ब्लॉग : पीएम नरेंद्र मोदी के अंधविरोधी हैं उनकी सबसे बड़ी शक्ति

मोदी के अंधविरोधी हैं उनकी सबसे बड़ी ताकत

ब्लॉग : Neeraj Badhwar (facebook Coyp) :- बीजेपी को यूपी में 325 सीटें मिलने के बाद से बहुत से लोग इसे लेकर काफी हैरान हैं। ये वो लोग हैं जो ‘स्थानीय लोगों’ से की गई बातचीत और ‘ज़मीनी हालात’ के आधार पर बीजेपी की हार का दावा और दुआ कर रहे थे। और जब योगी आदित्यनाथ वहां मुख्यमंत्री बन गए, तो ये समझ नहीं पा रहे कि ऐसा कैसे हो गया?

इसी तरह की हैरानी इन्हें तब भी हुई थी जब 3 साल पहले नरेंद्र मोदी अपने दम पर प्रधानमंत्री बन गए थे। यूं तो मैं ज़्यादा लंबा लिखने से बचता हूं मगर अब इस वर्ग की हैरानी इतनी दयनीय लगने लगी है कि सोचा अपने भी कुछ विचार साझा कर लूं।

पहली बात उन पत्रकारों की हैरानी के बारे में जो दावे तो कुछ और कर रहे थे और हुआ कुछ और। उनसे मुझे ये कहना है कि भाई आप किसी भी मुद्दे पर तय निष्कर्ष के साथ अपनी ही सोच वाले मेहमान बुलाकर अगर ‘निष्पक्ष’ चर्चा करोगे तो उस चर्चा से वही निकलकर आएगा जो आप चाहोगे।

अगर आप खुद से अलग सोच रखने वाले व्यक्ति को सोशल मीडिया के हर प्लेटफॉर्म पर ब्लॉक करते रहोगे, तो आप उन ही लोगों से घिर जाओगे जो आप जैसा सोचते होंगे या आपकी ही सोच का गुणगान करते होंगे। अब ऐसे लोगों की संगत से आप किसी ‘ज़मीनी हकीकत’ का अंदाज़ा लगाएंगे, तो आप खुद को अंधेरे में रखेंगे और ये अंधेरा आपकी टीवी स्क्रीन से भी ज़्यादा गहरा और काला होगा ।

अब बात करते हैं बीजेपी की जीत की। मुझे ईमानदारी से लगता है कि 2014 में जब प्रधानमंत्री पद के लिए मोदी की उम्मीदवारी सामने आई थी, तो बहुत से लोग उनमें एक ईमानदार प्रशासक तो देखते थे मगर इस बात का भरोसा बहुत कम लोगों को था कि वो बीजेपी को बहुमत दिला सकते हैं। मगर इसके बाद साम्प्रदायिकता के नाम पर उन्हें विपक्षी दलों, मीडिया और ख़ास वर्ग की तरफ से इतनी गालियां दी गईं कि इन गालियों ने उनके लिए वो काम कर दिया जो खुद मुख्यमंत्री रहते उनका काम भी नहीं कर पाता!

मगर अंध विरोधियों के ये बात न तब समझ आई थी न अब आई है। उन्हें ये मामूली बात समझ नहीं आई कि मोदी को मोटे तौर पर लोगों ने विकास के एजेंडे पर ही चुना था और अगर उन्हें मोदी को किसी मुद्दे पर घेरना है तो वो भ्रष्टाचार और विकास से ही जुड़ा हो सकता है।

मगर ये तो तर्क की बात हो गई। और जब हम किसी से नफरत करते हैं, तो तर्क तो इस्तेमाल की जाने वाली आखिरी चीज़ होती है। आप बीवी को साथ न रखने के लिए उनका मज़ाक बनाओगे, विदेश यात्राओं के लिए खिल्ली उड़ाओगे, कपड़ों के लिए तंज कसोगे। इस तरह से जितने non issue थे हर किसी को issue बनाने की कोशिश की गई। दादरी जैसे अपवाद को देश का करंट स्टेटस बताकर उसे बढ़ती असहिष्णुता से जोड़ा गया। अवॉर्ड लौटाए गए, कन्हैया कुमार पैदा किए गए, स्क्रीनें काली की गईं। खुद ही एक दूसरे की पीठी खुजा और थपथपाकर ये तसल्ली भी कर ली गई कि हम सही रास्ते पर जा रहे हैं मगर हुआ क्या?

