पुरुष आंतकियों को जन्नत में मिलती हैं 72 हूरें, तो महिलाओं को 72 लोंडे क्यों नहीं ?

ट्वीट में लिखा- “4 इस्लामिक आतंकियों को बांग्लादेश सेना ने कल (सोमवार) मार गिराया। बाकी के आतंकी बांग्लादेश से बाहर भागने की कोशिश करेंगे। बीएसएफ हाई अलर्ट पर है।

बांग्लादेश के सिलहट में इस्लामिक स्टेट के आतंकियों ने फिर हमला किया। बीते 5 दिनों से सिलहट स्थित पांच मंजिला इमारत पर कब्जा जमा लिया था और लोगों को बंधक बना लिया था। आंतकी इमारत के अंदर से ही फायरिंग कर रहे थे। आतंकियों के खात्मे के लिए बांग्लादेश सेना ने ऑपरेशन ‘ट्वाईलाईट’ चलाया। आईएस द्वारा किए गए हमले को लेकर बांग्लादेशी लेखिका तसलीमा नसरीन ने मंगलवार को एक के बाद एक दो ट्वीट किए। उन्होंने अपने ट्वीट में लिखा- “4 इस्लामिक आतंकियों को बांग्लादेश सेना ने कल (सोमवार) मार गिराया। बाकी के आतंकी बांग्लादेश से बाहर भागने की कोशिश करेंगे। बीएसएफ हाई अलर्ट पर है।” तसलीमा ने अपने अगले ट्वीट में लिखा- “4 बांग्लादेशी इस्लामिक आतंकियों में 3 पुरुष और 1 महिला थी। हर पुरुष आतंकी को 72 हूरें (72 Virgins). महिलाओं को कुछ नहीं मिलता है। वह भी 72 वर्जिन-जेलमैन (नौकर/दास) की हकदार हैं।”

सेना ने इमारत में फंसे 50 लोगों से ज्यादा लोगों को सुरक्षित बचाया जबकि अभी भी काफी लोग इमारत में फंसे हैं। जिन्हें बचाने की पूरी कोशिश की जा रही है। आतंकियों द्वारा सोमवार को रुक-रुपकर फायरिंग की जाने की वजह से प्रशासन ने इलाके में बिजली काट दी थी और आसपास की सभी दुकानों को अगले आदेश तक के लिए बंद करने को कहा।

इससे पहले बीते रविवार को आतंकियों ने दो धमाके किए। इन बम धमाकों में 6 लोगों की मौत हो गई जबकि करीब 50 लोग बुरी तरह से घायल हो गए। ये धमाके आतंकियों द्वारा कब्जा जमाए इमारत से 500 मीटर की दूरी पर किए गए। आतंकियों ने पहला धमाका रविवार सुबह भीड़ वाले इलाकों को निशाना बनाते हुए करीब सात बजे किया। हालांकि सुरक्षा एजेंसियां अभी तक ये पता लगाने में नाकाम रहीं है कि इमारत में छिपे आंतकियों की संख्या कितनी है या उनके पास किस तरह के हथियार हैं। इस हमले की जिम्मेदारी आतंकी संगठन इस्लामिक स्टेट ने ली। इन विस्फोटों में रैपिड एक्शन बटालियन (आरएबी) के इंटेलिजेंस प्रमुख भी शामिल हैं।

डोनाल्ड ट्रंप ने पीएम नरेंद्र मोदी को किया फोन, चुनावों में मिली जीत पर दी बधाई

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के चुनावों में मिली जीत के लिए फोन करके बधाई दी है।

देश के पांच राज्यों में से बीजेपी ने दो राज्यों में पूर्ण बहुमत से सरकार बनाई है जबकि असम और मणिपुर में कांग्रेस को छोड़ दूसरी पार्टियों के समर्थन से सरकार बनाई है।

बता दें कि इससे पहले भी डोनाल्ड ट्रंप ने पीएम मोदी को फोन कर दोस्ती की मिसाल पेश की थी। आपको बता दें कि अमेरिका के राष्ट्रपति का पदभार संभालने के चार दिन बाद डोनाल्ड ट्रंप ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ फोन पर हुई अपनी बातचीत में भारत को एक ‘सच्चा दोस्त और साझेदार’ बताया था।

बातचीत में दोनों नेताओं ने इस्लामिक आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक लड़ाई में ‘कंधे से कंधा मिलाकर खड़े रहने’ और रक्षा एवं आर्थिक संबंध को मजबूत करने का संकल्प लिया था।

