अगर मां जीजाबाई जैसी महान हो तो देश को शिवाजी जैसा ही पुत्र मिलेगा….

जीजाबाई जैसी महान मां हो तो देश को शिवाजी जैसा ही पुत्र मिलेगा
जीजाबाई जैसी महान मां हो तो देश को शिवाजी जैसा ही पुत्र मिलेगा

माँ जीजाबाई के प्रति उनकी श्रद्धा ओर आज्ञाकारिता उन्हे एक आदर्श सुपुत्र सिद्ध करती है। शिवाजी का व्यक्तित्व इतना आकर्षक था कि उनसे मिलने वाला हर व्यक्ति उनसे प्रभावित हो जाता था।

ब्लॉग: ( प्रीति झा ) – हिन्दू-राष्ट्र के गौरव क्षत्रपति शिवाजी की माता जीजाबाई का जन्म सन् 1597 ई. में सिन्दखेड़ के अधिपति जाघवराव के यहां हुआ। जीजाबाई बाल्यकाल से ही हिन्दुत्व प्रेमी, धार्मिक तथा साहसी स्वभाव की थीं। सहिष्णुता का गुण तो उनमें कूट-कूटकर भरा हुआ था। इनका विवाह मालोजी के पुत्र शाहजी से हुआ। प्रारंभ में इन दोनों परिवारों में मित्रता थी, किंतु बाद में यह मित्रता कटुता में बदल गई; क्योंकि जीजाबाई के पिता मुगलों के पक्षधर थे।

एक बार जाधवराव मुगलों की ओर से लड़ते हुए शाहजी का पीछा कर रहे थे। उस समय जीजाबाई गर्भवती थी। शाहजी अपने एक मित्र की सहायता से जीजाबाई को शिवनेर के किले में सुरक्षित कर आगे बढ़ गये। जब जाधवराव शाहजी का पीछा करते हुए शिवनेर पहुंचे तो उन्हें देख जीजाबाई ने पिता से कहा- ‘मैं आपकी दुश्मन हूं, क्योंकि मेरा पति आपका शत्रु है। दामाद के बदले कन्या ही हाथ लगी है, जो कुछ करना चाहो, कर लो।’

इस पर पिता ने उसे अपने साथ मायके चलने को कहा, किंतु जीजाबाई का उत्तर था- ‘आर्य नारी का धर्म पति के आदेश का पालन करना है।’

10 अप्रैल सन् 1627 को इसी शिवनेर दुर्ग में जीजाबाई ने शिवाजी को जन्म दिया। पति की उपेक्षा के कारण जीजाबाई ने अनेक असहनीय कष्टों को सहते हुए बालक शिवा का लालन-पालन किया। उसके लिए क्षत्रिय वेशानुरूप शास्त्रीय-शिक्षा के साथ शस्त्र-शिक्षा की व्यवस्था की। उन्होंने शिवाजी की शिक्षा के लिए दादाजी कोंडदेव जैसे व्यक्ति को नियुक्त किया। स्वयं भी रामायण, महाभारत तथा वीर बहादुरों की गौरव गाथाएं सुनाकर शिवाजी के मन में हिन्दू-भावना के साथ वीर-भावना की प्रतिष्ठा की। वह प्राय: कहा करती- ‘यदि तुम संसार में आदर्श हिन्दू बनकर रहना चाहते हो स्वराज की स्थापना करो। देश से यवनों और विधर्मियों को निकालकर हिन्दू-धर्म की रक्षा करो।’

भारतीय स्कूलों के पाठ्यक्रम में पढ़ाया जाना चाहिए रामायण-महाभारत : शशि थरूर

लखनऊ : कांग्रेस के सांसद शशि थरूर का कहना है कि महाभारत और रामायण जैसे महाकाव्यों को धार्मिक किताब की तरह नहीं, बल्कि साहित्य की तरह स्कूलों के पाठ्यक्रम में पढ़ाया जाना चाहिए। शशि थरूर यह भी मानते हैं कि इन महाकाव्यों की सूझबूझ से सांप्रदायिक बंटवारे को खत्म किया जा सकता है।

लखनऊ के श्री रामस्वरूप मेमोरियल यूनिवर्सिटी में कल शनिवार को आयोजित साहित्यिक सम्मेलन के दौरान अपनी ताजातरीन किताब ‘एन एरा ऑफ डार्कनेस’ पर आयोजित संवाद के दौरान शशि थरूर ने ये बातें कहीं।

यह पूछे जाने पर कि स्कूली बच्चों को ब्रिटिश राज की विरासत के ‘प्रतीक’ शेक्सपियर की किताबें पढ़ाना कितना सही फैसला है ?

शशि थरूर ने कहा, ‘शेक्सपियर को स्कूलों के पाठ्यक्रम में पढ़ाया जाना चाहिए, लेकिन साथ में संस्कृत के कवियों और कालिदास जैसे लेखकों की रचनाओं को भी बराबर महत्व दिया जाना चाहिए।

दुनिया के किसी भी अन्य महान लेखक की तुलना में कालिदास किसी भी दृष्टि से कमतर नहीं थे।’ उन्होंने कहा कि कालिदास को स्कूली पाठ्यक्रम से बाहर रखकर हम नई पीढ़ी को उनकी संस्कृति और मौलिक पहचान के बड़े हिस्से से दूर रख रहे हैं।

ब्लॉग: अलग-अलग हैं पाकिस्‍तान के 'दमादम मस्त कलंदर' व झूलेलाल ?

