पीएम मोदी ने लिए ये एहम फैसला जिससे मौत के मुंह में खड़े शख्स को मिला नया जीवन!

राजनीति के खेल में बहुत कम ही देखा गया है कि जब दो विपक्षी पार्टीयां कभी एक दूसरे के फैसले के समर्थन में उतरी हों| ऐसी ही कहानी है भाजपा और माकपा की भी| राजनीति में दोनों ही पार्टियों की ज़ुबानी जंग भी आम बात है लेकिन हाल ही में दोनों विपक्षी पार्टियाँ साथ आई और ज़िन्दगी और मौत से जूझ रहे एक शख्स को जीवनदान दिया| 

दरअसल दोनों विपक्षी पार्टियों ने एक साथ आकर कर अपनी दोनों किडनी गवां चुके एक गरीब युवक को बेहतर उपचार दिलाने के लिए इंसानियत का उदाहरण दिया और आपसी रंजिश भुला कर माकपा के राज्यसभा सदस्य ऋतब्रत बनर्जी के अनुरोध पर पीएम नरेंद्र मोदी ने अपनी निधि से आर्थिक सहायता मुहैया कराई है। पीएम मोदी और भाकपा सदस्य की इस मुहीम का असर ये हुआ कि अब जल्द ही इस युवक की दोनों किडनी का प्रत्यारोपण किया जाएगा।

जानिए कैसे पीएम मोदी के एक कदम ने इस मौत के मुंह में खड़े शख्स को दिया जीवनदान

दरअसल पश्चिम बंगाल के नदिया जिले के पलासी क्षेत्र निवासी 30 वर्षीय विवेक विश्वास की बीमारी के चलते दोनों किडनी खराब हो गई थी। ऐसे में अपने जवान बेटे को इस हालत में देखकर उसके परिवार वाले टूट गए थे। विवेक का इलाज तेहट महकमा अस्पताल में चला जिसके बाद उन्हें कोलकाता के एसएसकेएम अस्पताल में रेफेर कर दिया गया लेकिन सरकारी अस्पताल में बेटे के इलाज में सुस्ती बर्ती जाते देख बूढ़े माँ-बाप को एक बार फिर चिंता सताने लगी|

डॉक्टरों ने विवेक के परिवार को विवेक का तकरीबन 30 जांच कराने को कहा। इलाज में समय लगता देख अब परिवार का सब्र टूटने लगा और उन्होंने विवेक को एक निजी अस्पताल में भर्ती करवाने का निर्णय ले लिया, लेकिन अधिक खर्च देख गरीब परिवार के पांव एक बार फिर डगमगाने लगे| परेशानी की इस घड़ी में विवेक के परिवार को किसी ने जानकारी दी कि उपचार के लिए सांसद निधि से भी धन मिलता है।

बस फिर क्या था, सांसद निधि इस समय तो मानो विवेक के परिवार के लिए डूबते को तिनके का सहारा साबित हुई| जानकारी मिलते ही विवेक के परिवार ने माकपा के राज्यसभा सदस्य ऋतब्रत बनर्जी से संपर्क साधकर मदद की गुहार की। सांसद ने भी उपचार में मदद का हाथ बढ़ाकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से भी परिवार को आर्थिक मदद मुहैया कराने का अनुरोध किया।

विवेक के परिवार की ये गुहार सुनते ही पीएम मोदी ने अपनी निधि से 2.90 लाख रुपये अनुदान दिए जाने की आज्ञा दे| विवेक का कहना है कि मंगलवार सुबह इसकी जानकारी दिल्ली से सांसद ऋतब्रत बनर्जी ने उन्हें दी है और अब शीघ्र ही मुकुंदपुर के एक निजी अस्पताल में विवेक का किडनी प्रत्यारोपण किया जा सकेगा|

शहीद हुए तो अकेले भगत ही हीरो क्यों ? सिर्फ इसलिए कि वो जेल में लेनिन को पढते थे ।

भगत के मिट्टी की खुशबू हम सबके जेहन में रच-बस चुकी है, तुम्हारे षड्यंत्र अब सफल नहीं होंगे….

ब्लॉग : शिवेश प्रताप ( यूनाइटेड हिन्दी डॉट कॉम ) :- ॥ कड़वा सच ॥

जब भगत सिंह के साथ राजगुरु और सुखदेव भी बराबर शहीद हुए तो अकेले भगत ही हीरो क्यों ? सिर्फ इसलिए कि वो जेल में लेनिन को पढते थे ।

दरअसल “केवल भगत सिंह” का ही महिमामण्डन करना दूषित राष्ट्र वाद और वामपंथी मुस्लिम विचारधारा पर खडे सामाजिक विज्ञान को सह देना है ।

आजादी के पहले से ही मुसलमान बिकाऊ रहे और अंग्रेजी हुकूमत की चाटुकारिता में रहे । आजादी के बाद इस्लाम पोषित वामपंथी दरअसल हिंदुओं के राष्ट्रवादी विचारों के तोड़ के रूप में एक सिख भगत सिंह को हीरो के रूप में ज्यादा हाईलाइट कर एक तीर से कई निसाने साधते रहे । जिसमें सिखों को वामपंथ की ओर मोड़ देश को तोड़ा जाए भी एक कारण है । दूसरा कि क्रांति नायक के रूप में भगत को खडा कर चंद्रशेखर आजाद के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के स्वरूप को भी मंद किया जाए । दरअसल वामपंथियों को चंद्रशेखर के जनेऊ से हमेशा समस्या रही ।

भगत सिंह के बलिदान का मैं बहुत सम्मान करता हूँ पर “केवल भगत सिंह” के अतिशय महिमा मंडन के खिलाफ हूँ । सुखदेव और राजगुरु का बलिदान भगत से रत्ती भर कम नहीं है ।

और यदि बलिदान की बात है तो फिर यह देश सबसे कम उम्र में फांसी पर चढे खुदीराम बोस को सिर्फ इसलिए भूल जाता है कि वो हिंदू थे ???

