रिपोर्ट पढ़िये: भारतीय मीडिया का ज्ञान कितना घटिया है, देश की असलियत से कितने कटे हुए हैं….

ब्लॉग : पुष्पेंद्र राणा ( यूनाइटेड हिन्दी डॉट कॉम ) :-  अवैध बूचड़खानों की बंदी का विरोध कर विपक्ष, मीडिया, महानगरों में बैठे तथाकथित बुद्धिजीवियों ने ना केवल अपनी बेवकूफी का प्रदर्शन किया है बल्कि उनका ज्ञान कितना सिमित है और महानगरो से बाहर के भारत की असलियत से कितने कटे हुए हैं इस सच्चाई के दर्शन भी करा दिए हैं।

लेकिन दुर्भाग्य यह है कि अधिकतर समर्थक भी इस मुद्दे से ठीक से परिचित नही है ?
पहली बात तो मुद्दा सिर्फ गौ हत्या का नही था ! गौ हत्या पर उत्तर प्रदेश में पहले से ही कानूनी प्रतिबन्ध है। हालांकि सपा और बसपा की सरकारों में इस कानून की धज्जियां उड़ाई गई और बड़े पैमाने पर सरकारी संरक्षण में गौहत्या की जाती रही।

लेकिन गौ हत्या से भी बड़ा मुद्दा (विशेषकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश के लिये) भैंसों के अवैध कटान का रहा है। उदाहरण के लिये कुछ साल पहले तक मेरठ में शहर के बीचों बीच सरकारी कमेला होता था जिसे हर साल नगर निगम मामूली रकम के एवज में याकूब कुरैशी और शाहिद अख़लाक़ जैसे कसाई नेताओ को ठेके पर देता था। मेरठ शहर की रोजाना की मांस की खपत 250 भैंस की है और इसीलिए इस कमेले में कानूनी रूप से रोजाना 250-300 भैंस काटे जाने की अनुमति थी लेकिन स्थानीय मीडिया रिपोर्ट के अनुसार इसमें रोजाना 5-7 हजार तक भैंस काटी जाती थी। इसके अलावा कई हजार मेरठ शहर के एक हिस्से के गली मुहल्लों में बने छोटे कमेलो में कटती थी। मेरठ शहर के मुस्लिम बहुल इलाकों का यह हाल है कि वहां पानी में भी खून आता है। दुर्गन्ध और बीमारियों की वजह से कई इलाको से लोग पलायन कर गए। कोर्ट ने कई सालों पहले ही इस कमेले को बंद करने और शिफ्ट करने का आदेश दिया हुआ था लेकिन उसे हटाने की इक्षाशक्ति किसी सरकार में नही थी।

सबसे बड़ी बात ये है कि ये सारा मांस गल्फ में एक्सपोर्ट होता था। लोकल सप्लाई के लिये इतने कटान की आवश्यकता नही थी ! याकूब कुरैशी और शाहिद अख़लाक़ जैसे नेता रातो-रात करोड़पति से खरबपति हो गए। बसपा की सरकार में तो इनका खुद का ही राज था। सुविधा अनुसार पार्टी भी बदल लेते थे। पैसो और सत्ता के दम पर इन्होंने मेरठ में आतंक कायम किया। सपा में आजम खान की वजह से इनकी दाल नही गली क्योंकि उसकी कसाईयो से नही बनती थी। आजम खान ने मेरठ की पीड़ित मुस्लिम जनता की गुहार पर कमेला शहर से बाहर शिफ्ट करवा दिया। हालांकि याकूब कुरैशी जैसे इतने पैसे वाले हो गए कि उन्होंने खुद अपने आधुनिक संयंत्र स्थापित कर लिए लेकिन इनमे अवैध कटान चालू रहा।

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भारत बना रहा है भगवान विष्णु के ‘सुदर्शन चक्र’ जैसा वार करने वाला अचूक मिसाइल

