हिन्दुओं के रक्त में सेक्युलर नामक वायरस घुस गया है, इसलिए हिन्दू रामनवमी कैसे मनाएंगे ?

बहिष्कृत सिंधी शिया मुस्लिम साईं बाबा ने दिखाया था जो इसे भगवान् ही मान लिया ?

ब्लॉग : ( वैष्णवी कुमारी, यूनाइटेड हिन्दी डॉट कॉम ) :- अजमेर में स्थित सूफ़ी संत हजरत मोईनुद्दीन चिस्ती की दरगाह को कोई मुसलमान अल्लाह मानकर नहीं पूजता, बल्कि अल्लाह का बंदा मानकर ही पूजते है।

सतयुग में ऋषि विश्वामित्र ने तो अपने योग बल से एक नकली स्वर्ग ही बना दिया था। इतना सामर्थ्य होने के बाद भी उन्हें केवल एक बहुत बड़ा योगी ही माना जाता है, भगवान् नहीं! अगस्त्य मुनि ने पूरे खारे सागर को ही पी लिया था (कुम्भोदार अगस्त्य मुनि) लेकिन इतना महान चमत्कार दिखाने के बाद भी अगस्त्य को ईश्वर या ब्रह्म नहीं माना गया!

प्रश्न ये है कि इनमें से कौनसा चमत्कार इस बहिष्कृत सिंधी शिया मुस्लिम साईं बाबा ने दिखाया था जो इसे भगवान् ही मान लिया ? अगर चमत्कार दिखाया भी होता तो इसे केवल एक महान योगी और ईश्वर भक्त ही माना जा सकता था, ईश्वर तो स्वप्न में भी नहीं ?

अब अगर वेदों में प्रतिपादित भगवान् विष्णु हमारी लौकिक और तुच्छ मनोकामनाओं को फटाफट पूर्ण न कर सकें तो कोई बात नहीं; हम हिन्दू सौदेबाज लम्पट हैं। हमारे भगवान् वही है जो हमारी इच्छाओं को पूर्ण करे। फिर चाहे हमें पाकिस्तान के सिंध प्रांत से आये मानसिक बीमार मुस्लिम चाँद मियाँ उर्फ साई को ही क्यों न पूजना हो; जिसे उसकी बिरादरी वालों ने इसलिए निकाल दिया था कि वो ‘अनलहक अनलहक'(मैं अल्लाह हूँ, मैं अल्लाह हूँ) बकता रहता था। वही चाँद मियाँ महाराष्ट्र के शिरडी प्रान्त में मस्जिद में जैसे तैसे जीवन काटता था छोटे मोटे चमत्कार पाखंड दिखाकर। विचित्र है कि जो बात उसकी कौम वालों ने नहीं मानी वो आज के सेक्युलर हिन्दू मूर्ख तुरंत मान गए (कि वो भगवान् है)।

वैसे भी आज के वर्तमान हिन्दू समाज में किसी भी तरह की कोई लाज/शर्म तो है ही नहीं ! क्योंकि वैसे भी हज़ारों सालों से गुलामी के आदि हो चुके हैं। अब आज के सेक्युलर हिन्दू के पास स्वाभिमान नाम जैसा कुछ बचा नहीं है; सो हम इस कौम से बेदखल किये हुए साई बाबा को अपने नए भगवान् के रूप में पूजें। और हाँ इस मुस्लिम, अवैदिक, अपौरानिक साई बाबा को पूजने के बाद भी हम हिन्दू धर्मावलंबी ही कहलायेंगे और हिंदुओं के माथे पर काला दाग लगाएंगे!

अब और क्या बचा है? राम नवमी को हम अयोध्या या फिर राम मंदिर नहीं जाएंगे बल्कि नवविकसित तीरथ शिरडी जायेंगे और राम की जगह इस शिया मुस्लिम साई को साई ॐ साई राम (अर्थात माता जानकी के पति) कहकर पूजेंगे। हम हिन्दु इस ‘निष्कासित सिन्धी मुस्लिम साईबाबा’ को तो अब ‘भगवान् राम जो कि सनातन परब्रह्म है’ – उनके रूप में पूज रहे हैं न!

पाकिस्तान में बचे 1.8% हिंदूओ को 70 साल बाद मैरिज एक्ट का झुनझुना थमाया गया

ताकि उनको White Tiger की तरह संरक्षण कर, पाकिस्तान में पर्यटन को बढ़ावा दिया जा सके!

ब्लॉग : ( संजय कुमार, यूनाइटेड हिन्दी डॉट कॉम ) :- 1947 में गांधी के कुकर्मों से जन्मे पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान में बचे 1.8% हिंदूओ को 70 साल बाद मैरिज एक्ट का झुनझुना थमाया गया ताकि उनको White Tiger की तरह संरक्षण कर, पाकिस्तान में पर्यटन को बढ़ावा दिया जा सके और यह दुनिया को दिखाया जा सके कि ये बचे पाकिस्तानी हिंदू उस उन्नत आर्य संस्कृति और सभ्यता की देन है जिनके पुर्वज श्रीराम, लव-कुश, श्रीकृष्ण, अर्जुन, बुद्ध हुआ करते थे। जिस सभ्यता-संस्कृति​ से मोहनजोदड़ो​ जैसी उन्नत शहर – सभ्यता निकली थी। जिसके खुदाई से इसी हिंदूओ के धर्मिक प्रतीक “स्वास्तिक” और पशुपति की मुर्तियां मिली है।

उसी तरह एक बंग्लादेश है जहां आज से 70 साल पहले 30% हिंदू हुआ करते थे जो अब सिर्फ 8-9% बचे है। यहां भी ये विलुप्त होने वाले है। फिर जब 2% बच जायेंगे तो यहां भी White Tiger बचाओ की तरह अभियान चलाया जायेगा ताकि शांति दुतो के देश में इनको पिजड़े में बंद कर, पर्यटन को बढ़ावा दिया जा सके।