कृपया वामपंथी कुचक्र से बाहर निकल कर तीनों वीर बलिदानियों को बराबर सम्मान देकर नोटों पर छापने की बात करें । अकेले भगत क्यों ?

कम्युनिस्ट खेमे के इन इतिहासकारों ने भगत सिंह की इस तरह से की निर्मम हत्या…

भगत के मिट्टी की खुशबू हम सबके जेहन में रच-बस चुकी है, तुम्हारे षड्यंत्र अब सफल नहीं होंगे….

ब्लॉग : ( अभिजीत सिंह, यूनाइटेड हिन्दी डॉट कॉम ) :- 1931, फरवरी-मार्च का महीना, सेन्ट्रल जेल, लाहौर के 14 नम्बर वार्ड में फाँसी की प्रतीक्षा कर रहे बंदियों में से एक ने अपनी माँ को एक पत्र लिखा। माँ ने बेटे का पत्र खोला तो उसमें लिखा था, माँ, मार्च की 23 तारीख को तेरे बेटे की शादी है, आशीर्वाद देने जरूर आना। माँ सोचने लगी जेल में तो लडकियाँ होती नहीं तो फिर ये पगला किससे प्यार कर बैठा, कहीं किसी जेलर की बेटी पर तो मेरे बेटे का दिल नहीं आ गया ? माँ से पूछे बिना बेटा शादी कर लेगा इस आशंका से पीड़ित माँ ने तस्दीक करने के लिये अपने छोटे भाई को भेजा, जा जरा देख के आ कि ये किस कुड़ी को दिल दे बैठा है। कैदी ने मिलने आने वाले को एक कागज पर कुछ लिख कर दिया और कहा, इसे माँ को दे देना और ध्यान रहे इसे और कोई न खोले। माँ ने बेटे का पत्र खोला तो लिखा था, मेरी होने वाले दुल्हन का नाम है “मौत”।

मौत को माशूका बना लेने वाले इस शख्स का नाम था भगत सिंह। ये वो नाम है जिसके सामने आते ही देशप्रेम और बलिदान मूर्त हो उठता है। भगत वो नाम है जिसकी राह रूप, यौवन और सौन्दर्य नहीं रोक सकी, भगत वो नाम है जिसने एक अत्यंत धनी परिवार से आये विवाह प्रस्ताव को ये कहते हुए ठुकरा दिया था कि मेरा विवाह तो अपने ध्येय के साथ हो चुका है अब दुबारा विवाह क्या करना, भगत वो नाम भी है जिसके लिये उसकी अपनी धार्मिक परंपरा के अनुपालन से अधिक महत्व भारत की आजादी का था। वो चाहता तो फांसी की सजा से बच सकता था पर उसने इसके लिये कोई कोशिश नहीं की, इसलिये नहीं की क्योंकि उसे पता था कि अपना बलिदान देकर वो तो सो जायेगा पर सारा भारत जाग उठेगा और फिरंगी हूकूमत की जड़ उखड़ जायेगी।

जिस हुतात्मा का सिर्फ जिक्र भर आज उसके बलिदान के 86 साल बाद भी युवकों में जोश भर देता है, तो जाहिर है कि वो लोग जिनकी विचारधारा का अवसान हो चुका है वो अगर भगत को अपने खेमे का साबित कर दें तो शायद उनकी मृत विचारधारा कुछ अवधि के लिये जी उठे। इसी सोच को लेकर कम्युनिस्टों ने बड़ी बेशर्मी से भगत सिंह के बलिदान का अपहरण कर लिया। विपिन चन्द्र, सुमित सरकार, इरफान हबीब, रोमिला थापर जैसे वाम-परस्त इतिहासकारों ने सैकड़ों लीटर स्याही ये साबित करने में उड़ेल दी थी कि भगत सिंह तो कम्युनिस्ट थे। भगत के “मैं नास्तिक क्यों हूँ” वाले लेख को बिना किसी आधार का ये लोग ले उड़े और उसे लेनिन के उस कथन से जोड़ दिया जिसमें उसने कहा था कि ‘नास्तिकता के बिना मार्क्सवाद की कल्पना संभव नहीं है और नास्तिकता मार्क्सवाद के बिना अपूर्ण तथा अस्थिर है’।

यानि इनके अनुसार भगत सिंह मनसा, वाचा, कर्मणा एक प्रखर मार्क्सवादी थे। भगत सिंह के प्रति ममत्व जगने के वजह ये भी है कि जिस लेनिन, स्टालिन, माओ-चाओ, पोल पोट वगैरह को वो यूथ-आइकॉन बना कर बेचते रहे थे उनके काले कारनामे और उनके नीतियों की विफलता दुनिया के सामने आने लगी थी और स्वभाव से राष्ट्रप्रेमी भारतीय युवा मानस के बीच उनको मार्क्सवादी आइकॉन के रूप में बेचना संभव नहीं रख गया था इसलिए इन्होने भगत सिंह को कम्युनिस्ट बना कर हाईजैक कर लिया।

