ये 4 लड़के स्मृति ईरानी का पीछा कर रहे थे, फिर पुलिस ने उन्हें पकड़कर जो किया..

जहाँ एक तरफ सत्ता में आते ही योगी आदित्यनाथ ने बेटियों की सुरक्षा के लिए नए और सख्त नियम और कानून बना कर प्रदेश के मनचलों पर नकेल कसनी शुरू कर दी है वहीं दिल्ली में केजरीवाल सरकार के अंदर लड़कियों से छेड़छाड़ की बात आज भी आम है|

अब तो बात यहाँ तक पहुँच गयी है कि आम तो आम आजकल ख़ास लोग भी इन मनचलों से सुरक्षित नहीं है| दरअसल हम यहाँ आपको बता दें कि शनिवार रात केंद्रीय मंत्री स्मृति इरानी जब एयरपोर्ट से लौट रहीं थीं तब मोतीबाग फ्लाईओवर पर एक अन्य कार सवार चार युवकों ने उनकी कार का पीछा कर ओवरटेक किया और उनसे बदतमीजी की। स्मृति ईरानी..

अगली स्लाइड में जानिए क्या हुआ जब आधी रात को मनचलों ने स्मृति ईरानी की कार का पीछा कर…

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अयोध्या प्रकरण पर बोले मुलायम सिंह यादव, “वहां मंदिर बने या मस्ज़िद…”

उप्र के विधानसभा चुनाव में सपा की करारी हार के बाद मुलायम सिंह यादव के दिल की बात शनिवार को जुबां पर आ ही गई। दरअसल शनिवार को एक सभा को संबोधित करते हुए मुलायम सिंह यादव ने कहा कि, “अब जितना अपमान हुआ, उतना पहले कभी नहीं हुआ। ये अपमान भी अपनों ने ही दिया। जो अपने बाप का नहीं हुआ, वो किसी का नहीं हो सकता| मोदी को ये कहने का मौका अपनों ने ही दिया और इसीलिए सपा बुरी तरह से चुनाव हार गई।”

इस मौके पर मुलायम सिंह यादव के शब्दों में राजनीतिक हार की निराशा साफ़ झलक रही थी| मौका था मुलायम सिंह यादव की अपनी कर्मभूमि मैनपुरी में पैक्सफेड के अध्यक्ष तोताराम के होटल के उद्घाटन समारोह का, जहाँ उन्होंने लोगों को संबोधित करते हुए ये बात रखी|

इस सभा में मुलायम सिंह यादव ने पहली बार यूपी चुनाव में करारी हार के बाद अपनी चुप्पी तोड़ी थीl उन्होंने मैनपुरी में अपने इस भाषण के दौरान अयोध्या प्रकरण का जिक्र करते हुए कहा कि, “मंदिर बने या मस्जिद, पहली ईंट मैं रखूंगा और ये बात पहले भी कह चुका हूं।” उन्होंने आगे सुप्रीम कोर्ट द्वारा सहमति के सुझाव पर कहा कि, “हमने भी सरकार में रहते हुए कड़े फैसले लिए थे। तब 16 जानें गईं थीं और 84 लोग घायल हुए थे। हमने सहमति बनाने का चार बार प्रयास कि या था मगर बात नहीं बनी। सुप्रीम कोर्ट को इस मामले में हस्तक्षेप करना होगा। कोर्ट का फैसला ही सर्वमान्य होगा|”

शर्मनाक: कृष्णा भगवान का ऐसा अपमान जिसे सुनकर हर हिन्दू का खून खौल जायेगा

मशहूर वकील प्रशांत भूषण ने उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा शुरू किए गए एंटी-रोमियो स्क्वॉड की आलोचना करते हुए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को खुली चुनौती दी है| भूषण ने योगी की सीएम योगी की आलोचना करते हुए अपनी गन्दी राजनीति में भगवान कृष्ण को भी खींच लिया है। भूषण ने शेक्सपियर के एक नाटक के पात्र रोमियो और भगवान श्रीकृष्ण की आपस में तुलना कर दी। भूषण ने ट्वीट करते हुए लिखा कि, “रोमियो ने केवल एक लड़की से प्यार किया था जबकि भगवान कृष्ण तो लड़कियों को छेड़ने के लिए मशहूर थे।” भूषण ने आगे लिखा कि, “क्या आदित्यनाथ के अंदर हिम्मत है कि वो एंटी रोमियो स्क्वाड को एंटी कृष्ण स्क्वाड कहेंगे?”