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ब्लॉग: ( तेजवानी गिरधर ) : ( अजमेर निवासी लेखक तेजवानी गिरधर दैनिक भास्कर में सिटी चीफ सहित अनेक समाचार पत्रों में संपादकीय प्रभारी व संपादक रहे है। राजस्थान श्रमजीवी पत्रकार संघ के प्रदेश सचिव व जर्नलिस्ट एसोसिएशन ऑफ राजस्थान के  अजमेर जिला अध्यक्ष रह चुके है। हाल ही अजमेर के इतिहास पर उनका एक ग्रंथ प्रकाशित हो चुका है। वर्तमान में अपना स्थानीय न्यूज़ वैब पोर्टल संचालित करने के अतिरिक्त नियमित ब्लॉग लेखन भी कर रहे है । )

पाकिस्तान में सिंध प्रांत के सहवान कस्बे में स्थित लाल शाहबाज कलंदर की दरगाह के भीतर कल हुए आतंकी हमले में 100 से अधिक जानें चली गईं। 150 से भी अधिक लोग घायल हो गए। ये वास्‍तव में दुनिया भर में मशहूर “दमादम मस्‍त कलंदर” वाले सूफी बाबा यानी लाल शाहबाज कलंदर की दरगाह है। माना जाता है कि महान सूफी कवि अमीर खुसरो ने शाहबाज कलंदर के सम्‍मान में ‘दमादम मस्‍त कलंदर’ का गीत लिखा। बाद में सिंध के हिन्दू सिंधी समाज को इस्लाम में कन्वर्ट करने के षड्यंत्र के तहत बाबा बुल्‍ले शाह ने इस गीत में कुछ बदलाव किए और इनको ‘झूलेलाल कलंदर’ कहा। सदियों से ये गीत लोगों के जेहन में रचे-बसे हैं। इसी से इस दरगाह की लोकप्रियता का सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है।

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सूफी दार्शनिक और फकीर लाल शाहबाज कलंदर का असली नाम सैयद मुहम्‍मद उस्‍मान मरवंदी (1177-1275) था। कहा जाता है कि वह लाल वस्‍त्र धारण करते थे, इसलिए उनके नाम के साथ लाल जोड़ दिया गया। बाबा कलंदर के पुरखे बगदाद से ताल्‍लुक रखते थे लेकिन बाद में ईरान के मशद में जाकर बस गए। हालांकि बाद में वे फिर मरवंद चले गए। बाबा कलंदर गजवनी और गौरी वंशों के समकालीन थे। वह फारस के महान कवि रूमी के समकालीन थे और मुस्लिम जगत में खासा भ्रमण करने के बाद सहवान में बस गए थे। यहीं पर उनका इंतकाल हुआ।

जिस गीत दमा दम मस्त कलंदर को गा और सुन कर सिंधी ही नहीं, अन्य समुदाय के लोग भी झूम उठते है, उस पर यह सवाल आज भी मौजूं है उसका सिंधी समुदाय से कोई ताल्लुक है भी या नहीं? पाकिस्तान की मशहूर गायिका रेश्मा व बांग्लादेश की रूना लैला की जुबान से थिरक कर लोकप्रिय हुआ यह गीत किसकी महिमा या स्मृति में बना हुआ है, इसको लेकर विवाद है।

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यह सच है कि आम तौर सिंधी समुदाय के लोग अपने विभिन्न धार्मिक व सामाजिक समारोहों में इसे अपने इष्ट देश झूलेलाल की प्रार्थना के रूप में गाते हैं, लेकिन भारतीय सिंधू सभा ने खोज-खबर कर दावा किया है कि यह गीत असल में हजरत कलंदर लाल शाहबाज की तारीफ में बना हुआ है, जिसका झूलेलाल से कोई ताल्लुक नहीं है। सभा ने एक पर्चा छाप कर भी इसका खुलासा किया है।

पर्चे में लिखा है कि यह गीत सिंधी समुदाय के लोग चेटीचंड व अन्य उत्सवों पर गाते हैं। आम धारणा है कि यह अमरलाल, उडेरालाल या झूलेलाल अवतार की प्रशंसा या प्रार्थना के लिए बना है। उल्लेखनीय बात है कि पूरे गीत में झूलेलाल से संदर्भित प्रसंगों का कोई जिक्र नहीं है, जैसा कि आम तौर पर किसी भी देवी-देवता की स्तुतियों, चालीसाओं व प्रार्थनाओं में हुआ करता है। सिर्फ झूलेलालण शब्द ही भ्रम पैदा करता है कि यह झूलेलाल पर बना हुआ है। असल में यह तराना पाकिस्तान स्थित सेहवण कस्बे के हजरत कलंदर लाल शाहबाज की करामात बताने के लिए बना है।