इसलिये किसी व्यक्ति के मृत्यु के उपरांत उसकी विचारधारा को लेकर जलील करने का सबसे अधिक काम अगर किसी ने किया है तो वो यही लोग हैं जिन्होनें भगत सिंह जैसे हुतात्मा को कम्युनिस्ट घोषित करने का पाप किया। ऐसे में इस बात की तहकीक भी आवश्यक हो जाती है कि क्या कम्युनिस्टों के मन में हमेशा से भगत सिंह के प्रति आदर था या अपने राजनीतिक फायदे और अस्तित्व रक्षण के लिए उन्होंने उगला हुआ थूक निगल लिया ? भगत सिंह के प्रति कम्युनिस्ट आदर जानने के आवश्यक है कुछ कम्युनिस्टों की किताबों को पढ़ा जाए और भगत सिंह के संबंध में कुछ कम्युनिस्ट नेताओं की स्वीकारोक्तियों को सुना जाए।

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कभी सोचा है कि इतने आधातों को सहकर भी आज हिन्दू कैसे बचे हैं, ये धर्म कैसे बचा है?

आपने कभी सोचा है कि इतने आधातों को सहकर भी हम आज हिन्दू कैसे बचे हैं ? हमारा धर्म कैसे बचा है ? फोटो Source : santabanta.com

ब्लॉग : महावीर प्रसाद खिलेरी (संपादक यूनाइटेड हिन्दी डॉट कॉम) : हिन्दू समाज शायद दो हज़ार सालों से गुलाम रहा है! हमारे ऊपर सदियों तक इस्लामी शासन रहा फिर कई रूपों में ईसाईयों ने हम पर शासन किया फिर 1947 में जब देश तथाकथित रूप से आजाद हुआ तब हमसे हमारा धर्म छीनने मिशनरी लोग आ गये, लालच दिया, कई जगह डर दिखाया, कई जगह अहसान जता कर उसकी कीमत मत-परिवर्तन के रूप में वसूलनी चाही, हमारे ऊपर न जाने कितने मोपला और मीनाक्षीपुरम हुए। आपने कभी सोचा है कि इतने आधातों को सहकर भी हम आज हिन्दू कैसे बचे हैं ? हमारा धर्म कैसे बचा है ?

आज हम हिन्दू इसलिये हैं क्योंकि हमारे पूर्वजों ने अपना धर्म नहीं छोड़ा। डर, हिंसा, प्रपंच, लालच, षड्यंत्र सबके बीच सदियों तक संघर्ष करते रहे। हमारे एक पूर्वज इधर राजस्थान में घास की रोटी खाकर हिन्दू धर्म बचा रहे थे तो उधर पंजाब में हिन्दू धर्म को बचाने के लिये कुछ पूर्वज जीवित ही दीवार में चुनवा दिये गये। अपने उन पूर्वजों के बारे में भी दो मिनट सोचिये जिन्होनें धर्म बदलने की जगह मैला उठाने के काम को चुना था। हकीकत राय के बलिदान के बारे में सोचिये, दक्षिण भारत की माँ रुद्र्माम्बा देवी के त्याग का स्मरण कीजिये, पूरब के वीर लाचित बरफूकन का स्मरण कीजिये और न जाने ऐसे कितने नाम है जिन्होनें अपना सर्वस्व खो कर हिन्दू धर्म को बचाये रखा। ये सब किसी एक जाति-विशेष के नहीं थे !

आप योगी जी की प्रशासनिक क्षमता पर सवाल इसलिये नहीं उठा रहे कि आपको वास्तव में इस बात की कोई फ़िक्र है कि वो शासन कैसे चलायेंगे! दरअसल वजह ये है कि योगी जी में आपने किसी ठाकुर को ढूंढ लिया है जो आपको पीड़ा दे रहा है। योगी जी के ऐब आप इसलिये ढूंढ रहें हैं क्योंकि मोदी जी ने आपके जात वाले को मुख्यमंत्री नहीं बनाया। इसी तरह जब आप योगी जी को ठाकुर अजय सिंह विष्ट लिख रहें हैं तो आप उन्हें एक जाति विशेष से बाँध रहें हैं, जाहिर है फिर बाकी जाति वाले भी उन्हें उसी रूप में लेंगें।

अपनी जातिवादी मानसिकता में जब हम किसी के बारे में कुछ लिखतें हैं, किसी जाति के मूल पर प्रश्न उठाते हैं तो एक बार ये भी सोच लीजिए कि आपने गाली किसको दी है ? आप उनको गाली दे रहें हैं उनके कारण हम हैं वर्ना हम भी आज पीटर या जुम्मन बनकर जी रहे होते ! वो पूर्वज चाहे किसी भी जाति के हों पर वो सब हमारे लिये वन्दनीय है क्योंकि उन्होंने हमारे लिये उस धरोहर (हिंदुत्व) को सहेजे रखा जिसका अनुपालन मनु, परशुराम, श्रीराम, श्रीकृष्ण, श्री बुद्ध से लेकर गुरु गोविन्द सिंह करते थे।

