रिपोर्ट पढ़िये: भारतीय मीडिया का ज्ञान कितना घटिया है, देश की असलियत से कितने कटे हुए हैं….

ब्लॉग : पुष्पेंद्र राणा ( यूनाइटेड हिन्दी डॉट कॉम ) :-  अवैध बूचड़खानों की बंदी का विरोध कर विपक्ष, मीडिया, महानगरों में बैठे तथाकथित बुद्धिजीवियों ने ना केवल अपनी बेवकूफी का प्रदर्शन किया है बल्कि उनका ज्ञान कितना सिमित है और महानगरो से बाहर के भारत की असलियत से कितने कटे हुए हैं इस सच्चाई के दर्शन भी करा दिए हैं।

लेकिन दुर्भाग्य यह है कि अधिकतर समर्थक भी इस मुद्दे से ठीक से परिचित नही है ?
पहली बात तो मुद्दा सिर्फ गौ हत्या का नही था ! गौ हत्या पर उत्तर प्रदेश में पहले से ही कानूनी प्रतिबन्ध है। हालांकि सपा और बसपा की सरकारों में इस कानून की धज्जियां उड़ाई गई और बड़े पैमाने पर सरकारी संरक्षण में गौहत्या की जाती रही।

लेकिन गौ हत्या से भी बड़ा मुद्दा (विशेषकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश के लिये) भैंसों के अवैध कटान का रहा है। उदाहरण के लिये कुछ साल पहले तक मेरठ में शहर के बीचों बीच सरकारी कमेला होता था जिसे हर साल नगर निगम मामूली रकम के एवज में याकूब कुरैशी और शाहिद अख़लाक़ जैसे कसाई नेताओ को ठेके पर देता था। मेरठ शहर की रोजाना की मांस की खपत 250 भैंस की है और इसीलिए इस कमेले में कानूनी रूप से रोजाना 250-300 भैंस काटे जाने की अनुमति थी लेकिन स्थानीय मीडिया रिपोर्ट के अनुसार इसमें रोजाना 5-7 हजार तक भैंस काटी जाती थी। इसके अलावा कई हजार मेरठ शहर के एक हिस्से के गली मुहल्लों में बने छोटे कमेलो में कटती थी। मेरठ शहर के मुस्लिम बहुल इलाकों का यह हाल है कि वहां पानी में भी खून आता है। दुर्गन्ध और बीमारियों की वजह से कई इलाको से लोग पलायन कर गए। कोर्ट ने कई सालों पहले ही इस कमेले को बंद करने और शिफ्ट करने का आदेश दिया हुआ था लेकिन उसे हटाने की इक्षाशक्ति किसी सरकार में नही थी।

सबसे बड़ी बात ये है कि ये सारा मांस गल्फ में एक्सपोर्ट होता था। लोकल सप्लाई के लिये इतने कटान की आवश्यकता नही थी ! याकूब कुरैशी और शाहिद अख़लाक़ जैसे नेता रातो-रात करोड़पति से खरबपति हो गए। बसपा की सरकार में तो इनका खुद का ही राज था। सुविधा अनुसार पार्टी भी बदल लेते थे। पैसो और सत्ता के दम पर इन्होंने मेरठ में आतंक कायम किया। सपा में आजम खान की वजह से इनकी दाल नही गली क्योंकि उसकी कसाईयो से नही बनती थी। आजम खान ने मेरठ की पीड़ित मुस्लिम जनता की गुहार पर कमेला शहर से बाहर शिफ्ट करवा दिया। हालांकि याकूब कुरैशी जैसे इतने पैसे वाले हो गए कि उन्होंने खुद अपने आधुनिक संयंत्र स्थापित कर लिए लेकिन इनमे अवैध कटान चालू रहा।

अगले पृष्ठ पर पढ़िये : बिसाहड़ा जैसे कितने काण्ड हुए

कश्मीर के लिए पांच ट्रेन बिहार से चला दीजिये तो सारी धारायें सही से काम करेगी !!

ब्लॉग : आनंद कुमार ( यूनाइटेड हिन्दी डॉट कॉम ) :- कई बार जो बातें हम आपस में करते हैं वो अनजान लोगों के बीच नहीं करते। सोशल मीडिया पर पोस्ट करने से परहेज भी रखते हैं। बिहारियों की हालत ऐसी होती है कि हम अक्सर चुटकुले किसी संता-बंता, पप्पू-टीपू, या फजलु-अफ़जल पर भी नहीं सुनाते। हमारे चुटकुले भी हमपर ही होते हैं। जैसे अगर पूछा जाए की कश्मीर के आतंकवाद की समस्या का आसान इलाज क्या है ? तो जवाब होता है वहां के लिए बिहार से कुछ डायरेक्ट ट्रेन चलवा दो ! 

कश्मीर के लिए पांच ट्रेन चला दीजिये बिहार से तो वो भी सुधर जायेगा।

गौर कीजिये तो ये दिख भी जाएगा। सत्तर के दशक में कभी बंगाल राजनैतिक हत्याओं से पीड़ित हुआ करता था। बिहारी जाकर उसी दौर में वहां नौकरी करने लगे और धीरे धीरे मार काट ख़त्म। पूर्वोत्तर कई उल्फा जैसी उग्रवादी-आतंकी विचारधाराओं से ग्रस्त था। बिहारी वहां बसने लगे, वो भी ठीक हो चला। पंजाब आतंकवाद से ग्रस्त हुआ, बिहारी मजदूर वहां के खेतों में जाने लगे तो वो भी ठीक। दक्षिण में एल.टी.टी.इ. थी, बिहारी आज वहां होते हैं तो एल.टी.टी.ई. नहीं रही।

