फाइव स्टार होटल का आराम छोड़ कर इस नेता ने अपनाया गौशाला में रहना

यदि हममें से किसी के पास भी फाइव स्टार होटल में रहने का मौका हो तो हम बहुत ही उत्साह के साथ उस मौके को अपना लेंगे| लेकिन इस नेता ने हमारी इस सोच को गलत साबित कर दिया| भारतीय जनता पार्टी के केंद्रीय मंत्री एस सुरेश कुमार ने फाइव स्टार होटल में रहने का मौका छोड़ कर म्य्सूर के गाँव के गौशाला में रहना पसंद किया|

हालाँकि खुली जगह या गौशाला में रहना कुमार के लिए कोई नई बात नहीं है| सुरेश कुमार ने कहा-” मैं पहले भी बेंगलुरु से तिरुपति की 2013 की यात्रा में खुली जगहों पर रह चुका हूँ| मैं ऐसी जगहों पर तब भी रह चुका हूँ जब मैंने धर्मस्थल और सबरीमाला के लिए 2015 में पदयात्रा की थी|”

कुमार बेंगलूर दक्षिण उपनगर में राजजिनगर विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते हैं और 9 अप्रैल के लिए निर्धारित होने वाले नानजंगुद उप-चुनाव में भाजपा के उम्मीदवार श्रीनिवास प्रसाद के लिए प्रचार कर रहे हैं।

कुमार ने कहा-“पार्टी के नेताओं ने मेरे लिए अच्छे से अच्छा रहने का बंदोबस्त किया था पर मैंने उसे न स्वीकारने का निश्चय किया|” वे दिन भर काम्पैन्गिंग से थक क्र आने के बाद गौशाला में रहना ज्यादा पसंद करते हैं| गौशाला में वे समाचार पत्र पढकर और अपने अनुयायियों से बात चीत करके अपना समय बिताते हैं| अपनी निष्कलंक समझ बूझ कि वजह से अक्सर ही वे लोगो को अपनी बातों की ओर आकर्षित कर लेते हैं|

आप सभी को नववर्ष एवं नवरात्र मंगलमय हो। धर्मो रक्षति रक्षितः।

भारतीय एवं हिंदू नव वर्ष की शुभकामनाएं यह नव वर्ष आपके जीवन में खुशियां सुख समृद्धि एवं आनंद लेकर आए और आपके जीवन को प्रसन्नता से भर दे आपकी सारी मनोकामनाएं पूरी हो…..

Yashark Pandey : चैत्र प्रतिपदा आज से है या कल से ये मुझे नहीं पता। कुछ विद्वानों को पढ़ा किंतु समझ में नहीं आया। प्रायः अखबार में खबर आती है कि काशी के फलां फलां विद्वानों की बैठक होने वाली है जिसमें पूरे देश में एक पंचांग की व्यवस्था करने पर विचार होगा। ऐसी बैठकों में विमर्श से क्या निष्कर्ष निकलता है पता नहीं। ज्योतिष अपना विषय नहीं है अतः कुछ और कहना उचित नहीं।

अत्रि विक्रमार्क अन्तर्वेदी जी की आईडी बन्द है अन्यथा डांट डपट के कुछ ज्ञान दे ही देते। मांस हम खाते नहीं तो नवरात्र में छोड़ने का प्रश्न भी नहीं उठता। जीव जन्तु herbivore, carnivore और omnivore होते हैं। मैं ‘herbi-fruity-vore’ हूँ। अर्थात् अनाज खाते हुए फलाहार भी भखने वाला।

अपना एक मित्र है। जब बनारस में रहता था तो उसके यहाँ नवरात्र पे ढेर सारा स्वादिष्ट फलाहार बनता था। हम अपने घर में अनाजी खा के उसके यहाँ फलाहार खाने जाते थे। भूखा रहना अपने बस की बात नहीं। वर्ष में केवल दो दिन व्रत रहता हूँ: महाशिवरात्रि और श्रीकृष्ण जन्माष्टमी।

बन्धुओं प्रतिदिन किसी एक ग्रन्थ का पाठ अवश्य करें। संस्कृत ही संस्कृति का मूल है अतः अर्थ समझते हुए स्वाध्याय करें। मेरे परिवार में नित्य चार ग्रन्थों का पाठ होता है। मैं रुद्री करता हूँ, पिताजी गीता और मानस, माँ दुर्गा सप्तशती का पाठ करती हैं। यह बताने का आशय यह है कि आपके कुटुंब में जितने सदस्य हों उतने ग्रन्थ आपस में बाँट लीजिए। शास्त्रों से विमुख होना संस्कृति से विमुख होना है। संस्कृति से विमुख होना अर्थात् राष्ट्र से विमुख होना है।

