे, किसी के दबाव में न आए। उनको अच्छा वेतन दिया जाए। लालच या दबाव में आकर निर्णय करने वाले न्यायाधीश दण्ड के पात्र समझे जाए। न्याय की सम्पूर्ण प्रक्रिया पारदर्शी होनी चाहिए, अपराध मुक्त समाज की रचना तभी सम्भव है।

अपराधी समाज के लिए कांटा (कण्टक) होता है, उसे सजा दिलाने को चाणक्य ने ‘कण्टक शोधनÓ कहा है। अपराध छोटा हो या बड़ा अपराध है और अपराधी को सजा मिलनी चाहिये सजा अपराध के अनुरूप होनी चाहिए। कम भी नहीं और अधिक भी नहीं हत्या, डकैती, चोरी, बलात्कार जैसे बड़े अपराधों की सजा भी वैसी ही कठोर होनी चाहिए, दुस्साहस करने वालों को भी सजा मिलनी चाहिए। गाली गलौच, निन्दा, दूसरों को धमकाना आदि को चाणक्य ने ‘वाकपारूष्यÓ अपराध की संज्ञा दी। काने, गंजे, लंगडे, लूले आदि को काना, गंजा लंगड़ा कहकर सम्बोधित करना शिष्टाचार के विरूद्ध है, इसलिए दण्डनीय है। ऐसे सम्बोधन करने वालों पर जुर्माना लगाने की व्यवस्था होनी चाहिए। एक दूसरे के व्यवसाय की निंदा करने वाले, अपने देश समाज और पूजा स्थलों की निन्दा करने वाले भी दण्ड के पात्र बनते हैं।

पोस्ट जारी है Next पर क्लिक कर पूरा जरूर पढ़े …… 

1 of 3
CLICK ON NEXT BUTTON FOR NEXT SLIDE

loading...
शेयर करें