कश्मीर के लिए पांच ट्रेन चला दीजिये बिहार से तो वो भी सुधर जायेगा।

ये मेरा ही चुटकुला है या बेबसी पर मुस्कान वो तय करना जरा मुश्किल है। अकेले मुंबई में करीब 50 लाख बिहारी होते हैं। सभी मेट्रो और बड़ी जगहों को मिलायेंगे तो बिहार के तीन करोड़ से ऊपर लोग वहीँ प्रवासी के तौर पर मिल जायेंगे। जैसी की आम धारणा है वैसे बिहार कृषि प्रधान भी नहीं होता। बिहार की आबादी का 55-60% हिस्सा नौकरीपेशा है, काम करने वालों की लगभग 30-35 प्रतिशत की आबादी ही कृषि पर निर्भर है। ये तब है जब करीब 12% आबादी ही शहरी है, बाकी सब बिहार में ग्रामीण ही होते हैं। हिमांचल के पहाड़ी इलाकों के बाद ये सबसे कम शहरी आबादी वाला इलाका है। 80 प्रतिशत ग्रामीण आबादी और 35% कृषक, बाकी कहाँ नौकरी करते होंगे अंदाजा करना मुश्किल नहीं।

यानि जिस सर्विस इंडस्ट्री और नॉलेज प्रोसेस आउटसोर्सिंग की यदा कदा, बड़ी बैठकों में चर्चा होती है उसके लिए बिहार में श्रम शक्ति उपलब्ध थी। हाँ, उसकी इंडस्ट्री कभी यहाँ नहीं आई, ये और बात है। अब कई स्वनामधन्य बुद्धिजीवी बताएँगे कि देखो इस से बाहर से पैसा बिहार आ रहा है और उस से बहार आएगी। लेकिन समस्या ये है कि इन कामगारों के बच्चों की शिक्षा के लिए बिहार में कोई व्यवस्था नहीं। परीक्षाएं समय पर नहीं होती इसलिए आप तीन साल में ग्रेजुएशन नहीं कर सकते तो बाहर पढ़ना मजबूरी है। इस तरह आया हुआ पैसा वापिस दिल्ली, कोटा, बंगलौर, भोपाल चला जाता है।

ये चीज़ें आसानी से कल के कार्यक्रम में मंच पर भी दिख गई होंगी। सिर्फ पटना शहर का ही इतिहास 2000 साल से ज्यादा का निकल आएगा। किस्मत से जब मंच पर से इसी शहर में “बिहार दिवस” के सांस्कृतिक कार्यक्रम चल रहे थे तो बिहार के कितने कलाकार दिखे ? हजारों साल का सांस्कृतिक इतिहास कहाँ गया ? मंच से नितीश बाबू को ये क्यों कहना पड़ता है कि बिहारियों के काम ना करने से दिल्ली बंद हो जायेगी, ये क्यों नहीं पूछते कि बिहारियों को दिल्ली जाकर नौकरी क्यों करनी पड़ती है ?

आपके भाषण में मेरी रूचि नहीं सुशासन बाबु। मुझे उस कॉइन कलेक्टर को देखना था जो इतिहास सचमुच संजो के रख रहा था और आपकी अकर्मण्यता के वजह से हाल में ही डूब गया। मुझे उन किसानों को देखना था जिनके प्रति हेक्टेयर धान और आलू की उपज को तो अपनी पीठ थपथपाने के लिए आप अपने प्रकाशनों में छापते है, लेकिन मंच पर बुला कर उन्हें सम्मानित करने में शायद आपके जातीय-सियासी आंकड़े गड़बड़ाने लगते हैं। मुझे उस लड़के को भी देखना था जो बिना लोभ लालच लोगों को किताब खरीदने के लिए प्रेरित करता, अनजान लोगों को पोस्टकार्ड लिख रहा होता है। मुझे उसे भी देखना था जो बच्चों को नशा मुक्त कर के शिक्षित करने का प्रयास आपके गांधी मैदान वाले मंच से थोड़ी ही दूर पर हर रोज़ करता है।

बाकी ये अनपढ़ जाहिलों को भी मंच पर से उतारिये जनाब। इनकी तस्वीर छपने पर जैसा बिहार दिखता है, वो तो बिलकुल भी मेरा चेहरा नहीं।

बीएसएफ जवान तेज बहादुर यादव की मौत की खबर का सच आया सामने….

तेज बहादुर यादव पूरी तरह स्वस्थ हैं, मौत की खबरें पाकिस्तानियों का एजेंडा : बीएसएफ

नई दिल्ली (यूनाइटेड हिन्दी डॉट कॉम): कुछ महीने पहले भारतीय सीमा पर तैनात बीएसएफ के एक जवान ने खाने की गुणवत्ता पर सवाल उठाया और facebook पर एक वीडियो शेयर करके कहा कि बीएसएफ में जवानों को अच्छा खाना नहीं दिया जाता है ! बीएसएफ ने तत्काल उसपर जांच बिठाई और आरोपों को नकार दिया। लेकिन अब यह बात सामने आ रही है कि पाकिस्तान में सोशल मीडिया पर यह बताया जा रहा है कि भारत में यह शिकायत करने वाले जवान की मौत हो चुकी है। वहीं, बीएसएफ ने सोशल मीडिया पर जवान तेज बहादुर यादव की मौत की तस्वीरों को पूरे तौर पर सिरे से खारिज कर दिया है। बीएसएफ ने कहा है कि तेज बहादुर यादव पूरी तरह स्वस्थ हैं। दरअसल सोशल मीडिया पर घूम रही कुछ तस्वीरों में बीएसएफ में खान-पान की शिकायत करने वाले जवान तेज बहादुर की मौत की झूठी खबर प्रचारित की जा रही है। इन तस्वीरों में तेजबहादुर को चोटें लगी हुईं भी नज़र आ रही हैं।

pakistani tweet on tej bahadur

पाकिस्तान में सोशल मीडिया पर बीएसएफ जवान तेज बहादुर को लेकर चल रहा ट्वीट…

बीएसएफ का कहना कि ज़ाहिर है यह तस्वीरें फ़र्ज़ी प्रोपेगेंडा का हिस्सा हैं। पड़ताल में यह पता चला है कि यह प्रोपेगेंडा सीमापार से संचालित हो रहा है। इन तस्वीरों को प्रमुखता से ट्वीट करने वाले लोगों के सोशल मीडिया अकाउंट्स इसकी तस्दीक करते हैं कि वे पाकिस्तान के हैं।

