जानिये क्या खास हैं इस इंसान में, जो प्रधानमंत्री भी सब काम छोड़ कर कोंयमबटृर पहुंच गये !

यूनाइटेड हिन्दी विशेष : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने उत्तर प्रदेश जैसे महत्वपूर्ण चुनावी कार्यक्रम में से समय निकाल 112 फिट ऊंची शिव प्रतिमा का अनावरण करने कोंयमबटृर गए तो जरूर कोई बात रही होगी। दरअसल, जिस शख्स के सौजन्य से ये सब हो रहा था उसका नाम हैं जग्गी सद्गुरु वासुदेव। ये शख्स देखने और बोलने में जितना साधरण नजर आता है उससे कहीं अधिक असाधरण उनका व्यक्तित्व है।

आप इसी से उनकी प्रतिभा का अंदाजा लगा लीजिए कि जग्गी सद्गुरु वासुदेव को संयुक्त राष्ट्र के आर्थिक और सामाजिक परिषद में विशेष सलाहकार की पदवी प्राप्त है। उनका संस्थान ईशा फाउंडेशन भारत सहित संयुक्त राज्य अमेरिका, इंग्लैंड, लेबनान, सिंगापुर और ऑस्ट्रेलिया में योग कार्यक्रम सिखाता है।

यही नहीं जब देश में गौमांस को लेकर बहस हुई तो जग्गी सद्गुरु वासुदेव ही वह अकेले शख्स थे जिन्होंने वैज्ञानिक और आध्यात्मिक तरीके से गौमांस खाने का न केवल खंडन किया बल्कि वैज्ञानिक तर्क देकर इससे होने वाले नुकसान भी बताए। उनके तर्कों के बाद कई दिग्गज जो गौ मांस खाने को लेकर अपने तर्क दे रहे थे बैकफुट पर आ गए थे। उनमें चर्चित पत्रकार बरखा दत्त भी शामिल है।

आपको बता दें कि जग्गी सद्गुरु वासुदेव का आईटी और मेडिकल आदि क्षेत्रों में काम करने वाले लोगों पर बहुत प्रभाव है। यह न केवल भारत में बल्कि दुनिया भर में लोग उनके योग और उनकी आध्यात्मिक बातों के दीवाने हैं। जग्गी सद्गुरु वासुदेव की शख्सियत का अंदाजा इस बात से ही लगाया जा सकता है कि पूरे तमिलनाडु को हरा भरा करने का बीड़ा उठाया हुआ है। यहां वे लगभग 16 करोड़ पेड़ लगाने की परियोजना चला रहे हैं। उनके संगठन ने 17 अक्टूबर 2006 को तमिलनाडु के 27 जिलों में एक साथ 8.52 लाख पौधे रोपकर गिनीज विश्व रिकॉर्ड बनाया था।

अगले पेज पर पढ़े सद्गुरु के बारे में क्या योगदान हैं उनका भारतीय संस्कृति में ?

जानिये क्या खास हैं इस इंसान में, जो प्रधानमंत्री भी सब काम छोड़ कर कोंयमबटृर पहुंच गये !

यूनाइटेड हिन्दी विशेष : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने उत्तर प्रदेश जैसे महत्वपूर्ण चुनावी कार्यक्रम में से समय निकाल 112 फिट ऊंची शिव प्रतिमा का अनावरण करने कोंयमबटृर गए तो जरूर कोई बात रही होगी। दरअसल, जिस शख्स के सौजन्य से ये सब हो रहा था उसका नाम हैं जग्गी सद्गुरु वासुदेव। ये शख्स देखने और बोलने में जितना साधरण नजर आता है उससे कहीं अधिक असाधरण उनका व्यक्तित्व है।

आप इसी से उनकी प्रतिभा का अंदाजा लगा लीजिए कि जग्गी सद्गुरु वासुदेव को संयुक्त राष्ट्र के आर्थिक और सामाजिक परिषद में विशेष सलाहकार की पदवी प्राप्त है। उनका संस्थान ईशा फाउंडेशन भारत सहित संयुक्त राज्य अमेरिका, इंग्लैंड, लेबनान, सिंगापुर और ऑस्ट्रेलिया में योग कार्यक्रम सिखाता है।

 