बिना पूजा पाठ किये झुट्ठै व्रत रखना व्यर्थ है। कहा गया है कि दुर्गा सप्तशती का पाठ करते हुए उच्चारण की अशुद्धि नहीं होनी चाहिये। जिन्हें संस्कृत नहीं आती वे हिंदी संस्करण का मानसिक पाठ करें।

एक बार करपात्री जी महराज हाथ में कोई ग्रन्थ लेकर पाठ कर रहे थे। किसी ने देखा तो टोक दिया कि महराज पोथी को हमेशा लकड़ी के पीढ़े पर रख कर पाठ करना चाहिये अन्यथा आधा फल ही प्राप्त होता है।

करपात्री जी बोले, ‘कलियुग में पूरा फल मिलता कहाँ है, आधा ही मिल जाये तो बहुत है।’ अतः यदि आप संस्कृत से परिचित नहीं हैं तब भी हिंदी में दुर्गा सप्तशती गीता प्रेस से ले आइये। देवी का स्मरण करते हुए पाठ करें। एक बार पूरी कथा पढ़ लेंगे फिर संस्कृत में पढ़ने पर स्वतः सरल प्रतीत होगा।

आप सभी को नववर्ष एवं नवरात्र मंगलमय हो। धर्मो रक्षति रक्षितः। जय जय श्री राम _/\_

रिपोर्ट पढ़िये: भारतीय मीडिया का ज्ञान कितना घटिया है, देश की असलियत से कितने कटे हुए हैं….

ब्लॉग : पुष्पेंद्र राणा ( यूनाइटेड हिन्दी डॉट कॉम ) :-  अवैध बूचड़खानों की बंदी का विरोध कर विपक्ष, मीडिया, महानगरों में बैठे तथाकथित बुद्धिजीवियों ने ना केवल अपनी बेवकूफी का प्रदर्शन किया है बल्कि उनका ज्ञान कितना सिमित है और महानगरो से बाहर के भारत की असलियत से कितने कटे हुए हैं इस सच्चाई के दर्शन भी करा दिए हैं।

लेकिन दुर्भाग्य यह है कि अधिकतर समर्थक भी इस मुद्दे से ठीक से परिचित नही है ?
पहली बात तो मुद्दा सिर्फ गौ हत्या का नही था ! गौ हत्या पर उत्तर प्रदेश में पहले से ही कानूनी प्रतिबन्ध है। हालांकि सपा और बसपा की सरकारों में इस कानून की धज्जियां उड़ाई गई और बड़े पैमाने पर सरकारी संरक्षण में गौहत्या की जाती रही।

लेकिन गौ हत्या से भी बड़ा मुद्दा (विशेषकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश के लिये) भैंसों के अवैध कटान का रहा है। उदाहरण के लिये कुछ साल पहले तक मेरठ में शहर के बीचों बीच सरकारी कमेला होता था जिसे हर साल नगर निगम मामूली रकम के एवज में याकूब कुरैशी और शाहिद अख़लाक़ जैसे कसाई नेताओ को ठेके पर देता था। मेरठ शहर की रोजाना की मांस की खपत 250 भैंस की है और इसीलिए इस कमेले में कानूनी रूप से रोजाना 250-300 भैंस काटे जाने की अनुमति थी लेकिन स्थानीय मीडिया रिपोर्ट के अनुसार इसमें रोजाना 5-7 हजार तक भैंस काटी जाती थी। इसके अलावा कई हजार मेरठ शहर के एक हिस्से के गली मुहल्लों में बने छोटे कमेलो में कटती थी। मेरठ शहर के मुस्लिम बहुल इलाकों का यह हाल है कि वहां पानी में भी खून आता है। दुर्गन्ध और बीमारियों की वजह से कई इलाको से लोग पलायन कर गए। कोर्ट ने कई सालों पहले ही इस कमेले को बंद करने और शिफ्ट करने का आदेश दिया हुआ था लेकिन उसे हटाने की इक्षाशक्ति किसी सरकार में नही थी।