मैं हमेशा ये कहता हूं कि जनता बड़ी संयमी होती है। वो सरकारों के विश्लेषण करने में वैसी बेसब्र और पूर्वाग्रही नहीं होती जैसा एक ख़ास वर्ग होता है। जब तक उसे लगता है कि सरकार की नीयत साफ है, वो ईमानदारी से काम कर रही है, जो कर सकती थी कर रही है,तब तक लोगों का उस पर भरोसा डगमगाता नहीं।

उससे भी बड़ी बात पत्रकारों या धार्मिक कट्टरपंथियों के उलट आम आदमी को किसी नेता को खारिज ही नही करना होता, उसे चयन भी करना होता है। आप कहते हैं मोदी बुरा है… मोदी बुरा है…तो…अच्छा कौन है…राहुल गांधी!

बड़ा ताज्जुब होता है कि जिस राहुल गांधी ने सक्रिय राजनीति में आने के बाद कांग्रेस को दो दर्जन से ज़्यादा चुनाव हरवा दिए, उसकी ये वर्ग चर्चा नहीं कर रहा। पंजाब में केजरीवाल के हारने पर उसे दिल्ली में उनके काम पर मिले जनादेश के तौर पर नहीं देख रहा मगर ये सवाल ज़रूर पूछ रहा है कि योगी आदित्यनाथ को सीएम क्यों बना दिया? लोगों ने तो विकास के लिए बीजेपी को वोट दिया था।

भाई इतनी तो राजनीतिक समझ पैदा करो जब जनता किसी पार्टी को तीन चौथाई से भी ज़्यादा समर्थन देती है, वो भी यूपी जैसे राज्य में, तो वो समर्थन नहीं देती बल्कि अपने भरोसे का समर्पण करती है। वो कहती है कि भरोसा किया है चाहो जो कर लो। मगर अब भी बजाए इस जनसमर्थन को समझने के इस नुख्ताचीनी में लगे हैं कि घर का शुद्धीकरण क्यों करा दिया, सांसद को मुख्यमंत्री क्यों बना दिया।

मार्क ट्वेन ने कहा था गुस्सा उस तेजाब की तरह होता है जो जिस प्याले में होता है उसे ही सबसे ज़्यादा नुकसान पहुंचाता है। किसी के प्रति नफरत भी वैसे ही होती है। तभी तो देखिए न जो मोदी 2014 में प्रधानमंत्री बनते नहीं दिख रहे थे उन्हें प्रधानमंत्री बनवा दिया और जो बीजेपी पिछली बार 50 सीटें नहीं ला पाई थी वो सवा तौन के पार चली गई। और ये सब हुआ है तो इसमें मोदी का कम और उनके इन अंधविरोधियों का प्रताप ज़्यादा है!

लव-जिहाद की शिकार करीना ने दिया सैफ को लेकर दे दिया बड़ा बयान !!!

सैफ अली खान, कंगना रानौत और शाहिद कपूर जैसे बड़े सितारों से सजी फिल्म रंगून बड़े पर्दे पर औंधे मुंह गिरी है। बॉक्सऑफिस पर फिल्म के कलेक्शन की बात करें तो फिल्म फ्लॉप साबित हुई है। फिल्म अपनी रिलीज के पांच दिनों में सिर्फ 17 करोड़ की कमाई करने में सफल रही है।

जबकि ‘रंगून’ के पहले रिलीज हुई फिल्म ‘जॉली एलएसबी 2’ ने 5 दिनों में 66.79 करोड़ की कमाई कर ली थी। जिस हिसाब से रंगून बुरी तरह पिटती नजर आ रही है। कंगना, शाहिद, सैफ की फिल्मी करियर को देखें तो फिलहाल शाहिद और सैफ को एक अदद हिट की काफी जरूरत है।

अगले पर देखें करीना ने सैफ और शहीद को लेकर क्या बयान दिया !