यही नहीं जब देश में गौमांस को लेकर बहस हुई तो जग्गी सद्गुरु वासुदेव ही वह अकेले शख्स थे जिन्होंने वैज्ञानिक और आध्यात्मिक तरीके से गौमांस खाने का न केवल खंडन किया बल्कि वैज्ञानिक तर्क देकर इससे होने वाले नुकसान भी बताए। उनके तर्कों के बाद कई दिग्गज जो गौ मांस खाने को लेकर अपने तर्क दे रहे थे बैकफुट पर आ गए थे। उनमें चर्चित पत्रकार बरखा दत्त भी शामिल है।

आपको बता दें कि जग्गी सद्गुरु वासुदेव का आईटी और मेडिकल आदि क्षेत्रों में काम करने वाले लोगों पर बहुत प्रभाव है। यह न केवल भारत में बल्कि दुनिया भर में लोग उनके योग और उनकी आध्यात्मिक बातों के दीवाने हैं। जग्गी सद्गुरु वासुदेव की शख्सियत का अंदाजा इस बात से ही लगाया जा सकता है कि पूरे तमिलनाडु को हरा भरा करने का बीड़ा उठाया हुआ है। यहां वे लगभग 16 करोड़ पेड़ लगाने की परियोजना चला रहे हैं। उनके संगठन ने 17 अक्टूबर 2006 को तमिलनाडु के 27 जिलों में एक साथ 8.52 लाख पौधे रोपकर गिनीज विश्व रिकॉर्ड बनाया था।

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गिनीज बुक में दर्ज विश्व का सबसे बड़ा हिन्दू मंदिर, लेकिन ये भारत में नहीं है….

वैसे तो भारत ही मंदिरों का देश है। देश ही नहीं विदेश से भी लोग भारत के मंदिर घूमने आते है। लेकिन क्या आपको पता है की दुनिया का सबसे बड़ा विष्णु भगवान का मंदिर कहा है ? जिसकी प्रसिद्धि पूरे विश्व में फैली हुई है!

तो आपको बता दे की यह मंदिर भारत में नहीं बल्कि विदेश में है। कंबोडिया के अंकोरवाट में स्थित मंदिर विष्णु भगवान् को समर्पित है। यह दुनिया का सबसे बड़ा पूजा स्थल और पुरातात्विक स्थल भी है। इस मंदिर का पूरा नाम यशोधरपुर था। फ्रांस से आजादी मिलाने के बाद यही मंदिर कंबोडिया की पहचान बन गया। इस मंदिर की तस्वीर कंबोडिया के राष्ट्रिय ध्वज पर भी है।

इतिहास की बात करे तो 11 वीं शताब्दी में यंहा सम्राट सूर्यवर्मन द्वितीय का शासन था। बताया जाता है की उन्होंने ही इस मंदिर का निर्माण करवाया था। मिकांक नदी के किनारे बसे इस मंदिर को टाइम मैगजीन ने दुनिया के 5 आश्चर्यजनक चीजों में शुमार किया था।  इस मंदिर को 1992 में यूनेस्को ने विश्व विरासत में भी शामिल किया है। साथ ही इस मंदिर का नाम गिनीज बुक ऑफ़ वर्ल्ड में दर्ज किया गया है। इस मंदिर को देखने और विष्णु भगवान के दर्शन करने के लिए हर साल लाखों भक्त भारत समेत कई देशों से यंहा पहुचते है। बताया जाता है की इसे बनाने के लिए पचास से एक करोड़ रेत के पत्थर का इस्तेमाल किया गया है। प्रत्येक पत्थर का वजन डेढ़ टन है। सबसे खास बात है की इस मंदिर की दीवारों पर रामायण और महाभारत की कहानिया भी लिखी हुई है साथ ही देवताओं और असुरों के अमृत मंथन का भी उल्लेख किया गया है।

ब्लॉग : खुद अपने हाथ से 'शहजाद' उसको काट दिया…

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ब्लॉग : ( केशर देवी ) – 19 वीं शताब्दी के अंत में पंजाब के कादियान नाम की जगह से एक इस्लामी फिरका उठ खड़ा हुआ। इसके बानी (संस्थापक) मिर्ज़ा गुलाम अहमद थे। इस्लाम के 1300 साल में मिर्ज़ा गुलाम अहमद संभवतः वो पहले शख्स थे जिन्होंने अपने मजहब विस्तार के लिये “धर्मों के तुलनात्मक अध्ययन” विषय को आधार बनाया। मिर्ज़ा साहेब वही काम उस जमाने में कर रहे थे जो आज शेख अहमद दीदात ने किया है या जाकिर नाइक कर रहा है यानि दूसरे के मजहबी किताबों को पढ़ो और फिर उसकी मनमानी व्याख्या कर उसे अपने मजहब विस्तार का आधार बना लो।