हम या आप जिस जाति में पैदा हुयें हैं वो हमारी या आपकी चॉइस नहीं थी, भगवान की मर्जी थी। ईश्वर की मर्जी पर जो सवाल उठाये, उसके सृजन को किसी भी रूप में लांछित करे उससे कृतघ्न और अज्ञानी कोई नहीं हो सकता। मैं कभी किसी दलित को गाली नहीं देता, इसलिये नहीं कि वो गलत नहीं हो सकते बल्कि इसलिये क्योंकि इतने दंशों, अत्याचारों और प्रलोभनों को सह कर भी आज वो हिन्दू है। इस देश की मुख्य-धारा में है और कम से कम हमारे अस्तित्व को लीलने वाला खतरा नहीं है। मैं कभी किसी क्षत्रिय को गाली नहीं देता क्योंकि उनके पूर्वजों ने सदियों तक हमारे भारत की अखंडता अक्षुण्ण रखने के लिये बलिदान दिया है। मैं किसी ब्राह्मण को गाली नहीं देता क्योंकि दुनिया में भारत को विश्व-गुरु बनाने का गौरव उनके पूर्वजों का था। मैं किसी वैश्य को गाली नहीं देता क्योंकि इन्होंनें अपनी धन-संपत्ति राष्ट्र-रक्षा में कई बार न्योछावर की है। इसी तरह मैं अपने किसी वनवासी बंधू को अपमानित करने का भी पाप नहीं करता, ये तो तबसे धर्म रक्षक रहें हैं जब भगवान राम इस धरती पर आये थे।

अपने जातिगत पूर्वाग्रहों को छोड़िये वरना प्रकृति सौभाग्य को दुर्भाग्य में बदलने में जरा भी देर नहीं करती।

गंगा-यमुना को जीवित मनुष्य के समान कानूनी अधिकार देने का फैसला

गंगा-यमुना को मनुष्य मानने का वैदिक आधार

यूनाइटेड हिन्दी स्पेशल रिपोर्ट : आज नैनीताल हाईकोर्ट ने गंगा नदी को देश की पहली जीवित इकाई के रूप में मान्यता दी है और गंगा-यमुना को जीवित मनुष्य के समान अधिकार देने का फैसला किया है। इस फैसले के बाद भारत की दोनों महत्वपूर्ण नदियों गंगा और यमुना को अब एक मानव की तरह संविधान की ओर से मुहैया कराए गए सभी अधिकार मिल सकेंगे। कुछ दिनों पहले ही न्यूजीलैंड ने भी अपनी वांगानुई नदी को एक जीवित संस्था के रूप में मान्यता दी थी।
यह बहुत ही सराहनीय कदम है कि दोनों पवित्र नदियों को कोर्ट ने जीवित मानकर मनुष्यों के सभी संवैधानिक अधिकार दे दिए हैं पर न्यूजीलैंड से पहले हम यदि ऐसा करते तो बात ही अलग होती। क्योंकि हम तो गंगा यमुना को माता कहकर मनुष्य और उससे भी ऊपर देवता की कोटि में रखते आए ही हैं, खैर अदालत ने यह फैसला देकर वैदिक संस्कृति का मान बढ़ाया है।

आजकल लोग हम पर जड़ वस्तुओं की पूजा और उन्हें चेतन मानने का आरोप लगाते हैं, इसके निराकरण के लिए वैदिक मान्यता की ओर हम चलते हैं ताकि हमारी इन समृद्ध मान्यताओं का स्त्रोत जान सकें। ध्यानपूर्वक पढ़िए।

वैदिक मान्यता में एक ‘मन’, दूसरा ‘प्राण’, और ‘पंचमहाभूत’ रूप सात तंतुओं से वह बुनकर (परमात्मा) इस सृष्टि रूपी पट को बुन रहा है। वेद ने उस महान कवि की सृष्टिरूप इस कविता को सप्ततंतुमय यज्ञ कहा है।

पंचभूत को वैदिक परिभाषा में ‘वाक्’ कहते हैं क्योंकि इनमें सूक्ष्मतम भूत ‘आकाश’ है, उसका गुण ‘शब्द’ या ‘वाक्’ है। यह सूक्ष्म भूत ‘आकाश’ ही सब अन्य भूतों में अनुस्यूत होता है इसलिए वाक् को ही पंचमहाभूत का सरल प्रतीक मान लिया गया।

शतपथ ब्राह्मण कहता है आत्मा के तीन घटक हैं— ‘अयमात्मा वांमयो मनोमयः प्राणमयः।’ अर्थात आत्मा मन, प्राण और वाक् से बनी है। सप्त तंतु रूप इस मन, प्राण और वाक् को ही त्रिक् कहते हैं। मन सत्व, प्राण रज और वाक् तम रूप है। सृष्टिरचना की वैदिक कल्पना इसी त्रिक पर आश्रित है। मन, प्राण और वाक् इस त्रिक के सम्मिलित सम्बन्ध से ही एक शक्ति या अग्नि उत्पन्न होती है, वही वैश्वानर अग्नि है। त्रिक के मिलन से उत्पन्न वैश्वानरः अग्नि से ही जीवन अभिव्यक्त हो पाता है। यह जब तक है तभी तक जीवन है।