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पर्चे में बताया गया है कि काफी कोशिशों के बाद भी कलंदर शाहबाज की जीवनी के बारे में कोई लिखित साहित्य नहीं मिलता। पाकिस्तान में छपी कुछ किताबों में कुछ जानकारियां मिली हैं। उनके अनुसार कलंदर लाल शाहबाज का असली नाम सैयद उस्मान मरुदी था। उनका निवास स्थान अफगानिस्तान के मरुद में था। उनका जन्म 573 हिजरी यानि 1175 ईस्वी में हुआ। उनका बचपन मरुद में ही बीता। युवा अवस्था में वे हिंदुस्तान चले आए। सबसे पहले उन्होंने मंसूर की खिदमत की। उसके बाद बहाउवलदीन जकरिया मुल्तानी के पास गए। इसके बाद हिजरी 644 यानि 1246 ईस्वी में सेवहण पहुंचे। हिजरी 650 यानि 1252 ईस्वी में उनका इंतकाल हो गया। इस हिसाब से वे कुल छह साल तक सिंध में रहे।

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छत्रपति शिवाजी के ये ऐसे रहस्यमयी किले हैं जहां परिंदा भी पर नही मार सकता

शिवाजी के ये ऐसे रहस्यमयी किले हैं जहां परिंदा भी पर नही मार सकता
इस किले के कई गुफाये है जो अब बंद पड़ी हुयी है | कहा जाता है कि इन गुफाओ के अंदर ही शिवाजी ने गुरिल्ला युद्ध का अभ्यास लिया था |

मराठा साम्राज्य की पताका फहराने वाले छत्रपति शिवाजी महाराज का जन्म 19 फरवरी को हुआ था | मुगल सम्राट औरंगजेब को अपनी बहादुरी से झुका देने वाले शिवाजी का नाम देश के योद्धाओ में शुमार है | आज हम आपको उनके रहसमयी किलो के बारे में जानकारी देंगे , जो उन्होंने मुश्किल हालात में अपनी सत्ता को सुरक्षित रखने के लिए बनाये थे |

शिवनेरी किला : छत्रपति शिवाजी जा जन्म इसी किले में हुआ था | शिवनेरी किला , महाराष्ट्र के पुणे के पास जुन्नर गाँव में है | इस किले के भीतर माता शिवाई का मन्दिर है जिनके नाम पर शिवाजी का नाम रखा गया था | इस किले में मीठे पानी के दो स्त्रोत है जिन्हें लोग गंगा -जमुना कहते है | लोगो का कहना है कि इनसे साल भर पानी निकलता है | किले के चारो ओर गहरी खाई है जिससे शिवनेरी किले की सुरक्षा होती थी | इस किले के कई गुफाये है जो अब बंद पड़ी हुयी है | कहा जाता है कि इन गुफाओ के अंदर ही शिवाजी ने गुरिल्ला युद्ध का अभ्यास लिया था |

 

पुरदर का किला : पुरंदर का किला पुणे से 50 किमी की दूरी पर सासवाद गाँव में है | इसी किले में दुसरे छत्रपति साम्बाजी राज भौसले का जन्म हुआ था | साम्बाजी छत्रपति शिवाजी के बेटे थे | शिवाजी ने पहली जीत इसी किले पर कब्जा करके की थी | मुगल सम्राट औरंगजेब ने 1665 में इस किले पर कब्जा कर लिया था जिसे महज पांच सालो बाद शिवाजी ने छुड़ा लिया था और पुरन्दर के किले पर मराठा झंडा लहरा दिया था | इस किले में एक सुरंग है जिसका रास्ता किले के बाहर की ओर जाता है | इस सुरंग का इस्तेमाल युद्ध के समय शिवाजी बाहर जाने के लिए किया करते थे |

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ब्लॉग : ( पुष्कर अवस्थी ) छले कई सालो से जब भी 14 फरवरी आती है तो इस दिनों को भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी दिए जाने का दिन होंने के कारण उसे ‘वेलेंटाइन डे’ की जगह ‘शहीद दिवस’ के रूप में मनाये जाने का अवाहन होता है।

भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु भारत मां के महान सपूत थे, जो स्वतंत्रता संग्राम के दौरान हंसते-हंसते सूली पर चढ़ गये। आपको क्या लगता है इन महान शहीदों का नाता वैलेंटाइन डे से हो सकता है? नहीं, लेकिन सोशल मीडिया पर कुछ लोग वैलेंटाइन डे का विरोध इन शहीदों का नाम लेकर कर रहे हैं। ये वो लोग हैं, जो अपनी बात को सिद्ध करने के लिये इतिहास तक बदलने के लिये तैयार हैं।

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हमें ‘वेलेंटाइन डे’ न मनाया जाया इस का अवाहन तो समझ में आता है लेकिन इसको ‘शहीद दिवस’ के रूप में मनाना बिलकुल भी समझ में नही आता है क्योंकि भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी 14 फरवरी को न हो कर 23 मार्च को दी गयी थी। हकीकत यह है की उनकी फांसी 24 मार्च को होनी थी लेकिन उनको 11 घण्टे पहले ही 23 मार्च को फांसी पर चढ़ दिया गया था।

तो फिर यह 14 फरवरी कहा से आ गया ?