24 जनवरी रात को दोनों नेताओं के बीच टेलीफोन पर हुई अपनी बातचीत में एक दूसरे को अपने-अपने देश आने का न्यौता भी दिया। व्हाइट हाउस ने एक बयान में कहा, ‘प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ बातचीत में राष्ट्रपति ट्रंप ने इस बात पर जोर दिया कि भारत को अमेरिका एक सच्चा दोस्त और दुनियाभर की चुनौतियों से निपटने में एक सहयोगी मानता है।’

राष्ट्रपति ट्रंप और प्रधानमंत्री मोदी ने संकल्प लिया कि इस्लामिक आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक लड़ाई में अमेरिका और भारत कंधे से कंधा मिलाकर खड़े रहेंगे।

पीडीपी के सामने भाजपा ने घुटने टेक दिए और इससे अलगाववाद को और बल मिलेगा !

श्रीनगर के स्थानीय निवासीयों ने यह भी कहा की भाजपा का श्रीनगर से अपना प्रत्याशी खड़ा न करना बहुत दुखद है और पीडीपी के सामने भाजपा ने घुटने टेक दिए और इससे अलगाववाद को और बल मिलेगा !

श्रीनगर : हिंदु महासभा के प्रदेश संयोजक श्री चेतन शर्मा जी ने श्रीनगर लोकसभा सीट से नामांकन करने के बाद श्रीनगर में लार क्षेत्र में प्रचार किया और लोगों से मिले ! श्रीनगर के स्थानीय निवासी लोग हिंदू महासभा के नेता से स्वतः आकर मिले और क्षेत्र में आकर मिलने को बोला और उनकी समस्या सुनी और सभी का यही मत था की हिंदू महासभा पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर की बात करके उसे भारत में मिलाने की बात करती है तो उन्हें हिंदू महासभा को वोट देने में भी आपत्ति नही है । वहां के अधिकतर लोगों ने कहा की कश्मीर में कांग्रेस, नेशनल कांफ्रेस, पीडीपी जैसी पार्टियाँ ही अलगाववादियों से सांठ-गाँठ करके अपने प्रत्यासी जितवाकर लोकसभा और विधानसभा में भेजते हैं ! वहां के लोगों ने यह भी बताया की हमारे बच्चों के हाथों में पत्थर यही अलगाववादी देते हैं और इन अलगाववादियों के बच्चे डाक्टर या इंजिनियर बनते हैं, एक स्थानीय लड़के ने कहा की ये अलगाववादी क्यों नही अपने बच्चों को पत्थर मारने के लिए लगाते हैं !

श्रीनगर के स्थानीय निवासीयों ने यह भी कहा की भाजपा का श्रीनगर से अपना प्रत्याशी खड़ा न करना बहुत दुखद है और पीडीपी के सामने भाजपा ने घुटने टेक दिए और इससे अलगाववाद को और बल मिलेगा ! जब हिंदु महासभा के नेता श्री चेतन शर्मा ने कहा की हिंदु महासभा धारा 370 और धारा 35A के विरुद्ध है और जब ये नही होंगे तो उस दिन से जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद का दौर समाप्त होगा और उद्योग लगना प्रारम्भ हो जायेंगे तो वहां के लोगों ने कहा की इसी के कारण जम्मू-कश्मीर का निवासी अलग-थलग पड़ा हुआ है !

कश्मीर के लोगों को जब चेतन शर्मा जी ने सावरकर के सिद्धांत और हिंदू महासभा की विचारधारा से अवगत कराया तो लोगों ने कहा की हमें हिंदू महासभा से आपत्ति नही है और श्रीनगर में हिंदू महासभा का कार्यालय भी जल्द खोलने का प्रस्ताव दे दिया और वहां हिंदुराष्ट्र ध्वज को फहराने से भी उन्हें आपत्ति नही है । चेतन शर्मा ने बताया की हिंदू महासभा का हिंदु-राष्ट्र सिद्धांत सांस्कृतिक, पारंपरिक एवं वैचारिक है और तो और हिंदू महासभा को नास्तिक से भी आपत्ति नही है यदि वो कहे की भारत मेरी पुण्य एवं पितृ भूमि है !

आप सभी को नववर्ष एवं नवरात्र मंगलमय हो। धर्मो रक्षति रक्षितः।

भारतीय एवं हिंदू नव वर्ष की शुभकामनाएं यह नव वर्ष आपके जीवन में खुशियां सुख समृद्धि एवं आनंद लेकर आए और आपके जीवन को प्रसन्नता से भर दे आपकी सारी मनोकामनाएं पूरी हो…..

