मोदी एक हिजड़ा है, और अगर ऐसा नहीं है तो मेरे साथ हमबिस्तर होकर अपनी मर्दानगी साबित करे…

छत्तीसगढ़- छत्तीसगढ़ के बस्तर जिले में वामपंथी महिला संगठनों की नेता कामरेड कविता कृष्णन ने आज फिर भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर तीखी टिप्पणी की है। उन्होंने कहा कि भारत का प्रधानमंत्री अमेरिका के इशारे पर 1000 और 500 का नोट बंद कर दिया है, जिससे हमारे बस्तर में रहने वाले आदिवासी भाइयों को आज भुखमरी का सामना करना पड़ रहा है। 

उधोगपतियों का अरबों-खरबों का टैक्स माफ करने वाला यह प्रधानमंत्री देशद्रोही है गद्दार है। जो प्रधानमंत्री अपनी पत्नी का नहीं हुआ वह देश का कैसे होगा। यह देश का दुर्भाग्य है कि भारत को नरेंद्र मोदी जैसा नपुंसक प्रधानमंत्री मिला।

कविता कृष्णन ने अपने इस महिला सम्मेलन में आदिवासी महिलाओं को संबोधित करते हुए कहा कि हम महिलाओं को फ्री सेक्स की आजादी चाहिए। हमें किसी भी पुरुष के साथ सेक्स करने की आजादी चाहिए। हम महिलाएं किसी भी मनपसंद पुरुष के साथ शारीरिक संबंध बनाकर अपने काम वासना की पूर्ति कर सकें। जब पुरुष किसी भी महिला के साथ शारीरिक संबंध बना सकता है, तो हम महिलाओं को भी अधिकार होना चाहिए, हम लोग भी किसी भी मनचाहे पुरुष के साथ शारीरिक संबंध बना सकें।

अगले पृष्ठ : कविता कृष्णन ने कहा कि….  

अब इजाज़त लेकर करेंगे श्रीराम की पूजा ? हिंदुओं की आस्था से खिलवाड़ आसान ?

ताल ठोक के: अब इजाज़त लेकर करेंगे श्रीराम की पूजा ? हिंदुओं की आस्था से खिलवाड़ आसान ?

बंगाल में आज होने वाले राम नवमी समारोह पर ममता सरकार ने बंगाल में रोक लगा दी थी| जिसके बाद लोग कलकत्ता हाईकोर्ट भी गए और कोर्ट ने इस रोक को खारिज कर दिया है| अब सवाल ये उठता है की ऐसी नौबत आई ही क्यों ? क्या ममता बनर्जी अपने हिसाब से लोगों के धर्म को चलाएंगी|

यह बात सुनकर ममता बनर्जी खुद के गिरेवान पर झाँकने को हो जायेंगी मजबूर…

बंगाल में आज होने वाले राम नवमी समारोह पर ममता सरकार ने बंगाल में रोक लगा दी थी| जिसके बाद लोग कलकत्ता हाईकोर्ट भी गए और कोर्ट ने इस रोक को खारिज कर दिया है| अब सवाल ये उठता है की ऐसी नौबत आई ही क्यों ? क्या ममता बनर्जी अपने हिसाब से लोगों के धर्म को चलाएंगी|

ममता बनर्जी ने अपने एक ब्यान में कहा की राम नवमी कोई दंगा फसाद करने का मौका नहीं है बल्कि मानवता और प्रेम का त्यौहार है| ममता बनर्जी का कहना है की मेरी सरकार बंगाल में सांप्रदायिक भावनाए पनपने नहीं देगी| ये कोई पहला मौका नहीं है जब ममता ने हिन्दुओं की आस्था को ठेस पहुचाई हो, इससे पहले भी वे दुर्गा पूजा पर भी रोक लगा चुकी है| इससे तो यही अंदाज़ा लगाया जा सकता है की वोट बैंक के खातिर ममता ने श्री राम के नाम का फायेदा उठाकर उन्ही पर चोट लगा दी है|

इस पर भी ममता का कहना था की राम नवमी के दिन भगवान् राम की पूजा होती है और भगवान् राम रावण का वध करने के लिए अवतरित हुए थे यह दिन प्यार का प्रतीक है और हमारे बंगाल में पुराण और कुरान दोनों के लिए जगह है न की सिर्फ एक धर्म के लिए|