भूषण के इस ट्वीट के बाद भाजपा के प्रवक्ता संबित पात्रा ने उनके सवाल का जवाब भी एक ट्वीट के जरिए ही दे डाला। संबित ने भूषण के अंग्रेजी ट्वीट का जवाब हिंदी में देते हुए लिखा कि, “भगवान कृष्ण को समझने के लिए प्रशांत भूषण को कई जन्म लेने होंगे।” उन्होंने भूषण के ट्वीट की निंदा करते हुए आगे लिखा कि, “वह कितनी आसानी से कृष्ण जी को राजनीति में घसीट लाए हैं। भूषण का ऐसा करना बहुत ही दुख की बात है।”

बता दें कि योगी आदित्यनाथ के सीएम बनते ही एंटी रोमियो स्क्वाड का गठन करते हुए लड़कियों को छेड़ने वाले मनचलों पर सख्त कार्रवाई शुरू कर दी है। मालूम हो कि भूषण से पहले भी कई लोग इस स्क्वॉड का नाम ऐंटी-रोमियो रखने पर आपत्ति जता चुके हैं। आलोचकों का कहना है कि रोमियो शेक्सपियर के एक मशहूर नाटक का पात्र है और रोमियो-जूलियट की प्रेम कहानी अपने आपसी प्यार और समर्पण के लिए पूरी दुनिया में विख्यात है।

डोनाल्ड ट्रंप ने पीएम नरेंद्र मोदी को किया फोन, चुनावों में मिली जीत पर दी बधाई

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के चुनावों में मिली जीत के लिए फोन करके बधाई दी है।

देश के पांच राज्यों में से बीजेपी ने दो राज्यों में पूर्ण बहुमत से सरकार बनाई है जबकि असम और मणिपुर में कांग्रेस को छोड़ दूसरी पार्टियों के समर्थन से सरकार बनाई है।

बता दें कि इससे पहले भी डोनाल्ड ट्रंप ने पीएम मोदी को फोन कर दोस्ती की मिसाल पेश की थी। आपको बता दें कि अमेरिका के राष्ट्रपति का पदभार संभालने के चार दिन बाद डोनाल्ड ट्रंप ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ फोन पर हुई अपनी बातचीत में भारत को एक ‘सच्चा दोस्त और साझेदार’ बताया था।

बातचीत में दोनों नेताओं ने इस्लामिक आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक लड़ाई में ‘कंधे से कंधा मिलाकर खड़े रहने’ और रक्षा एवं आर्थिक संबंध को मजबूत करने का संकल्प लिया था।

24 जनवरी रात को दोनों नेताओं के बीच टेलीफोन पर हुई अपनी बातचीत में एक दूसरे को अपने-अपने देश आने का न्यौता भी दिया। व्हाइट हाउस ने एक बयान में कहा, ‘प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ बातचीत में राष्ट्रपति ट्रंप ने इस बात पर जोर दिया कि भारत को अमेरिका एक सच्चा दोस्त और दुनियाभर की चुनौतियों से निपटने में एक सहयोगी मानता है।’

राष्ट्रपति ट्रंप और प्रधानमंत्री मोदी ने संकल्प लिया कि इस्लामिक आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक लड़ाई में अमेरिका और भारत कंधे से कंधा मिलाकर खड़े रहेंगे।

पीडीपी के सामने भाजपा ने घुटने टेक दिए और इससे अलगाववाद को और बल मिलेगा !

श्रीनगर के स्थानीय निवासीयों ने यह भी कहा की भाजपा का श्रीनगर से अपना प्रत्याशी खड़ा न करना बहुत दुखद है और पीडीपी के सामने भाजपा ने घुटने टेक दिए और इससे अलगाववाद को और बल मिलेगा !

श्रीनगर : हिंदु महासभा के प्रदेश संयोजक श्री चेतन शर्मा जी ने श्रीनगर लोकसभा सीट से नामांकन करने के बाद श्रीनगर में लार क्षेत्र में प्रचार किया और लोगों से मिले ! श्रीनगर के स्थानीय निवासी लोग हिंदू महासभा के नेता से स्वतः आकर मिले और क्षेत्र में आकर मिलने को बोला और उनकी समस्या सुनी और सभी का यही मत था की हिंदू महासभा पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर की बात करके उसे भारत में मिलाने की बात करती है तो उन्हें हिंदू महासभा को वोट देने में भी आपत्ति नही है । वहां के अधिकतर लोगों ने कहा की कश्मीर में कांग्रेस, नेशनल कांफ्रेस, पीडीपी जैसी पार्टियाँ ही अलगाववादियों से सांठ-गाँठ करके अपने प्रत्यासी जितवाकर लोकसभा और विधानसभा में भेजते हैं ! वहां के लोगों ने यह भी बताया की हमारे बच्चों के हाथों में पत्थर यही अलगाववादी देते हैं और इन अलगाववादियों के बच्चे डाक्टर या इंजिनियर बनते हैं, एक स्थानीय लड़के ने कहा की ये अलगाववादी क्यों नही अपने बच्चों को पत्थर मारने के लिए लगाते हैं !