Yashark Pandey : चैत्र प्रतिपदा आज से है या कल से ये मुझे नहीं पता। कुछ विद्वानों को पढ़ा किंतु समझ में नहीं आया। प्रायः अखबार में खबर आती है कि काशी के फलां फलां विद्वानों की बैठक होने वाली है जिसमें पूरे देश में एक पंचांग की व्यवस्था करने पर विचार होगा। ऐसी बैठकों में विमर्श से क्या निष्कर्ष निकलता है पता नहीं। ज्योतिष अपना विषय नहीं है अतः कुछ और कहना उचित नहीं।

अत्रि विक्रमार्क अन्तर्वेदी जी की आईडी बन्द है अन्यथा डांट डपट के कुछ ज्ञान दे ही देते। मांस हम खाते नहीं तो नवरात्र में छोड़ने का प्रश्न भी नहीं उठता। जीव जन्तु herbivore, carnivore और omnivore होते हैं। मैं ‘herbi-fruity-vore’ हूँ। अर्थात् अनाज खाते हुए फलाहार भी भखने वाला।

अपना एक मित्र है। जब बनारस में रहता था तो उसके यहाँ नवरात्र पे ढेर सारा स्वादिष्ट फलाहार बनता था। हम अपने घर में अनाजी खा के उसके यहाँ फलाहार खाने जाते थे। भूखा रहना अपने बस की बात नहीं। वर्ष में केवल दो दिन व्रत रहता हूँ: महाशिवरात्रि और श्रीकृष्ण जन्माष्टमी।

बन्धुओं प्रतिदिन किसी एक ग्रन्थ का पाठ अवश्य करें। संस्कृत ही संस्कृति का मूल है अतः अर्थ समझते हुए स्वाध्याय करें। मेरे परिवार में नित्य चार ग्रन्थों का पाठ होता है। मैं रुद्री करता हूँ, पिताजी गीता और मानस, माँ दुर्गा सप्तशती का पाठ करती हैं। यह बताने का आशय यह है कि आपके कुटुंब में जितने सदस्य हों उतने ग्रन्थ आपस में बाँट लीजिए। शास्त्रों से विमुख होना संस्कृति से विमुख होना है। संस्कृति से विमुख होना अर्थात् राष्ट्र से विमुख होना है।

बिना पूजा पाठ किये झुट्ठै व्रत रखना व्यर्थ है। कहा गया है कि दुर्गा सप्तशती का पाठ करते हुए उच्चारण की अशुद्धि नहीं होनी चाहिये। जिन्हें संस्कृत नहीं आती वे हिंदी संस्करण का मानसिक पाठ करें।

एक बार करपात्री जी महराज हाथ में कोई ग्रन्थ लेकर पाठ कर रहे थे। किसी ने देखा तो टोक दिया कि महराज पोथी को हमेशा लकड़ी के पीढ़े पर रख कर पाठ करना चाहिये अन्यथा आधा फल ही प्राप्त होता है।

करपात्री जी बोले, ‘कलियुग में पूरा फल मिलता कहाँ है, आधा ही मिल जाये तो बहुत है।’ अतः यदि आप संस्कृत से परिचित नहीं हैं तब भी हिंदी में दुर्गा सप्तशती गीता प्रेस से ले आइये। देवी का स्मरण करते हुए पाठ करें। एक बार पूरी कथा पढ़ लेंगे फिर संस्कृत में पढ़ने पर स्वतः सरल प्रतीत होगा।

आप सभी को नववर्ष एवं नवरात्र मंगलमय हो। धर्मो रक्षति रक्षितः। जय जय श्री राम _/\_

रिपोर्ट पढ़िये: भारतीय मीडिया का ज्ञान कितना घटिया है, देश की असलियत से कितने कटे हुए हैं….

ब्लॉग : पुष्पेंद्र राणा ( यूनाइटेड हिन्दी डॉट कॉम ) :-  अवैध बूचड़खानों की बंदी का विरोध कर विपक्ष, मीडिया, महानगरों में बैठे तथाकथित बुद्धिजीवियों ने ना केवल अपनी बेवकूफी का प्रदर्शन किया है बल्कि उनका ज्ञान कितना सिमित है और महानगरो से बाहर के भारत की असलियत से कितने कटे हुए हैं इस सच्चाई के दर्शन भी करा दिए हैं।

लेकिन दुर्भाग्य यह है कि अधिकतर समर्थक भी इस मुद्दे से ठीक से परिचित नही है ?
पहली बात तो मुद्दा सिर्फ गौ हत्या का नही था ! गौ हत्या पर उत्तर प्रदेश में पहले से ही कानूनी प्रतिबन्ध है। हालांकि सपा और बसपा की सरकारों में इस कानून की धज्जियां उड़ाई गई और बड़े पैमाने पर सरकारी संरक्षण में गौहत्या की जाती रही।