यूनाइटेड हिन्दी डॉट कॉम ने इसी वायरल खबर की जाँच पड़ताल की तो पता चला की तेजबहादुर यादव के मौत की जो तस्वीर चलाई जा रही है वो सुकमा में मारे गए 12 जवानों में से किसी एक जवान की है ।

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तेजबहादुर के मौत की जो तस्वीरें इस फेसबुक में दिखाई जा रही है वो किसी और जवान की है। तेजबहादुर यादव के मौत की जो तस्वीर चलाई जा रही है वो 11 मार्च को सुकमा में मारे गए 12 जवानों में से किसी एक जवान की है।

टीम ने इस बारे में तेजबहादुर यादव की पत्नी से भी बात की है। उन्होंने ने भी तेजबहादुर के मौत की खबर को झूठी खबर कहा और यह बताया कि तेजबहादुर पूरी तरह स्वस्थ हैं।

साथ ही बीएसएफ का भी कहना कि जाहिर है यह तस्वीरें फर्जी प्रोपेगेंडा का हिस्सा हैं। जांच में यह पता चला है कि यह प्रोपेगेंडा सीमापार से संचालित हो रहा है।

कम्युनिस्ट खेमे के इन इतिहासकारों ने भगत सिंह की इस तरह से की निर्मम हत्या…

भगत के मिट्टी की खुशबू हम सबके जेहन में रच-बस चुकी है, तुम्हारे षड्यंत्र अब सफल नहीं होंगे….

ब्लॉग : ( अभिजीत सिंह, यूनाइटेड हिन्दी डॉट कॉम ) :- 1931, फरवरी-मार्च का महीना, सेन्ट्रल जेल, लाहौर के 14 नम्बर वार्ड में फाँसी की प्रतीक्षा कर रहे बंदियों में से एक ने अपनी माँ को एक पत्र लिखा। माँ ने बेटे का पत्र खोला तो उसमें लिखा था, माँ, मार्च की 23 तारीख को तेरे बेटे की शादी है, आशीर्वाद देने जरूर आना। माँ सोचने लगी जेल में तो लडकियाँ होती नहीं तो फिर ये पगला किससे प्यार कर बैठा, कहीं किसी जेलर की बेटी पर तो मेरे बेटे का दिल नहीं आ गया ? माँ से पूछे बिना बेटा शादी कर लेगा इस आशंका से पीड़ित माँ ने तस्दीक करने के लिये अपने छोटे भाई को भेजा, जा जरा देख के आ कि ये किस कुड़ी को दिल दे बैठा है। कैदी ने मिलने आने वाले को एक कागज पर कुछ लिख कर दिया और कहा, इसे माँ को दे देना और ध्यान रहे इसे और कोई न खोले। माँ ने बेटे का पत्र खोला तो लिखा था, मेरी होने वाले दुल्हन का नाम है “मौत”।

मौत को माशूका बना लेने वाले इस शख्स का नाम था भगत सिंह। ये वो नाम है जिसके सामने आते ही देशप्रेम और बलिदान मूर्त हो उठता है। भगत वो नाम है जिसकी राह रूप, यौवन और सौन्दर्य नहीं रोक सकी, भगत वो नाम है जिसने एक अत्यंत धनी परिवार से आये विवाह प्रस्ताव को ये कहते हुए ठुकरा दिया था कि मेरा विवाह तो अपने ध्येय के साथ हो चुका है अब दुबारा विवाह क्या करना, भगत वो नाम भी है जिसके लिये उसकी अपनी धार्मिक परंपरा के अनुपालन से अधिक महत्व भारत की आजादी का था। वो चाहता तो फांसी की सजा से बच सकता था पर उसने इसके लिये कोई कोशिश नहीं की, इसलिये नहीं की क्योंकि उसे पता था कि अपना बलिदान देकर वो तो सो जायेगा पर सारा भारत जाग उठेगा और फिरंगी हूकूमत की जड़ उखड़ जायेगी।

जिस हुतात्मा का सिर्फ जिक्र भर आज उसके बलिदान के 86 साल बाद भी युवकों में जोश भर देता है, तो जाहिर है कि वो लोग जिनकी विचारधारा का अवसान हो चुका है वो अगर भगत को अपने खेमे का साबित कर दें तो शायद उनकी मृत विचारधारा कुछ अवधि के लिये जी उठे। इसी सोच को लेकर कम्युनिस्टों ने बड़ी बेशर्मी से भगत सिंह के बलिदान का अपहरण कर लिया। विपिन चन्द्र, सुमित सरकार, इरफान हबीब, रोमिला थापर जैसे वाम-परस्त इतिहासकारों ने सैकड़ों लीटर स्याही ये साबित करने में उड़ेल दी थी कि भगत सिंह तो कम्युनिस्ट थे। भगत के “मैं नास्तिक क्यों हूँ” वाले लेख को बिना किसी आधार का ये लोग ले उड़े और उसे लेनिन के उस कथन से जोड़ दिया जिसमें उसने कहा था कि ‘नास्तिकता के बिना मार्क्सवाद की कल्पना संभव नहीं है और नास्तिकता मार्क्सवाद के बिना अपूर्ण तथा अस्थिर है’।

यानि इनके अनुसार भगत सिंह मनसा, वाचा, कर्मणा एक प्रखर मार्क्सवादी थे। भगत सिंह के प्रति ममत्व जगने के वजह ये भी है कि जिस लेनिन, स्टालिन, माओ-चाओ, पोल पोट वगैरह को वो यूथ-आइकॉन बना कर बेचते रहे थे उनके काले कारनामे और उनके नीतियों की विफलता दुनिया के सामने आने लगी थी और स्वभाव से राष्ट्रप्रेमी भारतीय युवा मानस के बीच उनको मार्क्सवादी आइकॉन के रूप में बेचना संभव नहीं रख गया था इसलिए इन्होने भगत सिंह को कम्युनिस्ट बना कर हाईजैक कर लिया।