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मिर्ज़ा गुलाम अहमद ने शुरुआत वेदों पर आक्षेप करके की पर सौभाग्य से उस समय आर्य समाज अपने पूर्ण यौवन पर था इसलिये हिन्दुओं को नीचा दिखा कर अपने मजहब में खींचने का अवसर उन्हें नहीं मिल पाया। वेदों पर किये उनके हर आक्षेपों पर वैदिक विद्वानों ने उन्हें मुंहतोड़ जबाब दिया पर ये अवसर ईसाई धर्मगुरुओं को नहीं मिल पाया। मिर्ज़ा गुलाम अहमद इंजील के ऊपर महारत रखते थे और कई बार उन्होंने ईसाई पादरियों को शास्त्रार्थ में धूल चटाया था। ईसा मसीह सलीब पर मरे नहीं थे बल्कि वो वहां से बचकर हिन्दुस्तान आ गये थे और कश्मीर में दफ़न हुए थे, ये सिद्धांत भी मिर्ज़ा गुलाम अहमद का ही था जिसके ऊपर बाद में सैकड़ों लोगों ने शोध किया। मिर्ज़ा गुलाम अहमद के सामने आने से ईसाई विद्वान् डरते थे, इसलिये जब मिर्ज़ा गुलाम अहमद की मृत्यु हुई तो मौलाना अबुल कलाम आज़ाद जैसे बड़े मुस्लिम विद्वान् ने उनके लिये जो लेख लिखे उसमें बड़े गैर-मामूली अल्फाजों में उन्हें श्रद्धांजलि दी। ये बात बहुत कम लोगों को हजम होगी कि अल्लामा इकबाल मिर्ज़ा गुलाम अहमद के बड़े शागिर्दों में थे और एक समय अहमदी हो गये थे। अपनी किताबों में उन्होंने मिर्ज़ा गुलाम अहमद की बेंइतेहा तारीफ की है। मिर्ज़ा गुलाम अहमद ने तो पूरी सिख जाति को ही मुसलमान घोषित करने का प्रयास किया था।

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यानि मिर्ज़ा गुलाम अहमद इस्लाम के वो सिपाही थे जिन्होंने सबसे पहले मुस्लिमों को ये सिखाया कि मजहब विस्तार तर्क से भी किया जा सकता है और एक्के-दुक्के लोगों को अपने मजहब में लाने की बजाय पूरे मजहब को कैसे अपने दीन में लाया जाये पर चूँकि बाद में उन्होंने खुद को नबी वगैरह घोषित करना शुरू कर दिया और पूरा मुस्लिम विश्व उनके खिलाफ फतवे की तलवार खींचकर सामने आ गया। इस्लाम के जिस सिपाही की उर्जा गैर-मुस्लिमों को लांछित करने और उन्हें मुस्लिम बनाने में में खर्च हो रही थी वो अब अपने बचाव में खर्च होने लगी और फिर गैरों से शास्त्रार्थ का उन्हें वक़्त ही नहीं मिला।

जो मुसलमान पाकिस्तान के निर्माण के लिये जिन्ना और इकबाल के नाम के साथ रहमतुल्लाहअलैहे लिखते हैं उन्हें पता नहीं ये इल्म है भी कि नहीं कि पाकिस्तान निर्माण में सबसे बड़ा योगदान अहमदियों का था। मुस्लिम लीग को आर्थिक बल देने के लिए इन्होंनें अपनी पंजाब की तमाम जागीरें लुटा दी और पाकिस्तान निर्माण का राह प्रशस्त किया था।