लेकिन गौ हत्या से भी बड़ा मुद्दा (विशेषकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश के लिये) भैंसों के अवैध कटान का रहा है। उदाहरण के लिये कुछ साल पहले तक मेरठ में शहर के बीचों बीच सरकारी कमेला होता था जिसे हर साल नगर निगम मामूली रकम के एवज में याकूब कुरैशी और शाहिद अख़लाक़ जैसे कसाई नेताओ को ठेके पर देता था। मेरठ शहर की रोजाना की मांस की खपत 250 भैंस की है और इसीलिए इस कमेले में कानूनी रूप से रोजाना 250-300 भैंस काटे जाने की अनुमति थी लेकिन स्थानीय मीडिया रिपोर्ट के अनुसार इसमें रोजाना 5-7 हजार तक भैंस काटी जाती थी। इसके अलावा कई हजार मेरठ शहर के एक हिस्से के गली मुहल्लों में बने छोटे कमेलो में कटती थी। मेरठ शहर के मुस्लिम बहुल इलाकों का यह हाल है कि वहां पानी में भी खून आता है। दुर्गन्ध और बीमारियों की वजह से कई इलाको से लोग पलायन कर गए। कोर्ट ने कई सालों पहले ही इस कमेले को बंद करने और शिफ्ट करने का आदेश दिया हुआ था लेकिन उसे हटाने की इक्षाशक्ति किसी सरकार में नही थी।

सबसे बड़ी बात ये है कि ये सारा मांस गल्फ में एक्सपोर्ट होता था। लोकल सप्लाई के लिये इतने कटान की आवश्यकता नही थी ! याकूब कुरैशी और शाहिद अख़लाक़ जैसे नेता रातो-रात करोड़पति से खरबपति हो गए। बसपा की सरकार में तो इनका खुद का ही राज था। सुविधा अनुसार पार्टी भी बदल लेते थे। पैसो और सत्ता के दम पर इन्होंने मेरठ में आतंक कायम किया। सपा में आजम खान की वजह से इनकी दाल नही गली क्योंकि उसकी कसाईयो से नही बनती थी। आजम खान ने मेरठ की पीड़ित मुस्लिम जनता की गुहार पर कमेला शहर से बाहर शिफ्ट करवा दिया। हालांकि याकूब कुरैशी जैसे इतने पैसे वाले हो गए कि उन्होंने खुद अपने आधुनिक संयंत्र स्थापित कर लिए लेकिन इनमे अवैध कटान चालू रहा।

अगले पृष्ठ पर पढ़िये : बिसाहड़ा जैसे कितने काण्ड हुए

शहीद हुए तो अकेले भगत ही हीरो क्यों ? सिर्फ इसलिए कि वो जेल में लेनिन को पढते थे ।

भगत के मिट्टी की खुशबू हम सबके जेहन में रच-बस चुकी है, तुम्हारे षड्यंत्र अब सफल नहीं होंगे….

ब्लॉग : शिवेश प्रताप ( यूनाइटेड हिन्दी डॉट कॉम ) :- ॥ कड़वा सच ॥

जब भगत सिंह के साथ राजगुरु और सुखदेव भी बराबर शहीद हुए तो अकेले भगत ही हीरो क्यों ? सिर्फ इसलिए कि वो जेल में लेनिन को पढते थे ।

दरअसल “केवल भगत सिंह” का ही महिमामण्डन करना दूषित राष्ट्र वाद और वामपंथी मुस्लिम विचारधारा पर खडे सामाजिक विज्ञान को सह देना है ।

आजादी के पहले से ही मुसलमान बिकाऊ रहे और अंग्रेजी हुकूमत की चाटुकारिता में रहे । आजादी के बाद इस्लाम पोषित वामपंथी दरअसल हिंदुओं के राष्ट्रवादी विचारों के तोड़ के रूप में एक सिख भगत सिंह को हीरो के रूप में ज्यादा हाईलाइट कर एक तीर से कई निसाने साधते रहे । जिसमें सिखों को वामपंथ की ओर मोड़ देश को तोड़ा जाए भी एक कारण है । दूसरा कि क्रांति नायक के रूप में भगत को खडा कर चंद्रशेखर आजाद के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के स्वरूप को भी मंद किया जाए । दरअसल वामपंथियों को चंद्रशेखर के जनेऊ से हमेशा समस्या रही ।

भगत सिंह के बलिदान का मैं बहुत सम्मान करता हूँ पर “केवल भगत सिंह” के अतिशय महिमा मंडन के खिलाफ हूँ । सुखदेव और राजगुरु का बलिदान भगत से रत्ती भर कम नहीं है ।

और यदि बलिदान की बात है तो फिर यह देश सबसे कम उम्र में फांसी पर चढे खुदीराम बोस को सिर्फ इसलिए भूल जाता है कि वो हिंदू थे ???