सुदर्शन चक्र

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नई दिल्ली : रक्षा, मिसाइल और अंतरिक्ष के क्षेत्र में रोज नए कीर्तिमान बनाने वाला हिंदुस्तान अब ऐसी मिसाइल बनाने जा रहा है जो दुश्मनों पर हमला करने के बाद वापस अपने खेमे में वापिस भी आ जाएगी। हाँ ये हैरान कर देने वाली बात जरूर है, लेकिन ऐसा भारत के लिए इस वक्त असंभव नहीं है।

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मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल के विज्ञान मेले में पहुंचे डीआरडीओ के विशिष्ट वैज्ञानिक और ब्रह्मोस के सीईओ सुधीर कुमार मिश्रा ने बताया कि यह प्रोजेक्ट तैयार है, केंद्र सरकार की अनुमति मिलते ही हम काम शुरू कर देंगे। यह पूरा प्रोजेक्ट पूरी तरह खुफिया रहेगा। अभी तक ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल की मारक क्षमता सिर्फ 290 किमी किमी प्रति घंटा है लेकिन इसे बढ़ाकर 450 किमी प्रति घंटे करने की योजना है। उन्होंने बताया कि इसका परीक्षण मार्च के दूसरे हफ्ते में किया जाएगा। पिछले साल गोवा में हुए सॉर्क सम्मेलन में इसकी मारक क्षमता को बढ़ाने की अनुमति मिली थी।

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मिश्रा जी ने बताया कि हम मार्च के अंतिम सप्ताह में 1000 हजार किमी प्रति घंटे की क्षमता वाले ब्रम्होस मिसाइल का परीक्षण करने वाले हैं। भारत वर्तमान में मिसाइल टेक्नोलॉजी कंट्रोल रेजिम (एमटीसीआर) का मुख्य सदस्य बन चुका है। इस समूह में अमेरिका, फ्रांस, जर्मनी, इटली, जापान, ब्रिटेन और कनाडा समेत कई देश शामिल हैं।

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मिश्रा ने कहा कि भारत और दुनिया के पास अभी तक ऐसी मिसाइलें हैं, जो लक्ष्य पर प्रहार कर वहीं समाप्त हो जाती हैं, लेकिन भारत ठीक वैसी मिसाइल बनाना चाहता है, जैसे सुदर्शन चक्र दुश्मन पर वार कर वापस लौट आता था। हमारी परंपरा वैदिक और आध्यात्मिक रही है, तो इस मिसाइल का विचार भी भगवान कृष्ण के सुदर्शन चक्र से लिया गया है।

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ताजा योजना के अनुसार मिसाइल की गति 5 मैक तक करने की है और इस पर अगले दो से तीन साल में काम पूरा होने की उम्मीद है। अभी ब्रह्मोस की मारक क्षमता 300 किमी है और स्पीड 2.08 मैक। एक मैक का अर्थ होता है ध्वनि के बराबर की गति। मिश्रा ने बताया कि मिसाइल 10 मीटर तक नीचे आ सकती है और इतनी देर में दुश्मन को अंतिम प्रार्थना करने का भी वक्त नहीं मिलता। मिश्रा ने इस बेहतरीन मिसाइल को तैयार करने का श्रेय डा. एपीजे अब्दुल कलाम को दिया।

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घर में पड़े खराब लैपटॉप-TV को बेचें ऑनलाइन, मिलेंगे अच्छे दाम…