इस त्रिक में से प्राण को हम एनर्जी(Energy) कह सकते हैं, पर Energy की अवधारणा जड़ भूतों से जुड़ी है जबकि वैदिक प्राण की अवधारणा जीवित शरीर से जुड़ी है। वैदिक दृष्टि के अनुसार चेतना ही भूत के रूप में परिणत होती है अर्थात मौलिक तत्व चेतना है और भूत उसका विकार है। इसलिए वैदिक दृष्टि में परमार्थतः सब कुछ चेतन ही है, जड़ कुछ है ही नहीं। चेतना जहाँ ज्यादा आवृत्त हो गई, कि हमारी दृष्टि में नहीं आती वही जड़ है। समस्त सृष्टि मन, प्राण और वाक्(पंचमहाभूत) के त्रिक से ही बनी है, यही मात्राभेद से सभी पदार्थों के घटक हैं। पर जैसे जैसे हमें छिपी हुई चेतना को पहचानने के साधन उपलब्ध हो जाते हैं, वैसे वैसे हम जिसे कल तक जड़ समझते थे उसे चेतन के रूप में जानने लगते हैं।

देखिए सर जगदीशचन्द्र बसु से पहले वनस्पतियों को आधुनिक विज्ञान में जड़ समझा जाता था पर जैसे ही बसु जी को समुचित उपकरण उपलब्ध हो गए, उन्होंने सिद्ध कर दिया कि वनस्पति में प्राण हैं। कम लोग जानते हैं कि जगदीश बोस वैदिक विद्याओं का भी ज्ञान रखते थे। महर्षि मनु की स्पष्ट घोषणा है कि वनस्पतियों में भी चेतना है और वे सुख दुख अनुभव करते हैं — ‘अन्तःसंज्ञा भवन्त्येते सुख दुखःसमन्विता।’

इसी तरह विज्ञान अब तक नदियों, पर्वतों आदि को जड़ माने हुए है पर वेद नदियों से कहता है कि, — ‘इमं मे गंगे यमुने सरस्वति’ ‘हे गंगा, यमुना और सरस्वती नदियों! मेरी प्रार्थना सुनो’ (ऋग्वेद 10.75.5)। यह इसीलिए क्योंकि सभी पदार्थों में आत्मा है और आत्मा है तो प्राण भी है, मन भी है और वाक् भी है, मन है तो सोचने की क्षमता भी है, इसलिए उन्हें सम्बोधित करना कि वे प्रार्थना सुनें बिल्कुल ठीक है। इसके अतिरिक्त जीवन की अभिव्यक्ति वैश्वानर अग्नि से ही होती है, वेद स्पष्ट रूप से जल में वैश्वानर अग्नि की बात कहता है, — ‘वैश्वानरो यास्वगनिः प्रविष्टः’ (ऋग्- 7.49.5) अर्थात जल में वैश्वानर अग्नि विद्यमान है।

वेद में जड़ पदार्थों से चेतन व्यवहार के अनेक प्रमाण मिलते हैं। पर जड़ और चेतन के बीच मौलिक एकता को हृदयंगम कर लेने के बाद कोई कठिनाई नहीं रहती। प्रकृति और मनुष्य के बीच सनातन धर्मियों ने कभी भेद नहीं माना, क्योंकि दोनों ही सजीव हैं, अतः प्रकृति और जीवों को अलग अलग करके नहीं देखा जा सकता। इसलिए सनातन संस्कृति सदैव गौ, भूमि, नदी, तुलसी को माता मानती आई है, हम हिन्दू चन्द्रमा को मामा कहते आए हैं, पहाड़ों को हमने पूजा है, प्रकृति के हर अंग को हमने वस्तु नहीं माना पर अपना आत्मीय सम्बन्धी माना है। इससे यह सिद्ध हो गया कि हम जड़ प्रकृति को नहीं पूजते, हमारी मूर्तिपूजा की परम्परा भी चेतन तत्व की ही उपासना है। जैसे जैसे सनातन संस्कृति और वैदिक मणि मंजूषा की आभा हमारे सामने प्रकट होती है, हमारी बुद्धि चमत्कृत, और जीवन धन्य धन्य हो जाता है। इससे पहले श्राद्ध के पीछे का वैदिक विज्ञान पर एक पोस्ट किया था, वैदिक विज्ञान पर यह दूसरा पोस्ट है।

'मैं भी शहीद का बेटा पर गुरमेहर से बिल्कुल सहमत नहीं' : मनीष कुमा

नई दिल्ली ( यूनाइटेड हिन्दी डॉट कॉम ) :- दिल्ली के रामजस कॉलेज में लेफ़्ट और राइट विचारधारा वाले स्टूडेंट गुटों के बीच झड़प के बाद दिल्ली के लेडी श्रीराम कॉलेज में पढ़ने वाली गुरमेहर कौर की पोस्ट वायरल हो गई। इसके बाद हंगामा मचा गुरमेहर की उस तस्वीर पर जिसमें वो एक प्लेकार्ड लिए खड़ी हैं। इस पर अंग्रेज़ी में लिखा है, ”पाकिस्तान ने मेरे पिता को नहीं मारा, बल्कि जंग ने मारा है।”

गुरमेहर के पिता कारगिल युद्ध के दौरान शहीद हुए थे। गुरमेहर कौर की इस पोस्ट का जवाब मल्टीनेशनल कंपनी में काम करने वाले मनीष शर्मा ने दिया है। ये पूरी चिट्ठी नीचे पढ़िए।

हाय गुरमेहर कौर,

पिछले कुछ दिनों में वायरल हुए आपके वीडियो और कुछ इंटरव्यू जिनमें आपने अभिव्यक्ति की आज़ादी की बात की और कहा है, ‘पाकिस्तान ने आपके डैड की हत्या नहीं की, युद्ध ने उन्हें मार डाला।’ इस पोस्ट के चलते आपका नाम हर घर तक पहुंच गया है।