कृपया वामपंथी कुचक्र से बाहर निकल कर तीनों वीर बलिदानियों को बराबर सम्मान देकर नोटों पर छापने की बात करें । अकेले भगत क्यों ?

कश्मीर के लिए पांच ट्रेन बिहार से चला दीजिये तो सारी धारायें सही से काम करेगी !!

ब्लॉग : आनंद कुमार ( यूनाइटेड हिन्दी डॉट कॉम ) :- कई बार जो बातें हम आपस में करते हैं वो अनजान लोगों के बीच नहीं करते। सोशल मीडिया पर पोस्ट करने से परहेज भी रखते हैं। बिहारियों की हालत ऐसी होती है कि हम अक्सर चुटकुले किसी संता-बंता, पप्पू-टीपू, या फजलु-अफ़जल पर भी नहीं सुनाते। हमारे चुटकुले भी हमपर ही होते हैं। जैसे अगर पूछा जाए की कश्मीर के आतंकवाद की समस्या का आसान इलाज क्या है ? तो जवाब होता है वहां के लिए बिहार से कुछ डायरेक्ट ट्रेन चलवा दो ! 

कश्मीर के लिए पांच ट्रेन चला दीजिये बिहार से तो वो भी सुधर जायेगा।

गौर कीजिये तो ये दिख भी जाएगा। सत्तर के दशक में कभी बंगाल राजनैतिक हत्याओं से पीड़ित हुआ करता था। बिहारी जाकर उसी दौर में वहां नौकरी करने लगे और धीरे धीरे मार काट ख़त्म। पूर्वोत्तर कई उल्फा जैसी उग्रवादी-आतंकी विचारधाराओं से ग्रस्त था। बिहारी वहां बसने लगे, वो भी ठीक हो चला। पंजाब आतंकवाद से ग्रस्त हुआ, बिहारी मजदूर वहां के खेतों में जाने लगे तो वो भी ठीक। दक्षिण में एल.टी.टी.इ. थी, बिहारी आज वहां होते हैं तो एल.टी.टी.ई. नहीं रही।

कश्मीर के लिए पांच ट्रेन चला दीजिये बिहार से तो वो भी सुधर जायेगा।

ये मेरा ही चुटकुला है या बेबसी पर मुस्कान वो तय करना जरा मुश्किल है। अकेले मुंबई में करीब 50 लाख बिहारी होते हैं। सभी मेट्रो और बड़ी जगहों को मिलायेंगे तो बिहार के तीन करोड़ से ऊपर लोग वहीँ प्रवासी के तौर पर मिल जायेंगे। जैसी की आम धारणा है वैसे बिहार कृषि प्रधान भी नहीं होता। बिहार की आबादी का 55-60% हिस्सा नौकरीपेशा है, काम करने वालों की लगभग 30-35 प्रतिशत की आबादी ही कृषि पर निर्भर है। ये तब है जब करीब 12% आबादी ही शहरी है, बाकी सब बिहार में ग्रामीण ही होते हैं। हिमांचल के पहाड़ी इलाकों के बाद ये सबसे कम शहरी आबादी वाला इलाका है। 80 प्रतिशत ग्रामीण आबादी और 35% कृषक, बाकी कहाँ नौकरी करते होंगे अंदाजा करना मुश्किल नहीं।

यानि जिस सर्विस इंडस्ट्री और नॉलेज प्रोसेस आउटसोर्सिंग की यदा कदा, बड़ी बैठकों में चर्चा होती है उसके लिए बिहार में श्रम शक्ति उपलब्ध थी। हाँ, उसकी इंडस्ट्री कभी यहाँ नहीं आई, ये और बात है। अब कई स्वनामधन्य बुद्धिजीवी बताएँगे कि देखो इस से बाहर से पैसा बिहार आ रहा है और उस से बहार आएगी। लेकिन समस्या ये है कि इन कामगारों के बच्चों की शिक्षा के लिए बिहार में कोई व्यवस्था नहीं। परीक्षाएं समय पर नहीं होती इसलिए आप तीन साल में ग्रेजुएशन नहीं कर सकते तो बाहर पढ़ना मजबूरी है। इस तरह आया हुआ पैसा वापिस दिल्ली, कोटा, बंगलौर, भोपाल चला जाता है।

ये चीज़ें आसानी से कल के कार्यक्रम में मंच पर भी दिख गई होंगी। सिर्फ पटना शहर का ही इतिहास 2000 साल से ज्यादा का निकल आएगा। किस्मत से जब मंच पर से इसी शहर में “बिहार दिवस” के सांस्कृतिक कार्यक्रम चल रहे थे तो बिहार के कितने कलाकार दिखे ? हजारों साल का सांस्कृतिक इतिहास कहाँ गया ? मंच से नितीश बाबू को ये क्यों कहना पड़ता है कि बिहारियों के काम ना करने से दिल्ली बंद हो जायेगी, ये क्यों नहीं पूछते कि बिहारियों को दिल्ली जाकर नौकरी क्यों करनी पड़ती है ?