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मिर्ज़ा गुलाम अहमद ने बहुत पहले मुस्लिमों से ये अपील की थी कि जिहाद-बिल-सैफ (तलवार से जिहाद) का हुक्म मंसूख हो चुका है पर मुस्लिम इस बात पर विचार करने की जगह उनकी जान के पीछे पड़ गये। आज तारीख उठाकर देख लीजिये अगर मुस्लिम समाज ने मिर्ज़ा साहेब की वो बात मान की होती तो आज दुनिया में उनकी इतनी बदनामी नहीं होती जो जिहाद की अवधारणा के चलते हो रही है। कुरान की काफी हद तक अक्ल में आने वाली विज्ञान सम्मत व्याख्या की शुरुआत मिर्ज़ा साहेब ने ही की थी जिसे बाद में सर सैयद अहमद खान ने आगे बढ़ाया पर दुर्भाग्यवश अपने इस सिपाही को भी मुस्लिमों ने यहूदियों का एजेंट और मुर्तद कह कर धर्म बहिष्कृत कर दिया। मिर्ज़ा गुलाम अहमद और सर सैयद को अगर ये मुर्तद नहीं ठहराते तो सच्चर समिति की रपट कम से कम इतनी बुरी नहीं होती।

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इनके एक तीसरे हीरो थे आरिफ मोहम्मद खान जिन्होनें ये समझ लिया था कि हर मजहबी ग्रन्थ के लिये ये लाजिम है कि उसकी काल-सापेक्ष व्याख्या की जाये और इसी हेतू उन्होंने Quran and Contemporary Challenges नाम से एक किताब लिखी पर दुर्भाग्य से आरिफ मोहम्मद खान भी आज बाहर बैठा दिए गये हैं।

अब आज यही काम तारेक फ़तेह भी कर रहे हैं। तारेक ने इस्लाम नहीं छोड़ा है और न ही तारेक ने कभी नबी या कुरान के खिलाफ कुछ कहा है। वो भी इस्लाम के ही सिपाही हैं, उनकी वेदना ये है कि उनके प्यारे दीन को कट्टरपंथी मानसिकता ने बदनाम कर दिया और इसी के लिये वो मार खाकर भी अल्लाह के इस्लाम का प्रसार कर रहें हैं। दुर्भाग्यवश मुसलमान यहाँ भी तारेक को अपना दुश्मन माने बैठे हैं।

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ऊपर मैंनें जितने नाम गिनाये ये सबके सब आपके सच्चे सिपाही थे जिनकी आपने कद्र न की। ये वो लोग थे या हैं जो आपको गैरों के साथ नज़र मिलाकर बात करने का हौसला दे सकते थे, जो आपको इल्म में आगे लेकर जा सकते थे। मगर आपको न तो सभ्य तरीके से शास्त्रार्थ की जरूरत महसूस होती है, न ही आपको ये लगता है कि अपनी चीजों की काल-सापेक्ष व्याख्या आपका मेयार ऊँचा करेगी और न ही आप जिहाद की अवधारणा को छोड़कर विश्व को शांति और सहअस्तित्व का आश्वासन देना चाहतें हैं उल्टा आप अपने मजहब के ऐसे आला लोगों को ही दीन से खारिज कर देतें हैं तो फिर आपके लिये फरहत शहजाद का शेर ही सबसे बैठता सटीक है। फरहत कहतें हैं….

खुद अपने हाथ से शहजाद उसको काट दिया
कि जिस दरख़्त की टहनी पे आशियाना था

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जानिए : अगर दरगाह-मजार पर मन्नत मांगना शिर्क है तो ये बनाए क्यूँ गए ?

मन्नत मांगना शिर्क है तो बनाए क्यूँ गए ?

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ब्लॉग: ( आनंद ) मंदिर तोड़े गए इसलिए दरगाह– मजार बनाए गए है या ये कहिए कि परोसे गए । पूजने के लिए कुछ तो चाहिए । फिर सड़ते शव को पड़ी मूर्ति भी कहा गया । चमत्कारों की कहानियाँ भी प्रसृत की गयी । उन चमत्कारों में हमेशा हिन्दू साधू – सिद्ध – मांत्रिक – तांत्रिक या कहीं तो देवी देवताओं का भी इन पीरों के हाथों हारने की कहानियाँ बनी । वैसे इन पीरों के मजारों पर कुछ और “चमत्कार” भी होते रहे हैं इसमें कोई नई बात नहीं है, ऐसे ही चमत्कारों का ये गज्जब मज्जब है, ऐसे चमत्कारों से ही फैला है ।

इतिहास की समझ से देखेंगे तो जहां जहां प्रतीक पूजक संस्कृति पर मजहब तलवार से थोपा गया और बलात्कार से रोपा गया, वहाँ वहाँ दरगाह/मजार अवश्य मिलेंगे । यह क्यूँ हुआ होगा ? आप सोच सकते हैं, जवाब आसान है फिर भी दे देता हूँ ।