‘Intolerance’ की मिसाल वामपंथियों से भी बड़ी कोई हो सकती है क्या ?

ब्लॉग: ( पारिजात सिन्हा ) :- फ्रैंज काफ्का ने कुछ यूं कहा था कि बस आपको प्रतीक्षा करनी होती है और सामने वाले के मुखौटे अपने आप उतरने लगते हैं । अपने ‘फ्रीडम ऑफ़ स्पीच’ की दुहाई देने वाले इन वामपंथियों का ‘लिबरल’ मुखौटा कुछ समय से तेजी से उतरा है और इनका ‘इनटॉलेरेंस’ तब खुल कर सामने आया है जब मामला दूसरों की फ्रीडम ऑफ़ स्पीच का रहा है :-

– मुंबई के एक संस्थान में राजीव मल्होत्रा को बोलने से रोकने के लिए ये वामपंथी हाथापाई पर उतर आते हैं ।

– दिल्ली के श्रीराम कॉलेज में एक संविधान-सम्मत मुख्यमंत्री की स्पीच को रोकने के लिए ये वामपंथी-जमात सारी हदें पार कर जाती है ।

– दिल्ली के ही जामिया में स्त्री-अधिकार के विषय पर आयोजित एक परिचर्चा में आमंत्रण के बावजूद शाजिया इल्मी को परिचर्चा में हिस्सा लेने से आख़िरी मिनट में रोक दिया जाता है ।

– जेएनयू में आमंत्रित बाबा रामदेव को ये बोलने नहीं देते ।

– जेएनयू और कलकत्ता में विवेक अग्निहोत्री को वामपंथी-जमात उनकी फिल्म ‘बुद्धा इन ट्रैफिक जाम’ के प्रदर्शन को रोक देती है ।

– सेना के सम्मानित और रिटायर्ड जेनेरल बख्शी समेत कई समानित अतिथियों द्वारा पाकिस्तान को बे-नकाब करते एक कार्यक्रम को ये पाखंडी रद्द करवा देते हैं ।

– “कला और राजनीति की असंबद्धता” की दुहाई देते हुए पाकिस्तानी कलाकारों के बैन का विरोध करने वाले ये वही वामपंथी हैं जिन्होंने दिल्ली में आयोजित इंटरनेश्नल आर्ट फेस्टिवल में इस्रायली थिएटर ग्रुप ‘कैमेरी’ के वहिष्कार के लिए ये लिखित दुहाई दी थी की कला को राजनीति से अलग कर के नहीं देखा जा सकता ।

– दिल्ली में सुब्रमण्यम स्वामी को स्पीच देने से रोकने के लिए ये वामपंथी हंगामा कर बैठते हैं ।

– तारेक फतह के साथ मारपीट और उनके फ्रीडम ऑफ़ स्पीच पर हमले पर ये वामपंथी गैंग चुप्पी लगा जाता है ।

– तसलीमा नसरीन को बोलने से रोकने के लिए उनके साथ मारपीट की जाती है लेकिन ये वामपथी-गिरोह मुंह बंद कर लेता है ।

– अब आप बताइये कि ‘इल्लिबरल’ वामपंथी-गैंग के इस वैचारिक-दोगलेपन और ‘इनटॉलेरेंस’ की मिसाल कहीं और मिलेगी क्या ?