इसलिये किसी व्यक्ति के मृत्यु के उपरांत उसकी विचारधारा को लेकर जलील करने का सबसे अधिक काम अगर किसी ने किया है तो वो यही लोग हैं जिन्होनें भगत सिंह जैसे हुतात्मा को कम्युनिस्ट घोषित करने का पाप किया। ऐसे में इस बात की तहकीक भी आवश्यक हो जाती है कि क्या कम्युनिस्टों के मन में हमेशा से भगत सिंह के प्रति आदर था या अपने राजनीतिक फायदे और अस्तित्व रक्षण के लिए उन्होंने उगला हुआ थूक निगल लिया ? भगत सिंह के प्रति कम्युनिस्ट आदर जानने के आवश्यक है कुछ कम्युनिस्टों की किताबों को पढ़ा जाए और भगत सिंह के संबंध में कुछ कम्युनिस्ट नेताओं की स्वीकारोक्तियों को सुना जाए।

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हिन्दुओं के रक्त में सेक्युलर नामक वायरस घुस गया है, इसलिए हिन्दू रामनवमी कैसे मनाएंगे ?

बहिष्कृत सिंधी शिया मुस्लिम साईं बाबा ने दिखाया था जो इसे भगवान् ही मान लिया ?

ब्लॉग : ( वैष्णवी कुमारी, यूनाइटेड हिन्दी डॉट कॉम ) :- अजमेर में स्थित सूफ़ी संत हजरत मोईनुद्दीन चिस्ती की दरगाह को कोई मुसलमान अल्लाह मानकर नहीं पूजता, बल्कि अल्लाह का बंदा मानकर ही पूजते है।

सतयुग में ऋषि विश्वामित्र ने तो अपने योग बल से एक नकली स्वर्ग ही बना दिया था। इतना सामर्थ्य होने के बाद भी उन्हें केवल एक बहुत बड़ा योगी ही माना जाता है, भगवान् नहीं! अगस्त्य मुनि ने पूरे खारे सागर को ही पी लिया था (कुम्भोदार अगस्त्य मुनि) लेकिन इतना महान चमत्कार दिखाने के बाद भी अगस्त्य को ईश्वर या ब्रह्म नहीं माना गया!

प्रश्न ये है कि इनमें से कौनसा चमत्कार इस बहिष्कृत सिंधी शिया मुस्लिम साईं बाबा ने दिखाया था जो इसे भगवान् ही मान लिया ? अगर चमत्कार दिखाया भी होता तो इसे केवल एक महान योगी और ईश्वर भक्त ही माना जा सकता था, ईश्वर तो स्वप्न में भी नहीं ?

अब अगर वेदों में प्रतिपादित भगवान् विष्णु हमारी लौकिक और तुच्छ मनोकामनाओं को फटाफट पूर्ण न कर सकें तो कोई बात नहीं; हम हिन्दू सौदेबाज लम्पट हैं। हमारे भगवान् वही है जो हमारी इच्छाओं को पूर्ण करे। फिर चाहे हमें पाकिस्तान के सिंध प्रांत से आये मानसिक बीमार मुस्लिम चाँद मियाँ उर्फ साई को ही क्यों न पूजना हो; जिसे उसकी बिरादरी वालों ने इसलिए निकाल दिया था कि वो ‘अनलहक अनलहक'(मैं अल्लाह हूँ, मैं अल्लाह हूँ) बकता रहता था। वही चाँद मियाँ महाराष्ट्र के शिरडी प्रान्त में मस्जिद में जैसे तैसे जीवन काटता था छोटे मोटे चमत्कार पाखंड दिखाकर। विचित्र है कि जो बात उसकी कौम वालों ने नहीं मानी वो आज के सेक्युलर हिन्दू मूर्ख तुरंत मान गए (कि वो भगवान् है)।

वैसे भी आज के वर्तमान हिन्दू समाज में किसी भी तरह की कोई लाज/शर्म तो है ही नहीं ! क्योंकि वैसे भी हज़ारों सालों से गुलामी के आदि हो चुके हैं। अब आज के सेक्युलर हिन्दू के पास स्वाभिमान नाम जैसा कुछ बचा नहीं है; सो हम इस कौम से बेदखल किये हुए साई बाबा को अपने नए भगवान् के रूप में पूजें। और हाँ इस मुस्लिम, अवैदिक, अपौरानिक साई बाबा को पूजने के बाद भी हम हिन्दू धर्मावलंबी ही कहलायेंगे और हिंदुओं के माथे पर काला दाग लगाएंगे!

अब और क्या बचा है? राम नवमी को हम अयोध्या या फिर राम मंदिर नहीं जाएंगे बल्कि नवविकसित तीरथ शिरडी जायेंगे और राम की जगह इस शिया मुस्लिम साई को साई ॐ साई राम (अर्थात माता जानकी के पति) कहकर पूजेंगे। हम हिन्दु इस ‘निष्कासित सिन्धी मुस्लिम साईबाबा’ को तो अब ‘भगवान् राम जो कि सनातन परब्रह्म है’ – उनके रूप में पूज रहे हैं न!

पाकिस्तान में बचे 1.8% हिंदूओ को 70 साल बाद मैरिज एक्ट का झुनझुना थमाया गया

ताकि उनको White Tiger की तरह संरक्षण कर, पाकिस्तान में पर्यटन को बढ़ावा दिया जा सके!