सबसे बड़ी बात ये है कि ये सारा मांस गल्फ में एक्सपोर्ट होता था। लोकल सप्लाई के लिये इतने कटान की आवश्यकता नही थी ! याकूब कुरैशी और शाहिद अख़लाक़ जैसे नेता रातो-रात करोड़पति से खरबपति हो गए। बसपा की सरकार में तो इनका खुद का ही राज था। सुविधा अनुसार पार्टी भी बदल लेते थे। पैसो और सत्ता के दम पर इन्होंने मेरठ में आतंक कायम किया। सपा में आजम खान की वजह से इनकी दाल नही गली क्योंकि उसकी कसाईयो से नही बनती थी। आजम खान ने मेरठ की पीड़ित मुस्लिम जनता की गुहार पर कमेला शहर से बाहर शिफ्ट करवा दिया। हालांकि याकूब कुरैशी जैसे इतने पैसे वाले हो गए कि उन्होंने खुद अपने आधुनिक संयंत्र स्थापित कर लिए लेकिन इनमे अवैध कटान चालू रहा।

अगले पृष्ठ पर पढ़िये : बिसाहड़ा जैसे कितने काण्ड हुए

कभी सोचा है कि इतने आधातों को सहकर भी आज हिन्दू कैसे बचे हैं, ये धर्म कैसे बचा है?

आपने कभी सोचा है कि इतने आधातों को सहकर भी हम आज हिन्दू कैसे बचे हैं ? हमारा धर्म कैसे बचा है ? फोटो Source : santabanta.com

ब्लॉग : महावीर प्रसाद खिलेरी (संपादक यूनाइटेड हिन्दी डॉट कॉम) : हिन्दू समाज शायद दो हज़ार सालों से गुलाम रहा है! हमारे ऊपर सदियों तक इस्लामी शासन रहा फिर कई रूपों में ईसाईयों ने हम पर शासन किया फिर 1947 में जब देश तथाकथित रूप से आजाद हुआ तब हमसे हमारा धर्म छीनने मिशनरी लोग आ गये, लालच दिया, कई जगह डर दिखाया, कई जगह अहसान जता कर उसकी कीमत मत-परिवर्तन के रूप में वसूलनी चाही, हमारे ऊपर न जाने कितने मोपला और मीनाक्षीपुरम हुए। आपने कभी सोचा है कि इतने आधातों को सहकर भी हम आज हिन्दू कैसे बचे हैं ? हमारा धर्म कैसे बचा है ?

आज हम हिन्दू इसलिये हैं क्योंकि हमारे पूर्वजों ने अपना धर्म नहीं छोड़ा। डर, हिंसा, प्रपंच, लालच, षड्यंत्र सबके बीच सदियों तक संघर्ष करते रहे। हमारे एक पूर्वज इधर राजस्थान में घास की रोटी खाकर हिन्दू धर्म बचा रहे थे तो उधर पंजाब में हिन्दू धर्म को बचाने के लिये कुछ पूर्वज जीवित ही दीवार में चुनवा दिये गये। अपने उन पूर्वजों के बारे में भी दो मिनट सोचिये जिन्होनें धर्म बदलने की जगह मैला उठाने के काम को चुना था। हकीकत राय के बलिदान के बारे में सोचिये, दक्षिण भारत की माँ रुद्र्माम्बा देवी के त्याग का स्मरण कीजिये, पूरब के वीर लाचित बरफूकन का स्मरण कीजिये और न जाने ऐसे कितने नाम है जिन्होनें अपना सर्वस्व खो कर हिन्दू धर्म को बचाये रखा। ये सब किसी एक जाति-विशेष के नहीं थे !

आप योगी जी की प्रशासनिक क्षमता पर सवाल इसलिये नहीं उठा रहे कि आपको वास्तव में इस बात की कोई फ़िक्र है कि वो शासन कैसे चलायेंगे! दरअसल वजह ये है कि योगी जी में आपने किसी ठाकुर को ढूंढ लिया है जो आपको पीड़ा दे रहा है। योगी जी के ऐब आप इसलिये ढूंढ रहें हैं क्योंकि मोदी जी ने आपके जात वाले को मुख्यमंत्री नहीं बनाया। इसी तरह जब आप योगी जी को ठाकुर अजय सिंह विष्ट लिख रहें हैं तो आप उन्हें एक जाति विशेष से बाँध रहें हैं, जाहिर है फिर बाकी जाति वाले भी उन्हें उसी रूप में लेंगें।