( फ्रेंज काफ्का के शब्द उनकी पुस्तक “The Zurau Aphorism” से)

गुरमेहर मामला: जावेद अख्तर ने कहा अनपढ़ तो फोगाट बहनों ने यूं दिया जवाब

नई दिल्ली, 1 मार्च। भारतीय क्रिकेट टीम के दिग्गज बल्लेबाज वीरेंद्र सहवाग ने भले ही गुरमेहर को लेकर किए अपने ट्वीट पर सफाई दे दी हो लेकिन अब भी इस मसले पर ट्विटर वॉर जारी है। मंगलवार को मशहूर गीतकार जावेद अख्तर ने गुरमेहर के समर्थन में एक ट्वीट किया तो भारतीय पहलवान योगेश्वर दत्त इस पर गुस्सा गए। योगेश्वर ने जावेद अख्तर के ट्वीट का अपने ही अंदाज में जवाब दिया। योगेश्वर के बाद फोगाट बहनों ने भी जावेद अख्तर को जवाब दिया है।

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जावेद अख्तर ने गुरमेहर के समर्थन में किए गए ट्वीट में लिखा, ‘अगर कम पढ़े-लिखे खिलाड़ी और पहलवान एक शहीद की बेटी को ट्रोल करते हैं तो समझ आता है लेकिन जो पढ़े लिखे हैं, उनका क्या?

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इस पर बबीता ने जवाब देते हुए कहा है कि मैंने जब स्कूल देखा भी नहीं था तबसे भारतमाता की जय बोल रही हूं। देशभक्ति किताबों से नहीं आती। बबीता के साथ उनकी बहन गीता ने भी ट्वीट कर कहा कि सर देशभक्ति किताबों से नहीं आती।

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बबिता-गीता के अलावा निर्देशक मधुर भंडारकर ने भी जावेद अख्तर की बात से असहमति जताई। उन्होंने लिखा- अभिव्याक्ति की आजादी से अशिक्षा का कोई लेना-देना नहीं है। मैं एक छठी फेल स्टूडेंट हूं, फिर भी कोई मुझे मेरी राय रखने से नहीं रोक सकता।

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जावेद अख्तर के इस ट्वीट पर पहलवान योगेश्वर दत्त नाराज हो गए। योगेश्वर ने जावेद अख्तर के ट्वीट पर जवाब दिया और लिखा,’ जावेद जी, आपने कविता-कहानी की रचना की तो हमने भी कुछ कारनामे कर छोटा ही सही भारत के लिए विश्वपटल पर इतिहास रचा है। योगेश्वर ने अपने इस ट्वीट में वीरेंद्र सहवाग को भी टैग किया।

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आगे: जावेद अख्तर को महावीर फोगट और अनुपम खेर का मुंहतोड़ जवाब

टट्टी खाकर सूअर कितना हृष्ट-पुष्ट रहता है! अतः मनुष्यों को भी टट्टी खाना चाहिए!

ब्लॉग: ( विनय झा ) यूनाइटेड हिन्दी डॉट कॉम के पाठकों के लिए स्पेशल : देशद्रोहियों में इतनी हिम्मत है कि सरेआम राजधानी की सड़कों पर देश के विरुद्ध नारेबाजी कर लेते हैं और उन्हें दण्डित करने की हिम्मत सरकार नहीं दिखा रही है। इसका एकमात्र कारण यह है कि अभी भी बहुमत देशवासी सरकार के साथ नहीं हैं |

पिछले लोक सभा चुनाव में भाजपा को कितने मत मिले थे ? उनमें भी कितने लोग ऐसे थे जिन्होंने जीवनभर भाजपा का विरोध किया किन्तु पिछली सरकार के भ्रष्टाचार से आजिज आकर इस बार भाजपा को वोट दिया।

वह वोट हिन्दुत्व का समर्थक नहीं है | कोई सरकार अपने मतदाताओं के विरुद्ध नहीं जा सकती | अतः दोष मतदाताओं का है | उन्हें सुधारने के लिए शिक्षा और मीडिया को सुधारना पडेगा जिसमें बहुत समय लगेगा और जिसे सुधारने का सामर्थ्य अकेले भाजपा में नहीं है | जनता को जागरूक करने के लिए आप/हमारे जैसे सामान्य नागरिकों का भी दायित्व बनता है |