दरअसल जब प्रिवी कौंसिल ने भगत सिंह, राजगुरु और सहदेव की फांसी की सजा माफ़ करने के लिए की गयी अपील को ठुकरा दिया था तब कांग्रेस के अध्यक्ष पंडित मदनमोहन मालवीय ने 14 फरवरी को वायसराय लार्ड इरविन से इस फांसी को रोकने की अपील की थी।

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इस अपील पर जब वायसराय ने ध्यान नही दिया था तब लोगो ने गाँधी जी से अपनी वायसराय से होने वाली वार्ता में, इस मुद्दे पर बात करने को कहा था जिसके बारे में वायसराय लार्ड इरविन ने 19 मार्च 1931 को अपनी डायरी में लिखा था की, “जब वार्ता कर के गाँधी जी जाने लगे तब उन्होंने मुझ से भगत सिंह के केस के बारे में बात की थी क्योंकि अखबारों में यह खबर आचुकी थी की 24 मार्च को इन लोगो को फांसी दी जायगी। उन्होंने कहा कि 24 मार्च को फांसी दिया जाना बड़ा दुर्भाग्यपूर्ण होगा क्योंकि उसी दिन, कांग्रेस के नए अध्यक्ष को करांची पहुंचना है और वहां भारी वातावरण में गरमा गर्म बहसें होंगी। मैंने उनसे कहा की मैंने भगत सिंह और उनके साथियों की फांसी की सज़ा पर की गयी अपील पर काफी विचार किया है लेकिन मुझे कोई भी कारण ऐसा नही मिला है जिसके आधार पर मैं अपने को यह समझा सकूँ की फांसी की सजा को माफ़ कर दिया जाना चाहिए।”

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फरवरी को भगत सिंह को फाँसी की सजा सुनाई गयी थी, यह भी अफवाह है : भगत सिंह व वुटकेश्वर दत्त ने 8 अप्रैल 1929 को असेम्बली मे बम फेका था, 7 अक्टुबर 1930 को न्यायलय द्धारा भगत सिंह राजगुरू और सुखदेव को मौत की सजा सुनाई गयी और 23 मार्च 1931 को तीनो लोगो को फाँसी दिया गया।

अतः सनम्र निवेदन है की शहीद दिवस को 23 मार्च के लिए ही रखिये और भ्रामक अवाहन से बचिये।

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जोगेंद्र नाथ मंडल भारत के पहले बड़े गद्दार नेता, देश की दुर्गति के सूत्रधार स्वतंत्रता सेनानी

ब्लॉग : ( आनंद कुमार ) – बांग्ला में योगेन्द्र को अक्सर जोगेंद्र कहा जाता है। बंगाल के दलित नेता थे जोगेंद्र नाथ मंडल। आपने उनका नाम नहीं सुना होगा! आम तौर पर दल हित चिन्तक उनका नाम लेने से कतराते नजर आयेंगे। आजकल जो जय भीम के साथ जय मीम जोड़ने की कवायद चल रही है ये नाम उसकी नींव ही खोद डालता है। इसलिए इनके बारे में जानने के लिए आपको खुद ही पढ़ना पड़ेगा।

उनका जन्म ब्रिटिश बंगाल में 29 जनवरी 1904 को हुआ था। पकिस्तान के जन्मदाताओं में से वो एक थे। सन 1940 में कलकत्ता म्युनिसिपल कारपोरेशन में चुने जाने के बाद से ही मुस्लिम समुदाय की उन्होंने खूब मदद की। उन्होंने बंगाल की ए.के. फज़लुल हक़ और ख्वाजा नज़ीमुद्दीन (1943-45) की सरकारों की खूब मदद की और 1946-47 के दौरान मुस्लिम लीग में भी उनका योगदान खूब था। इस वजह से जब कायदे आज़म जिन्ना को अंतरिम सरकार के लिए पांच मंत्रियों का नाम देना था तो एक नाम उनका भी रहा।

जोगेंद्र नाथ मंडल पाकिस्तान के पहले कानून मंत्री थे। जोगेंद्र नाथ मंडल के इस पद को स्वीकारने से कांग्रेस के उस निर्णय की बराबरी हो जाती थी जिसमें कांग्रेस ने अपनी तरफ से मौलाना अबुल कलाम आजाद को मनोनीत किया था।

आप सोचेंगे कि जोगेंद्र नाथ मंडल ने ऐसा क्या किया था कि जिन्ना ने उन्हें चुना ? 3 जून 1947 की घोषणा के बाद असम के सयलहेट जिले को मतदान से ये तय करना था कि वो पकिस्तान का हिस्सा बनेगा या भारत का। उस इलाके में हिन्दुओं और मुस्लिमों की जनसँख्या लगभग बराबर थी। चुनाव में नतीजे बराबरी के आने की संभावना थी। जिन्ना ने मंडल को वहां भेजा। दलितों का मत, मंडल ने पकिस्तान के समर्थन में झुका दिया। मतों की गिनती हुई तो सयलहेट पकिस्तान में चला गया जो आज वो बांग्लादेश में है।