इसी आर्य संस्कृति का विश्व में एक बहुसंख्य राष्ट्र भारत भी अभी बचा है जहां की पिढ़ी अपने मुल से कटकर, अपनी सभ्यता, संस्कृति और स्वतंत्रा को बचाये रखने के लिए संघर्ष करती दिख रही है क्योंकि इस भारत को सेकुलर बनने का एक ऐसा भयंकर रोग लग चुका है जिससे इसके पुर्वी​ (बंगाल) और दक्षिण (केरल) क्षेत्र भयंकर पिड़ित हो, अपने मरणासन्न की अवस्था में अपने उधार के लिए किसी नायक की आश में है। वैसे इनको एक और रोग है। कभी के कर्मयोग के सिद्धांत को जाति मे बदल। वह हर बात में अपनी-२ जाति खोजते हैं जिससे इनकी एकता भंग होती है और कमजोर साबित होते है।

एक उन्नत सभ्यता और संस्कृति का ऐसा भी हष्र हो सकता है क्योंकि वह पश्चिम से आये विघटनकारी विचारों के बहकावे और अत्याचार से अपनी ज्ञान, विज्ञान, प्राकृति, शुरवीरता को भुल, हीन भावना की शिकार होती गयी है।

लेकिन आज 21वी सदी की युवा पिढ़ी जागरूक हो रही है वह क्षणिक स्वार्थों का त्याग कर, एकताबद्ध हो रही है जो एक सुखद संदेश है।

जागते रहो जगाते रहो!

इस्लाम मजहब से जुड़ जाते ही एक दो पीढ़ियों के व्यक्ति की सोच में ही कैसा फर्क पड़ता है ?

लेकिन यही हिन्दू जब मुसलमान बन गए तो ५:४८ या १३:३१ में कही यही बात को पूर्ण और अंतिम सत्य तो मानते ही हैं।

ब्लॉग: ( केशर देवी, एडिटर – यूनाइटेड हिन्दी डॉट कॉम ) अगर कोई कृष्णभक्त कहे कि कृष्ण ने कहा है कि मैं चाहता तो हर किसी को मेरा भक्त ही पैदा करता लेकिन तुम्हारी परीक्षा लेने के लिए अलग अलग बनाए हैं। जो मुझे नहीं मानेंगे उनपर विपदाओं के पहाड़ टूटेंगे ये मेरा वादा रहा। पता नहीं कितने हिन्दू उसकी सुनते और पता नहीं कितने हिन्दू उसे क्या क्या सुनाते। इतना तो अवश्य सुनाते कि ये तेरा कृष्ण कैसा भगवान है रे, जो दुनिया में लोगों के बीच अपने को ही भगवान मानने के लिए खूनखराबा करवा रहा है ? खुद ही सब को अपना भक्त बनाकर न भेजता ? जो मारे जा रहे हैं उनके घरवालों की हाय का भागी कौन ?

लेकिन यही हिन्दू जब मुसलमान बन गए तो कुरान की आयात ५:४८ या १३:३१ में कही यही बात को पूर्ण और अंतिम सत्य तो मानते ही हैं और उसे सत्य कराने के लिए हथियार भी उठाते हैं और खुद से हथियार न उठे तो जो उठाये उनके लिए अपना धन लुटा रहे हैं क्योंकि वे कुरान आयात ९:३५ से ९:४० को भी इतना ही अंतिम सत्य मानते हैं।

कैसा फर्क पड़ता है व्यक्ति के सोच में, एक दो पीढ़ियों में ही ? कितनी प्रोग्रामिंग होती होगी दिमाग की जो तर्क और तथ्य से चलना छोड़ देता है आदमी ?

यहाँ वो बंदरों वाले प्रयोग का किस्सा याद आता है जहाँ उंचाई पर टंगे केले के घड को एक भी बन्दर के छूते ही सब पर जोर से पानी की धार मारी जाती थी। इसके चलते सब के दिमागों में ये बात प्रोग्राम हो गई कि केले के घड को छूना नहीं है। यहाँ तक कि जब धार मारना बंद हो गया तब भी वे सब न खुद छूते थे न किसी दूसरे बन्दर को छूने देते थे, उस पर हमला कर देते थे। एक एक करके सब बन्दर बदल दिए गए, लेकिन सब में यही भाव बना रहा, कोई भी बन्दर दूसरे बन्दर को केले के घड को छूने से रोकता ही था।

देखने लायक बात यह थी कि बाकी बातों में बन्दर नार्मल थे, बस वो ऊपर टंगे केले के घड़े के बारे में सोचने से भी खुद को ही रोक रहे थे।

कुछ ऐसी ही बात हिन्दू के सेक्युलर हो जाने से होती है जो वो भी ऐसी बातों पर सवाल उठाने से डरता है। हाँ, वेद, पुराण, उपनिषदादि पर आलोचना करते वक्त उसको कोई रोक नहीं सकता, खुद का घोर अज्ञान भी नहीं।

डार्विन बाबा बन्दर को मानव का पूर्वज मानते थे आप को पता ही होगा! और हाँ, मदारियों का धर्म या मजहब क्या होता है यह भी देखिये कभी नाम पूछकर ?

कुछ कहेंगे ? सहमत हैं तो शेयर या कोपी पेस्ट का अनुरोध तो है ही …. 