→ केन्द्र सरकार को सुझाव कैसे भेजें : भाजपा राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सभी सदस्यों की ईमेल ID भाजपा के वेबसाईट पर है, उसमें प्रधानमन्त्री को छोड़कर सभी प्रमुख नेता हैं, जैसे कि राजनाथ सिंह और अमित शाह, PMO को सुझाव भेजने का वेबसाईट गूगल सर्च से मिल जाएगा | अधिक लम्बे सन्देश कोई नहीं पढ़ेगा | कम शब्दों में सार्थक और व्यवहारिक सुझाव भेजें जिन्हें लागू करना सम्भव हो |

मोदी के विरुद्ध सारी पार्टियां एकजुट हो गयीं, आडवाणी के नेतृत्व में भाजपा भी, तो मोदी के पक्ष में बाँकी देश इकट्ठा हो गया और मोदी को जिता दिया |

अब ABVP के विरुद्ध सारे छात्र संगठन एकजुट होकर कश्मीर और नक्सल-बहुल (बस्तर जैसे) क्षेत्रों की आज़ादी के लिए एकजुट हो रही हैं ! शुभ संकेत है, लगता है शीघ्र ही सभी विश्वविद्यालयों में ABVP की शक्ति इतनी बढ़ जायेगी कि देशद्रोही तत्वों पर मुकदमा करने की भी आवश्यकता नहीं पड़ेगी !

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वाशिंगटन पोस्ट ने शलभ कुमार पर छापी ‘गलत’ खबर, भारतीय-अमेरिकी खफा

वाशिंगटन पोस्ट ने भारतीय अमेरिकी बिजनेस मैन शलभ कुमार को लेकर एक खबर छापी थी। जिसमें बताया गया था कि वह ट्रंप के खासमखास हैं और हिंदूवादी विचारधारा को लगातार बढ़ाने की जुगत में लगे हुए हैं। ऐसे में ट्रंप से उनकी नजदीकी को मोदी सरकार भी भुनाने की कोशिश में है और उन्हें अमेरिका का एंबेसडर बनाया जा सकता है। वाशिंगटन पोस्ट की इस लेख में शलभ कुमार को लेकर कई तथ्यों को शामिल किया गया है और बताया गया है कि वह हिंदुओं को लेकर अपना दृष्टिकोण स्पष्ट तौर पर पेश करते हैं और इसी का प्रभाव है कि वह ट्रंप के चहेते लोगों में से हैं। इसी वजह से भारत की नरेंद्र मोदी सरकार अमेरिका में उन्हें बड़ी जिम्मेवारी सौंपने की तैयारी है। अमेरिका में रह रहे हिंदू लोगों के संगठन ने इस खबर को सिरे से खारिज करते हुए लिखा है कि यह मनगढ़ंत खबर है और इसका वास्तविकता से कोई लेना देना नहीं है। इस खबर को लिखे जाने को लेकर वाशिंगटन पोस्ट से रिपब्लिकन हिन्दू कोअलिशन के लोगों ने माफी की भी मांग की है।

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वाशिंगटन पोस्ट की इस खबर को लेकर अमेरिकी संसद के एक सदस्य ने भी इस खबर को सिरे से खारिज कर दिया है। अखबार को अपनी तरफ से कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए लिखा है कि भारत और अमेरिका के बीच संबंधों को मजबूत करने की दिशा में शलभ कुमार हमेशा से प्रयासरत रहे हैं ऐसे में उनके ऊपर किसी भी तरह का सवाल खड़ा करना वाजिब नहीं है। उल्लेखनीय है कि इस बार ट्रंप सरकार का नारा भी शलभ कुमार ने हीं दिया था। जिस कारण ट्रंप को भारतीय अमेरिकन समुदाय के लोगों का अभूतपूर्व समर्थन प्राप्त हुआ था।