श्रीनगर के स्थानीय निवासीयों ने यह भी कहा की भाजपा का श्रीनगर से अपना प्रत्याशी खड़ा न करना बहुत दुखद है और पीडीपी के सामने भाजपा ने घुटने टेक दिए और इससे अलगाववाद को और बल मिलेगा ! जब हिंदु महासभा के नेता श्री चेतन शर्मा ने कहा की हिंदु महासभा धारा 370 और धारा 35A के विरुद्ध है और जब ये नही होंगे तो उस दिन से जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद का दौर समाप्त होगा और उद्योग लगना प्रारम्भ हो जायेंगे तो वहां के लोगों ने कहा की इसी के कारण जम्मू-कश्मीर का निवासी अलग-थलग पड़ा हुआ है !

कश्मीर के लोगों को जब चेतन शर्मा जी ने सावरकर के सिद्धांत और हिंदू महासभा की विचारधारा से अवगत कराया तो लोगों ने कहा की हमें हिंदू महासभा से आपत्ति नही है और श्रीनगर में हिंदू महासभा का कार्यालय भी जल्द खोलने का प्रस्ताव दे दिया और वहां हिंदुराष्ट्र ध्वज को फहराने से भी उन्हें आपत्ति नही है । चेतन शर्मा ने बताया की हिंदू महासभा का हिंदु-राष्ट्र सिद्धांत सांस्कृतिक, पारंपरिक एवं वैचारिक है और तो और हिंदू महासभा को नास्तिक से भी आपत्ति नही है यदि वो कहे की भारत मेरी पुण्य एवं पितृ भूमि है !

रिपोर्ट पढ़िये: भारतीय मीडिया का ज्ञान कितना घटिया है, देश की असलियत से कितने कटे हुए हैं….

ब्लॉग : पुष्पेंद्र राणा ( यूनाइटेड हिन्दी डॉट कॉम ) :-  अवैध बूचड़खानों की बंदी का विरोध कर विपक्ष, मीडिया, महानगरों में बैठे तथाकथित बुद्धिजीवियों ने ना केवल अपनी बेवकूफी का प्रदर्शन किया है बल्कि उनका ज्ञान कितना सिमित है और महानगरो से बाहर के भारत की असलियत से कितने कटे हुए हैं इस सच्चाई के दर्शन भी करा दिए हैं।

लेकिन दुर्भाग्य यह है कि अधिकतर समर्थक भी इस मुद्दे से ठीक से परिचित नही है ?
पहली बात तो मुद्दा सिर्फ गौ हत्या का नही था ! गौ हत्या पर उत्तर प्रदेश में पहले से ही कानूनी प्रतिबन्ध है। हालांकि सपा और बसपा की सरकारों में इस कानून की धज्जियां उड़ाई गई और बड़े पैमाने पर सरकारी संरक्षण में गौहत्या की जाती रही।

लेकिन गौ हत्या से भी बड़ा मुद्दा (विशेषकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश के लिये) भैंसों के अवैध कटान का रहा है। उदाहरण के लिये कुछ साल पहले तक मेरठ में शहर के बीचों बीच सरकारी कमेला होता था जिसे हर साल नगर निगम मामूली रकम के एवज में याकूब कुरैशी और शाहिद अख़लाक़ जैसे कसाई नेताओ को ठेके पर देता था। मेरठ शहर की रोजाना की मांस की खपत 250 भैंस की है और इसीलिए इस कमेले में कानूनी रूप से रोजाना 250-300 भैंस काटे जाने की अनुमति थी लेकिन स्थानीय मीडिया रिपोर्ट के अनुसार इसमें रोजाना 5-7 हजार तक भैंस काटी जाती थी। इसके अलावा कई हजार मेरठ शहर के एक हिस्से के गली मुहल्लों में बने छोटे कमेलो में कटती थी। मेरठ शहर के मुस्लिम बहुल इलाकों का यह हाल है कि वहां पानी में भी खून आता है। दुर्गन्ध और बीमारियों की वजह से कई इलाको से लोग पलायन कर गए। कोर्ट ने कई सालों पहले ही इस कमेले को बंद करने और शिफ्ट करने का आदेश दिया हुआ था लेकिन उसे हटाने की इक्षाशक्ति किसी सरकार में नही थी।