नई दिल्‍ली।घर में बेकार पड़े टीवी, लैपटॉप या फिर किसी भी इलेक्‍ट्रॉनिक सामान को आप अब आसानी से ऑनलाइन बेच सकते हैं। सिर्फ पुराना सामान ही नहीं, बल्कि खराब हो चुका और टूट चुके इलेक्‍ट्रॉनिक्‍स को भी ऑनलाइन बेचा जा सकता है। आज लैपटॉप, स्‍मार्टफोन और टीवी जैसी इलेक्‍ट्रोनिक चीजें हर घर का अहम हिस्‍सा बन गए हैं। डिजिटल टेक्‍नोलॉजी जितनी तेजी से बढ़ रही है, उतनी ही तेजी से बढ़ रहा है ई-वेस्‍ट। इस इलेक्‍ट्रॉनिक वेस्‍ट को कूड़ेदान में फेंकने की बजाय आप ऑनलाइन बेचकर अच्‍छे दाम हासिल कर सकते हैं।
घर में पड़े खराब लैपटॉप-TV को बेचें ऑनलाइन, मिलेंगे अच्छे दाम
ईस्‍क्रैपइंडिया के सीनियर ऑफिसर आशिफ मलिक ने Moneybhaskar को बताया कि कि ई-वेस्‍ट को बेचकर आप न सिर्फ पर्यावरण संरक्षण में योगदान देते हैं, बल्कि पुराने और बेकार पड़े सामान के लिए अच्‍छी कीमत भी हासिल करते हैं।
आगे हम आपको ऐसी ऑनलाइन कंपनियों के बारे में बता रहे हैं, जो आपके घर में पड़े ई-वेस्‍ट को खरीदते हैं।

राजीव दीक्षित के समर्थक युवाओं का अंतरिक्ष से बिजली बनाने का फार्मूला, इसरो भेजा प्रस्ताव

सैटेलाइट तकनीक से जमीन तक बिजली लाने का सुझाव
सैटेलाइट तकनीक से जमीन तक बिजली लाने का सुझाव

कुचामन सिटी – मौलासरके युवा वैज्ञानिक ऋषिकुमार शर्मा रामकृष्ण वैष्णव ने अंतरिक्ष से बिजली बनाने की नवीन तकनीक का प्रारूप तैयार किया है। उनके इस प्रारूप को केवल ‘नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय’ एवं ‘वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद’ द्वारा सराहा है बल्कि परिषद की मैग्जीन में प्रमुखता से प्रकाशित करते हुए अब इसे इसरो के पास भेजने का सुझाव दिया है। #राष्ट्रप्रेमी_राजीव_दीक्षित

दोनों युवाओं ने इसरो के पास इस तकनीक का प्रायोगिक मॉडल बनाकर भेजने की तैयारी शुरू कर दी है। सौर ऊर्जा के संशोधित स्वरूप के साथ विकसित की गई इस तकनीक की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि सौर ऊर्जा आधारित सिस्टम होने की वजह से इसमें किसी प्रकार के ईंधन की आवश्यकता नहीं होगी। ऐसे में बिजली उत्पादन में ज्यादा खर्चा नहीं होगा और रखरखाव आदि भी मामूली खर्च पर हो जाएगा और यह सिस्टम सालों-साल बिना प्रदूषण के चलता जाएगा। जानकारी अनुसार अगर इसरो की ओर से इस प्रोजेक्ट को मंजूरी मिल जाती है तो भारत दुनिया में पहला देश बन सकता है जो अंतरिक्ष से ही बिजली पैदा कर सकेगा। इसरो के वैज्ञानिकों को दिखाने के लिए मॉडल बनाने में जुटे है।

सौर-विद्युत उर्जा का उपयोग बढ़ता जा रहा है। कारण साफ है, एक बार सोलर पैनल लगाने के बाद बिना खर्च वर्षों तक बिजली बनाई जा सकती है। लेकिन दिक्कत यह आती है कि रात के समय सूर्य की रोशनी नहीं मिलने के करण बिजली उत्पादन सिर्फ दिन में हो पाता है। दिन में भी मौसम, बादल, धूप-छांव आदि उत्पादन को प्रभावित करते हैं। इन्हें ध्यान में रखते हुए वैज्ञानिकों ने अंतरिक्ष से बिजली बनाने की तकनीक का मॉडल तैयार किया है। ‘सोलर सैटेलाइट पॉवर प्लांट’ नाम की इस तकनीक में सैटेलाइट के साथ सोलर पैनल्स को जोड़कर अंतरिक्ष में पृथ्वी की भू-स्थिर कक्षा में स्थापित किया जा सकता है। इसके बाद अंतरिक्ष में ही सौर ऊर्जा को बिजली में परिवर्तित किया जा सकता है। अंतरिक्ष में 24 घंटे सूर्य की किरणें प्राप्त होती है और इसे मौसम, वातावरण, बादल आदि भी प्रभावित नहीं कर सकते। अंतरिक्ष में उत्पादित बिजली को धरती पर बने रिसीविंग स्टेशन तक लेजर अथवा माइक्रोवेव के जरिए रिसीव किया जा सकेगा।