अपनी जातिवादी मानसिकता में जब हम किसी के बारे में कुछ लिखतें हैं, किसी जाति के मूल पर प्रश्न उठाते हैं तो एक बार ये भी सोच लीजिए कि आपने गाली किसको दी है ? आप उनको गाली दे रहें हैं उनके कारण हम हैं वर्ना हम भी आज पीटर या जुम्मन बनकर जी रहे होते ! वो पूर्वज चाहे किसी भी जाति के हों पर वो सब हमारे लिये वन्दनीय है क्योंकि उन्होंने हमारे लिये उस धरोहर (हिंदुत्व) को सहेजे रखा जिसका अनुपालन मनु, परशुराम, श्रीराम, श्रीकृष्ण, श्री बुद्ध से लेकर गुरु गोविन्द सिंह करते थे।

हम या आप जिस जाति में पैदा हुयें हैं वो हमारी या आपकी चॉइस नहीं थी, भगवान की मर्जी थी। ईश्वर की मर्जी पर जो सवाल उठाये, उसके सृजन को किसी भी रूप में लांछित करे उससे कृतघ्न और अज्ञानी कोई नहीं हो सकता। मैं कभी किसी दलित को गाली नहीं देता, इसलिये नहीं कि वो गलत नहीं हो सकते बल्कि इसलिये क्योंकि इतने दंशों, अत्याचारों और प्रलोभनों को सह कर भी आज वो हिन्दू है। इस देश की मुख्य-धारा में है और कम से कम हमारे अस्तित्व को लीलने वाला खतरा नहीं है। मैं कभी किसी क्षत्रिय को गाली नहीं देता क्योंकि उनके पूर्वजों ने सदियों तक हमारे भारत की अखंडता अक्षुण्ण रखने के लिये बलिदान दिया है। मैं किसी ब्राह्मण को गाली नहीं देता क्योंकि दुनिया में भारत को विश्व-गुरु बनाने का गौरव उनके पूर्वजों का था। मैं किसी वैश्य को गाली नहीं देता क्योंकि इन्होंनें अपनी धन-संपत्ति राष्ट्र-रक्षा में कई बार न्योछावर की है। इसी तरह मैं अपने किसी वनवासी बंधू को अपमानित करने का भी पाप नहीं करता, ये तो तबसे धर्म रक्षक रहें हैं जब भगवान राम इस धरती पर आये थे।

अपने जातिगत पूर्वाग्रहों को छोड़िये वरना प्रकृति सौभाग्य को दुर्भाग्य में बदलने में जरा भी देर नहीं करती।

देखिए कैसे इन दो नौजवान लड़कों ने किया खतरनाक सांप से मुकाबला !

सोशल मीडिया पर इन दिनों एक वीडियो बड़ी तेज़ी से वायरल हो रहा है जिसमें 2 नौजवान लड़के सांप से लड़ते दिख रहे हैं l कम्बोडिया नाम की एक जगह से आया ये वीडियो इस समय वायरल है और अब तक कई लाख लोग देख चुके हैं l

दरअसल इस वीडियो में 2 बच्चे एक नेट और बास्केट को पानी में छोड़ जाते हैं उसके कुछ समय बाद जब वापिस आते हैं तो वहां उस जाल में कई मछलियाँ और सांप भी आ जाता है l कम्बोडिया की अधिकाँश जनसँख्या खेती पर जीवित है और ऐसे में बच्चों को बचपन से ही इस तरह का हुनार सिखाया जाता है  l

देखिए वीडियो ! 

यकीनन आप भी इस वीडियो को देखने के बाद चौक गए होंगे आखिर इतने छोटे लड़के कैसे ऐसे खतरनाक साँपों से मुकाबला कर सकते हैं l वीडियो अच्छा लगा हो तो शेयर करें !

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'मैं भी शहीद का बेटा पर गुरमेहर से बिल्कुल सहमत नहीं' : मनीष कुमा

नई दिल्ली ( यूनाइटेड हिन्दी डॉट कॉम ) :- दिल्ली के रामजस कॉलेज में लेफ़्ट और राइट विचारधारा वाले स्टूडेंट गुटों के बीच झड़प के बाद दिल्ली के लेडी श्रीराम कॉलेज में पढ़ने वाली गुरमेहर कौर की पोस्ट वायरल हो गई। इसके बाद हंगामा मचा गुरमेहर की उस तस्वीर पर जिसमें वो एक प्लेकार्ड लिए खड़ी हैं। इस पर अंग्रेज़ी में लिखा है, ”पाकिस्तान ने मेरे पिता को नहीं मारा, बल्कि जंग ने मारा है।”