सबसे बड़ी बात ये है कि ये सारा मांस गल्फ में एक्सपोर्ट होता था। लोकल सप्लाई के लिये इतने कटान की आवश्यकता नही थी ! याकूब कुरैशी और शाहिद अख़लाक़ जैसे नेता रातो-रात करोड़पति से खरबपति हो गए। बसपा की सरकार में तो इनका खुद का ही राज था। सुविधा अनुसार पार्टी भी बदल लेते थे। पैसो और सत्ता के दम पर इन्होंने मेरठ में आतंक कायम किया। सपा में आजम खान की वजह से इनकी दाल नही गली क्योंकि उसकी कसाईयो से नही बनती थी। आजम खान ने मेरठ की पीड़ित मुस्लिम जनता की गुहार पर कमेला शहर से बाहर शिफ्ट करवा दिया। हालांकि याकूब कुरैशी जैसे इतने पैसे वाले हो गए कि उन्होंने खुद अपने आधुनिक संयंत्र स्थापित कर लिए लेकिन इनमे अवैध कटान चालू रहा।

अगले पृष्ठ पर पढ़िये : बिसाहड़ा जैसे कितने काण्ड हुए

सामूहिक बलात्कार पीड़िता को ज़बरदस्ती हैवानो ने पिला दिया तेज़ाब, योगी ने खुद की मुलाक़ात और…

उत्तर प्रदेश में एक बार फिर इंसानियत को शर्मसार करने वाली घटना सामने आई है. बताया जा रहा है कि बीते आठ साल से कानूनी जंग लड़ रही सामूहिक बलात्कार की पीड़िता 35 साल की एक महिला एक बार फिर से गंभीर हालत में अस्पताल में भर्ती है. वजह यह है कि गुरुवार को लखनऊ जा रही एक ट्रेन में दो पुरुषों ने उसे पकड़कर जबरदस्ती तेजाब पिलाया.

चलती ट्रेन में महिला को तेजाब पिलाया:

बताया जा रहा है कि अभी महिला की हालत गंभीर है, जो लखनऊ के किंग जॉर्ज मेडिकल कॉलेड अस्पताल में भर्ती है. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ शुक्रवार को महिला से मुलाकात करने अस्पताल पहुंचे. बताया जा रहा है कि वह आईसीयू में भर्ती है. मुख्यमंत्री ने महिला की हालत की जानकारी ली और एक लाख रुपये के मुआवजे की घोषणा की. साथ ही सीएम योगी ने पुलिस को जल्द से जल्द महिला के साथ दुर्व्यवहार करन वाले आक्रमणकारियों को गिरफ्तार करने का सख्त आदेश दिया.

इससे पहले इस महिला का हो चुका है गैंगरेप:

आपको बता दें कि पीड़ित महिला के साथ वर्ष 2008 में रायबरेली में सामूहिक बलात्कार किया गया था और उसके बाद बलात्कारियों द्वारा उसके पेट पर तेज़ाब फेंक दिया गया था. उस मामले में उस वक़्त तीन लोगों को गिरफ्तार किया गया था. मगर अब इस घटना के बाद और जल्द ही मामले की सुनवाई शुरू होने जा रही है.

कश्मीर के लिए पांच ट्रेन बिहार से चला दीजिये तो सारी धारायें सही से काम करेगी !!

ब्लॉग : आनंद कुमार ( यूनाइटेड हिन्दी डॉट कॉम ) :- कई बार जो बातें हम आपस में करते हैं वो अनजान लोगों के बीच नहीं करते। सोशल मीडिया पर पोस्ट करने से परहेज भी रखते हैं। बिहारियों की हालत ऐसी होती है कि हम अक्सर चुटकुले किसी संता-बंता, पप्पू-टीपू, या फजलु-अफ़जल पर भी नहीं सुनाते। हमारे चुटकुले भी हमपर ही होते हैं। जैसे अगर पूछा जाए की कश्मीर के आतंकवाद की समस्या का आसान इलाज क्या है ? तो जवाब होता है वहां के लिए बिहार से कुछ डायरेक्ट ट्रेन चलवा दो ! 