बाबरी मस्जिद विवाद और वामपंथी फरेब के कारण हुई राम मंदिर निर्माण में इतने वर्ष की देरी

क्रॉस एग्जामिनेशन में पकड़े गए इनके फरेबों के कुछ दृष्टांत आपको हैरत में डाल देंगे :-

ब्लॉग : ( पारिजात सिन्हा ) :- इलाहाबाद उच्च न्यायालय के ऐतिहासिक फैसले ने विवादित स्थल पर मंदिर होने के शोधपूर्ण वैज्ञानिक निष्कर्षों की पुष्टि तो की ही थी, साथ ही साथ वामपंथी इतिहासकार इरफ़ान हबीब की अगुवाई में मस्जिद-कमिटी की ओर से गवाह के तौर पर पेश हुए देश के तमाम वामपंथी इतिहासकारों के फरेब को उजागर भी किया था । न्यायालय को ये टिप्पणी करनी पडी थी कि इन इतिहासकारों ने अपने रवैये से उलझाव, विवाद, और सम्प्रदायों में तनाव पैदा करने की कोशिश की और इनका विषय-ज्ञान छिछला है । क्रॉस एग्जामिनेशन में पकड़े गए इनके फरेबों के कुछ दृष्टांत आपको हैरत में डाल देंगे :-

(1) वामपंथी इतिहासकार प्रोफ़ेसर मंडल ने ये स्वीकारा कि खुदाई का वर्णन करती उनकी पुस्तक दरअसल उन्होंने बिना अयोध्या गए ही (मामले को भटकाने के लिए ) लिख दी थी ।

(2) वामपंथी इतिहासकार सुशील श्रीवास्तव ने ये स्वीकार किया कि प्रमाण के तौर पर पेश की गयी उनकी पुस्तक में संदर्भ के तौर पर दिए पुस्तकों का उल्लेख उन्होंने बिना पढ़े ही कर दिया है ।

(3) जेएनयू की इतिहास-प्रोफ़ेसर सुप्रिया वर्मा ने ये स्वीकार किया कि उन्होंने खुदाई से संदर्भित ‘राडार सर्वे’ की रिपोर्ट को पढ़े बगैर ही रिपोर्ट के गलत होने की गवाही दे दी थी ।

(4) अलीगढ मुस्लिम यूनिवर्सिटी की प्रोफ़ेसर जया मेनन ने ये स्वीकारा कि वे तो खुदाई स्थल पर गयी ही नहीं थी लेकिन ये (झूठी) गवाही दे दी थी कि मंदिर के खंभे बाद में वहां रखे गए थे ।

अब प्रस्तावित मंदिर का मॉडल ये नजर आयेगा…

(5) ‘एक्सपर्ट’ के तौर पर उपस्थित वामपंथी सुविरा जायसवाल जब क्रोस एग्जामिनेशन में पकड़ी गयीं तब उन्होंने स्वीकार किया कि उन्हें मुद्दे पर कोई ‘एक्सपर्ट’ ज्ञान नहीं है; जो भी है वो सिर्फ ‘अखबारी खबरों’ के आधार पर ही है ।

(6) पुरात्व्वेत्ता वामपंथी शीरीन रत्नाकर ने सवाल-जवाब में ये स्वीकारा कि दरअसल उन्हें कोई “फील्ड-नॉलेज” है ही नहीं ।

(7) “एक्सपर्ट” प्रोफ़ेसर मंडल ने ये भी स्वीकारा था, “मुझे बाबर के विषय में इसके अलावा – कि वो सोलहवीं सदी का एक शासक था – और कुछ ज्ञान नहीं है! न्यायधीश ने ये सुन कर कहा था कि इनके ये बयान विषय सम्बंधित इनके छिछले ज्ञान को प्रदर्शित करते है ।

(8) वामपंथी सूरजभान मध्यकालीन इतिहासकार के तौर पर गवाही दे रहे थे पर क्रॉस एग्जामिनेशन में ये तथ्य सामने आया कि वे तो इतिहासकार थे ही नहीं, मात्र पुरातत्ववेत्ता थे ।

(9) सूरजभान ने ये भी स्वीकारा कि डी एन झा और आर एस शर्मा के साथ लिखी उनकी पुस्तिका “हिस्टोरियंस रिपोर्ट टू द नेशन” दरअसलद खुदाई की रपट पढ़े बगैर ही (मंदिर संबंधी प्रमाणों को झुठलाने के) दबाव में केवल छै हफ्ते में ही लिख दी गयी थी ।

(10) वामपंथी शिरीन मौसवी ने क्रॉस एग्जामिनेशन में ये स्वीकार किया कि उन्होंने झूठ कहा था कि राम-जन्मस्थली का ज़िक्र मध्यकालीन इतिहास में नहीं है ।

दृष्टान्तों की सूची और लम्बी है । पर विडंबना तो ये है कि लाज हया को ताक पर रख कर वामपंथी इतिहासकार रोमिला थापर ने इन्हीं फरेबी वामपंथी इतिहासकारों व अन्य वामपंथियों का नेतृत्व करते हुए न्यायालय के इसी फैसले के खिलाफ लम्बे लम्बे पर्चे भी लिख डाले थे । पर शर्म इन्हें आती है क्या ?

(सन्दर्भ : Allahabad High court verdict dated 30 September 2010 )

इस प्रश्न को हिन्दू-मुस्लिम विवाद का रूप देने वालों को तत्काल जेल में बन्द कर देना चाहिए

यह शुद्ध रूप से राजनैतिक मसला हो गया है।नहीं तो वास्तविकता तो हर मुसलमान जनता है।आम मुसलमान भूमि छोड़ना भी चाहे तो कथित मुस्लिम धर्म ठीकेदार ऐसा नहीं होने देंगे।

ब्लॉग : विनय झा ( यूनाइटेड हिन्दी डॉट कॉम ) :- बाबरी मस्जिद के नीचे विशाल हिन्दू मन्दिर के साक्ष्य भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने सर्वोच्च न्यायालय को सौंप दिया था जिसपर सर्वोच्च न्यायालय वर्षों से कुण्डली मारकर बैठी है और अब कहती है कि (इस पुरातात्विक साक्ष्य को किनारे करके) “बातचीत” द्वारा हल ढूँढना चाहिए !

सर्वोच्च न्यायालय ने ही रामजन्मभूमि मन्दिर के साक्ष्य माँगे थे जिसपर पहले तो मनमोहन सरकार ने कहा था कि राम जी काल्पनिक हैं, जिस कारण पुरातात्विक उत्खनन हुआ, और अब उस साक्ष्य को सर्वोच्च न्यायालय द्वारा ही अनदेखा किया जा रहा है ।

यही कारण है कि बाबरी एक्शन कमिटी को सर्वोच्च न्यायालय पर पूरा भरोसा है। क्या आप लोगों को सर्वोच्च न्यायालय पर पूरा भरोसा है ?