आपके भाषण में मेरी रूचि नहीं सुशासन बाबु। मुझे उस कॉइन कलेक्टर को देखना था जो इतिहास सचमुच संजो के रख रहा था और आपकी अकर्मण्यता के वजह से हाल में ही डूब गया। मुझे उन किसानों को देखना था जिनके प्रति हेक्टेयर धान और आलू की उपज को तो अपनी पीठ थपथपाने के लिए आप अपने प्रकाशनों में छापते है, लेकिन मंच पर बुला कर उन्हें सम्मानित करने में शायद आपके जातीय-सियासी आंकड़े गड़बड़ाने लगते हैं। मुझे उस लड़के को भी देखना था जो बिना लोभ लालच लोगों को किताब खरीदने के लिए प्रेरित करता, अनजान लोगों को पोस्टकार्ड लिख रहा होता है। मुझे उसे भी देखना था जो बच्चों को नशा मुक्त कर के शिक्षित करने का प्रयास आपके गांधी मैदान वाले मंच से थोड़ी ही दूर पर हर रोज़ करता है।

बाकी ये अनपढ़ जाहिलों को भी मंच पर से उतारिये जनाब। इनकी तस्वीर छपने पर जैसा बिहार दिखता है, वो तो बिलकुल भी मेरा चेहरा नहीं।

एक हिंदू की हत्या के बदले 10 की हत्‍या करवाएंगे- वायरल हुआ योगी आदित्‍य नाथ का यह वीडियो

लखनऊ के हजरतंगज थाने का औचक निरीक्षण करते यूपी सीएम योगी आदित्‍य नाथ। (Source: PTI)

उत्‍तर प्रदेश के नए मुख्‍यमंत्री भगवाधारी महंत योगी आदित्‍य नाथ अपनी हिंदूवादी छवी की वजह से कई बार विवादों में रहे हैं। अब उत्‍तर प्रदेश मुख्यमंत्री पद के लिए भारतीय जनता पार्टी द्वारा चुना कई लोगों के गले नहीं उतर रहा। इसके पीछे थे उनके पुराने हिन्दू सुरक्षा को लेकर दिये गये कई बयान, जो एक समुदाय विशेष के कुछ असामाजिक लोगों के प्रति नफरत में डूबे हुए थे। जब भगवाधारी महंत योगी आदित्‍य नाथ मुख्यमंत्री बने तो ऐसे पुराने भाषण फिर से इन्टरनेट पर शेयर होने लगे है। ऐसा ही एक वीडियो यूट्यूब पर मुख्यमंत्री योगी के शपथ-ग्रहण के ठीक एक दिन बाद (20 मार्च, 2017) को अपलोड किया गया है, जिसमें मुख्यमंत्री योगी कहते दिख रहे हैं कि ”अगर एक निर्दोष हिंदू का खून बहेगा तो एक हिंदू के खून के बदले, आने वाले समय में हम प्रशासन से एफआईआर दर्ज नहीं करवाएंगे बल्कि कम से कम 10 ऐसे लोगों की हत्‍या उससे करवाएंगे जो उस हिंदू की हत्‍या में शामिल होंगे।”

यूट्यूब पर मात्र तीन दिन में इस वीडियो को 33 लाख से ज्‍यादा लोग देख चुके हैं। इसमें मुख्यमंत्री योगी के पुराने भाषण दिखाए गए हैं। आजमगढ़ में एक सभा में वह कहते दिखते हैं, ”वंदेमातरम का गायन नहीं कर सकते, भारत माता की जय नहीं कह सकते। भारत की धरती पर रहेंगे, भारत का अन्‍न खाएंगे, भारत में सारे कर्म-कुकर्म करेंगे और उसके बाद कहेंगे कि भारत माता की जय नहीं कहेंगे। इतना दुस्‍साहस आया कैसे। इस आजमगढ़ के अंदर कोई भारत माता की जय बोलने से मना नहीं कर सकता। अगर पूर्वी यूपी के अंदर किसी भी संस्‍थान में किसी ने ‘भारत माता की जय’ और वंदेमातरम पर प्रतिबंध लगाया तो बाबरी ढांचे की तरह उस संस्‍थान की इमारत ढहा दी जाएगी।”

अगले पृष्ठ पर विडियो देखिये 

बीएसएफ जवान तेज बहादुर यादव की मौत की खबर का सच आया सामने….