कश्मीर के लिए पांच ट्रेन चला दीजिये बिहार से तो वो भी सुधर जायेगा।

गौर कीजिये तो ये दिख भी जाएगा। सत्तर के दशक में कभी बंगाल राजनैतिक हत्याओं से पीड़ित हुआ करता था। बिहारी जाकर उसी दौर में वहां नौकरी करने लगे और धीरे धीरे मार काट ख़त्म। पूर्वोत्तर कई उल्फा जैसी उग्रवादी-आतंकी विचारधाराओं से ग्रस्त था। बिहारी वहां बसने लगे, वो भी ठीक हो चला। पंजाब आतंकवाद से ग्रस्त हुआ, बिहारी मजदूर वहां के खेतों में जाने लगे तो वो भी ठीक। दक्षिण में एल.टी.टी.इ. थी, बिहारी आज वहां होते हैं तो एल.टी.टी.ई. नहीं रही।

कश्मीर के लिए पांच ट्रेन चला दीजिये बिहार से तो वो भी सुधर जायेगा।

ये मेरा ही चुटकुला है या बेबसी पर मुस्कान वो तय करना जरा मुश्किल है। अकेले मुंबई में करीब 50 लाख बिहारी होते हैं। सभी मेट्रो और बड़ी जगहों को मिलायेंगे तो बिहार के तीन करोड़ से ऊपर लोग वहीँ प्रवासी के तौर पर मिल जायेंगे। जैसी की आम धारणा है वैसे बिहार कृषि प्रधान भी नहीं होता। बिहार की आबादी का 55-60% हिस्सा नौकरीपेशा है, काम करने वालों की लगभग 30-35 प्रतिशत की आबादी ही कृषि पर निर्भर है। ये तब है जब करीब 12% आबादी ही शहरी है, बाकी सब बिहार में ग्रामीण ही होते हैं। हिमांचल के पहाड़ी इलाकों के बाद ये सबसे कम शहरी आबादी वाला इलाका है। 80 प्रतिशत ग्रामीण आबादी और 35% कृषक, बाकी कहाँ नौकरी करते होंगे अंदाजा करना मुश्किल नहीं।

यानि जिस सर्विस इंडस्ट्री और नॉलेज प्रोसेस आउटसोर्सिंग की यदा कदा, बड़ी बैठकों में चर्चा होती है उसके लिए बिहार में श्रम शक्ति उपलब्ध थी। हाँ, उसकी इंडस्ट्री कभी यहाँ नहीं आई, ये और बात है। अब कई स्वनामधन्य बुद्धिजीवी बताएँगे कि देखो इस से बाहर से पैसा बिहार आ रहा है और उस से बहार आएगी। लेकिन समस्या ये है कि इन कामगारों के बच्चों की शिक्षा के लिए बिहार में कोई व्यवस्था नहीं। परीक्षाएं समय पर नहीं होती इसलिए आप तीन साल में ग्रेजुएशन नहीं कर सकते तो बाहर पढ़ना मजबूरी है। इस तरह आया हुआ पैसा वापिस दिल्ली, कोटा, बंगलौर, भोपाल चला जाता है।

ये चीज़ें आसानी से कल के कार्यक्रम में मंच पर भी दिख गई होंगी। सिर्फ पटना शहर का ही इतिहास 2000 साल से ज्यादा का निकल आएगा। किस्मत से जब मंच पर से इसी शहर में “बिहार दिवस” के सांस्कृतिक कार्यक्रम चल रहे थे तो बिहार के कितने कलाकार दिखे ? हजारों साल का सांस्कृतिक इतिहास कहाँ गया ? मंच से नितीश बाबू को ये क्यों कहना पड़ता है कि बिहारियों के काम ना करने से दिल्ली बंद हो जायेगी, ये क्यों नहीं पूछते कि बिहारियों को दिल्ली जाकर नौकरी क्यों करनी पड़ती है ?

आपके भाषण में मेरी रूचि नहीं सुशासन बाबु। मुझे उस कॉइन कलेक्टर को देखना था जो इतिहास सचमुच संजो के रख रहा था और आपकी अकर्मण्यता के वजह से हाल में ही डूब गया। मुझे उन किसानों को देखना था जिनके प्रति हेक्टेयर धान और आलू की उपज को तो अपनी पीठ थपथपाने के लिए आप अपने प्रकाशनों में छापते है, लेकिन मंच पर बुला कर उन्हें सम्मानित करने में शायद आपके जातीय-सियासी आंकड़े गड़बड़ाने लगते हैं। मुझे उस लड़के को भी देखना था जो बिना लोभ लालच लोगों को किताब खरीदने के लिए प्रेरित करता, अनजान लोगों को पोस्टकार्ड लिख रहा होता है। मुझे उसे भी देखना था जो बच्चों को नशा मुक्त कर के शिक्षित करने का प्रयास आपके गांधी मैदान वाले मंच से थोड़ी ही दूर पर हर रोज़ करता है।