बाबरी एक्शन कमिटी का कहना है कि बातचीत से कोई हल नहीं निकलेगा, अदालत को फैसला करना चाहिए, जबकि हिन्दुत्ववादियों ने बातचीत का स्वागत किया है।

मस्जिद में अल्लाह या मुहम्मद साहब पैदा नहीं हुए थे और न ही उनकी मूर्ति की प्राणप्रतिष्ठा की जाती है, मस्जिद केवल नमाज पढने की सुविधा हेतु बनाया स्थान है जिसे आवश्यकता पड़ने पर विस्थापित करने से मजहब को कोई क्षति नहीं पंहुचती। किन्तु रामजन्मभूमि को अन्यत्र विस्थापित करना असम्भव है। यह साधारण बात बाबरी एक्शन कमिटी और मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के पल्ले नहीं पड़ती, पुरातात्विक साक्ष्य भी उनके लिए बेमतलब हैं। वे भली-भांति जानते हैं कि श्रीराम के मन्दिर को तोड़कर मस्जिद बनाया गया था, फिर भी मस्जिद हटाने के लिए तैयार नहीं हैं।

अतः मामला गुण्डागर्दी का है, मजहब का नहीं ! इस्लाम तो नहीं कहता कि हिन्दू मन्दिर को तोड़कर उसके मूर्ति वाली दीवारों द्वारा मस्जिद बनाना चाहिए। जिस बाबरी मस्जिद को 1992 में तोड़ा गया था उसके प्रवेश द्वार के एक खम्बे का एक फोटो मैं संलग्न कर रहा हूँ जो सिद्ध करता है कि प्राचीन हिन्दू मन्दिर की दीवारों और खम्बों द्वारा ही बाबरी मस्जिद बनी थी (यह फोटो और अनेक अन्य फोटो 1992 में ही मस्जिद टूटने से कुछ पहले एक सांसद द्वारा लोकसभा में दिखाए गए थे)।  जिस मस्जिद की दीवारों में हिन्दू मूर्तियाँ हों उसे मस्जिद नहीं माना जा सकता, उसमें नमाज पढ़ना कुफ्र है। अतः जो लोग बाबरी मस्जिद में नमाज पढ़ना चाहते हैं वे काफिर हैं। बाबरी एक्शन कमिटी के नेताओं ने भी बाबरी मस्जिद में कभी नमाज नहीं पढ़ी, वे लोग केवल हिन्दूओं का मानमर्दन करने की जिद ठाने हुए हैं। सुब्रह्मण्यम स्वामी भी यह बात अदालत को नहीं बता पा रहे हैं कि हिन्दू मन्दिर के अवशेषों से बने मस्जिद में नमाज नहीं पढ़ा जा सकता।

जिन हिन्दू मन्दिरों को तोड़कर वहाँ मस्जिदें बनायी गयी वहाँ पुनः मन्दिर बनाना ही पडेगा। इस प्रश्न को हिन्दू-मुस्लिम विवाद का रूप देने वालों को जेल में बन्द कर देना चाहिए, क्योंकि महमूद गजनवी और बाबर जैसे विदेशी डाकुओं द्वारा मन्दिरों का ध्वंस करने का मामला है, भारतीय मुस्लिम बनाम हिन्दू का मामला नहीं है।

ब्लॉग : पीएम नरेंद्र मोदी के अंधविरोधी हैं उनकी सबसे बड़ी शक्ति

मोदी के अंधविरोधी हैं उनकी सबसे बड़ी ताकत

ब्लॉग : Neeraj Badhwar (facebook Coyp) :- बीजेपी को यूपी में 325 सीटें मिलने के बाद से बहुत से लोग इसे लेकर काफी हैरान हैं। ये वो लोग हैं जो ‘स्थानीय लोगों’ से की गई बातचीत और ‘ज़मीनी हालात’ के आधार पर बीजेपी की हार का दावा और दुआ कर रहे थे। और जब योगी आदित्यनाथ वहां मुख्यमंत्री बन गए, तो ये समझ नहीं पा रहे कि ऐसा कैसे हो गया?

इसी तरह की हैरानी इन्हें तब भी हुई थी जब 3 साल पहले नरेंद्र मोदी अपने दम पर प्रधानमंत्री बन गए थे। यूं तो मैं ज़्यादा लंबा लिखने से बचता हूं मगर अब इस वर्ग की हैरानी इतनी दयनीय लगने लगी है कि सोचा अपने भी कुछ विचार साझा कर लूं।

पहली बात उन पत्रकारों की हैरानी के बारे में जो दावे तो कुछ और कर रहे थे और हुआ कुछ और। उनसे मुझे ये कहना है कि भाई आप किसी भी मुद्दे पर तय निष्कर्ष के साथ अपनी ही सोच वाले मेहमान बुलाकर अगर ‘निष्पक्ष’ चर्चा करोगे तो उस चर्चा से वही निकलकर आएगा जो आप चाहोगे।

अगर आप खुद से अलग सोच रखने वाले व्यक्ति को सोशल मीडिया के हर प्लेटफॉर्म पर ब्लॉक करते रहोगे, तो आप उन ही लोगों से घिर जाओगे जो आप जैसा सोचते होंगे या आपकी ही सोच का गुणगान करते होंगे। अब ऐसे लोगों की संगत से आप किसी ‘ज़मीनी हकीकत’ का अंदाज़ा लगाएंगे, तो आप खुद को अंधेरे में रखेंगे और ये अंधेरा आपकी टीवी स्क्रीन से भी ज़्यादा गहरा और काला होगा ।

अब बात करते हैं बीजेपी की जीत की। मुझे ईमानदारी से लगता है कि 2014 में जब प्रधानमंत्री पद के लिए मोदी की उम्मीदवारी सामने आई थी, तो बहुत से लोग उनमें एक ईमानदार प्रशासक तो देखते थे मगर इस बात का भरोसा बहुत कम लोगों को था कि वो बीजेपी को बहुमत दिला सकते हैं। मगर इसके बाद साम्प्रदायिकता के नाम पर उन्हें विपक्षी दलों, मीडिया और ख़ास वर्ग की तरफ से इतनी गालियां दी गईं कि इन गालियों ने उनके लिए वो काम कर दिया जो खुद मुख्यमंत्री रहते उनका काम भी नहीं कर पाता!