जोगेंद्र नाथ मंडल पाकिस्तान के पहले श्रम मंत्री भी थे। सन 1949 में जिन्ना ने उन्हें कॉमनवेल्थ और कश्मीर मामलों के मंत्रालय की जिम्मेदारी भी सौंप दी थी। इस 1947 से 1950 के बीच ही पकिस्तान में हिन्दुओं पर लौहमर्षक अत्याचार होने शुरू हो चुके थे। दरअसल हिन्दुओं को कुचलना कभी रुका ही नहीं था। इस्लाम मेन बलात्कार आम बात होती है। हिन्दुओं की स्त्रियों को उठा ले जाना जोगेंद्र नाथ मंडल की नजरों से भी छुपा नहीं था। वो बार बार इनपर कारवाई के लिए चिट्ठियां लिखते रहे।

इस्लामिक हुकूमत को ना उनकी बात सुननी थी, ना उन्होंने सुनी! हिन्दुओं की हत्याएं होती रही जमीन, घर, स्त्रियाँ लूटी जाती रही। कुछ समय तो जोगेंद्र नाथ मंडल ने प्रयास जारी रखे। आखिर उन्हें समझ आ गया कि उन्होंने किस इस्लाम पर पर भरोसा करने की मूर्खता कर दी है! जिन्ना की मौत होते ही 1950 में जोगेंद्र नाथ मंडल भारत लौट आये। पश्चिम बंगाल के बनगांव में वो गुमनामी की जिन्दगी जीते रहे। अपने किये पर 18 साल पछताते हुए आखिर 5 अक्टूबर 1968 को उन्होंने गुमनामी में ही आखरी साँसे ली।

अब आपको शायद ये सोचकर थोड़ा आश्चर्य हो रहा होगा कि कैसे आपने कभी इस नेता का नाम तक नहीं सुना ?
राजनीति में तो अच्छी खासी दिलचस्पी है ना आपकी ?

अपने फायदे के लिए कैसे एक समुदाय विशेष ने एक दलित का इस्तेमाल किया था उसका ये इकलौता उदाहरण भी नहीं है। बस समस्या है कि ना अपने खुद पढ़ने की कोशिश की और दल हित चिन्तक तो आपको सिर्फ एक वोट बनाना चाहते हैं ! वो क्यों पढ़ने देते भला ?

यही सिर्फ एक वोट बनकर रह जाने का अफ़सोस था जो आपने रोहित वेमुल्ला की चिट्ठी में लिखा पाया था। उनकी चिट्ठी में जो कुछ हिस्सा आप आज कटा हुआ देखते हैं वो कल कोई और लिखेगा। आप पढ़ने से इनकार करते रहेंगे उधर मासूम अपने खून से बार बार ऐसी चिट्ठियां लिखते रहेंगे।

कभी सोचा है कि वो आपको जोगेंद्र नाथ मंडल का नाम क्यों नहीं बताते ? कभी सोचा है कि वो आपको पढ़ने क्यों नहीं कहते ? कभी सोचा है कि उन्होंने आपको चार किताबों का नाम बताकर खुद पढ़कर आने को क्यों नहीं कहा ? वो खुद को आंबेडकर वादी कहते हैं ना ? आंबेडकर और फुले दम्पति तो जिन्दगी भर शिक्षा के लिए संघर्ष करते रहे ! फिर ये क्यों आपको किताबों से दूर करते हैं ?

ऐसा वो इसलिए करते हैं क्योंकि पढ़ने के बाद आप सिर्फ एक वोट नहीं रह जायेंगे। पढने के बाद आप दर्ज़नो तीखे सवाल हो जायेंगे। पढने पर आप पूछेंगे कि पूनम भारती की आत्महत्या के विषय में कोई बोलता क्यों नहीं ? पढ़ने पर आप पूछेंगे कि उसकी चिट्ठी में ये जहाँगीर के बारे में लिखा क्या है ? पढ़ने पर आप देखेंगे कि आंबेडकर खुद क्या कहते थे।

बाकी किसी विदेशी फण्ड पर पलने वाले की पूँछ पकड़ कर चलना है, या खुद से दलित चिंतन करना है, ये फैसला तो आपको खुद ही करना होगा।

हैदराबादी ब्राह्मण थे AIMIM चीफ ओवैसी के पूर्वज !

नई दिल्ली : हमेशा अपने भड़काउ भाषणों की वजह से चर्चा में रहने वाले ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुसलमीन (AIMIM) के प्रमुख और सांसद असदुद्दीन ओवैसी के पूर्वज भी हिंदू ही थे। ओवैसी को लेकर संघ विचारक राकेश सिन्हा ने अपने एक ट्वीट से विवाद पैदा कर दिया है। उन्होंने गुरुवार को ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुसलमीन (एआइएमआइएम) के प्रमुख और सांसद असदुद्दीन ओवैसी के पूर्वजों को हिंदू ब्राह्मण बता दिया। प्रोफेसर सिन्हा ने अपने ट्विटर अकाउंट पर गुरुवार को ओवैसी को संबोधित करते हुए कहा, ‘ आपके पुरखे हैदराबाद के ब्राह्मण थे। धर्मांतरण आपकी राष्ट्रीय इतिहास और पुरखों को नहीं बदलता’।