बाकी ये अनपढ़ जाहिलों को भी मंच पर से उतारिये जनाब। इनकी तस्वीर छपने पर जैसा बिहार दिखता है, वो तो बिलकुल भी मेरा चेहरा नहीं।

कम्युनिस्ट खेमे के इन इतिहासकारों ने भगत सिंह की इस तरह से की निर्मम हत्या…

भगत के मिट्टी की खुशबू हम सबके जेहन में रच-बस चुकी है, तुम्हारे षड्यंत्र अब सफल नहीं होंगे….

ब्लॉग : ( अभिजीत सिंह, यूनाइटेड हिन्दी डॉट कॉम ) :- 1931, फरवरी-मार्च का महीना, सेन्ट्रल जेल, लाहौर के 14 नम्बर वार्ड में फाँसी की प्रतीक्षा कर रहे बंदियों में से एक ने अपनी माँ को एक पत्र लिखा। माँ ने बेटे का पत्र खोला तो उसमें लिखा था, माँ, मार्च की 23 तारीख को तेरे बेटे की शादी है, आशीर्वाद देने जरूर आना। माँ सोचने लगी जेल में तो लडकियाँ होती नहीं तो फिर ये पगला किससे प्यार कर बैठा, कहीं किसी जेलर की बेटी पर तो मेरे बेटे का दिल नहीं आ गया ? माँ से पूछे बिना बेटा शादी कर लेगा इस आशंका से पीड़ित माँ ने तस्दीक करने के लिये अपने छोटे भाई को भेजा, जा जरा देख के आ कि ये किस कुड़ी को दिल दे बैठा है। कैदी ने मिलने आने वाले को एक कागज पर कुछ लिख कर दिया और कहा, इसे माँ को दे देना और ध्यान रहे इसे और कोई न खोले। माँ ने बेटे का पत्र खोला तो लिखा था, मेरी होने वाले दुल्हन का नाम है “मौत”।

मौत को माशूका बना लेने वाले इस शख्स का नाम था भगत सिंह। ये वो नाम है जिसके सामने आते ही देशप्रेम और बलिदान मूर्त हो उठता है। भगत वो नाम है जिसकी राह रूप, यौवन और सौन्दर्य नहीं रोक सकी, भगत वो नाम है जिसने एक अत्यंत धनी परिवार से आये विवाह प्रस्ताव को ये कहते हुए ठुकरा दिया था कि मेरा विवाह तो अपने ध्येय के साथ हो चुका है अब दुबारा विवाह क्या करना, भगत वो नाम भी है जिसके लिये उसकी अपनी धार्मिक परंपरा के अनुपालन से अधिक महत्व भारत की आजादी का था। वो चाहता तो फांसी की सजा से बच सकता था पर उसने इसके लिये कोई कोशिश नहीं की, इसलिये नहीं की क्योंकि उसे पता था कि अपना बलिदान देकर वो तो सो जायेगा पर सारा भारत जाग उठेगा और फिरंगी हूकूमत की जड़ उखड़ जायेगी।

जिस हुतात्मा का सिर्फ जिक्र भर आज उसके बलिदान के 86 साल बाद भी युवकों में जोश भर देता है, तो जाहिर है कि वो लोग जिनकी विचारधारा का अवसान हो चुका है वो अगर भगत को अपने खेमे का साबित कर दें तो शायद उनकी मृत विचारधारा कुछ अवधि के लिये जी उठे। इसी सोच को लेकर कम्युनिस्टों ने बड़ी बेशर्मी से भगत सिंह के बलिदान का अपहरण कर लिया। विपिन चन्द्र, सुमित सरकार, इरफान हबीब, रोमिला थापर जैसे वाम-परस्त इतिहासकारों ने सैकड़ों लीटर स्याही ये साबित करने में उड़ेल दी थी कि भगत सिंह तो कम्युनिस्ट थे। भगत के “मैं नास्तिक क्यों हूँ” वाले लेख को बिना किसी आधार का ये लोग ले उड़े और उसे लेनिन के उस कथन से जोड़ दिया जिसमें उसने कहा था कि ‘नास्तिकता के बिना मार्क्सवाद की कल्पना संभव नहीं है और नास्तिकता मार्क्सवाद के बिना अपूर्ण तथा अस्थिर है’।