ब्लॉग : ( संजय कुमार, यूनाइटेड हिन्दी डॉट कॉम ) :- 1947 में गांधी के कुकर्मों से जन्मे पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान में बचे 1.8% हिंदूओ को 70 साल बाद मैरिज एक्ट का झुनझुना थमाया गया ताकि उनको White Tiger की तरह संरक्षण कर, पाकिस्तान में पर्यटन को बढ़ावा दिया जा सके और यह दुनिया को दिखाया जा सके कि ये बचे पाकिस्तानी हिंदू उस उन्नत आर्य संस्कृति और सभ्यता की देन है जिनके पुर्वज श्रीराम, लव-कुश, श्रीकृष्ण, अर्जुन, बुद्ध हुआ करते थे। जिस सभ्यता-संस्कृति​ से मोहनजोदड़ो​ जैसी उन्नत शहर – सभ्यता निकली थी। जिसके खुदाई से इसी हिंदूओ के धर्मिक प्रतीक “स्वास्तिक” और पशुपति की मुर्तियां मिली है।

उसी तरह एक बंग्लादेश है जहां आज से 70 साल पहले 30% हिंदू हुआ करते थे जो अब सिर्फ 8-9% बचे है। यहां भी ये विलुप्त होने वाले है। फिर जब 2% बच जायेंगे तो यहां भी White Tiger बचाओ की तरह अभियान चलाया जायेगा ताकि शांति दुतो के देश में इनको पिजड़े में बंद कर, पर्यटन को बढ़ावा दिया जा सके।

इसी आर्य संस्कृति का विश्व में एक बहुसंख्य राष्ट्र भारत भी अभी बचा है जहां की पिढ़ी अपने मुल से कटकर, अपनी सभ्यता, संस्कृति और स्वतंत्रा को बचाये रखने के लिए संघर्ष करती दिख रही है क्योंकि इस भारत को सेकुलर बनने का एक ऐसा भयंकर रोग लग चुका है जिससे इसके पुर्वी​ (बंगाल) और दक्षिण (केरल) क्षेत्र भयंकर पिड़ित हो, अपने मरणासन्न की अवस्था में अपने उधार के लिए किसी नायक की आश में है। वैसे इनको एक और रोग है। कभी के कर्मयोग के सिद्धांत को जाति मे बदल। वह हर बात में अपनी-२ जाति खोजते हैं जिससे इनकी एकता भंग होती है और कमजोर साबित होते है।

एक उन्नत सभ्यता और संस्कृति का ऐसा भी हष्र हो सकता है क्योंकि वह पश्चिम से आये विघटनकारी विचारों के बहकावे और अत्याचार से अपनी ज्ञान, विज्ञान, प्राकृति, शुरवीरता को भुल, हीन भावना की शिकार होती गयी है।

लेकिन आज 21वी सदी की युवा पिढ़ी जागरूक हो रही है वह क्षणिक स्वार्थों का त्याग कर, एकताबद्ध हो रही है जो एक सुखद संदेश है।

जागते रहो जगाते रहो!

इस्लाम मजहब से जुड़ जाते ही एक दो पीढ़ियों के व्यक्ति की सोच में ही कैसा फर्क पड़ता है ?

लेकिन यही हिन्दू जब मुसलमान बन गए तो ५:४८ या १३:३१ में कही यही बात को पूर्ण और अंतिम सत्य तो मानते ही हैं।

ब्लॉग: ( केशर देवी, एडिटर – यूनाइटेड हिन्दी डॉट कॉम ) अगर कोई कृष्णभक्त कहे कि कृष्ण ने कहा है कि मैं चाहता तो हर किसी को मेरा भक्त ही पैदा करता लेकिन तुम्हारी परीक्षा लेने के लिए अलग अलग बनाए हैं। जो मुझे नहीं मानेंगे उनपर विपदाओं के पहाड़ टूटेंगे ये मेरा वादा रहा। पता नहीं कितने हिन्दू उसकी सुनते और पता नहीं कितने हिन्दू उसे क्या क्या सुनाते। इतना तो अवश्य सुनाते कि ये तेरा कृष्ण कैसा भगवान है रे, जो दुनिया में लोगों के बीच अपने को ही भगवान मानने के लिए खूनखराबा करवा रहा है ? खुद ही सब को अपना भक्त बनाकर न भेजता ? जो मारे जा रहे हैं उनके घरवालों की हाय का भागी कौन ?

लेकिन यही हिन्दू जब मुसलमान बन गए तो कुरान की आयात ५:४८ या १३:३१ में कही यही बात को पूर्ण और अंतिम सत्य तो मानते ही हैं और उसे सत्य कराने के लिए हथियार भी उठाते हैं और खुद से हथियार न उठे तो जो उठाये उनके लिए अपना धन लुटा रहे हैं क्योंकि वे कुरान आयात ९:३५ से ९:४० को भी इतना ही अंतिम सत्य मानते हैं।

कैसा फर्क पड़ता है व्यक्ति के सोच में, एक दो पीढ़ियों में ही ? कितनी प्रोग्रामिंग होती होगी दिमाग की जो तर्क और तथ्य से चलना छोड़ देता है आदमी ?

यहाँ वो बंदरों वाले प्रयोग का किस्सा याद आता है जहाँ उंचाई पर टंगे केले के घड को एक भी बन्दर के छूते ही सब पर जोर से पानी की धार मारी जाती थी। इसके चलते सब के दिमागों में ये बात प्रोग्राम हो गई कि केले के घड को छूना नहीं है। यहाँ तक कि जब धार मारना बंद हो गया तब भी वे सब न खुद छूते थे न किसी दूसरे बन्दर को छूने देते थे, उस पर हमला कर देते थे। एक एक करके सब बन्दर बदल दिए गए, लेकिन सब में यही भाव बना रहा, कोई भी बन्दर दूसरे बन्दर को केले के घड को छूने से रोकता ही था।

देखने लायक बात यह थी कि बाकी बातों में बन्दर नार्मल थे, बस वो ऊपर टंगे केले के घड़े के बारे में सोचने से भी खुद को ही रोक रहे थे।

कुछ ऐसी ही बात हिन्दू के सेक्युलर हो जाने से होती है जो वो भी ऐसी बातों पर सवाल उठाने से डरता है। हाँ, वेद, पुराण, उपनिषदादि पर आलोचना करते वक्त उसको कोई रोक नहीं सकता, खुद का घोर अज्ञान भी नहीं।

डार्विन बाबा बन्दर को मानव का पूर्वज मानते थे आप को पता ही होगा! और हाँ, मदारियों का धर्म या मजहब क्या होता है यह भी देखिये कभी नाम पूछकर ?