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किसी भी पुरानी संस्कृति को जड़ से उखाड़ना आसान नहीं हैखास कर के जब हमलावर उसके मानने वालों को वास्तव में अपना नहीं रहे हों । इस्लाम ने यही किया, हमलावरों ने जिन्हें मुसलमान बनाया उनको कभी बराबरी नहीं दी । बस क्लास मॉनिटर बना रखा बाकी काफिरों पर मॉनीटरी करने ताकि इनमें सत्ता चलाने का मुगालता पनपे – ठीक गाड़ी के नीचे चलते कुत्ते वाला । लेकिन इसके ऊपर कोई प्रमोशन नहीं । वे आका, तुम खाक । आज भी बात वही है, आज काफिर इनके आका से नजर भिड़ा सकता है, इनकी नजर आज भी नीची ही है लेकिन कोई वामपंथी आप से यह नहीं कहेगा, खैर, हम मुद्दे से भटकेंगे नहीं । बात पुरानी संस्कृति की हो रही थी ।

प्रतीक की पूजा होती है, मूर्ति भी प्रतीक ही होती है । पूजने वाले भी जानते हैं । असल बात तो यही होती है – जित समाज का आत्मगौरव खत्म करने के लिए उसके प्रतीक नष्ट किए जाते हैं कि देखो, तुम अपने आप को हम से बचा नहीं सकते । लेकिन यही narrative होती है कि हमने तो तुम्हारे ईश्वर को तोड़ दिया, हम उस से भी ऊंची चीज है, अब हम से डरा करो । यहूदियों ने अपने शत्रुओं के साथ यह किया था, इस्लाम ने जैसे खतना भी उनसे कॉपी किया, यह भी उनसे ही कॉपी पेस्ट किया है । लेकिन प्रतीक ध्वस्त होने पर मन से निकलता नहीं, उसकी जरूरत महसूस होती रहती है । और आप मॉनिटर तो कुछ को ही बना सकते हैं, बाकी लोग तो है ही जिनसे आप को काम लेना है, उनकी खून पसीने की कमाई लूटकर सवाब लूटना है ।

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यहाँ ये पीर काम में आते हैं । दरगाह-मजार बनाओ, कहानियाँ फैलाओ, अपने आप अवचेतन में मजहब का दबदबा भी बना रहेगा । तोड़े प्रतीक की रिप्लेसमेंट भी हो जाएगी, लूट का नया जरिया भी मिलेगा, झूठ से परहेज तो कभी था ही नहीं । सांस्कृतिक आक्रमण ही है । कहते हैं कि जहरीले नाग हमेशा बने बनाए बिलों में ही घुसकर कब्जा जमाते हैं ।

जब तक काफिर, काफिर बन कर जीते रहते हैं, ये दरगाह -मजार काम आते रहते हैं । एक स्टेज आने पर अपनों को यहाँ जाने पर रोका जाता है, प्रचारित किया जाता है कि ये शिर्क है । जहां मजहब के राजा प्रजा दोनों हो वहाँ तोड़ा भी जाता है जैसे सऊदी में तोड़े गए । अब पाकिस्तानी तोड़ रहे हैं धीरे-धीरे । वहाँ अब काफिर बचे तो नहीं, जो हैं उनसे दरगाह-मजार चलते नहीं । तो तोड़ना ही ठीक समझा जा रहा है, क्योंकि मोमिन दरगाह-मजार में माने यह तो शिर्क है, वे तो केवल काफिर को लूटने का जरिया या व्यापार मात्र है । पूछिए किसी अजमेरिया के मुरीद से भी, पहले तो चमत्कारों की टेप लगाएगा लेकिन पूछिए, क्या दरगाह पर मरे पीर से मन्नत मांगना एक मुसलमान के लिए शिर्क नहीं ? उनको ज़ोर की नमाज लग जाएगी, निकल जाएँगे !