यानि इनके अनुसार भगत सिंह मनसा, वाचा, कर्मणा एक प्रखर मार्क्सवादी थे। भगत सिंह के प्रति ममत्व जगने के वजह ये भी है कि जिस लेनिन, स्टालिन, माओ-चाओ, पोल पोट वगैरह को वो यूथ-आइकॉन बना कर बेचते रहे थे उनके काले कारनामे और उनके नीतियों की विफलता दुनिया के सामने आने लगी थी और स्वभाव से राष्ट्रप्रेमी भारतीय युवा मानस के बीच उनको मार्क्सवादी आइकॉन के रूप में बेचना संभव नहीं रख गया था इसलिए इन्होने भगत सिंह को कम्युनिस्ट बना कर हाईजैक कर लिया।

इसलिये किसी व्यक्ति के मृत्यु के उपरांत उसकी विचारधारा को लेकर जलील करने का सबसे अधिक काम अगर किसी ने किया है तो वो यही लोग हैं जिन्होनें भगत सिंह जैसे हुतात्मा को कम्युनिस्ट घोषित करने का पाप किया। ऐसे में इस बात की तहकीक भी आवश्यक हो जाती है कि क्या कम्युनिस्टों के मन में हमेशा से भगत सिंह के प्रति आदर था या अपने राजनीतिक फायदे और अस्तित्व रक्षण के लिए उन्होंने उगला हुआ थूक निगल लिया ? भगत सिंह के प्रति कम्युनिस्ट आदर जानने के आवश्यक है कुछ कम्युनिस्टों की किताबों को पढ़ा जाए और भगत सिंह के संबंध में कुछ कम्युनिस्ट नेताओं की स्वीकारोक्तियों को सुना जाए।

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ब्लॉग : पीएम नरेंद्र मोदी के अंधविरोधी हैं उनकी सबसे बड़ी शक्ति

मोदी के अंधविरोधी हैं उनकी सबसे बड़ी ताकत

ब्लॉग : Neeraj Badhwar (facebook Coyp) :- बीजेपी को यूपी में 325 सीटें मिलने के बाद से बहुत से लोग इसे लेकर काफी हैरान हैं। ये वो लोग हैं जो ‘स्थानीय लोगों’ से की गई बातचीत और ‘ज़मीनी हालात’ के आधार पर बीजेपी की हार का दावा और दुआ कर रहे थे। और जब योगी आदित्यनाथ वहां मुख्यमंत्री बन गए, तो ये समझ नहीं पा रहे कि ऐसा कैसे हो गया?

इसी तरह की हैरानी इन्हें तब भी हुई थी जब 3 साल पहले नरेंद्र मोदी अपने दम पर प्रधानमंत्री बन गए थे। यूं तो मैं ज़्यादा लंबा लिखने से बचता हूं मगर अब इस वर्ग की हैरानी इतनी दयनीय लगने लगी है कि सोचा अपने भी कुछ विचार साझा कर लूं।

पहली बात उन पत्रकारों की हैरानी के बारे में जो दावे तो कुछ और कर रहे थे और हुआ कुछ और। उनसे मुझे ये कहना है कि भाई आप किसी भी मुद्दे पर तय निष्कर्ष के साथ अपनी ही सोच वाले मेहमान बुलाकर अगर ‘निष्पक्ष’ चर्चा करोगे तो उस चर्चा से वही निकलकर आएगा जो आप चाहोगे।

अगर आप खुद से अलग सोच रखने वाले व्यक्ति को सोशल मीडिया के हर प्लेटफॉर्म पर ब्लॉक करते रहोगे, तो आप उन ही लोगों से घिर जाओगे जो आप जैसा सोचते होंगे या आपकी ही सोच का गुणगान करते होंगे। अब ऐसे लोगों की संगत से आप किसी ‘ज़मीनी हकीकत’ का अंदाज़ा लगाएंगे, तो आप खुद को अंधेरे में रखेंगे और ये अंधेरा आपकी टीवी स्क्रीन से भी ज़्यादा गहरा और काला होगा ।

अब बात करते हैं बीजेपी की जीत की। मुझे ईमानदारी से लगता है कि 2014 में जब प्रधानमंत्री पद के लिए मोदी की उम्मीदवारी सामने आई थी, तो बहुत से लोग उनमें एक ईमानदार प्रशासक तो देखते थे मगर इस बात का भरोसा बहुत कम लोगों को था कि वो बीजेपी को बहुमत दिला सकते हैं। मगर इसके बाद साम्प्रदायिकता के नाम पर उन्हें विपक्षी दलों, मीडिया और ख़ास वर्ग की तरफ से इतनी गालियां दी गईं कि इन गालियों ने उनके लिए वो काम कर दिया जो खुद मुख्यमंत्री रहते उनका काम भी नहीं कर पाता!