गुरमेहर के पिता कारगिल युद्ध के दौरान शहीद हुए थे। गुरमेहर कौर की इस पोस्ट का जवाब मल्टीनेशनल कंपनी में काम करने वाले मनीष शर्मा ने दिया है। ये पूरी चिट्ठी नीचे पढ़िए।

हाय गुरमेहर कौर,

पिछले कुछ दिनों में वायरल हुए आपके वीडियो और कुछ इंटरव्यू जिनमें आपने अभिव्यक्ति की आज़ादी की बात की और कहा है, ‘पाकिस्तान ने आपके डैड की हत्या नहीं की, युद्ध ने उन्हें मार डाला।’ इस पोस्ट के चलते आपका नाम हर घर तक पहुंच गया है।

मैं सार्वजनिक तौर पर भावनाओं की अभिव्यक्ति से बचता हूं, लेकिन इस बार लगता है कि बहुत हो गया। मुझे नहीं मालूम कि आप ये जानबूझ कर रही हैं या अनजाने में, लेकिन आपकी वजह से डिफेंस से जुड़े परिवारों की भावनाएं आहत हो रही हैं।

पहले मैं अपना परिचय दे दूं, मैं एक मल्टीनेशनल कंपनी में आईटी पेशेवर के तौर पर काम करता हूं। मेरे पिता भारतीय सेना में अधिकारी थे जो श्रीनगर में ऑपरेशन रक्षक के दौरान चरमपंथियों से संघर्ष करते हुए मारे गए थे।

मैं नहीं जानता कि मैं इसके लिए किसे दोष दूं – युद्ध को, पाकिस्तान को, राजनेताओं को और किसे दोष नहीं दूं क्योंकि मेरे पिता वहां संघर्ष कर रहे थे जो विदेशी ज़मीन ही थी क्योंकि वहां के स्थानीय लोग कहते हैं- इंडिया गो बैक

मेरे पिता ने अपनी जान दी उन्हीं लोगों के लिए, हमारे लिए और हमारे देश के लिए। बहरहाल, हम दोनों नैतिकता के एक ही धरातल पर मौजूद हैं- आपके पिता ने भी जान दी और मेरे पिता ने भी जान गंवाई है।

अब क़दम दर क़दम आगे बढ़ते हैं। आपने कहा कि पाकिस्तान ने आपके पिता को नहीं मारा, ये युद्ध था जिसने आपके पिता को मारा।

मेरा सीधा सवाल आपसे है? आपके पिता किससे संघर्ष कर रहे थे? क्या ये उनका निजी युद्ध था या फिर हम एक देश के ख़िलाफ़ लड़ रहे थे?

ज़ाहिर है ये पाकिस्तान और उसकी हरकतें ही थीं, जिसके चलते आपके पिता और उनके जैसे कई सेना अधिकारियों को कश्मीर में तनावपूर्ण माहौल में अपनी जान गंवानी पड़ी।

अपने पिता की मौत की वजह युद्ध बताना तर्कसंगत लगता है, लेकिन ज़रा सोचिए उनकी मौत की कई वजहें थीं-

1. पाकिस्तान और उसका विश्वासघाती कृत्य

2. भारत के राजनीतिक नेतृत्व में राजनीतिक इच्छाशक्ति का अभाव

3. हमारे नेतृत्व की एक के बाद एक ग़लतियां

4. धार्मिक कट्टरता

5. भारत में मौजूद स्लीपर सेल जो भारत में रहकर पाकिस्तानी आईएसआई की मदद करते हैं.

और इन सबके अलावा, उनकी मौत की वजह- अपनी ड्यूटी के प्रति उनका पैशन और उनकी प्रतिबद्धता थी। ये वजह थी।

मैं इसे एक्सप्लेन करता हूं……

आपके पिता ने अपनी जान तब गंवाई जब उनकी उम्र काफ़ी कम थी, आप महज दो साल की थीं। ये देश के प्रति उनका पैशन था, राष्ट्रीय झंडे और अपने रेजिमेंट के प्रति सम्मान का भाव जिसने उन्हें शहीद होने का साहस दिया।

नहीं तो हम लोग देख रहे हैं कि आपके पिता से ज़्यादा उम्र के लोग अभी भी जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी में पढ़ रहे हैं और देश के ख़िलाफ़ काम कर रहे हैं- किसी क़ुर्बानी की इनसे उम्मीद के बारे में तो भूल ही जाइए।

