खुल गया अमिताभ बच्चन से जुड़ा वो राज़ जो उन्होंने आजतक सबसे छुपाया, आपको भी हैरान कर देगा ये सच!

ये बात तो आप जानते ही है कि अमिताभ बच्चन के दुनिया भर में अनेकों चाहने वाले है| जिस समय अमिताभ बच्चन ने फ़िल्मी दुनिया में कदम रखा था उसी समय से उन्होंने लाखों लोगो को अपना दीवाना बना लिया था| आज भी अमिताभ के फैन्स उनके बारे में नई-नई बातें जानने के इच्छुक रहते है, लेकिन जो बात आज हम आपको बताने जा रहे हैं वो यक़ीनन आपको नहीं पता होगी और उसे सुनकर आपको भी गहरा झटका लग सकता है|

आपको याद होगा कि साल 2005 के नवंबर महीने में अमिताभ बच्चन अपने स्वर्गीय पिता हरिवंशराय बच्चन की जयंती के अवसर पर अपने परिवार के साथ उतर-प्रदेश गए हुए थे, वहां उन्होंने एक समाहरोह में हिस्सा लिया लेकिन इसी बीच उन्हें पेट-दर्द शुरू हो गया और फिर उन्हें अस्पताल में भर्ती करवाना पड़ा था| उस ऑपरेशन में अमिताभ बच्चन की बड़ी आंत की अंतड़ियां सड़ चुकी थी| सड़ी अंतड़ियों को काट कर उन्हे जीवनदान दिया गया था|

लेकिन यहाँ हैरानी वाली बात ये थी कि इस तरह से अंतड़िया या तो शराब पीने वालों की, या नशा करने वालों की, या तो फिर सूअर का मांस खाने वालों की सड़ती हैं, जिसका मतलब साफ़ था कि…

अगली स्लाइड में जानिए सदी के महानायक अमिताभ बच्चन का वो काला सच जिससे आप आजतक बेखबर रहे हैं…

राजीव दीक्षित के समर्थक युवाओं का अंतरिक्ष से बिजली बनाने का फार्मूला, इसरो भेजा प्रस्ताव

सैटेलाइट तकनीक से जमीन तक बिजली लाने का सुझाव
सैटेलाइट तकनीक से जमीन तक बिजली लाने का सुझाव

कुचामन सिटी – मौलासरके युवा वैज्ञानिक ऋषिकुमार शर्मा रामकृष्ण वैष्णव ने अंतरिक्ष से बिजली बनाने की नवीन तकनीक का प्रारूप तैयार किया है। उनके इस प्रारूप को केवल ‘नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय’ एवं ‘वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद’ द्वारा सराहा है बल्कि परिषद की मैग्जीन में प्रमुखता से प्रकाशित करते हुए अब इसे इसरो के पास भेजने का सुझाव दिया है। #राष्ट्रप्रेमी_राजीव_दीक्षित

दोनों युवाओं ने इसरो के पास इस तकनीक का प्रायोगिक मॉडल बनाकर भेजने की तैयारी शुरू कर दी है। सौर ऊर्जा के संशोधित स्वरूप के साथ विकसित की गई इस तकनीक की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि सौर ऊर्जा आधारित सिस्टम होने की वजह से इसमें किसी प्रकार के ईंधन की आवश्यकता नहीं होगी। ऐसे में बिजली उत्पादन में ज्यादा खर्चा नहीं होगा और रखरखाव आदि भी मामूली खर्च पर हो जाएगा और यह सिस्टम सालों-साल बिना प्रदूषण के चलता जाएगा। जानकारी अनुसार अगर इसरो की ओर से इस प्रोजेक्ट को मंजूरी मिल जाती है तो भारत दुनिया में पहला देश बन सकता है जो अंतरिक्ष से ही बिजली पैदा कर सकेगा। इसरो के वैज्ञानिकों को दिखाने के लिए मॉडल बनाने में जुटे है।