मगर अंध विरोधियों के ये बात न तब समझ आई थी न अब आई है। उन्हें ये मामूली बात समझ नहीं आई कि मोदी को मोटे तौर पर लोगों ने विकास के एजेंडे पर ही चुना था और अगर उन्हें मोदी को किसी मुद्दे पर घेरना है तो वो भ्रष्टाचार और विकास से ही जुड़ा हो सकता है।

मगर ये तो तर्क की बात हो गई। और जब हम किसी से नफरत करते हैं, तो तर्क तो इस्तेमाल की जाने वाली आखिरी चीज़ होती है। आप बीवी को साथ न रखने के लिए उनका मज़ाक बनाओगे, विदेश यात्राओं के लिए खिल्ली उड़ाओगे, कपड़ों के लिए तंज कसोगे। इस तरह से जितने non issue थे हर किसी को issue बनाने की कोशिश की गई। दादरी जैसे अपवाद को देश का करंट स्टेटस बताकर उसे बढ़ती असहिष्णुता से जोड़ा गया। अवॉर्ड लौटाए गए, कन्हैया कुमार पैदा किए गए, स्क्रीनें काली की गईं। खुद ही एक दूसरे की पीठी खुजा और थपथपाकर ये तसल्ली भी कर ली गई कि हम सही रास्ते पर जा रहे हैं मगर हुआ क्या?

मैं हमेशा ये कहता हूं कि जनता बड़ी संयमी होती है। वो सरकारों के विश्लेषण करने में वैसी बेसब्र और पूर्वाग्रही नहीं होती जैसा एक ख़ास वर्ग होता है। जब तक उसे लगता है कि सरकार की नीयत साफ है, वो ईमानदारी से काम कर रही है, जो कर सकती थी कर रही है,तब तक लोगों का उस पर भरोसा डगमगाता नहीं।

उससे भी बड़ी बात पत्रकारों या धार्मिक कट्टरपंथियों के उलट आम आदमी को किसी नेता को खारिज ही नही करना होता, उसे चयन भी करना होता है। आप कहते हैं मोदी बुरा है… मोदी बुरा है…तो…अच्छा कौन है…राहुल गांधी!

बड़ा ताज्जुब होता है कि जिस राहुल गांधी ने सक्रिय राजनीति में आने के बाद कांग्रेस को दो दर्जन से ज़्यादा चुनाव हरवा दिए, उसकी ये वर्ग चर्चा नहीं कर रहा। पंजाब में केजरीवाल के हारने पर उसे दिल्ली में उनके काम पर मिले जनादेश के तौर पर नहीं देख रहा मगर ये सवाल ज़रूर पूछ रहा है कि योगी आदित्यनाथ को सीएम क्यों बना दिया? लोगों ने तो विकास के लिए बीजेपी को वोट दिया था।

भाई इतनी तो राजनीतिक समझ पैदा करो जब जनता किसी पार्टी को तीन चौथाई से भी ज़्यादा समर्थन देती है, वो भी यूपी जैसे राज्य में, तो वो समर्थन नहीं देती बल्कि अपने भरोसे का समर्पण करती है। वो कहती है कि भरोसा किया है चाहो जो कर लो। मगर अब भी बजाए इस जनसमर्थन को समझने के इस नुख्ताचीनी में लगे हैं कि घर का शुद्धीकरण क्यों करा दिया, सांसद को मुख्यमंत्री क्यों बना दिया।

मार्क ट्वेन ने कहा था गुस्सा उस तेजाब की तरह होता है जो जिस प्याले में होता है उसे ही सबसे ज़्यादा नुकसान पहुंचाता है। किसी के प्रति नफरत भी वैसे ही होती है। तभी तो देखिए न जो मोदी 2014 में प्रधानमंत्री बनते नहीं दिख रहे थे उन्हें प्रधानमंत्री बनवा दिया और जो बीजेपी पिछली बार 50 सीटें नहीं ला पाई थी वो सवा तौन के पार चली गई। और ये सब हुआ है तो इसमें मोदी का कम और उनके इन अंधविरोधियों का प्रताप ज़्यादा है!

विडियो : जब योगी आदित्यनाथ के रूप में हिंदू का अस्तित्व बेबसी के आंसू रो रहा था !

वर्ष 2006 में लोकसभा में पुलिस‍ की प्रताड़ना का जिक्र करते हुए योगी रोने लगे थे, तब मुलायम सिंह यादव यूपी के सीएम थे।

यूपी में सीएम को लेकर लखनऊ में फैसला हो गया है और अब योगी आदित्यनाथ उत्तर प्रदेश के नए मुख्यमंत्री है। ऐसे में बात जब भाजपा के इस कद्दावर नेता योगी आदित्यनाथ की होती है तो जो बात सबसे पहले जहन में आती है वो उनकी बुलंद शख्सियत और शेर की दहाड़ जैसी आवाज़।

कहते हैं “किसी तितली को भी बेवजह कष्ट दिया, तो उसके पीड़ा से फड़फड़ाते हुए पंखों से एक तरंग उठती है जो अपने हिसाब से समय लेती है और ब्रह्मांड के अज्ञात क्षेत्रों से अनंत गुना शक्तिशाली होकर पीड़ा देने वाले पर ही कहर बनकर टूटती है।”