कुछ कहेंगे ? सहमत हैं तो शेयर या कोपी पेस्ट का अनुरोध तो है ही …. 

इस प्रश्न को हिन्दू-मुस्लिम विवाद का रूप देने वालों को तत्काल जेल में बन्द कर देना चाहिए

यह शुद्ध रूप से राजनैतिक मसला हो गया है।नहीं तो वास्तविकता तो हर मुसलमान जनता है।आम मुसलमान भूमि छोड़ना भी चाहे तो कथित मुस्लिम धर्म ठीकेदार ऐसा नहीं होने देंगे।

ब्लॉग : विनय झा ( यूनाइटेड हिन्दी डॉट कॉम ) :- बाबरी मस्जिद के नीचे विशाल हिन्दू मन्दिर के साक्ष्य भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने सर्वोच्च न्यायालय को सौंप दिया था जिसपर सर्वोच्च न्यायालय वर्षों से कुण्डली मारकर बैठी है और अब कहती है कि (इस पुरातात्विक साक्ष्य को किनारे करके) “बातचीत” द्वारा हल ढूँढना चाहिए !

सर्वोच्च न्यायालय ने ही रामजन्मभूमि मन्दिर के साक्ष्य माँगे थे जिसपर पहले तो मनमोहन सरकार ने कहा था कि राम जी काल्पनिक हैं, जिस कारण पुरातात्विक उत्खनन हुआ, और अब उस साक्ष्य को सर्वोच्च न्यायालय द्वारा ही अनदेखा किया जा रहा है ।

यही कारण है कि बाबरी एक्शन कमिटी को सर्वोच्च न्यायालय पर पूरा भरोसा है। क्या आप लोगों को सर्वोच्च न्यायालय पर पूरा भरोसा है ?

बाबरी एक्शन कमिटी का कहना है कि बातचीत से कोई हल नहीं निकलेगा, अदालत को फैसला करना चाहिए, जबकि हिन्दुत्ववादियों ने बातचीत का स्वागत किया है।

मस्जिद में अल्लाह या मुहम्मद साहब पैदा नहीं हुए थे और न ही उनकी मूर्ति की प्राणप्रतिष्ठा की जाती है, मस्जिद केवल नमाज पढने की सुविधा हेतु बनाया स्थान है जिसे आवश्यकता पड़ने पर विस्थापित करने से मजहब को कोई क्षति नहीं पंहुचती। किन्तु रामजन्मभूमि को अन्यत्र विस्थापित करना असम्भव है। यह साधारण बात बाबरी एक्शन कमिटी और मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के पल्ले नहीं पड़ती, पुरातात्विक साक्ष्य भी उनके लिए बेमतलब हैं। वे भली-भांति जानते हैं कि श्रीराम के मन्दिर को तोड़कर मस्जिद बनाया गया था, फिर भी मस्जिद हटाने के लिए तैयार नहीं हैं।

अतः मामला गुण्डागर्दी का है, मजहब का नहीं ! इस्लाम तो नहीं कहता कि हिन्दू मन्दिर को तोड़कर उसके मूर्ति वाली दीवारों द्वारा मस्जिद बनाना चाहिए। जिस बाबरी मस्जिद को 1992 में तोड़ा गया था उसके प्रवेश द्वार के एक खम्बे का एक फोटो मैं संलग्न कर रहा हूँ जो सिद्ध करता है कि प्राचीन हिन्दू मन्दिर की दीवारों और खम्बों द्वारा ही बाबरी मस्जिद बनी थी (यह फोटो और अनेक अन्य फोटो 1992 में ही मस्जिद टूटने से कुछ पहले एक सांसद द्वारा लोकसभा में दिखाए गए थे)।  जिस मस्जिद की दीवारों में हिन्दू मूर्तियाँ हों उसे मस्जिद नहीं माना जा सकता, उसमें नमाज पढ़ना कुफ्र है। अतः जो लोग बाबरी मस्जिद में नमाज पढ़ना चाहते हैं वे काफिर हैं। बाबरी एक्शन कमिटी के नेताओं ने भी बाबरी मस्जिद में कभी नमाज नहीं पढ़ी, वे लोग केवल हिन्दूओं का मानमर्दन करने की जिद ठाने हुए हैं। सुब्रह्मण्यम स्वामी भी यह बात अदालत को नहीं बता पा रहे हैं कि हिन्दू मन्दिर के अवशेषों से बने मस्जिद में नमाज नहीं पढ़ा जा सकता।

जिन हिन्दू मन्दिरों को तोड़कर वहाँ मस्जिदें बनायी गयी वहाँ पुनः मन्दिर बनाना ही पडेगा। इस प्रश्न को हिन्दू-मुस्लिम विवाद का रूप देने वालों को जेल में बन्द कर देना चाहिए, क्योंकि महमूद गजनवी और बाबर जैसे विदेशी डाकुओं द्वारा मन्दिरों का ध्वंस करने का मामला है, भारतीय मुस्लिम बनाम हिन्दू का मामला नहीं है।

ब्लॉग : पीएम नरेंद्र मोदी के अंधविरोधी हैं उनकी सबसे बड़ी शक्ति

मोदी के अंधविरोधी हैं उनकी सबसे बड़ी ताकत

ब्लॉग : Neeraj Badhwar (facebook Coyp) :- बीजेपी को यूपी में 325 सीटें मिलने के बाद से बहुत से लोग इसे लेकर काफी हैरान हैं। ये वो लोग हैं जो ‘स्थानीय लोगों’ से की गई बातचीत और ‘ज़मीनी हालात’ के आधार पर बीजेपी की हार का दावा और दुआ कर रहे थे। और जब योगी आदित्यनाथ वहां मुख्यमंत्री बन गए, तो ये समझ नहीं पा रहे कि ऐसा कैसे हो गया?