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इससे पहले शलभ कुमार कई मुद्दों पर मुखर होकर अपनी राय देते रहे हैं। खासकर आतंकवाद के मुद्दे पर वह खुलकर बोलने से कभी भी पीछ नहीं रहे हैं। हाल ही में उन्होंने कहा था कि अमेरिका-भारत गठबंधन आतंकवाद के लिए एक ‘‘प्रचंड’’ खतरा है।

रिपब्लिकन हिन्दू कोअलिशन के संस्थापक शलभ कुमार ने ब्रीटबर्ट न्यूज से कहा था कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एकसाथ मिलकर अब आतंकवादियों के सबसे बड़े शत्रु हैं। दोनों प्रतिबद्ध राष्ट्रवादी हैं और दोनों ही जनता के लिए अधिक नौकरियों तथा आर्थिक वृद्धि के लिए आगे बढ़ने की इच्छा रखते हैं।

अपने जमाने में कई महिलाओं के साथ शारीरिक संबंधों के लिए

नोबेल पुरस्कार विजेता और मशहूर कवि रवींद्रनाथ टैगोर के बारे में तो सब लोग जानते होगे. लेकिन उनकी प्रेम कहानी के बारे में बहुत कम लोग हैं जो जानते है. रवींद्रनाथ टैगोर और अर्जेंटीना की प्रसिद्ध लेखिका विक्टोरिया ओकैंपो की प्रेम कहानी। 

सन 1914, अर्जेंटीना में 25-26 साल की एक लड़की ने फ्रेंच में रवींद्रनाथ टैगोर की  किताब गीतांजलि पढ़ी. विक्टोरिया टैगोर की लेखनी की मुरीद हो गई. उसके बाद से विक्टोरिया रवींद्रनाथ टैगोर से मिलने के लिए बेताब हो गई. वो कोई सामान्य लड़की नहीं थी बल्कि बहुत बड़ी नारीवादी लेखिका एक साहित्यिक मैग्जीन की एडिटर, सांस्कृतिक कार्यकर्ता भी थी. वो वहां की पहली महिला थी जिसे अर्जेंटीना एकेडमी ऑफ लैटर्स का सदस्य भी बनाया गया था। 

1924 में विक्टोरिया की टैगोर से मुलाकात की तमन्ना पूरी हुई. रवींद्रनाथ टैगोर उस वक्त पेरु की यात्रा पर थे, रास्ते में बीमार हुए तो आराम करने के लिए उन्हें ब्यूनस आयर्स में रुकना पड़ा. विक्टोरिया को जैसे ही ये खबर मिली वो उनसे मिलने पहुंच गईं. टैगोर को ठहराने के लिए वहां एक कमरा किराए पर लिया जहां वो 2 महीने से ज्यादा रुके थे.

आगे पढ़िए 34 साल की विक्टोरिया को कैसे हुआ 63 साल के टैगोर से प्यार

आत्महत्या से पहले 60 पन्नों के सुसाइड नोट में AP के पूर्व मुख्यमंत्री कलिखो पुल नें खोली थी कांग्रेस की पोल कहा..

कायदे से भारत की राजनीति में आज भूचाल होना चाहिए। इसलिए कि अरुणाचल प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिवंगत कलिखो पुल के 60 पन्नों के सुसाइड नोट में देश की सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी कांग्रेस के कई नेताओं के नाम हैं। उन्होंने कई मशहूर वकीलों और जजों के नाम भी लिखे हैं, जिनकी ओर से उनसे संपर्क किया गया था और फैसले बदलने के लिए मोटी रकम मांगी गई थी। उन्होंने दिन, तारीख और समय के साथ पूरा विवरण लिखा है। 60 पन्नों का नोट हिंदी में लिखा गया है और टाइप किए गए हर पन्ने पर पुल ने बाकायदा दस्तखत किए हैं। इसलिए इसे बनाया हुआ यानि फर्जी दस्तावेज भी करार नहीं दिया जा सकता है।