कल से 2006 का संसद का वीडियो देख रहा हूँ। योगी आदित्यनाथ के रूप में हिंदू का अस्तित्व बेबसी के आंसू रो रहा था। सामने बैठे सेकुलर गिरोह कपटी मुस्कान से एक दूसरे को देख रहे थे। वर्ष 2006 में लोकसभा में पुलिस‍ की प्रताड़ना का जिक्र करते हुए योगी रोने लगे थे, तब मुलायम सिंह यादव यूपी के सीएम थे।

तब सोशल मीडिया इतना मुखर नहीं था। हम सब समझ कर भी टीवी और अखबारों की थोपी हुई खबरों से ही संतुष्ट होने को बाध्य थे। तब एक भावुक संन्यासी के आंसू की जो छोटी सी तरंग थी, आज वह ज्वालामुखी सी फटी है और तमाम कुटिल मुस्कानों के चेहरों पर राख पुती है।

अहंकारी इटैलियन मॉम का बाबा आज राष्ट्रीय विदूषक के रूप में स्थापित हो पप्पूत्व को उपलब्ध हो चुका है। तमाम वामी खलकामी गुट नंगे भिखारी सी हालत में हैं। सपा बसपा का कमीनापन उनके अपने ही वोटबैंक ने नकारकर उनको सड़कछाप कर दिया है।  हिंदू की ऊर्जा अभी ज्वार पर है। इसे समझना होगा। हमें वो गलती नहीं करनी है जो इन्होंने की।

मरते हुए शत्रु को देखकर जो सुख मिलता है वो बहुत सम्मोहक होता है। परंतु उस सम्मोहन के परे उसे एक घूंट गंगाजल पिलाकर शांति से मरने देना श्रेयस्कर है।

अवधूत बाबा शिवानंदजी की एक बात कभी भूल नहीं सकता, “Don’t ever respond to negativity.” कभी भी नकारात्मकता को प्रतिक्रिया मत दो।

 

कभी सोचा है कि इतने आधातों को सहकर भी आज हिन्दू कैसे बचे हैं, ये धर्म कैसे बचा है?

आपने कभी सोचा है कि इतने आधातों को सहकर भी हम आज हिन्दू कैसे बचे हैं ? हमारा धर्म कैसे बचा है ? फोटो Source : santabanta.com

ब्लॉग : महावीर प्रसाद खिलेरी (संपादक यूनाइटेड हिन्दी डॉट कॉम) : हिन्दू समाज शायद दो हज़ार सालों से गुलाम रहा है! हमारे ऊपर सदियों तक इस्लामी शासन रहा फिर कई रूपों में ईसाईयों ने हम पर शासन किया फिर 1947 में जब देश तथाकथित रूप से आजाद हुआ तब हमसे हमारा धर्म छीनने मिशनरी लोग आ गये, लालच दिया, कई जगह डर दिखाया, कई जगह अहसान जता कर उसकी कीमत मत-परिवर्तन के रूप में वसूलनी चाही, हमारे ऊपर न जाने कितने मोपला और मीनाक्षीपुरम हुए। आपने कभी सोचा है कि इतने आधातों को सहकर भी हम आज हिन्दू कैसे बचे हैं ? हमारा धर्म कैसे बचा है ?

आज हम हिन्दू इसलिये हैं क्योंकि हमारे पूर्वजों ने अपना धर्म नहीं छोड़ा। डर, हिंसा, प्रपंच, लालच, षड्यंत्र सबके बीच सदियों तक संघर्ष करते रहे। हमारे एक पूर्वज इधर राजस्थान में घास की रोटी खाकर हिन्दू धर्म बचा रहे थे तो उधर पंजाब में हिन्दू धर्म को बचाने के लिये कुछ पूर्वज जीवित ही दीवार में चुनवा दिये गये। अपने उन पूर्वजों के बारे में भी दो मिनट सोचिये जिन्होनें धर्म बदलने की जगह मैला उठाने के काम को चुना था। हकीकत राय के बलिदान के बारे में सोचिये, दक्षिण भारत की माँ रुद्र्माम्बा देवी के त्याग का स्मरण कीजिये, पूरब के वीर लाचित बरफूकन का स्मरण कीजिये और न जाने ऐसे कितने नाम है जिन्होनें अपना सर्वस्व खो कर हिन्दू धर्म को बचाये रखा। ये सब किसी एक जाति-विशेष के नहीं थे !

आप योगी जी की प्रशासनिक क्षमता पर सवाल इसलिये नहीं उठा रहे कि आपको वास्तव में इस बात की कोई फ़िक्र है कि वो शासन कैसे चलायेंगे! दरअसल वजह ये है कि योगी जी में आपने किसी ठाकुर को ढूंढ लिया है जो आपको पीड़ा दे रहा है। योगी जी के ऐब आप इसलिये ढूंढ रहें हैं क्योंकि मोदी जी ने आपके जात वाले को मुख्यमंत्री नहीं बनाया। इसी तरह जब आप योगी जी को ठाकुर अजय सिंह विष्ट लिख रहें हैं तो आप उन्हें एक जाति विशेष से बाँध रहें हैं, जाहिर है फिर बाकी जाति वाले भी उन्हें उसी रूप में लेंगें।

अपनी जातिवादी मानसिकता में जब हम किसी के बारे में कुछ लिखतें हैं, किसी जाति के मूल पर प्रश्न उठाते हैं तो एक बार ये भी सोच लीजिए कि आपने गाली किसको दी है ? आप उनको गाली दे रहें हैं उनके कारण हम हैं वर्ना हम भी आज पीटर या जुम्मन बनकर जी रहे होते ! वो पूर्वज चाहे किसी भी जाति के हों पर वो सब हमारे लिये वन्दनीय है क्योंकि उन्होंने हमारे लिये उस धरोहर (हिंदुत्व) को सहेजे रखा जिसका अनुपालन मनु, परशुराम, श्रीराम, श्रीकृष्ण, श्री बुद्ध से लेकर गुरु गोविन्द सिंह करते थे।