सौर-विद्युत उर्जा का उपयोग बढ़ता जा रहा है। कारण साफ है, एक बार सोलर पैनल लगाने के बाद बिना खर्च वर्षों तक बिजली बनाई जा सकती है। लेकिन दिक्कत यह आती है कि रात के समय सूर्य की रोशनी नहीं मिलने के करण बिजली उत्पादन सिर्फ दिन में हो पाता है। दिन में भी मौसम, बादल, धूप-छांव आदि उत्पादन को प्रभावित करते हैं। इन्हें ध्यान में रखते हुए वैज्ञानिकों ने अंतरिक्ष से बिजली बनाने की तकनीक का मॉडल तैयार किया है। ‘सोलर सैटेलाइट पॉवर प्लांट’ नाम की इस तकनीक में सैटेलाइट के साथ सोलर पैनल्स को जोड़कर अंतरिक्ष में पृथ्वी की भू-स्थिर कक्षा में स्थापित किया जा सकता है। इसके बाद अंतरिक्ष में ही सौर ऊर्जा को बिजली में परिवर्तित किया जा सकता है। अंतरिक्ष में 24 घंटे सूर्य की किरणें प्राप्त होती है और इसे मौसम, वातावरण, बादल आदि भी प्रभावित नहीं कर सकते। अंतरिक्ष में उत्पादित बिजली को धरती पर बने रिसीविंग स्टेशन तक लेजर अथवा माइक्रोवेव के जरिए रिसीव किया जा सकेगा।

इन 4 आविष्कारों के लिए पेटेंट के कर चुके हैं आवेदन

पूर्वराष्ट्रपति अब्दुल कलाम आजाद और डॉ. राजीव दीक्षित दीवार पर टच स्क्रीन, वायरलेस मोबाइल चार्जर, हवा से मोबाइल चार्ज करने वाला चार्जर, वायरलेस बैटरी पॉवर ट्रांसफर करने की तकनीक, सोलर कूलर, नवीन उर्जा उत्पादन तकनीक आदि कई आविष्कार कर चुके हैं। अब तक 4 पेटेंट दाखिल कर चुके है। जिनमें से 2 टच स्क्रीन एवं 2 विद्युत उत्पादन तकनीक से संबंधित है।

प्रोजेक्ट पर कार्य कर रहे रामकृष्ण और ऋषिकुमार बताते हैं कि तकनीक का प्रारूप सरकार के पास भेज चुके है। हम चाहते है कि भारत अंतरिक्ष से बिजली उत्पादन की तकनीक को प्रायोगिक रूप में लागू करने वाला दुनिया का सबसे पहला देश बने। इस तकनीक के क्रियान्वयन के लिए राष्ट्रपति से अपील की है। रूपरेखा प्रस्तुत करते हुए राष्ट्रपति कार्यालय से इसे उर्जा मंत्रालय तथा नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय के पास भेजा गया। जहां केवल इस प्रोजेक्ट की तारीफ हुई बल्कि तकनीकी रूप से इसे सही पाए जाने पर इसरो के पास भेजने का सुझाव दिया है। साथ ही वैज्ञानिक केंद्र सीएसआईआर एवं निस्केयर की विज्ञान मैग्जीन में भी इस वैज्ञानिक लेख को शामिल किया जा चुका है।

गुजरात का ये गुरुकुल टक्कर देता है अमेरिका की हॉवर्ड से लेकर भारत की आईआईटी तक को

गुरुकुल के इन पुराने मॉडल पर पढ़ाई करने वाले बच्चों के सामने आधुनिक शिक्षा ने टेके घुटने

अहमदाबाद (कर्णावती): दिन प्रतिदिन गिरती जा रही भारतीय व्यवस्था पर चिंता करने वाले बहुतों बुद्धिजीवी मिलेंगे लेकिन भारतीय शिक्षा व्यवस्था कैसी हो, उसका स्वरूप कैसा हो, किस प्रकार उसे विकसित किया जाए ऐसे हर प्रश्नों का जवाब है : गुजरात का यह गुरुकुल, जो आज इक्कीसवीं सदी में भी पूर्णतया भारतीय परंपराओं पर आधारित शिक्षा देता है। अपनी अनूठी एवं गुणवत्तापूर्ण शिक्षा से आज यह दुनिया के बड़े बड़े संस्थानों को टक्कर दे रहा है।

इस गुरुकुल का पूरा नाम हेमचंद्राचार्य संस्कृत पाठशाला है, जो स्थित है गुजरात के कर्णावती (अहमदाबाद) शहर स्थित साबरमती में, जिसे देखने देश व दुनिया भर के कोने कोने से लोग आते है और अपने बच्चों का यहाँ प्रवेश दिलवाने को लालायित रहते हैं।

अमेरिका के हॉवर्ड विश्वविधालय से लेकर भारत के आई आई टी में क्या कोई ऐसी शिक्षा दी जाती है कि छात्र की आंख पर पट्टी बांध दी जाये और उसे प्रकाश की किरने भी दिखाई ना दे, फिर भी वो सामने रखी हर वस्तु को पढ़ सकता हो? है ना चौकाने वाली बात? पर इसी भारत में किसी हिमालय की कंदरा में नहीं बल्कि प्रधानमंत्री के गृहराज्य गुजरात के महानगर में यह चमत्कार आज साक्षात् हो रहा है।