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वैसे यह सवाल किसी वामिए से पूछवाना चाहिए, लेकिन वे हमारा ही एनालिसिस कर सकते हैं, मजहब का एनालिसिस करने को कहें तो उनकी जबान को पैरालिसिस हो जाता है यह अनुभवित है, आप भी कभी भी अनुभव कर सकते हैं । चू से पूछिए, बंडल ही छोड़ेगा ।

पाकिस्तान में दरगाह-मजार टूटे तो टूटे, लेकिन यहाँ तौहीद जमातवाले लाखों मोमिनो का मेला लगाकर दरगाह-मजार को शिर्क बताते हैं (तमिलनाडु, जनवरी 2016) यह चिंता का विषय है, क्या यह गजवा ए हिन्द के टाइम टेबल का हिस्सा तो नहीं ?

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मेरा शौहर मुझे अपने दोस्तों के साथ सोने को मजबूर करता था, इसलिए बदल दिया धर्म

नई दिल्ली : काफी दिक्कतों के बाद जय शिवसेना के नेतृत्व में मुस्लिम महिला शबनम ने मुस्लिम धर्म छोड़कर हिंदू धर्म अपना लिया है। आर्य समाज के विद्वान शास्त्री ने वैदिक रीति के तहत धर्म परिवर्तन कराया।

अब मुस्लिम महिला शबनम सीमा बन गई हैं। महिला के मुताबिक, वह जय शिवसेना के साथ मिलकर तीन तलाक व मुस्लिम धर्म में व्याप्त अन्य कुरीतियों से पीड़ित महिलाओं की मदद के लिए लड़ाई लड़ेगी। इसी वजह से उसने धर्म परिवर्तन कराया है।

वहीं, महिला के धर्म परिवर्तन के बाद जय शिवसेना के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित आर्यन ने कहा कि हमारी पार्टी धर्म बदलने के लिए किसी पर दबाव नहीं डालती, लेकिन हमारे पास जो भी मुस्लिम महिला अपनी परेशानी लेकर आएगी, हम उसकी पूरी मदद करेंगे।

प्रशासन ने हमारे इस काम में काफी अड़ंगे लगाए, लेकिन महिला ने धर्म परिवर्तन कर ही लिया। अमित आर्यन ने कहा कि धर्म परिवर्तन का काम वैदिक रीति के अनुसार कोई भी व्यक्ति स्वेच्छा से कर सकता है। प्रत्येक व्यक्ति को शुद्धिकरण का अधिकार है।

सीमा का कहना है कि वह अब काफी खुश हैं। उसे लग रहा है कि हिंदु समाज में महिलाओं का सम्मान किया जाता है। ‘मेरा यह फैसला बिल्कुल सही है’ अब मैं अपनी जैसी महिलाओं की मदद करूंगी । 

विश्व की 10 बेहद ही खूबसूरत मस्‍जिदें, इनको देख कर आप भी कह उठेंगे "माशा अल्लाह"

दुनिया की 10 बेहद खूबसूरत मस्‍जिदें

मुस्‍लिम समुदाय के लिए मस्‍जिद उनका सबसे पवित्र स्‍थान होता है। यहां आकर वो ईश्‍वर से सीधे रूबरू होते हैं। वैसे तो सभी मस्‍जिदें एक खास शैली में ही बनायी जाती हैं पर दुनिया भर में कई ऐसी मस्‍जिदें हैं जो अपने आर्टिटेक्‍चर से आपको स्‍तब्‍ध कर देती हैं। आइये आपको बतायें विश्‍व की ऐसी ही दस सबसे खूबसूरत मानी जाने वाली मस्‍जिदों के बारे में।

Al Haram Mosque : मक्‍का की अल हराम मस्‍जिद इस सिलसिले में सबसे पहले नंबर पर आती है। इस्‍लाम के सबसे पवित्र स्‍थान काबा में स्‍थित ये मस्‍जिद आकार में विश्‍व की सबसे बड़ी मस्‍जिद में शुमार की जाती है। मान्‍यता है कि इंसान के लिए अल्‍लाह को याद करने और उसकी पूजा करने के लिए इसे सबसे पहले बनाया गया था।

Al-Masjid an-Nabawi : मदीना में स्‍थित अल मस्‍जिद अन नवाबी को पैगंबर की मस्जिद की मस्‍जिद भी कहा जाता है। इस मस्‍जिद मुस्‍लिम पैगंबर मोहम्‍मद साहब ने बनवाया था। मदीना भी मुसलमान संप्रदाय के लोगों का दूसरा सबसे पवित्र स्‍थान माना जाता है। ये दुनिया में बनायी गयी दूसरी मस्‍जिद है और अल हराम मस्‍जिद के बाद ये दूसरी सबसे बड़ी मस्‍जिद है।