हम या आप जिस जाति में पैदा हुयें हैं वो हमारी या आपकी चॉइस नहीं थी, भगवान की मर्जी थी। ईश्वर की मर्जी पर जो सवाल उठाये, उसके सृजन को किसी भी रूप में लांछित करे उससे कृतघ्न और अज्ञानी कोई नहीं हो सकता। मैं कभी किसी दलित को गाली नहीं देता, इसलिये नहीं कि वो गलत नहीं हो सकते बल्कि इसलिये क्योंकि इतने दंशों, अत्याचारों और प्रलोभनों को सह कर भी आज वो हिन्दू है। इस देश की मुख्य-धारा में है और कम से कम हमारे अस्तित्व को लीलने वाला खतरा नहीं है। मैं कभी किसी क्षत्रिय को गाली नहीं देता क्योंकि उनके पूर्वजों ने सदियों तक हमारे भारत की अखंडता अक्षुण्ण रखने के लिये बलिदान दिया है। मैं किसी ब्राह्मण को गाली नहीं देता क्योंकि दुनिया में भारत को विश्व-गुरु बनाने का गौरव उनके पूर्वजों का था। मैं किसी वैश्य को गाली नहीं देता क्योंकि इन्होंनें अपनी धन-संपत्ति राष्ट्र-रक्षा में कई बार न्योछावर की है। इसी तरह मैं अपने किसी वनवासी बंधू को अपमानित करने का भी पाप नहीं करता, ये तो तबसे धर्म रक्षक रहें हैं जब भगवान राम इस धरती पर आये थे।

अपने जातिगत पूर्वाग्रहों को छोड़िये वरना प्रकृति सौभाग्य को दुर्भाग्य में बदलने में जरा भी देर नहीं करती।

गंगा-यमुना को जीवित मनुष्य के समान कानूनी अधिकार देने का फैसला

गंगा-यमुना को मनुष्य मानने का वैदिक आधार

यूनाइटेड हिन्दी स्पेशल रिपोर्ट : आज नैनीताल हाईकोर्ट ने गंगा नदी को देश की पहली जीवित इकाई के रूप में मान्यता दी है और गंगा-यमुना को जीवित मनुष्य के समान अधिकार देने का फैसला किया है। इस फैसले के बाद भारत की दोनों महत्वपूर्ण नदियों गंगा और यमुना को अब एक मानव की तरह संविधान की ओर से मुहैया कराए गए सभी अधिकार मिल सकेंगे। कुछ दिनों पहले ही न्यूजीलैंड ने भी अपनी वांगानुई नदी को एक जीवित संस्था के रूप में मान्यता दी थी।
यह बहुत ही सराहनीय कदम है कि दोनों पवित्र नदियों को कोर्ट ने जीवित मानकर मनुष्यों के सभी संवैधानिक अधिकार दे दिए हैं पर न्यूजीलैंड से पहले हम यदि ऐसा करते तो बात ही अलग होती। क्योंकि हम तो गंगा यमुना को माता कहकर मनुष्य और उससे भी ऊपर देवता की कोटि में रखते आए ही हैं, खैर अदालत ने यह फैसला देकर वैदिक संस्कृति का मान बढ़ाया है।

आजकल लोग हम पर जड़ वस्तुओं की पूजा और उन्हें चेतन मानने का आरोप लगाते हैं, इसके निराकरण के लिए वैदिक मान्यता की ओर हम चलते हैं ताकि हमारी इन समृद्ध मान्यताओं का स्त्रोत जान सकें। ध्यानपूर्वक पढ़िए।

वैदिक मान्यता में एक ‘मन’, दूसरा ‘प्राण’, और ‘पंचमहाभूत’ रूप सात तंतुओं से वह बुनकर (परमात्मा) इस सृष्टि रूपी पट को बुन रहा है। वेद ने उस महान कवि की सृष्टिरूप इस कविता को सप्ततंतुमय यज्ञ कहा है।

पंचभूत को वैदिक परिभाषा में ‘वाक्’ कहते हैं क्योंकि इनमें सूक्ष्मतम भूत ‘आकाश’ है, उसका गुण ‘शब्द’ या ‘वाक्’ है। यह सूक्ष्म भूत ‘आकाश’ ही सब अन्य भूतों में अनुस्यूत होता है इसलिए वाक् को ही पंचमहाभूत का सरल प्रतीक मान लिया गया।

शतपथ ब्राह्मण कहता है आत्मा के तीन घटक हैं— ‘अयमात्मा वांमयो मनोमयः प्राणमयः।’ अर्थात आत्मा मन, प्राण और वाक् से बनी है। सप्त तंतु रूप इस मन, प्राण और वाक् को ही त्रिक् कहते हैं। मन सत्व, प्राण रज और वाक् तम रूप है। सृष्टिरचना की वैदिक कल्पना इसी त्रिक पर आश्रित है। मन, प्राण और वाक् इस त्रिक के सम्मिलित सम्बन्ध से ही एक शक्ति या अग्नि उत्पन्न होती है, वही वैश्वानर अग्नि है। त्रिक के मिलन से उत्पन्न वैश्वानरः अग्नि से ही जीवन अभिव्यक्त हो पाता है। यह जब तक है तभी तक जीवन है।

इस त्रिक में से प्राण को हम एनर्जी(Energy) कह सकते हैं, पर Energy की अवधारणा जड़ भूतों से जुड़ी है जबकि वैदिक प्राण की अवधारणा जीवित शरीर से जुड़ी है। वैदिक दृष्टि के अनुसार चेतना ही भूत के रूप में परिणत होती है अर्थात मौलिक तत्व चेतना है और भूत उसका विकार है। इसलिए वैदिक दृष्टि में परमार्थतः सब कुछ चेतन ही है, जड़ कुछ है ही नहीं। चेतना जहाँ ज्यादा आवृत्त हो गई, कि हमारी दृष्टि में नहीं आती वही जड़ है। समस्त सृष्टि मन, प्राण और वाक्(पंचमहाभूत) के त्रिक से ही बनी है, यही मात्राभेद से सभी पदार्थों के घटक हैं। पर जैसे जैसे हमें छिपी हुई चेतना को पहचानने के साधन उपलब्ध हो जाते हैं, वैसे वैसे हम जिसे कल तक जड़ समझते थे उसे चेतन के रूप में जानने लगते हैं।