इन 4 आविष्कारों के लिए पेटेंट के कर चुके हैं आवेदन

पूर्वराष्ट्रपति अब्दुल कलाम आजाद और डॉ. राजीव दीक्षित दीवार पर टच स्क्रीन, वायरलेस मोबाइल चार्जर, हवा से मोबाइल चार्ज करने वाला चार्जर, वायरलेस बैटरी पॉवर ट्रांसफर करने की तकनीक, सोलर कूलर, नवीन उर्जा उत्पादन तकनीक आदि कई आविष्कार कर चुके हैं। अब तक 4 पेटेंट दाखिल कर चुके है। जिनमें से 2 टच स्क्रीन एवं 2 विद्युत उत्पादन तकनीक से संबंधित है।

प्रोजेक्ट पर कार्य कर रहे रामकृष्ण और ऋषिकुमार बताते हैं कि तकनीक का प्रारूप सरकार के पास भेज चुके है। हम चाहते है कि भारत अंतरिक्ष से बिजली उत्पादन की तकनीक को प्रायोगिक रूप में लागू करने वाला दुनिया का सबसे पहला देश बने। इस तकनीक के क्रियान्वयन के लिए राष्ट्रपति से अपील की है। रूपरेखा प्रस्तुत करते हुए राष्ट्रपति कार्यालय से इसे उर्जा मंत्रालय तथा नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय के पास भेजा गया। जहां केवल इस प्रोजेक्ट की तारीफ हुई बल्कि तकनीकी रूप से इसे सही पाए जाने पर इसरो के पास भेजने का सुझाव दिया है। साथ ही वैज्ञानिक केंद्र सीएसआईआर एवं निस्केयर की विज्ञान मैग्जीन में भी इस वैज्ञानिक लेख को शामिल किया जा चुका है।

गुजरात का ये गुरुकुल टक्कर देता है अमेरिका की हॉवर्ड से लेकर भारत की आईआईटी तक को

गुरुकुल के इन पुराने मॉडल पर पढ़ाई करने वाले बच्चों के सामने आधुनिक शिक्षा ने टेके घुटने

अहमदाबाद (कर्णावती): दिन प्रतिदिन गिरती जा रही भारतीय व्यवस्था पर चिंता करने वाले बहुतों बुद्धिजीवी मिलेंगे लेकिन भारतीय शिक्षा व्यवस्था कैसी हो, उसका स्वरूप कैसा हो, किस प्रकार उसे विकसित किया जाए ऐसे हर प्रश्नों का जवाब है : गुजरात का यह गुरुकुल, जो आज इक्कीसवीं सदी में भी पूर्णतया भारतीय परंपराओं पर आधारित शिक्षा देता है। अपनी अनूठी एवं गुणवत्तापूर्ण शिक्षा से आज यह दुनिया के बड़े बड़े संस्थानों को टक्कर दे रहा है।

इस गुरुकुल का पूरा नाम हेमचंद्राचार्य संस्कृत पाठशाला है, जो स्थित है गुजरात के कर्णावती (अहमदाबाद) शहर स्थित साबरमती में, जिसे देखने देश व दुनिया भर के कोने कोने से लोग आते है और अपने बच्चों का यहाँ प्रवेश दिलवाने को लालायित रहते हैं।

अमेरिका के हॉवर्ड विश्वविधालय से लेकर भारत के आई आई टी में क्या कोई ऐसी शिक्षा दी जाती है कि छात्र की आंख पर पट्टी बांध दी जाये और उसे प्रकाश की किरने भी दिखाई ना दे, फिर भी वो सामने रखी हर वस्तु को पढ़ सकता हो? है ना चौकाने वाली बात? पर इसी भारत में किसी हिमालय की कंदरा में नहीं बल्कि प्रधानमंत्री के गृहराज्य गुजरात के महानगर में यह चमत्कार आज साक्षात् हो रहा है।