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वीडियोः इस मस्जिद में नमाज के साथ ही गूंजता है ‘हरी नारायण, हरी ॐ’ का जाप

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नई दिल्ली : कोई भी धर्म लड़ाई, झगड़े का संदेश नहीं देता। सभी धर्म आपस में प्रेम और भाईचारे की भावना का संदेश देते हैं।

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आज के लोग धर्म के नाम पर ही आपस में लड़ रहे हैं। मार-पीट कर रहे हैं। लेकिन आज हम आपको हिन्दू-मुस्लिम एकता और धर्म से जुड़ी ऐसी आस्था के बारे में बताने जा रहे हैं जो दोनों धर्मों को एक कर रही है। हम बात कर रहें है सउदी अरब में एक ऐसी मस्जिद कि जिसमें लोग नमाज के साथ ही भजन कीर्तन में लिप्त होकर ‘हरी नारायण हरी ॐ’ के गीत भी गाते हैं।

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अरब की एक मस्जिद में ऐसा अद्भुत नजारा देखने को मिलता है। इस मस्जिद में केवल मर्द ही नहीं, औरतें भी ‘हरी नारायणा’, ‘हरी ॐ’, के भजन गाते हुए बड़ी श्रद्धा के साथ झूमते दिखती हैं। ये सच में किसी चमत्कार से कम नहीं है। मस्जिदों में औरतों का अंदर प्रवेश करना वर्जित होता है, पर इस मस्जिद में सभी लोग एक साथ मिलकर भक्ति में लीन हो रहे हैं। आज के युग में ये किसी चमत्कार से कम नहीं है।

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अरब देश की इस मस्जिद में हजारों मुस्लिम एक साथ बैठकर भक्ति में लीन होकर भजन कीर्तन गा रहे हैं। ऐसी अद्भुत मिसाल को देखकर एक तरफ लोग आश्चर्य कर रहे हैं तो दूसरी ओर एकता की मिसाल देकर वहां के आंतकियों को ललकार कर एकजुट होने का संदेश दे रहे हैं।

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मुसलमनों पर सऊदी अरब सरकार का कहर, कर्बला जाने पर लगाई रोक

saudi arabia govt put sanctions on shiite

नई दिल्ली (9 फरवरी): सऊदी अरब में रहने वाले 40 साल से कम उम्र के शिया मुसलमान इराक स्थित करबला शरीफ की यात्रा नहीं कर सकते। सऊदी अरब की सरकार ने इस तरह के आदेश जारी करते हए कहा है कि अगर कोई शिया सरकार को धोखे में रखकर इराक की यात्रा पर जाता है तो उसे वापस लौटने पर तीन साल तक देश से बाहर जाने पर रोक लगा दी जायेगी। इसके अलावा उस पर भारी हर्जाना भी चुकाना पड़ सकता है।

हर वर्ष बड़ी संख्या में सऊदी अरब के शिया इराक़ के पवित्र स्थलों की ज़ियारत के लिए जाते हैं और नए क़ानून के अनुसार बहुत से सऊदी नागरिक इस तीर्थ यात्रा से वंचित हो जायेंगे। सऊदी अरब का यह क़ानून इजरायली शासन के उस क़ानून की तरह है जिसमें मस्जिदुल अक़सा में नमाज़ पढ़ने के लिए फ़िलिस्तीनियों पर आयु सीमा की शर्त लगाई जाती है।

आपकी जानकारी के लिए बता दे की करबला की लडा़ई मानव इतिहास कि एक बहुत ही जरूरी घटना है। यह सिर्फ एक लडा़ई ही नही बल्कि जिन्दगी के सभी पहलुओ की मार्ग दर्शक भी है। इस लडा़ई की बुनियाद तो ह० मुहम्मद मुस्तफा़ स० के देहान्त के बाशी रखी जा चुकी थी। इमाम अली अ० का खलीफा बनना कुछ अधर्मी लोगो को पसंद नहीं था तो कई लडा़ईयाँ हुईं अली अ० को शहीद कर दिया गया, तो उनके पश्चात इमाम हसन अ० खलीफा बने उनको भी शहीद कर दिया गया। यहाँ ये बताना आवश्यक है कि, इमाम हसन को किसने और क्यों शहीद किया?, असल मे अली अ० के समय मे सिफ्फीन नामक लडा़ई मे माविया ने मुँह की खाई वो खलीफा बनना चाहता था प‍र न बन सका।