मैं सार्वजनिक तौर पर भावनाओं की अभिव्यक्ति से बचता हूं, लेकिन इस बार लगता है कि बहुत हो गया। मुझे नहीं मालूम कि आप ये जानबूझ कर रही हैं या अनजाने में, लेकिन आपकी वजह से डिफेंस से जुड़े परिवारों की भावनाएं आहत हो रही हैं।

पहले मैं अपना परिचय दे दूं, मैं एक मल्टीनेशनल कंपनी में आईटी पेशेवर के तौर पर काम करता हूं। मेरे पिता भारतीय सेना में अधिकारी थे जो श्रीनगर में ऑपरेशन रक्षक के दौरान चरमपंथियों से संघर्ष करते हुए मारे गए थे।

मैं नहीं जानता कि मैं इसके लिए किसे दोष दूं – युद्ध को, पाकिस्तान को, राजनेताओं को और किसे दोष नहीं दूं क्योंकि मेरे पिता वहां संघर्ष कर रहे थे जो विदेशी ज़मीन ही थी क्योंकि वहां के स्थानीय लोग कहते हैं- इंडिया गो बैक

मेरे पिता ने अपनी जान दी उन्हीं लोगों के लिए, हमारे लिए और हमारे देश के लिए। बहरहाल, हम दोनों नैतिकता के एक ही धरातल पर मौजूद हैं- आपके पिता ने भी जान दी और मेरे पिता ने भी जान गंवाई है।

अब क़दम दर क़दम आगे बढ़ते हैं। आपने कहा कि पाकिस्तान ने आपके पिता को नहीं मारा, ये युद्ध था जिसने आपके पिता को मारा।

मेरा सीधा सवाल आपसे है? आपके पिता किससे संघर्ष कर रहे थे? क्या ये उनका निजी युद्ध था या फिर हम एक देश के ख़िलाफ़ लड़ रहे थे?

ज़ाहिर है ये पाकिस्तान और उसकी हरकतें ही थीं, जिसके चलते आपके पिता और उनके जैसे कई सेना अधिकारियों को कश्मीर में तनावपूर्ण माहौल में अपनी जान गंवानी पड़ी।

अपने पिता की मौत की वजह युद्ध बताना तर्कसंगत लगता है, लेकिन ज़रा सोचिए उनकी मौत की कई वजहें थीं-

1. पाकिस्तान और उसका विश्वासघाती कृत्य

2. भारत के राजनीतिक नेतृत्व में राजनीतिक इच्छाशक्ति का अभाव

3. हमारे नेतृत्व की एक के बाद एक ग़लतियां

4. धार्मिक कट्टरता

5. भारत में मौजूद स्लीपर सेल जो भारत में रहकर पाकिस्तानी आईएसआई की मदद करते हैं.

और इन सबके अलावा, उनकी मौत की वजह- अपनी ड्यूटी के प्रति उनका पैशन और उनकी प्रतिबद्धता थी। ये वजह थी।

मैं इसे एक्सप्लेन करता हूं……

आपके पिता ने अपनी जान तब गंवाई जब उनकी उम्र काफ़ी कम थी, आप महज दो साल की थीं। ये देश के प्रति उनका पैशन था, राष्ट्रीय झंडे और अपने रेजिमेंट के प्रति सम्मान का भाव जिसने उन्हें शहीद होने का साहस दिया।

नहीं तो हम लोग देख रहे हैं कि आपके पिता से ज़्यादा उम्र के लोग अभी भी जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी में पढ़ रहे हैं और देश के ख़िलाफ़ काम कर रहे हैं- किसी क़ुर्बानी की इनसे उम्मीद के बारे में तो भूल ही जाइए।

क्या आपको मालूम है कि आपके पिता ने जिस कश्मीर के लिए अपनी जान दी, उसी कश्मीर की आज़ादी के लिए ये जेएनयू में नारे लगाते हैं।

वे किस आज़ादी की बात करते हैं, वे कश्मीर को पाकिस्तान का हिस्सा बता रहे हैं, ये उनके लिए आज़ादी है और इसके ख़िलाफ़ हम दोनों के पिता ने संघर्ष किया था।

आप जागरूक नागरिक होने के बाद भी इनकी वकालत कर रही हैं। ये वो लोग हैं जो अपने कभी ना ख़त्म होने वाले प्रोपगैंडे के लिए आपको प्यादे की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं।

मैंने आपका आज सुबह इंटरव्यू सुना जिसमें आप कह रही हैं कि आप किसी राजनीतिक पार्टी के ख़िलाफ़ नहीं हैं, आप केवल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बात कर रही हैं।

मेरा आपसे सीधा सवाल है – आपके लिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता क्या है? क्या आपके लिए यह भारत के टुकड़े हों, जैसे नारे लगाना है ?

क्या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मतलब आपके लिए लोगों- मेरे और आपके अपने पिता और उनकी तरह सीमा पर दिन रात गश्त लगा रहे जवानों के अपमान करने का अधिकार मिल जाना है?

मिस कौर, यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं है. अगर आपके पिता आज जीवित होते तो वे आपको बेहतर बता पाते।

मेरा आपसे विनम्र अनुरोध है- आप अपने पिता से कुछ सीखिए. कम से कम अपने देश का सम्मान करना सीखिए क्योंकि देश हमेशा पहले आता है।

मुझे उम्मीद है कि मैं अपनी बात स्पष्टता से रख पाया हूं।

जय हिंद !!