सीए की पढ़ाई छोड़कर शुरु किया वर्मी कंपोस्ट बनाने का काम, लाखों में होती है कमाई, किसानों को भी देते हैं ट्रेनिंग

बरेली : बचपन से लेकर युवा होने तक अभिभावक बच्चों को पढ़ा-लिखा कर डॉक्टर, इंजीनियर व सरकारी नौकरी कराना चाहते हैं। युवा भी प्रोफेशनल कोर्स करने के बाद कारपोरेट जगत में नौकरी करने का ख्वाब देखता है वहीं बरेली का एक 22 वर्षीय युवा ऐसा भी है जिसने सीए की पढ़ाई छोड़ जैविक ढंग से खाद बनाने और बेचने का कार्य शुरू किया जिससे उसे अच्छा मुनाफा हो रहा है।

तीन वर्ष पहले 12वीं की परीक्षा उत्तीर्ण की फिर सीए बनने के लिए बीकॉम में प्रवेश लिया, फिर सीए में सीपीटी की परीक्षा क्वालीफाई की। उसी समय बड़े भाई मोहित बजाज के साथ आईवीआरआई में कामधेनु योजना के एक कार्यक्रम में गया था। वहां वर्मी कम्पोस्ट खाद बनाने को लेकर एक लेक्चर सुना। तभी से जैविक खाद बनाने का मेरे अंदर रुझान बढ़ा। जिला मुख्यालय से लगभग 21 किमी दूर बरधौली गाँव बड़ा बाई पास भोजीपुरा ब्लाॅक के रहने वाले प्रतीक बजाज (22 वर्ष)

आईबीआरआई के कृषि विज्ञान केंद्र से जुड़ और वर्मी कम्पोस्ट खाद बनाने का प्रशिक्षण लिया। इसके बाद इसे बनाने का अभ्यास शुरू कर दिया। जब अच्छे परिणाम मिले तो इसे ही अपना व्यवसाय बना लिया। नीम जैविक खाद और जैविक खाद से लगभग एक वर्ष में 10 से 12 लाख की सालाना कमाई हो रही है। – प्रतीक बजाज

प्रतीक ने प्रशिक्षण लेने के बाद सात बीघा जमीन पर वर्मी कम्पोस्ट प्लांट स्थापित किया। यहां तैयार होने वाली जैविक खाद को वह आस-पास के कई गाँवों और शहरों के किसानों को मामूली दामों पर उपलब्ध करा रहे हैं। उनके प्लांट की खाद का उपयोग करने से तमाम किसान फसल का बहुत अच्छा उत्पादन ले रहे हैं। साथ ही फसल लगाने की कीमत में कमी आई है।

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ऐसा बन जायेगा कि पहचानने में नहीं आयेगा नई दिल्ली रेलवे स्टेशन !

नई दिल्ली: दक्षिण कोरिया ने देश के सबसे भीड़भाड़ वाले रेलवे स्टेशनों में से एक नई दिल्ली रेलवे स्टेशन का कायाकल्प कर उसे विश्व स्तरीय बनाने के लिए हाथ आगे बढ़ाया है। रेलवे की इस महत्वाकांक्षी योजना के तहत स्टेशन को दस हजार करोड़ रुपये की अनुमानित लागत के साथ चमकाया जाएगा। हवाई अड्डों की तर्ज पर अलग-अलग अराइवल और डिपार्चर वाला नई दिल्ली स्टेशन, पहला रेलवे स्टेशन होगा। स्टेशन की मल्टी-स्टोरी बिल्डिंग में डिपार्चर्स और अराइवल के लिए अलग सेक्शन होंगे। अजमेरी गेट की तरफ आसमान छूते 3 टावर कमर्शल इस्तेमाल के लिए होंगे। स्टेशन पर ट्रेन का इंतजार कर रहे लोगों के लिए स्टेशन के फर्स्ट फ्लोर पर काफी स्पेस होगा। ट्रेन से उतरने वाले लोग ग्राउंड फ्लोर से बाहर आ सकेंगे। सेकंड फ्लोर पर ऑफिस होंगे। इंडीजीनियस स्टेट ऑफ आर्ट्स वाला नई दिल्ली स्टेशन भारत में ही नहीं दुनिया में अपनी तरह का पहला स्टेशन होगा। नई दिल्ली रेलवे स्टेशन की कायाकल्प में साउथ कोरियन रेलवे का विशेष योगदान रहेगा। नई दिल्ली रेलवे स्टेशन की कायाकल्प पर लगभग 10 हजार करोड़ रुपये खर्च किये जायेंगे।