वो सीरिया का गवर्नर पिछ्ले खलिफाओं के कारण बना था अब वो अपनी एक बडी़ सेना तैयार कर रहा था जो इस्लाम के नही वरन उसके अपने लिये थी, नही तो उस्मान के क्त्ल के वक्त खलिफा कि मदद के लिये हुक्म के बावजूद क्यों नही भेजी गई? अब उसने वही सवाल इमाम हसन के सामने रखा या तो युद्ध या फिर अधीनता।

इमाम हसन ने अधीनता स्वीकार नही की परन्तु वो मुसलमानो का खून भी नहीं बहाना चाहते थे इस कारण वो युद्ध से दूर रहे अब माविया भी किसी भी तरह सत्ता चाहता था तो इमाम हसन से सन्धि करने पर मजबूर हो गया इमाम हसन ने अपनी शर्तो पर उसको सि‍र्फ सत्ता सोंपी इन शर्तो मे से कुछ ये हैं: –

  • वो सिर्फ सत्ता के कामो तक सीमित रहेगा धर्म मे कोई हस्तक्षेप नही कर सकेगा।
  • वो अपने जीवन तक ही सत्ता मे रहेगा म‍रने से पहले किसी को उत्तराधिकारी न बना सकेगा।
  • उसके म्ररने के बाद इमाम हसन खलिफा़ होगे यदि इमाम हसन कि मृत्यु हो जाये तो इमाम हुसैन को खलिफा माना जायगा।
  • वो सिर्फ इस्लाम के कानूनों का पालन करेगा।

इस प्रकार की शर्तो के द्वारा वो सिर्फ नाम मात्र का शासक रह गया।

 

केवल हिंदुओं के अंतिम संस्कार पर ही पाबंदी क्यों चाहते हैं केजरीवाल?

साभार : दैनिक भारत

दिल्ली में अरविंद केजरीवाल सरकार अब हिंदू तरीके से शवों के अंतिम संस्कार के तौर तरीकों पर पूर्ण पाबंदी लगाना चाहती है। दिल्ली के पर्यावरण मंत्री व कट्टर इस्लामिक विचारक इमरान हुसैन ने कहा है कि शवों को जलाने से राज्य में प्रदूषण फैलता है। इसलिए ये तरीका तत्काल प्रभाव से बंद होना चाहिए। इसके बजाय शवों को जलाने में सीएनजी या बिजली का इस्तेमाल किया जाना चाहिए। इस्लामिक विचारक इमरान हुसैन ने इस बारे में केंद्र सरकार को भी एक पत्र भी लिख डाला है। इसमें उन्होंने दिल्ली में करोड़ों वर्षों से चली आ रही हिंदुओं की शव दाह संस्कार परंपरा को प्रदूषण के लिए बड़ा भयंकर कारण बताया है। जबकि वैज्ञानिक तौर पर यह साबित हो चुका है कि शवों को जलाने के मुकाबले उन्हें कब्रिस्तान में गाड़ने से ज्यादा प्रदूषण फैलता है। दिल्ली सरकार को प्रदूषण कम करने के लिए सबसे पहले हिंदुओं के तरीके पर ही नजर क्यों गई ?

हिंदुओं के शवदाह में लकड़ी इस्तेमाल पर पाबंदी!

दिल्ली सरकार ने इस बारे में अपनी तरफ से कोशिश शुरू भी कर दी है। इमरान हुसैन ने केंद्रीय पर्यावरण राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) अनिल दवे को चिट्ठी लिखकर कहा है कि हिंदू तरीके से दाह संस्कार करने पर हवा में कार्बन डाइ ऑक्साइड, कार्बन मोनोऑक्साइड और नाइट्रोजन मोनो ऑक्साइड जैसी जहरीली गैसें फैलती हैं। साथ ही हवा में तैरने वाले कणों पीएम 2.5 और पीएम 10 का लेवल बढ़ जाता है। ऐसे में लकड़ी पर शवदाह पर पाबंदी होनी चाहिए। इसके बजाय सीएनजी या बिजली का इस्तेमाल शवों को जलाने के लिए करना ठीक होगा।

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