प्रोफेसर राकेश सिन्हा ने अपने ट्वीटर खाते पर ओवैसी को संबोधित करते हुए कहा कि ‘आपके पुरखे हैदराबाद के ब्राह्मण थे। धर्मांतरण आपकी राष्ट्रीय इतिहास और पुरखों को नहीं बदलता’। अब ओवैसी भी कहां चुप बैठने वाले थे उन्होंने भी सिन्हा के बात पर पलटवार करते हुए ट्वीट कर दिया कि ‘ नहीं, मेरे परदादा, उनके परदादा और सारे परदादा पैगंबर आदम के यहां से आए हैं’। ओवैसी के जवाब पर सिन्हा ने एक और ट्वीट करते हुए लिखा, ‘आपका बहुत सम्मान करते हुए मैं कहता हूं कि हमारा डीएनए एक ही है। आपके पूर्वज स्वदेशी थे और किसी विदेशी मिट्टी से नहीं आए थे। हिंदू तो सभ्यतामूलक परिभाषा है’। ‘

इसके बाद ओवैसी चुप कहाँ बैठने वाले थे। उन्होंने राकेश सिन्हा पर पलटवार करते हुए लिखा कि ‘नहीं, मेरे परदादा, उनके परदादा और सारे परदादा पैगंबर आदम के यहां से आए हैं’।

ओवैसी के जवाब पर सिन्हा ने एक और ट्वीट करते हुए लिखा, ‘आपका बहुत सम्मान करते हुए मैं कहता हूं कि हमारा डीएनए एक ही है। आपके पूर्वज स्वदेशी थे और किसी विदेशी मिट्टी से नहीं आए थे। हिंदू तो सभ्यतामूलक परिभाषा है’।

सोशल मीडिया पर जंग की शुरुआत का मुख्य कारण पीएम मोदी द्वारा मनमोहन सिंह पर किया गया कटाक्ष था। जिसको लेकर ओवैसी ने प्रधानमंत्री के इस बयान की विपक्ष ने तीखी आलोचना की थी। इसी संदर्भ में ओवैसी ने 2002 में हुए गुलबर्ग सोसायटी जनसंहार से प्रधानमंत्री मोदी के जुड़े होने को लेकर तीखे सवाल किए थे।

उन्होंने लिखा कि अगर पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने बाथरूम में रेनकोट पहना हुआ था तो उस समय आपने क्या पहना हुआ था जब आपके मुख्यमंत्री रहते एहसान जाफरी और दूसरों की हत्याएं की जा रही थी।

रेनकोट वाले बयान पर विपक्ष के तीखे हमले का जवाब देने के लिए संघ विचारकों का खेमा भी पीछे नहीं रहा। संघ का खेमा सोशल मीडिया पर बोलते- बोलते ओवैसी के डीएनए तक जा पहुंचा।

मुसलमनों पर सऊदी अरब सरकार का कहर, कर्बला जाने पर लगाई रोक

saudi arabia govt put sanctions on shiite

नई दिल्ली (9 फरवरी): सऊदी अरब में रहने वाले 40 साल से कम उम्र के शिया मुसलमान इराक स्थित करबला शरीफ की यात्रा नहीं कर सकते। सऊदी अरब की सरकार ने इस तरह के आदेश जारी करते हए कहा है कि अगर कोई शिया सरकार को धोखे में रखकर इराक की यात्रा पर जाता है तो उसे वापस लौटने पर तीन साल तक देश से बाहर जाने पर रोक लगा दी जायेगी। इसके अलावा उस पर भारी हर्जाना भी चुकाना पड़ सकता है।

हर वर्ष बड़ी संख्या में सऊदी अरब के शिया इराक़ के पवित्र स्थलों की ज़ियारत के लिए जाते हैं और नए क़ानून के अनुसार बहुत से सऊदी नागरिक इस तीर्थ यात्रा से वंचित हो जायेंगे। सऊदी अरब का यह क़ानून इजरायली शासन के उस क़ानून की तरह है जिसमें मस्जिदुल अक़सा में नमाज़ पढ़ने के लिए फ़िलिस्तीनियों पर आयु सीमा की शर्त लगाई जाती है।

आपकी जानकारी के लिए बता दे की करबला की लडा़ई मानव इतिहास कि एक बहुत ही जरूरी घटना है। यह सिर्फ एक लडा़ई ही नही बल्कि जिन्दगी के सभी पहलुओ की मार्ग दर्शक भी है। इस लडा़ई की बुनियाद तो ह० मुहम्मद मुस्तफा़ स० के देहान्त के बाशी रखी जा चुकी थी। इमाम अली अ० का खलीफा बनना कुछ अधर्मी लोगो को पसंद नहीं था तो कई लडा़ईयाँ हुईं अली अ० को शहीद कर दिया गया, तो उनके पश्चात इमाम हसन अ० खलीफा बने उनको भी शहीद कर दिया गया। यहाँ ये बताना आवश्यक है कि, इमाम हसन को किसने और क्यों शहीद किया?, असल मे अली अ० के समय मे सिफ्फीन नामक लडा़ई मे माविया ने मुँह की खाई वो खलीफा बनना चाहता था प‍र न बन सका।