क्या आपको मालूम है कि आपके पिता ने जिस कश्मीर के लिए अपनी जान दी, उसी कश्मीर की आज़ादी के लिए ये जेएनयू में नारे लगाते हैं।

वे किस आज़ादी की बात करते हैं, वे कश्मीर को पाकिस्तान का हिस्सा बता रहे हैं, ये उनके लिए आज़ादी है और इसके ख़िलाफ़ हम दोनों के पिता ने संघर्ष किया था।

आप जागरूक नागरिक होने के बाद भी इनकी वकालत कर रही हैं। ये वो लोग हैं जो अपने कभी ना ख़त्म होने वाले प्रोपगैंडे के लिए आपको प्यादे की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं।

मैंने आपका आज सुबह इंटरव्यू सुना जिसमें आप कह रही हैं कि आप किसी राजनीतिक पार्टी के ख़िलाफ़ नहीं हैं, आप केवल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बात कर रही हैं।

मेरा आपसे सीधा सवाल है – आपके लिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता क्या है? क्या आपके लिए यह भारत के टुकड़े हों, जैसे नारे लगाना है ?

क्या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मतलब आपके लिए लोगों- मेरे और आपके अपने पिता और उनकी तरह सीमा पर दिन रात गश्त लगा रहे जवानों के अपमान करने का अधिकार मिल जाना है?

मिस कौर, यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं है. अगर आपके पिता आज जीवित होते तो वे आपको बेहतर बता पाते।

मेरा आपसे विनम्र अनुरोध है- आप अपने पिता से कुछ सीखिए. कम से कम अपने देश का सम्मान करना सीखिए क्योंकि देश हमेशा पहले आता है।

मुझे उम्मीद है कि मैं अपनी बात स्पष्टता से रख पाया हूं।

जय हिंद !!

केंद्रीय सचिव ने अन्य वरिष्ठ अधिकारी के साथ मिलकर गांव वालों को दी ‘ऐसी सीख’ जिसके बाद दुनिया कर रही है सलाम…

पीएम मोदी के स्वच्छ भारत अभियान के चलते तेलंगाना के नौकरशाहों ने दुनिया के आगे पेश की अनोखी मिसाल

सभी को याद होगा कि बीते साल 2014 को नई दिल्ली में राजपथ पर स्वच्छ भारत अभियान का शुभारंभ करते हुए पीएम नरेन्द्र मोदी ने कहा, “2019 में महात्मा गांधी की 150वीं जयंती के अवसर पर भारत उन्हें स्वच्छ भारत के रूप में सर्वश्रेष्ठ श्रद्धांजलि दे सकता हैl” 2 अक्टूबर 2014 को देश भर में एक राष्ट्रीय आंदोलन के रूप में स्वच्छ भारत मिशन की शुरुआत स्वयं पीएम मोदी ने की थीl

पीएम मोदी ने अपने कार्यकाल में VIP कल्चर को खत्म करने पर भी खासा जोर दिया हैl जहा आज जब कोई अफसर घर से निकलता है तो अपने साथ पूरा गाडियों का काफिला लेकर चलता है जिसे दूर से ही देख कर कोई भी अंदाज़ा लगा ले की कोई बड़ा अफसर आ रहा हैl

नौकरशाही के ज़माने  में आज जहां बड़े अफसर एक नहीं 2-2 सरकारी गाडियों का प्रयोग करना अपनी शान समझते हैं वहीं VIP कल्चर त्याग कर बिल्कुल आम युवा की तरह बीते महीने फ़रवरी में 23 राज्यों के करीब एक दर्जन वरिष्ठ नौकरशाहों ने ऐसा ही करके दिखाया हैl इनमें केंद्रीय स्वच्छता सचिव परमेश्वरन अय्यर भी शामिल हैंl

सफाई की बात करना और लोगों को इसके महत्व की सीख देना एक बात है, लेकिन इसे खुद करके मिसाल कायम करना बिल्कुल अलग ही बात हैl आपको बता दें कि केंद्रीय स्वच्छता सचिव परमेश्वरन अय्यर के साथ इन सभी अधिकारियों ने बीते दिनों चार घंटे लंबी बस यात्रा की और हैदराबाद से तेलंगाना स्थित वारंगल पहुंचेl तेलंगाना पहुँच कुछ अन्य अधिकारियों के साथ मिलकर इन सभी नौकरशाहों ने गंगादेवीपल्ली गांव में पहुँच पीएम मोदी के स्वच्छ भारत अभियान और नौकरशाही का त्याग कर ईमानदारी की ऐसी मिसाल पेश की है जिसे सुन खुद पीएम मोदी दंग रह गयेl

आगे पढ़ें पीएम मोदी की अपील के चलते केंद्रीय सचिव को घुसना पड़ा शौचालयों के गड्ढों में और फिर…

जानिये क्या खास हैं इस इंसान में, जो प्रधानमंत्री भी सब काम छोड़ कर कोंयमबटृर पहुंच गये !