इसी तरह की हैरानी इन्हें तब भी हुई थी जब 3 साल पहले नरेंद्र मोदी अपने दम पर प्रधानमंत्री बन गए थे। यूं तो मैं ज़्यादा लंबा लिखने से बचता हूं मगर अब इस वर्ग की हैरानी इतनी दयनीय लगने लगी है कि सोचा अपने भी कुछ विचार साझा कर लूं।

पहली बात उन पत्रकारों की हैरानी के बारे में जो दावे तो कुछ और कर रहे थे और हुआ कुछ और। उनसे मुझे ये कहना है कि भाई आप किसी भी मुद्दे पर तय निष्कर्ष के साथ अपनी ही सोच वाले मेहमान बुलाकर अगर ‘निष्पक्ष’ चर्चा करोगे तो उस चर्चा से वही निकलकर आएगा जो आप चाहोगे।

अगर आप खुद से अलग सोच रखने वाले व्यक्ति को सोशल मीडिया के हर प्लेटफॉर्म पर ब्लॉक करते रहोगे, तो आप उन ही लोगों से घिर जाओगे जो आप जैसा सोचते होंगे या आपकी ही सोच का गुणगान करते होंगे। अब ऐसे लोगों की संगत से आप किसी ‘ज़मीनी हकीकत’ का अंदाज़ा लगाएंगे, तो आप खुद को अंधेरे में रखेंगे और ये अंधेरा आपकी टीवी स्क्रीन से भी ज़्यादा गहरा और काला होगा ।

अब बात करते हैं बीजेपी की जीत की। मुझे ईमानदारी से लगता है कि 2014 में जब प्रधानमंत्री पद के लिए मोदी की उम्मीदवारी सामने आई थी, तो बहुत से लोग उनमें एक ईमानदार प्रशासक तो देखते थे मगर इस बात का भरोसा बहुत कम लोगों को था कि वो बीजेपी को बहुमत दिला सकते हैं। मगर इसके बाद साम्प्रदायिकता के नाम पर उन्हें विपक्षी दलों, मीडिया और ख़ास वर्ग की तरफ से इतनी गालियां दी गईं कि इन गालियों ने उनके लिए वो काम कर दिया जो खुद मुख्यमंत्री रहते उनका काम भी नहीं कर पाता!

मगर अंध विरोधियों के ये बात न तब समझ आई थी न अब आई है। उन्हें ये मामूली बात समझ नहीं आई कि मोदी को मोटे तौर पर लोगों ने विकास के एजेंडे पर ही चुना था और अगर उन्हें मोदी को किसी मुद्दे पर घेरना है तो वो भ्रष्टाचार और विकास से ही जुड़ा हो सकता है।

मगर ये तो तर्क की बात हो गई। और जब हम किसी से नफरत करते हैं, तो तर्क तो इस्तेमाल की जाने वाली आखिरी चीज़ होती है। आप बीवी को साथ न रखने के लिए उनका मज़ाक बनाओगे, विदेश यात्राओं के लिए खिल्ली उड़ाओगे, कपड़ों के लिए तंज कसोगे। इस तरह से जितने non issue थे हर किसी को issue बनाने की कोशिश की गई। दादरी जैसे अपवाद को देश का करंट स्टेटस बताकर उसे बढ़ती असहिष्णुता से जोड़ा गया। अवॉर्ड लौटाए गए, कन्हैया कुमार पैदा किए गए, स्क्रीनें काली की गईं। खुद ही एक दूसरे की पीठी खुजा और थपथपाकर ये तसल्ली भी कर ली गई कि हम सही रास्ते पर जा रहे हैं मगर हुआ क्या?

मैं हमेशा ये कहता हूं कि जनता बड़ी संयमी होती है। वो सरकारों के विश्लेषण करने में वैसी बेसब्र और पूर्वाग्रही नहीं होती जैसा एक ख़ास वर्ग होता है। जब तक उसे लगता है कि सरकार की नीयत साफ है, वो ईमानदारी से काम कर रही है, जो कर सकती थी कर रही है,तब तक लोगों का उस पर भरोसा डगमगाता नहीं।

उससे भी बड़ी बात पत्रकारों या धार्मिक कट्टरपंथियों के उलट आम आदमी को किसी नेता को खारिज ही नही करना होता, उसे चयन भी करना होता है। आप कहते हैं मोदी बुरा है… मोदी बुरा है…तो…अच्छा कौन है…राहुल गांधी!

बड़ा ताज्जुब होता है कि जिस राहुल गांधी ने सक्रिय राजनीति में आने के बाद कांग्रेस को दो दर्जन से ज़्यादा चुनाव हरवा दिए, उसकी ये वर्ग चर्चा नहीं कर रहा। पंजाब में केजरीवाल के हारने पर उसे दिल्ली में उनके काम पर मिले जनादेश के तौर पर नहीं देख रहा मगर ये सवाल ज़रूर पूछ रहा है कि योगी आदित्यनाथ को सीएम क्यों बना दिया? लोगों ने तो विकास के लिए बीजेपी को वोट दिया था।

भाई इतनी तो राजनीतिक समझ पैदा करो जब जनता किसी पार्टी को तीन चौथाई से भी ज़्यादा समर्थन देती है, वो भी यूपी जैसे राज्य में, तो वो समर्थन नहीं देती बल्कि अपने भरोसे का समर्पण करती है। वो कहती है कि भरोसा किया है चाहो जो कर लो। मगर अब भी बजाए इस जनसमर्थन को समझने के इस नुख्ताचीनी में लगे हैं कि घर का शुद्धीकरण क्यों करा दिया, सांसद को मुख्यमंत्री क्यों बना दिया।

मार्क ट्वेन ने कहा था गुस्सा उस तेजाब की तरह होता है जो जिस प्याले में होता है उसे ही सबसे ज़्यादा नुकसान पहुंचाता है। किसी के प्रति नफरत भी वैसे ही होती है। तभी तो देखिए न जो मोदी 2014 में प्रधानमंत्री बनते नहीं दिख रहे थे उन्हें प्रधानमंत्री बनवा दिया और जो बीजेपी पिछली बार 50 सीटें नहीं ला पाई थी वो सवा तौन के पार चली गई। और ये सब हुआ है तो इसमें मोदी का कम और उनके इन अंधविरोधियों का प्रताप ज़्यादा है!