वो सीरिया का गवर्नर पिछ्ले खलिफाओं के कारण बना था अब वो अपनी एक बडी़ सेना तैयार कर रहा था जो इस्लाम के नही वरन उसके अपने लिये थी, नही तो उस्मान के क्त्ल के वक्त खलिफा कि मदद के लिये हुक्म के बावजूद क्यों नही भेजी गई? अब उसने वही सवाल इमाम हसन के सामने रखा या तो युद्ध या फिर अधीनता।

इमाम हसन ने अधीनता स्वीकार नही की परन्तु वो मुसलमानो का खून भी नहीं बहाना चाहते थे इस कारण वो युद्ध से दूर रहे अब माविया भी किसी भी तरह सत्ता चाहता था तो इमाम हसन से सन्धि करने पर मजबूर हो गया इमाम हसन ने अपनी शर्तो पर उसको सि‍र्फ सत्ता सोंपी इन शर्तो मे से कुछ ये हैं: –

  • वो सिर्फ सत्ता के कामो तक सीमित रहेगा धर्म मे कोई हस्तक्षेप नही कर सकेगा।
  • वो अपने जीवन तक ही सत्ता मे रहेगा म‍रने से पहले किसी को उत्तराधिकारी न बना सकेगा।
  • उसके म्ररने के बाद इमाम हसन खलिफा़ होगे यदि इमाम हसन कि मृत्यु हो जाये तो इमाम हुसैन को खलिफा माना जायगा।
  • वो सिर्फ इस्लाम के कानूनों का पालन करेगा।

इस प्रकार की शर्तो के द्वारा वो सिर्फ नाम मात्र का शासक रह गया।

 

अरबी टुकड़ों पर पलने वाले बॉलीवुड ने हिन्दुओं की माँ-बहनों के बलिदान मज़ाक बना दिया : केशर देवी

 

ब्लॉग: केशर देवी (यूनाइटेड हिन्दी) :- स्कूल की बात है, स्कूल में जब कोई टीचर नहीं आते थे तो उनकी जगह टेम्परेरी टीचर कुछ दिन के लिए पढ़ाने आते थे। तब मैं सातवीं क्लास में थी और हमारी हिन्दी की मैम एक दो महीने के लिए बाहर गयीं थीं। उनकी जगह एक नीरज सर पढ़ाने आने लगे, टेम्परेरी टीचर्स अक्सर मस्त होते हैं, मज़े में पढ़ाते हैं। हम थे भी तब छोटे तो वो हमको कहानियाँ सुनाया करते थे, हम रोज उनके पीछे पड़ जाते सर कहानी, सर कहानी, अब उनको कोर्स भी कवर करना होता था तो हफ्ते में 2-3 कहानी तो सुनाते ही देते थे। जब वो कहानी सुनाते तो सारी क्लास चुपचाप सुनती, SUPW के पीरिएड भी वो ही ले लेते और हम कहानी सुनते रहते।

ज्यादातर वो इतिहास की बातें बताते, एक बार उन्होंने स्वामी विवेकानन्द की कहानी सुनाई, कैसे उन्होंने शून्य पर भाषण दिया, एक बार भानगढ़ के भूतों की और एक बार राजा हम्मीर की, एक बार भगत सिंह की और एक बार अक़बर के नवरत्नों की।

पर जिस कहानी ने हमें पूरी तरह झकझोर डाला था और कई साल तक क्लास के सब बच्चे उस कहानी की वजह से उनको याद करते रहे वो कहानी थी रानी पद्मिनी के जौहर की। क्लास में वीररस की वर्षा हो रही थी, शायद ही कोई ऐसा बच्चा था जिसके रोंगटे खड़े न हों। चित्तौड़ के किले की विश्वसुन्दरी रानी के सौंदर्य, उसके पति के अद्भुत पराक्रम, क्षत्रियों की विस्मयकारी रणनीति, आततायी ख़िलजी की नीचता और किले की हज़ारों वीरांगनाओं के भीषण जौहर की वह कहानी मेरे दिल में आज तक ज्यों की त्यों बनी हुई है। चित्तौड़ के किले की मिट्टी आज भी काली है, चित्तौड़ के किले से रात आठ बजे बाद आज भी मर्माहत चीखें सुनाई पड़ती हैं, यह सुनकर हम बच्चे अनुमान लगा पाते थे कि जिन्दा जलने का दर्द क्या होता है? पर बौद्धिक पशु यह नहीं समझ सकते कि क्यों उस फूल सी कोमल रानी ने अपनी सुंदरता समेत स्वयं को दावानल में झुलसा डाला था? क्यों किले की हज़ारों औरतें, बच्चे, बूढ़े आग के दरिया में हंसकर कूद पड़े? रतन सिंह, गोरा और बादल जैसे हज़ारों क्षत्रिय वीरों ने अपने प्राण युद्ध में बलिदान कर दिए?