यूनाइटेड हिन्दी विशेष : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने उत्तर प्रदेश जैसे महत्वपूर्ण चुनावी कार्यक्रम में से समय निकाल 112 फिट ऊंची शिव प्रतिमा का अनावरण करने कोंयमबटृर गए तो जरूर कोई बात रही होगी। दरअसल, जिस शख्स के सौजन्य से ये सब हो रहा था उसका नाम हैं जग्गी सद्गुरु वासुदेव। ये शख्स देखने और बोलने में जितना साधरण नजर आता है उससे कहीं अधिक असाधरण उनका व्यक्तित्व है।

आप इसी से उनकी प्रतिभा का अंदाजा लगा लीजिए कि जग्गी सद्गुरु वासुदेव को संयुक्त राष्ट्र के आर्थिक और सामाजिक परिषद में विशेष सलाहकार की पदवी प्राप्त है। उनका संस्थान ईशा फाउंडेशन भारत सहित संयुक्त राज्य अमेरिका, इंग्लैंड, लेबनान, सिंगापुर और ऑस्ट्रेलिया में योग कार्यक्रम सिखाता है।

यही नहीं जब देश में गौमांस को लेकर बहस हुई तो जग्गी सद्गुरु वासुदेव ही वह अकेले शख्स थे जिन्होंने वैज्ञानिक और आध्यात्मिक तरीके से गौमांस खाने का न केवल खंडन किया बल्कि वैज्ञानिक तर्क देकर इससे होने वाले नुकसान भी बताए। उनके तर्कों के बाद कई दिग्गज जो गौ मांस खाने को लेकर अपने तर्क दे रहे थे बैकफुट पर आ गए थे। उनमें चर्चित पत्रकार बरखा दत्त भी शामिल है।

आपको बता दें कि जग्गी सद्गुरु वासुदेव का आईटी और मेडिकल आदि क्षेत्रों में काम करने वाले लोगों पर बहुत प्रभाव है। यह न केवल भारत में बल्कि दुनिया भर में लोग उनके योग और उनकी आध्यात्मिक बातों के दीवाने हैं। जग्गी सद्गुरु वासुदेव की शख्सियत का अंदाजा इस बात से ही लगाया जा सकता है कि पूरे तमिलनाडु को हरा भरा करने का बीड़ा उठाया हुआ है। यहां वे लगभग 16 करोड़ पेड़ लगाने की परियोजना चला रहे हैं। उनके संगठन ने 17 अक्टूबर 2006 को तमिलनाडु के 27 जिलों में एक साथ 8.52 लाख पौधे रोपकर गिनीज विश्व रिकॉर्ड बनाया था।

अगले पेज पर पढ़े सद्गुरु के बारे में क्या योगदान हैं उनका भारतीय संस्कृति में ?

जानिये क्या खास हैं इस इंसान में, जो प्रधानमंत्री भी सब काम छोड़ कर कोंयमबटृर पहुंच गये !

यूनाइटेड हिन्दी विशेष : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने उत्तर प्रदेश जैसे महत्वपूर्ण चुनावी कार्यक्रम में से समय निकाल 112 फिट ऊंची शिव प्रतिमा का अनावरण करने कोंयमबटृर गए तो जरूर कोई बात रही होगी। दरअसल, जिस शख्स के सौजन्य से ये सब हो रहा था उसका नाम हैं जग्गी सद्गुरु वासुदेव। ये शख्स देखने और बोलने में जितना साधरण नजर आता है उससे कहीं अधिक असाधरण उनका व्यक्तित्व है।

आप इसी से उनकी प्रतिभा का अंदाजा लगा लीजिए कि जग्गी सद्गुरु वासुदेव को संयुक्त राष्ट्र के आर्थिक और सामाजिक परिषद में विशेष सलाहकार की पदवी प्राप्त है। उनका संस्थान ईशा फाउंडेशन भारत सहित संयुक्त राज्य अमेरिका, इंग्लैंड, लेबनान, सिंगापुर और ऑस्ट्रेलिया में योग कार्यक्रम सिखाता है।