देखिए सर जगदीशचन्द्र बसु से पहले वनस्पतियों को आधुनिक विज्ञान में जड़ समझा जाता था पर जैसे ही बसु जी को समुचित उपकरण उपलब्ध हो गए, उन्होंने सिद्ध कर दिया कि वनस्पति में प्राण हैं। कम लोग जानते हैं कि जगदीश बोस वैदिक विद्याओं का भी ज्ञान रखते थे। महर्षि मनु की स्पष्ट घोषणा है कि वनस्पतियों में भी चेतना है और वे सुख दुख अनुभव करते हैं — ‘अन्तःसंज्ञा भवन्त्येते सुख दुखःसमन्विता।’

इसी तरह विज्ञान अब तक नदियों, पर्वतों आदि को जड़ माने हुए है पर वेद नदियों से कहता है कि, — ‘इमं मे गंगे यमुने सरस्वति’ ‘हे गंगा, यमुना और सरस्वती नदियों! मेरी प्रार्थना सुनो’ (ऋग्वेद 10.75.5)। यह इसीलिए क्योंकि सभी पदार्थों में आत्मा है और आत्मा है तो प्राण भी है, मन भी है और वाक् भी है, मन है तो सोचने की क्षमता भी है, इसलिए उन्हें सम्बोधित करना कि वे प्रार्थना सुनें बिल्कुल ठीक है। इसके अतिरिक्त जीवन की अभिव्यक्ति वैश्वानर अग्नि से ही होती है, वेद स्पष्ट रूप से जल में वैश्वानर अग्नि की बात कहता है, — ‘वैश्वानरो यास्वगनिः प्रविष्टः’ (ऋग्- 7.49.5) अर्थात जल में वैश्वानर अग्नि विद्यमान है।

वेद में जड़ पदार्थों से चेतन व्यवहार के अनेक प्रमाण मिलते हैं। पर जड़ और चेतन के बीच मौलिक एकता को हृदयंगम कर लेने के बाद कोई कठिनाई नहीं रहती। प्रकृति और मनुष्य के बीच सनातन धर्मियों ने कभी भेद नहीं माना, क्योंकि दोनों ही सजीव हैं, अतः प्रकृति और जीवों को अलग अलग करके नहीं देखा जा सकता। इसलिए सनातन संस्कृति सदैव गौ, भूमि, नदी, तुलसी को माता मानती आई है, हम हिन्दू चन्द्रमा को मामा कहते आए हैं, पहाड़ों को हमने पूजा है, प्रकृति के हर अंग को हमने वस्तु नहीं माना पर अपना आत्मीय सम्बन्धी माना है। इससे यह सिद्ध हो गया कि हम जड़ प्रकृति को नहीं पूजते, हमारी मूर्तिपूजा की परम्परा भी चेतन तत्व की ही उपासना है। जैसे जैसे सनातन संस्कृति और वैदिक मणि मंजूषा की आभा हमारे सामने प्रकट होती है, हमारी बुद्धि चमत्कृत, और जीवन धन्य धन्य हो जाता है। इससे पहले श्राद्ध के पीछे का वैदिक विज्ञान पर एक पोस्ट किया था, वैदिक विज्ञान पर यह दूसरा पोस्ट है।

अफ़ज़ल के जीजा साले, अब बोलो किस पर ऐठेंगे! भैंसों के सारे मालिक अब गाय बाँध कर बैठेंगे

अबतक तो उम्मीद नहीं थी, यू पी के दिन बदलेंगे ।
गुंडे तस्कर और मवाली, अपनी राहें बदलेंगे ॥

लेकिन मोदी जी ने मोदी वाला, तेवर दिखा दिया ।
सबकी हाँ मिलते ही योगी जी को, सी एम बना दिया ॥

माथे पर चंदन टीका है, सूर्य तेज़ के स्वामी हैं ।
यू पी के दिल की सुन ली, मोदी जी अंतर्यामी हैं ॥

हाथी थककर बैठ गया है, और साइकल टूटी है ।
पूरा यू पी झूम रहा हैं , बस योगी की तूती है ॥

कई सियासी गठबंधन अब, भिखमंगे हो जाएँगे ।
माँ को डायन कहने वाले, सब नंगे हो जाएँगे ॥

यू पी के सब गुंडो सुनलो, ये पिस्टल वाला गाँधी हैं ।
योगी केवल नाम नहीं हैं, योगी ख़ुद में आँधी हैं ॥

जिन को घिन आती हो, भारत माँ को माता कहने में ।
जिनकी साँसे फूल रही हो, वन्दे मातरम कहने में ॥

उनको योगी, योगी वाली, भाषा में समझाएँगे ।
वक़्त पड़ा तो हिटलर वाले, तेवर भी अपनाएँगे ॥

हाँ, थोड़ा कड़वा तेवर हैं, कड़वी भाषा कहते हैं ।
लेकिन योगी राष्ट्रवाद को, गले लगाकर रहते हैं ॥

साम दाम और दंड भेद का, मंतर पढ़ना आता हैं ।
योगी जी को सीधी ऊँगली, टेढ़ी करना आता हैं ॥

अफ़ज़ल के जीजा साले, अब बोलो किस पर ऐठेंगे ।
भैंसों के सारे मालिक अब, गाय बाँध कर बैठेंगे ॥

वक़्त लेगेगा, लेकिन यू पी, पावन सी हो जाएगी ।
अब यू पी में हर दिन होली , रात दिवाली आएगी ॥

कवि ‘प्रभात परवाना’ की कविता, अब पूरा यू पी गाएगा ।
देशप्रेम और राष्ट्रवाद की, योगी अलख जगाएगा ॥