केंद्रीय सचिव ने अन्य वरिष्ठ अधिकारी के साथ मिलकर गांव वालों को दी ‘ऐसी सीख’ जिसके बाद दुनिया कर रही है सलाम…

पीएम मोदी के स्वच्छ भारत अभियान के चलते तेलंगाना के नौकरशाहों ने दुनिया के आगे पेश की अनोखी मिसाल

सभी को याद होगा कि बीते साल 2014 को नई दिल्ली में राजपथ पर स्वच्छ भारत अभियान का शुभारंभ करते हुए पीएम नरेन्द्र मोदी ने कहा, “2019 में महात्मा गांधी की 150वीं जयंती के अवसर पर भारत उन्हें स्वच्छ भारत के रूप में सर्वश्रेष्ठ श्रद्धांजलि दे सकता हैl” 2 अक्टूबर 2014 को देश भर में एक राष्ट्रीय आंदोलन के रूप में स्वच्छ भारत मिशन की शुरुआत स्वयं पीएम मोदी ने की थीl

पीएम मोदी ने अपने कार्यकाल में VIP कल्चर को खत्म करने पर भी खासा जोर दिया हैl जहा आज जब कोई अफसर घर से निकलता है तो अपने साथ पूरा गाडियों का काफिला लेकर चलता है जिसे दूर से ही देख कर कोई भी अंदाज़ा लगा ले की कोई बड़ा अफसर आ रहा हैl

नौकरशाही के ज़माने  में आज जहां बड़े अफसर एक नहीं 2-2 सरकारी गाडियों का प्रयोग करना अपनी शान समझते हैं वहीं VIP कल्चर त्याग कर बिल्कुल आम युवा की तरह बीते महीने फ़रवरी में 23 राज्यों के करीब एक दर्जन वरिष्ठ नौकरशाहों ने ऐसा ही करके दिखाया हैl इनमें केंद्रीय स्वच्छता सचिव परमेश्वरन अय्यर भी शामिल हैंl

सफाई की बात करना और लोगों को इसके महत्व की सीख देना एक बात है, लेकिन इसे खुद करके मिसाल कायम करना बिल्कुल अलग ही बात हैl आपको बता दें कि केंद्रीय स्वच्छता सचिव परमेश्वरन अय्यर के साथ इन सभी अधिकारियों ने बीते दिनों चार घंटे लंबी बस यात्रा की और हैदराबाद से तेलंगाना स्थित वारंगल पहुंचेl तेलंगाना पहुँच कुछ अन्य अधिकारियों के साथ मिलकर इन सभी नौकरशाहों ने गंगादेवीपल्ली गांव में पहुँच पीएम मोदी के स्वच्छ भारत अभियान और नौकरशाही का त्याग कर ईमानदारी की ऐसी मिसाल पेश की है जिसे सुन खुद पीएम मोदी दंग रह गयेl

आगे पढ़ें पीएम मोदी की अपील के चलते केंद्रीय सचिव को घुसना पड़ा शौचालयों के गड्ढों में और फिर…

खुल गया अमिताभ बच्चन से जुड़ा वो राज़ जो उन्होंने आजतक सबसे छुपाया, आपको भी हैरान कर देगा ये सच!

ये बात तो आप जानते ही है कि अमिताभ बच्चन के दुनिया भर में अनेकों चाहने वाले है| जिस समय अमिताभ बच्चन ने फ़िल्मी दुनिया में कदम रखा था उसी समय से उन्होंने लाखों लोगो को अपना दीवाना बना लिया था| आज भी अमिताभ के फैन्स उनके बारे में नई-नई बातें जानने के इच्छुक रहते है, लेकिन जो बात आज हम आपको बताने जा रहे हैं वो यक़ीनन आपको नहीं पता होगी और उसे सुनकर आपको भी गहरा झटका लग सकता है|

आपको याद होगा कि साल 2005 के नवंबर महीने में अमिताभ बच्चन अपने स्वर्गीय पिता हरिवंशराय बच्चन की जयंती के अवसर पर अपने परिवार के साथ उतर-प्रदेश गए हुए थे, वहां उन्होंने एक समाहरोह में हिस्सा लिया लेकिन इसी बीच उन्हें पेट-दर्द शुरू हो गया और फिर उन्हें अस्पताल में भर्ती करवाना पड़ा था| उस ऑपरेशन में अमिताभ बच्चन की बड़ी आंत की अंतड़ियां सड़ चुकी थी| सड़ी अंतड़ियों को काट कर उन्हे जीवनदान दिया गया था|

लेकिन यहाँ हैरानी वाली बात ये थी कि इस तरह से अंतड़िया या तो शराब पीने वालों की, या नशा करने वालों की, या तो फिर सूअर का मांस खाने वालों की सड़ती हैं, जिसका मतलब साफ़ था कि…

अगली स्लाइड में जानिए सदी के महानायक अमिताभ बच्चन का वो काला सच जिससे आप आजतक बेखबर रहे हैं…

जानिये क्या खास हैं इस इंसान में, जो प्रधानमंत्री भी सब काम छोड़ कर कोंयमबटृर पहुंच गये !