तेज बहादुर यादव पूरी तरह स्वस्थ हैं, मौत की खबरें पाकिस्तानियों का एजेंडा : बीएसएफ

नई दिल्ली (यूनाइटेड हिन्दी डॉट कॉम): कुछ महीने पहले भारतीय सीमा पर तैनात बीएसएफ के एक जवान ने खाने की गुणवत्ता पर सवाल उठाया और facebook पर एक वीडियो शेयर करके कहा कि बीएसएफ में जवानों को अच्छा खाना नहीं दिया जाता है ! बीएसएफ ने तत्काल उसपर जांच बिठाई और आरोपों को नकार दिया। लेकिन अब यह बात सामने आ रही है कि पाकिस्तान में सोशल मीडिया पर यह बताया जा रहा है कि भारत में यह शिकायत करने वाले जवान की मौत हो चुकी है। वहीं, बीएसएफ ने सोशल मीडिया पर जवान तेज बहादुर यादव की मौत की तस्वीरों को पूरे तौर पर सिरे से खारिज कर दिया है। बीएसएफ ने कहा है कि तेज बहादुर यादव पूरी तरह स्वस्थ हैं। दरअसल सोशल मीडिया पर घूम रही कुछ तस्वीरों में बीएसएफ में खान-पान की शिकायत करने वाले जवान तेज बहादुर की मौत की झूठी खबर प्रचारित की जा रही है। इन तस्वीरों में तेजबहादुर को चोटें लगी हुईं भी नज़र आ रही हैं।

pakistani tweet on tej bahadur

पाकिस्तान में सोशल मीडिया पर बीएसएफ जवान तेज बहादुर को लेकर चल रहा ट्वीट…

बीएसएफ का कहना कि ज़ाहिर है यह तस्वीरें फ़र्ज़ी प्रोपेगेंडा का हिस्सा हैं। पड़ताल में यह पता चला है कि यह प्रोपेगेंडा सीमापार से संचालित हो रहा है। इन तस्वीरों को प्रमुखता से ट्वीट करने वाले लोगों के सोशल मीडिया अकाउंट्स इसकी तस्दीक करते हैं कि वे पाकिस्तान के हैं।

यूनाइटेड हिन्दी डॉट कॉम ने इसी वायरल खबर की जाँच पड़ताल की तो पता चला की तेजबहादुर यादव के मौत की जो तस्वीर चलाई जा रही है वो सुकमा में मारे गए 12 जवानों में से किसी एक जवान की है ।

sukma

तेजबहादुर के मौत की जो तस्वीरें इस फेसबुक में दिखाई जा रही है वो किसी और जवान की है। तेजबहादुर यादव के मौत की जो तस्वीर चलाई जा रही है वो 11 मार्च को सुकमा में मारे गए 12 जवानों में से किसी एक जवान की है।

टीम ने इस बारे में तेजबहादुर यादव की पत्नी से भी बात की है। उन्होंने ने भी तेजबहादुर के मौत की खबर को झूठी खबर कहा और यह बताया कि तेजबहादुर पूरी तरह स्वस्थ हैं।

साथ ही बीएसएफ का भी कहना कि जाहिर है यह तस्वीरें फर्जी प्रोपेगेंडा का हिस्सा हैं। जांच में यह पता चला है कि यह प्रोपेगेंडा सीमापार से संचालित हो रहा है।

कम्युनिस्ट खेमे के इन इतिहासकारों ने भगत सिंह की इस तरह से की निर्मम हत्या…

भगत के मिट्टी की खुशबू हम सबके जेहन में रच-बस चुकी है, तुम्हारे षड्यंत्र अब सफल नहीं होंगे….

ब्लॉग : ( अभिजीत सिंह, यूनाइटेड हिन्दी डॉट कॉम ) :- 1931, फरवरी-मार्च का महीना, सेन्ट्रल जेल, लाहौर के 14 नम्बर वार्ड में फाँसी की प्रतीक्षा कर रहे बंदियों में से एक ने अपनी माँ को एक पत्र लिखा। माँ ने बेटे का पत्र खोला तो उसमें लिखा था, माँ, मार्च की 23 तारीख को तेरे बेटे की शादी है, आशीर्वाद देने जरूर आना। माँ सोचने लगी जेल में तो लडकियाँ होती नहीं तो फिर ये पगला किससे प्यार कर बैठा, कहीं किसी जेलर की बेटी पर तो मेरे बेटे का दिल नहीं आ गया ? माँ से पूछे बिना बेटा शादी कर लेगा इस आशंका से पीड़ित माँ ने तस्दीक करने के लिये अपने छोटे भाई को भेजा, जा जरा देख के आ कि ये किस कुड़ी को दिल दे बैठा है। कैदी ने मिलने आने वाले को एक कागज पर कुछ लिख कर दिया और कहा, इसे माँ को दे देना और ध्यान रहे इसे और कोई न खोले। माँ ने बेटे का पत्र खोला तो लिखा था, मेरी होने वाले दुल्हन का नाम है “मौत”।