मैं बचपन में सुनी उस कहानी को आज इसलिए लिख रही हूँ ताकि वेटिकन-अरब के टुकड़ों पर पलने वाले बॉलीवुड के जानवरों ने हिन्दुओं की माँ बहनों के साहस और बलिदान का भद्दा मज़ाक बना डाला है।

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बाजार की जरूरतों के लिए रानी पद्मावती जैसी धीर-गंभीर रानी को क्यों बाजारू बना रहे हो ?

ब्लॉग : कुमार प्रियांक (यूनाइटेड हिन्दी) :- जयपुर में ‘पद्मावती’ की शूटिंग कर रहे थे संजय लीला भंसाली। अब जबरदस्ती का मसाला डालने के लिए संभवतः अलाउद्दीन ख़िलजी और रानी पद्मावती के प्रेम प्रसंग को दिखा रहे हैं उसमें। बीच में राणा रतन सिंह को पता नहीं कहाँ गायब कर दिए हैं..??!!

भैया, जब ऐतिहासिक तथ्यों पे फ़िल्म बना रहे हो, तो उसमें बाजार की जरूरतों के लिए रानी पद्मावती जैसी धीर-गंभीर रानी को क्यों बाजारू बना रहे हो..?? फिर अब ऐसे में अभी तो सिर्फ करणी सेना आगे आई है, जरूरत पड़ी तो अखिल भारतीय महासभा भी उठ खड़ी होगी..!!

रणबीर सिंह जैसे बाँके जवान और दीपिका पादुकोण जैसी खूबसूरत हीरोइन की आपसी केमिस्ट्री तो फिर भी समझ आती है, उनके आपसी प्रेम-प्रसंग को भुनाने के लिए इन्ही दोनों को फ़िल्मी पर्दे पर क्रमशः अलाउद्दीन ख़िलजी व पद्मावती बना दिए..और अब हंगामा होगा तो तड़ से कहेंगे कि मोदी राज में असहिष्णुता बढ़ रही..!! क्रिएटिव फ्रीडम का मतलब बाजार से किसी तरह भी पैसा कमाने के लिए कुछ भी दिखाना नहीं होता है..!!

उधर दूसरी तरफ़ एक असमी फ़िल्म डायरेक्टर ने हिंदी फिल्मों की वजह से उनकी असमी फ़िल्म थिएटर से हटाने के चलते सीधे उल्फा के उग्रवादी नेता परेश बरुआ से ही फेसबुक पर अपील कर दी..और म्यांमार में छुपे परेश बरुआ ने लोकल चैनल पर खुद की धमकी भी प्रसारित करवा दी..!!

सच्चाई तो यही है कि ये अधिकाँश फ़िल्म वाले कोई सकारात्मक सन्देश देने की बजाए सिर्फ मसाला बेच कर बाजार से येनकेन-प्रकारेण पैसा निकालना जानते हैं। फ़िल्म “पीके” में आमिर खान शिवलिंग पर दूध चढ़ाने को संसाधनों की बरबादी बताते हैं। तो फिर क्यों नहीं कोई उनकी फिल्में चोरी से डाउनलोड करके देखे और जो महँगे होते सिनेमा हॉल में जाने से बेहतर उतने रूपये किसी जरूरतमन्द अपाहिज को दे दे..!!

उसी फ़िल्म में खुद के मज़हब में निहित कमियाँ बताने में कोताही कर गए क्योंकि उनको पता था कि फिर फ़िल्म की बैंड बज जानी थी..इसलिए जो कमजोर कड़ी है, उसकी सहिष्णुता का फायदा उठाकर शिव जी का मजाक बनाएँ..!!

हमारे देश के संविधान में हर किस्म की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर कुछ युक्तियुक्त निर्बन्धन है..जिसका पालन किया जाना चाहिए, वरना समाज में फिर असहिष्णुता का माहौल बनेगा जो देश की क़ानून-व्यवस्था में दिक्कतें पैदा करेगा..!! अतः सरकार को चाहिए कि समय रहते इस तरह के व्यावसायिक फिल्मकारों को कड़ा सन्देश दिया जाए जो ऐतिहासिक या फिर धार्मिक तथ्यों व परम्पराओं के साथ निज स्वार्थ हेतु छेड़छाड़ करते हैं..!!

पहले ही वामपंथी इतिहासकारों ने अपने आकाओं को खुश करने व खुद संस्थागत अड्डाओं पर बैठ कर मुफ़्त की रोटी तोड़ने के लिए देश की गौरवपूर्ण सभ्यता व सांस्कृतिक इतिहास के साथ काफी छेड़छाड़ कर कबाड़ा कर रखा है..!!

अब समय आ गया है कि इन ऐतिहासिक त्रुटियों को भी दूर किया जाए और तमाम ऐतिहासिक स्थलों तथा ऐतिहासिक पुस्तकों का निष्पक्ष व तार्किक अध्ययन किया जाए, न कि पूर्वाग्रहपूर्ण। इस निमित्त ऐतिहासिक स्थलों की क्षैतिज व उर्द्धवाधर खुदाई को और भी विस्तृत किया जाए। एक गौरवपूर्ण इतिहास किसी भी देश के नागरिकों का आत्मसम्मान बढ़ाने में सहायक होता है, जो प्रकारांतर से देश के वर्तमान व भविष्य को सुधारने में भी मदद देता है..!!

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