यूनाइटेड हिन्दी विशेष : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने उत्तर प्रदेश जैसे महत्वपूर्ण चुनावी कार्यक्रम में से समय निकाल 112 फिट ऊंची शिव प्रतिमा का अनावरण करने कोंयमबटृर गए तो जरूर कोई बात रही होगी। दरअसल, जिस शख्स के सौजन्य से ये सब हो रहा था उसका नाम हैं जग्गी सद्गुरु वासुदेव। ये शख्स देखने और बोलने में जितना साधरण नजर आता है उससे कहीं अधिक असाधरण उनका व्यक्तित्व है।

आप इसी से उनकी प्रतिभा का अंदाजा लगा लीजिए कि जग्गी सद्गुरु वासुदेव को संयुक्त राष्ट्र के आर्थिक और सामाजिक परिषद में विशेष सलाहकार की पदवी प्राप्त है। उनका संस्थान ईशा फाउंडेशन भारत सहित संयुक्त राज्य अमेरिका, इंग्लैंड, लेबनान, सिंगापुर और ऑस्ट्रेलिया में योग कार्यक्रम सिखाता है।

यही नहीं जब देश में गौमांस को लेकर बहस हुई तो जग्गी सद्गुरु वासुदेव ही वह अकेले शख्स थे जिन्होंने वैज्ञानिक और आध्यात्मिक तरीके से गौमांस खाने का न केवल खंडन किया बल्कि वैज्ञानिक तर्क देकर इससे होने वाले नुकसान भी बताए। उनके तर्कों के बाद कई दिग्गज जो गौ मांस खाने को लेकर अपने तर्क दे रहे थे बैकफुट पर आ गए थे। उनमें चर्चित पत्रकार बरखा दत्त भी शामिल है।

आपको बता दें कि जग्गी सद्गुरु वासुदेव का आईटी और मेडिकल आदि क्षेत्रों में काम करने वाले लोगों पर बहुत प्रभाव है। यह न केवल भारत में बल्कि दुनिया भर में लोग उनके योग और उनकी आध्यात्मिक बातों के दीवाने हैं। जग्गी सद्गुरु वासुदेव की शख्सियत का अंदाजा इस बात से ही लगाया जा सकता है कि पूरे तमिलनाडु को हरा भरा करने का बीड़ा उठाया हुआ है। यहां वे लगभग 16 करोड़ पेड़ लगाने की परियोजना चला रहे हैं। उनके संगठन ने 17 अक्टूबर 2006 को तमिलनाडु के 27 जिलों में एक साथ 8.52 लाख पौधे रोपकर गिनीज विश्व रिकॉर्ड बनाया था।

अगले पेज पर पढ़े सद्गुरु के बारे में क्या योगदान हैं उनका भारतीय संस्कृति में ?

जानिये क्या खास हैं इस इंसान में, जो प्रधानमंत्री भी सब काम छोड़ कर कोंयमबटृर पहुंच गये !

यूनाइटेड हिन्दी विशेष : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने उत्तर प्रदेश जैसे महत्वपूर्ण चुनावी कार्यक्रम में से समय निकाल 112 फिट ऊंची शिव प्रतिमा का अनावरण करने कोंयमबटृर गए तो जरूर कोई बात रही होगी। दरअसल, जिस शख्स के सौजन्य से ये सब हो रहा था उसका नाम हैं जग्गी सद्गुरु वासुदेव। ये शख्स देखने और बोलने में जितना साधरण नजर आता है उससे कहीं अधिक असाधरण उनका व्यक्तित्व है।

आप इसी से उनकी प्रतिभा का अंदाजा लगा लीजिए कि जग्गी सद्गुरु वासुदेव को संयुक्त राष्ट्र के आर्थिक और सामाजिक परिषद में विशेष सलाहकार की पदवी प्राप्त है। उनका संस्थान ईशा फाउंडेशन भारत सहित संयुक्त राज्य अमेरिका, इंग्लैंड, लेबनान, सिंगापुर और ऑस्ट्रेलिया में योग कार्यक्रम सिखाता है।

 

यही नहीं जब देश में गौमांस को लेकर बहस हुई तो जग्गी सद्गुरु वासुदेव ही वह अकेले शख्स थे जिन्होंने वैज्ञानिक और आध्यात्मिक तरीके से गौमांस खाने का न केवल खंडन किया बल्कि वैज्ञानिक तर्क देकर इससे होने वाले नुकसान भी बताए। उनके तर्कों के बाद कई दिग्गज जो गौ मांस खाने को लेकर अपने तर्क दे रहे थे बैकफुट पर आ गए थे। उनमें चर्चित पत्रकार बरखा दत्त भी शामिल है।

आपको बता दें कि जग्गी सद्गुरु वासुदेव का आईटी और मेडिकल आदि क्षेत्रों में काम करने वाले लोगों पर बहुत प्रभाव है। यह न केवल भारत में बल्कि दुनिया भर में लोग उनके योग और उनकी आध्यात्मिक बातों के दीवाने हैं। जग्गी सद्गुरु वासुदेव की शख्सियत का अंदाजा इस बात से ही लगाया जा सकता है कि पूरे तमिलनाडु को हरा भरा करने का बीड़ा उठाया हुआ है। यहां वे लगभग 16 करोड़ पेड़ लगाने की परियोजना चला रहे हैं। उनके संगठन ने 17 अक्टूबर 2006 को तमिलनाडु के 27 जिलों में एक साथ 8.52 लाख पौधे रोपकर गिनीज विश्व रिकॉर्ड बनाया था।

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