मौत को माशूका बना लेने वाले इस शख्स का नाम था भगत सिंह। ये वो नाम है जिसके सामने आते ही देशप्रेम और बलिदान मूर्त हो उठता है। भगत वो नाम है जिसकी राह रूप, यौवन और सौन्दर्य नहीं रोक सकी, भगत वो नाम है जिसने एक अत्यंत धनी परिवार से आये विवाह प्रस्ताव को ये कहते हुए ठुकरा दिया था कि मेरा विवाह तो अपने ध्येय के साथ हो चुका है अब दुबारा विवाह क्या करना, भगत वो नाम भी है जिसके लिये उसकी अपनी धार्मिक परंपरा के अनुपालन से अधिक महत्व भारत की आजादी का था। वो चाहता तो फांसी की सजा से बच सकता था पर उसने इसके लिये कोई कोशिश नहीं की, इसलिये नहीं की क्योंकि उसे पता था कि अपना बलिदान देकर वो तो सो जायेगा पर सारा भारत जाग उठेगा और फिरंगी हूकूमत की जड़ उखड़ जायेगी।

जिस हुतात्मा का सिर्फ जिक्र भर आज उसके बलिदान के 86 साल बाद भी युवकों में जोश भर देता है, तो जाहिर है कि वो लोग जिनकी विचारधारा का अवसान हो चुका है वो अगर भगत को अपने खेमे का साबित कर दें तो शायद उनकी मृत विचारधारा कुछ अवधि के लिये जी उठे। इसी सोच को लेकर कम्युनिस्टों ने बड़ी बेशर्मी से भगत सिंह के बलिदान का अपहरण कर लिया। विपिन चन्द्र, सुमित सरकार, इरफान हबीब, रोमिला थापर जैसे वाम-परस्त इतिहासकारों ने सैकड़ों लीटर स्याही ये साबित करने में उड़ेल दी थी कि भगत सिंह तो कम्युनिस्ट थे। भगत के “मैं नास्तिक क्यों हूँ” वाले लेख को बिना किसी आधार का ये लोग ले उड़े और उसे लेनिन के उस कथन से जोड़ दिया जिसमें उसने कहा था कि ‘नास्तिकता के बिना मार्क्सवाद की कल्पना संभव नहीं है और नास्तिकता मार्क्सवाद के बिना अपूर्ण तथा अस्थिर है’।

यानि इनके अनुसार भगत सिंह मनसा, वाचा, कर्मणा एक प्रखर मार्क्सवादी थे। भगत सिंह के प्रति ममत्व जगने के वजह ये भी है कि जिस लेनिन, स्टालिन, माओ-चाओ, पोल पोट वगैरह को वो यूथ-आइकॉन बना कर बेचते रहे थे उनके काले कारनामे और उनके नीतियों की विफलता दुनिया के सामने आने लगी थी और स्वभाव से राष्ट्रप्रेमी भारतीय युवा मानस के बीच उनको मार्क्सवादी आइकॉन के रूप में बेचना संभव नहीं रख गया था इसलिए इन्होने भगत सिंह को कम्युनिस्ट बना कर हाईजैक कर लिया।

इसलिये किसी व्यक्ति के मृत्यु के उपरांत उसकी विचारधारा को लेकर जलील करने का सबसे अधिक काम अगर किसी ने किया है तो वो यही लोग हैं जिन्होनें भगत सिंह जैसे हुतात्मा को कम्युनिस्ट घोषित करने का पाप किया। ऐसे में इस बात की तहकीक भी आवश्यक हो जाती है कि क्या कम्युनिस्टों के मन में हमेशा से भगत सिंह के प्रति आदर था या अपने राजनीतिक फायदे और अस्तित्व रक्षण के लिए उन्होंने उगला हुआ थूक निगल लिया ? भगत सिंह के प्रति कम्युनिस्ट आदर जानने के आवश्यक है कुछ कम्युनिस्टों की किताबों को पढ़ा जाए और भगत सिंह के संबंध में कुछ कम्युनिस्ट नेताओं की स्वीकारोक्तियों को सुना जाए।

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