कभी सोचा है कि इतने आधातों को सहकर भी आज हिन्दू कैसे बचे हैं, ये धर्म कैसे बचा है?

आपने कभी सोचा है कि इतने आधातों को सहकर भी हम आज हिन्दू कैसे बचे हैं ? हमारा धर्म कैसे बचा है ? फोटो Source : santabanta.com

ब्लॉग : महावीर प्रसाद खिलेरी (संपादक यूनाइटेड हिन्दी डॉट कॉम) : हिन्दू समाज शायद दो हज़ार सालों से गुलाम रहा है! हमारे ऊपर सदियों तक इस्लामी शासन रहा फिर कई रूपों में ईसाईयों ने हम पर शासन किया फिर 1947 में जब देश तथाकथित रूप से आजाद हुआ तब हमसे हमारा धर्म छीनने मिशनरी लोग आ गये, लालच दिया, कई जगह डर दिखाया, कई जगह अहसान जता कर उसकी कीमत मत-परिवर्तन के रूप में वसूलनी चाही, हमारे ऊपर न जाने कितने मोपला और मीनाक्षीपुरम हुए। आपने कभी सोचा है कि इतने आधातों को सहकर भी हम आज हिन्दू कैसे बचे हैं ? हमारा धर्म कैसे बचा है ?

आज हम हिन्दू इसलिये हैं क्योंकि हमारे पूर्वजों ने अपना धर्म नहीं छोड़ा। डर, हिंसा, प्रपंच, लालच, षड्यंत्र सबके बीच सदियों तक संघर्ष करते रहे। हमारे एक पूर्वज इधर राजस्थान में घास की रोटी खाकर हिन्दू धर्म बचा रहे थे तो उधर पंजाब में हिन्दू धर्म को बचाने के लिये कुछ पूर्वज जीवित ही दीवार में चुनवा दिये गये। अपने उन पूर्वजों के बारे में भी दो मिनट सोचिये जिन्होनें धर्म बदलने की जगह मैला उठाने के काम को चुना था। हकीकत राय के बलिदान के बारे में सोचिये, दक्षिण भारत की माँ रुद्र्माम्बा देवी के त्याग का स्मरण कीजिये, पूरब के वीर लाचित बरफूकन का स्मरण कीजिये और न जाने ऐसे कितने नाम है जिन्होनें अपना सर्वस्व खो कर हिन्दू धर्म को बचाये रखा। ये सब किसी एक जाति-विशेष के नहीं थे !

आप योगी जी की प्रशासनिक क्षमता पर सवाल इसलिये नहीं उठा रहे कि आपको वास्तव में इस बात की कोई फ़िक्र है कि वो शासन कैसे चलायेंगे! दरअसल वजह ये है कि योगी जी में आपने किसी ठाकुर को ढूंढ लिया है जो आपको पीड़ा दे रहा है। योगी जी के ऐब आप इसलिये ढूंढ रहें हैं क्योंकि मोदी जी ने आपके जात वाले को मुख्यमंत्री नहीं बनाया। इसी तरह जब आप योगी जी को ठाकुर अजय सिंह विष्ट लिख रहें हैं तो आप उन्हें एक जाति विशेष से बाँध रहें हैं, जाहिर है फिर बाकी जाति वाले भी उन्हें उसी रूप में लेंगें।

अपनी जातिवादी मानसिकता में जब हम किसी के बारे में कुछ लिखतें हैं, किसी जाति के मूल पर प्रश्न उठाते हैं तो एक बार ये भी सोच लीजिए कि आपने गाली किसको दी है ? आप उनको गाली दे रहें हैं उनके कारण हम हैं वर्ना हम भी आज पीटर या जुम्मन बनकर जी रहे होते ! वो पूर्वज चाहे किसी भी जाति के हों पर वो सब हमारे लिये वन्दनीय है क्योंकि उन्होंने हमारे लिये उस धरोहर (हिंदुत्व) को सहेजे रखा जिसका अनुपालन मनु, परशुराम, श्रीराम, श्रीकृष्ण, श्री बुद्ध से लेकर गुरु गोविन्द सिंह करते थे।

हम या आप जिस जाति में पैदा हुयें हैं वो हमारी या आपकी चॉइस नहीं थी, भगवान की मर्जी थी। ईश्वर की मर्जी पर जो सवाल उठाये, उसके सृजन को किसी भी रूप में लांछित करे उससे कृतघ्न और अज्ञानी कोई नहीं हो सकता। मैं कभी किसी दलित को गाली नहीं देता, इसलिये नहीं कि वो गलत नहीं हो सकते बल्कि इसलिये क्योंकि इतने दंशों, अत्याचारों और प्रलोभनों को सह कर भी आज वो हिन्दू है। इस देश की मुख्य-धारा में है और कम से कम हमारे अस्तित्व को लीलने वाला खतरा नहीं है। मैं कभी किसी क्षत्रिय को गाली नहीं देता क्योंकि उनके पूर्वजों ने सदियों तक हमारे भारत की अखंडता अक्षुण्ण रखने के लिये बलिदान दिया है। मैं किसी ब्राह्मण को गाली नहीं देता क्योंकि दुनिया में भारत को विश्व-गुरु बनाने का गौरव उनके पूर्वजों का था। मैं किसी वैश्य को गाली नहीं देता क्योंकि इन्होंनें अपनी धन-संपत्ति राष्ट्र-रक्षा में कई बार न्योछावर की है। इसी तरह मैं अपने किसी वनवासी बंधू को अपमानित करने का भी पाप नहीं करता, ये तो तबसे धर्म रक्षक रहें हैं जब भगवान राम इस धरती पर आये थे।

अपने जातिगत पूर्वाग्रहों को छोड़िये वरना प्रकृति सौभाग्य को दुर्भाग्य में बदलने में जरा भी देर नहीं करती।