यात्रियों को सर्वश्रेष्ठ सुविधाएं दी जाएगी और उनके लिए खरीददारी की सुविधा भी होगी। नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर एक दिन में पांच लाख से ज्यादा यात्री आते हैं। स्टेशन पर एक दिन में 361 रेलगाड़ियां आती हैं। योजना के तहत तीन मंजिला स्टेशन इमारत में प्रस्थान और आगमन के अलग-अलग सेक्शन होंगे। स्टेशन के अजमेरी गेट की ओर व्यावसायिक इस्तेमाल के लिए तीन गगनचुंबी इमारत होंगी।

रेल मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि दक्षिण कोरिया ने नई दिल्ली स्टेशन के पुनर्विकास के लिए उत्सुकता दिखायी है। रेलवे ने स्टेशन में और उसके आसपास खाली पड़ी भूमि के व्यावसायिक इस्तेमाल से लाभ कमाने की संभावनाओं को तलाशा और दक्षिण कोरिया रेलवे को संभावित लेआउट के साथ विस्तृत योजना सौंपी।

योजना के तहत स्टेशन पर डिजिटल साइनेज, स्वचालित सीढ़ियां और लिफ्ट, ऑटोमेटिक सेल्फ टिकट काउंटर, एग्जिक्यूटिव लाउंज और यात्रियों के लिए कई अन्य सुविधाएं होंगी। रेल मंत्री सुरेश प्रभु ने निजी कंपनियों की मदद से 400 स्टेशनों के पुनर्विकास के जरिये राजस्व एकत्रित करने पर जोर दिया है और नई दिल्ली स्टेशन का कायाकल्प इसी का हिस्सा है। रेलवे ने हाल ही में 23 जंक्शनों के लिए महत्वाकांक्षी स्टेशन पुनर्विकास परियोजना के पहले चरण का शुभारंभ किया।

बेंगलुरु देगा पहला स्वदेशी जेट इंजन का तोहफा, टॉप देशों में शुमार होगा भारत

करीब 24 हफ्तों में यह साफ हो जाएगा कि बेंगलुरु भारत को पहला स्वदेश निर्मित जेट इंजन दे सकता है कि नहीं। अगर ऐसा हुआ तो भारत भी उन तीन देशों के ग्रुप में शामिल हो जाएगा, जिन्हें अपना जेट इंजन विकसित करने का गौरव हासिल है।

अभी तक सिर्फ अमेरिका, यूरोप (अगर सभी देशों को एक ग्रुप में गिना जाए) और इजराइल ही इस बात का दंभ भर सकते हैं। भारतीय इंजीनियरों और वैज्ञानिकों की एक 11 सदस्यीय टीम इस इंजन के सर्टिफिकेशन की तैयारियों में जुटी है।

बेंगलुरु की कंपनी इन्टेक डीएमएलएस के तहत काम करने वाली रिसर्च एंड डिवेलपमेंट फर्म पोएर जेट्स प्राइवेट लिमिटेड को इस प्रॉजेक्ट के लिए 20 करोड़ रुपये मिले हैं। इसमें से 9 करोड़ रुपये खर्च हो चुके हैं। एचएएल जैसी कंपनियों से टाई-अप के बाद मिले अनुभवों से समृद्ध इस कंपनी ने दो साल पहले खुद का गैस टरबाइन इंजन बनाने का फैसला किया था।

समुद्र के नीचे से गुजरेगी देश की पहली बुलेट ट्रेन, मिट्टी और चट्टान के परीक्षण….