 

यही नहीं जब देश में गौमांस को लेकर बहस हुई तो जग्गी सद्गुरु वासुदेव ही वह अकेले शख्स थे जिन्होंने वैज्ञानिक और आध्यात्मिक तरीके से गौमांस खाने का न केवल खंडन किया बल्कि वैज्ञानिक तर्क देकर इससे होने वाले नुकसान भी बताए। उनके तर्कों के बाद कई दिग्गज जो गौ मांस खाने को लेकर अपने तर्क दे रहे थे बैकफुट पर आ गए थे। उनमें चर्चित पत्रकार बरखा दत्त भी शामिल है।

आपको बता दें कि जग्गी सद्गुरु वासुदेव का आईटी और मेडिकल आदि क्षेत्रों में काम करने वाले लोगों पर बहुत प्रभाव है। यह न केवल भारत में बल्कि दुनिया भर में लोग उनके योग और उनकी आध्यात्मिक बातों के दीवाने हैं। जग्गी सद्गुरु वासुदेव की शख्सियत का अंदाजा इस बात से ही लगाया जा सकता है कि पूरे तमिलनाडु को हरा भरा करने का बीड़ा उठाया हुआ है। यहां वे लगभग 16 करोड़ पेड़ लगाने की परियोजना चला रहे हैं। उनके संगठन ने 17 अक्टूबर 2006 को तमिलनाडु के 27 जिलों में एक साथ 8.52 लाख पौधे रोपकर गिनीज विश्व रिकॉर्ड बनाया था।

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Video: मोदी जी ने मुझे नहीं छोड़ा बल्कि राष्ट्र के लिए मैं ख़ुद अलग हुई थी – पीएम की पत्नी


जब से मोदी जी मुस्लिम महिलाओं के हक़ के लिए लड़ना शुरू किया हैं तबसे उन पर तरह- तरह के इल्जाम लगाये जा रहे हैं| मोदीजी ने ये मुद्दा एक रैली में उठाया था तबसे ही देश के सेक्युलर लोग नीचता पर उतर आये हैं| सेक्युलर लोगों की नीचता इस हद तक गिर गई की वो मोदीजी से कह रहे हैं कि ” वो पहले अपनी पत्नी को तो हक़ दे”|

इन सेक्युलर लोगों को मोदीजी और उनकी के बीच बोलने का कोई हक नहीं हैं| मोदीजी की पत्नी यशोदाबेन ने मोदी पर कभी किसी तरह का आरोप नहीं लगाया हैं, ना ही किसी प्रकार की मांग की हैं|

लेकिन सेक्युलर और वामपंथी तत्त्व यशोदाबेन को निशाना बनाकर नरेन्द्र मोदीजी पर आरोप लगा रहे हैं। लेकिन अब मोदीजी की पत्नी यशोदाबेन ने अब इन वामपंथी और सेक्युलर तत्वों को करारा जवाब दिया हैं। यशोदाबेन ने इन सेक्युलर तत्वों की बोलती बंद कर दी हैं। यशोदाबेन ने कहा कि “मोदीजी ने मुझे कभी नहीं छोड़ा, मैं खुद ही उनसे अलग हुई थी उनकी ख़ुशी का सम्मान करते हुए।

यशोदाबेन ने बताया की जब उनकी मोदीजी से शादी हुई थी तब वो 17 बरस की थी और मोदीजी 18 बरस के थे| तीन साल की शादी में हम मुश्किल से तीन महीने साथ रहे| फिर एक दिन मोदीजी ने अपने दिल की बात मुझसे कही कि जशोदा मैं देश भ्रमण पर निकलना चाहता हूँ| मुझे देश के लिए कुछ करना हैं, देश की प्रगति करनी हैं, मुझे देश के लिए बहुत से काम करने हैं तो तुम अपनी छुटी हुई पढाई पूरी कर लो| तब मैंने फैसला किया कि मैं नरेन्द्र मोदी को छोड़ दूंगी| मैंने नरेन्द्र मोदी के सपनोँ के बीच नहीं आउंगी| मेरे लिए मोदी की ख़ुशी से बढ़कर कुछ नहीं था इसलिए मैंने उनसे अलग होने का फैसला लिया|

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