जी हाँ इस सुसाइड नोट में कुछ ऐसा लिखा हुआ है जो कई लोगों को बेनकाब कर देगा..यह सुसाइड नोट भ्रष्टाचार के खिलाफ एक व्यक्ति का निजी चार्जशीट है..देश में हो रहे इसी भ्रष्टाचार नें पूर्व मुख्यमंत्री को आत्महत्या करने के लिए विवश किया था..इस नोट में अरुणाचल प्रदेश के कई बड़े नेताओं, सुप्रीम कोर्ट के सिटींग जज, कांग्रेस पार्टी के कई बड़े नेताओं के अलावा भी प्रदेश के कई सरकारी अधिकारीयों का कच्चा चिटठा लिखा हुआ है|

अगले पेज पर देखें वीडियो और जानिए कैसे कांग्रेस नें कलिखो पुल पर लगाये थे कैसे संगीन आरोप जिसकी वजह से..

एक अलग मुल्क बनाने वाले जिन्ना की बेटी ने जब एक गैर-मुस्लिम के लिए कर दी अपने पिता से बगावत

मोहम्मद अली जिन्ना चाहते थे कि हिंदुस्तान से अलग मुस्लिमों के लिये एक देश बने जहाँ हिंदुस्तान के सारे मुस्लिम एक साथ रहें। उनका सपना सच तो हुआ लेकिन पूरी तरह से नहीं मुस्लिमों के लिए पाकिस्तान नाम से एक नया मुल्क तो जरुर बना पर भारत के सारे मुस्लिम वहां नहीं गए. जिन्ना को लगा था कि भारत के सारे मुस्लिम पाकिस्तान आ जाएंगे लेकिन वो गलत साबित हुए।

जिन्ना को इससे भी बड़ा झटका इस बात से लगा कि उनकी बेटी ने एक मुस्लिम से शादी न करके एक पारसी से शादी कर ली। बंटवारे के बाद उनकी बेटी हिंदुस्तान आकर रहने लगी। वो आज भी भारत में ही रहती हैं। कहा जाता है कि इस घटना का जिन्ना पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ा था।

अगले पेज पर जानें, क्यों टूटा जिन्ना का परिवार 

जब एक कलयुगी बाप ने अपने और अपने बेटी के पवित्र रिश्ते को किया तार-तार, बेटी ने रोते-रोते बताया कि कैसे हर रात…

आये दिन हमे महिलाओं के साथ हो रहे यौन उत्पीड़न के मामले सुनाई देते ही हैं| ऐसे में अगर खबर आये बाप के द्वारा अपनी ही बेटी के यौन उत्पीड़न का तो? जहाँ एक बाप फ़र्ज़ होता है की वह अपनी बेटी की बहुत ही जिम्मेदारी से परवरिश करे, उसे प्यार दे, उसके जीवन की हर कठिनाइयों में उसका साथ दे ऐसे में इन सब बातो से परे होकर एक कलयुगी पिता ने बाप-बेटी का रिश्ता शर्मशार कर दिया|
बाप बेटी के इसी पवित्र रिश्ते को शर्मसार करती हुई ये कहानी आरोन मध्यप्रदेश की है | आरोन पुलिस ने एक 48 वर्षीय व्यक्ति को उसकी बेटी के शिकायत के बाद गिरफ्तार किया है| यौन शोषण की शिकार बेटी ने पुलिस को बताया कि उसका पिता पिछले 2 वर्ष से शारीरिक शोषण कर रहा था जिसमे वो हर रात उसके साथ…

अगली स्लाइड में जानिए पीड़ित बेटी ने बतायी अपने शोषण से जुड़ी कुछ ऐसी दिल दहला देने वाली बातें जिसे सुनकर…