 

 

प्रतीकात्मक तस्वीर…

नई दिल्ली : देश में बुलेट ट्रेन का सपना पूरा होने में भले ही अभी काफी वक्त है, पर इस महत्वाकांक्षी प्रॉजेक्ट से जुड़ी बातें लोगों को अभी से रोमांचित करने के लिए काफी हैं। मुंबई और अहमदाबाद के बीच चलने वाली यह बुलेट ट्रेन समुद्र के नीचे से भी गुजरेगी और इसके लिए काम जोरशोर से चल रहा है। मुंबई-अहमदाबाद रेल कॉरिडोर के 7 किलोमीटर लंबे समुद्र के नीचे के मार्ग की ड्रिलिंग का काम शुरू हो गया है। इसके तहत फिलहाल समुद्र के नीचे की मिट्टी और चट्टानों का परीक्षण किया जा रहा है।

दो प्रमुख महानगरों को जोड़ने वाली हाई स्पीड ट्रेन 350 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से चलेगी। ठाणे के नजदीक देश में पहली बार यात्रियों को समुद्र के नीचे की यात्रा का रोमांच मिलेगा। ट्रेन अधिकतम 350 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से दौड़ेगी।

रिकॉर्ड 104 सैटेलाइट लॉन्च का ISRO ने जारी किया 'चुभने वाला' सेल्फी वीडियो

रिकॉर्ड 104 सैटेलाइट लॉन्च से चिढ़ गया चीन, ISRO ने जारी किया ‘चुभने वाला’ सेल्फी वीडियो

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संस्थान ने गुरुवार को एकसाथ 104 सैटेलाइट लॉन्च कर एक नया विश्व कीर्तिमान स्थापित किया। इसरो की इस सफलता की पूरी दुनिया में सराहना हो रही है। लेकिन भारत की यह उपलब्धि चीन को रास नहीं आयी। इस विश्व रिकॉर्ड से चीन चिढ़ गया है। इसरो ने आज एक वीडियो जारी किया जिससे चीन की खीझ और बढ़नी तय है। साथ ही यह वीडियो पूरे देश के लिए गर्व से भर देने वाला है।

चीनी अखबार ने अपने लेख में लिखा है कि 104 सैटेलाइट लॉन्च करना भारत के लिए उपलब्धि तो है लेकिन भारत अभी भी स्पेस के क्षेत्र में अमेरिका और चीन से काफी पीछे है। लेख में कहा गया है कि स्पेस के क्षेत्र में कामयाबी सिर्फ नंबर के आधार पर नहीं होती है, इसलिए यह एक लिमिटिड कामयाबी ही है और यह बात भारतीय वैज्ञानिक भी जानते हैं।

इसरो ने पहली बार हाई रिजॉल्यूशन कैमरे से प्रक्षेपण का सेल्फी वीडियो बनाया है। इसमें साफ तौर पर देखा जा सकता है कि कैसे चार चरणों में 104 उपग्रह सफलतापूर्वक अपनी कक्षा में स्थापित हुए। यह सेल्फी कैमरा पीएसएलवी में लगाया गया था।

आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा प्रक्षेपण केंद्र से जैसे ही लॉन्च शुरू हुआ कैमरे भी शुरू हो गया। उसके बाद चार चरणों का प्रक्षेपण और फिर 101 सैटेलाइट को उनकी कक्षा में स्थापित करते हुए देखना सुखद है। आप भी देखिए ये वीडियो…..

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संस्थान (इसरो) ने  एक नया कीर्तिमान बना दिया। आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा के सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से सुबह 9.28 मिनट पर एकसाथ 104 सैटेलाइट को सफलता पूर्वक लॉन्च किया गया। इससे पहले एकसाथ इतने सैटेलाइट कभी नहीं छोड़े गए थे। यह रिकॉर्ड अभी तक रूस के पास था। उसने 2014 में एक साथ 37 सैटेलाइट भेजे थे।