मगर अंध विरोधियों के ये बात न तब समझ आई थी न अब आई है। उन्हें ये मामूली बात समझ नहीं आई कि मोदी को मोटे तौर पर लोगों ने विकास के एजेंडे पर ही चुना था और अगर उन्हें मोदी को किसी मुद्दे पर घेरना है तो वो भ्रष्टाचार और विकास से ही जुड़ा हो सकता है।

मगर ये तो तर्क की बात हो गई। और जब हम किसी से नफरत करते हैं, तो तर्क तो इस्तेमाल की जाने वाली आखिरी चीज़ होती है। आप बीवी को साथ न रखने के लिए उनका मज़ाक बनाओगे, विदेश यात्राओं के लिए खिल्ली उड़ाओगे, कपड़ों के लिए तंज कसोगे। इस तरह से जितने non issue थे हर किसी को issue बनाने की कोशिश की गई। दादरी जैसे अपवाद को देश का करंट स्टेटस बताकर उसे बढ़ती असहिष्णुता से जोड़ा गया। अवॉर्ड लौटाए गए, कन्हैया कुमार पैदा किए गए, स्क्रीनें काली की गईं। खुद ही एक दूसरे की पीठी खुजा और थपथपाकर ये तसल्ली भी कर ली गई कि हम सही रास्ते पर जा रहे हैं मगर हुआ क्या?

मैं हमेशा ये कहता हूं कि जनता बड़ी संयमी होती है। वो सरकारों के विश्लेषण करने में वैसी बेसब्र और पूर्वाग्रही नहीं होती जैसा एक ख़ास वर्ग होता है। जब तक उसे लगता है कि सरकार की नीयत साफ है, वो ईमानदारी से काम कर रही है, जो कर सकती थी कर रही है,तब तक लोगों का उस पर भरोसा डगमगाता नहीं।

उससे भी बड़ी बात पत्रकारों या धार्मिक कट्टरपंथियों के उलट आम आदमी को किसी नेता को खारिज ही नही करना होता, उसे चयन भी करना होता है। आप कहते हैं मोदी बुरा है… मोदी बुरा है…तो…अच्छा कौन है…राहुल गांधी!

बड़ा ताज्जुब होता है कि जिस राहुल गांधी ने सक्रिय राजनीति में आने के बाद कांग्रेस को दो दर्जन से ज़्यादा चुनाव हरवा दिए, उसकी ये वर्ग चर्चा नहीं कर रहा। पंजाब में केजरीवाल के हारने पर उसे दिल्ली में उनके काम पर मिले जनादेश के तौर पर नहीं देख रहा मगर ये सवाल ज़रूर पूछ रहा है कि योगी आदित्यनाथ को सीएम क्यों बना दिया? लोगों ने तो विकास के लिए बीजेपी को वोट दिया था।

भाई इतनी तो राजनीतिक समझ पैदा करो जब जनता किसी पार्टी को तीन चौथाई से भी ज़्यादा समर्थन देती है, वो भी यूपी जैसे राज्य में, तो वो समर्थन नहीं देती बल्कि अपने भरोसे का समर्पण करती है। वो कहती है कि भरोसा किया है चाहो जो कर लो। मगर अब भी बजाए इस जनसमर्थन को समझने के इस नुख्ताचीनी में लगे हैं कि घर का शुद्धीकरण क्यों करा दिया, सांसद को मुख्यमंत्री क्यों बना दिया।

मार्क ट्वेन ने कहा था गुस्सा उस तेजाब की तरह होता है जो जिस प्याले में होता है उसे ही सबसे ज़्यादा नुकसान पहुंचाता है। किसी के प्रति नफरत भी वैसे ही होती है। तभी तो देखिए न जो मोदी 2014 में प्रधानमंत्री बनते नहीं दिख रहे थे उन्हें प्रधानमंत्री बनवा दिया और जो बीजेपी पिछली बार 50 सीटें नहीं ला पाई थी वो सवा तौन के पार चली गई। और ये सब हुआ है तो इसमें मोदी का कम और उनके इन अंधविरोधियों का प्रताप ज़्यादा है!