वहीँ ममता बनर्जी द्वारा मुस्लिमों के हित में और हिन्दुओं के खिलाफ बातें सुनते ही बीजेपी प्रवक्ता संबित पात्रा बिलकुल भी नहीं रुके थामें और सीधा ममता बनर्जी पर निशाना साधते हुए संबित पात्रा ने ममता बनर्जी की धजियाँ उड़ा दी|

संबित ने कहा की ममता बनर्जी चाहे जितनी मर्जी नमाज अदा कर लें लेकिन उनका नाम हमेशा इतिहास में जय चन्द के ही नाम से लिया जायेगा| साथ ही संबित ने बंगाल के मुसलमानों से गुज़ारिश करते हुए कहा की आप लोगों से विनती है की ममता बनर्जी की बातों में न आयें क्योंकि जो इंसान अपने धर्म का न हुआ वो आपका क्या होगा यह सब वोट बैंक के लिए हो रहा है|

देखें वीडियो-

आपको बता दें की ममता बनर्जी के राज में जिस तरह पुरे बंगाल में हिन्दुओं का दमन हो रहा है अगर ऐसा ही चलता रहा तो वो दिन भी दूर नहीं जब बंगाल हिन्दुओं के लिए दूसरा कश्मीर बन जाएगा|

जिसे अपनी ढाल बनाया था उसी राम जेठमलानी ने अपने इस बयान से केजरीवाल को कहीं का नहीं छोड़ा!

अरुण जेटली मानहानि केस में केजरीवाल के वकील राम जेठमलानी ने एक बड़ा ही चौंकाने वाला खुलासा किया है जिससे केजरीवाल की मुश्किलें बढ़ सकती हैं।

अरविन्द केजरीवाल ने हाल ही में पूरी दिल्ली की जनता को धोखा दिया है जिसके बाद से अधिकांश लोगों का केजरीवाल से भरोसा उठ गया है l अरविन्द केजरीवाल अपने केस के लिए सरकारी पैसे का इस्तेमाल करना चाहते थे, लेकिन उन्होंने जिस वकील को केस लड़ने के लिए दिया था उन्होंने ही केजरीवाल के बारे में ऐसा खुलासा किया है कि अब उनका बचना नामुमकिन है l

राम जेठमलानी ने अपने एक बयान में कहा है कि “मैंने आडवाणी, अमित शाह और बाल ठाकरे जैसे बड़े नेताओं के लिए भी केस लड़ा है लेकिन उनसे एक रुपया भी फीस के नाम पर नहीं लिया। केजरीवाल के मामले में सफाई देते हुए उन्होंने कहा कि मैंने तो केजरीवाल से भी फीस के लिए नहीं कहा था लेकिन जब उन्होंने मुझपर जोर डाला तो मैंने बिल बनाकर भेज दिया।” इसके साथ ही जेठमलानी ने ये भी कहा कि उन्होंने केजरीवाल को फीस में डिस्काउंट दिया है।

इसके बाद उन्होंने बताया कि, मैं अन्य क्लायंट्स से कई तरह के टैक्सेज की फीस लेता हूं,वो भी मैंने मांगी ही नहीं है,  ।उन्होंने केजरीवाल को पेशी की फीस भी कम बताई है। इसके अलावा हर पेशी के बाद होने वाली कॉन्फ्रेंस के लिए भी मैंने कोई पैसा नहीं मांगा है।

जेठमलानी फीस के लिए दवाब नही डाल रहे तो केजरीवाल सरकारी खजाने से पैसा क्यों निकालना चाहते हैं? जब जेठमलानी फीस में रियायत भी दे रहे हैं तो आखिर केजरीवाल 3.8 करोड़ का बिल LG के पास क्यों भेज रहे हैं? कहीं जेठमलानी के नाम पर केजरीवाल जनता का पैसा तो नही खाना चाहते?a

आपको बता दें कि फीस मुद्दे पर जब विवाद ज्यादा बढ़ गया था तो राम जेठमलानी ने कहा था कि अगर दिल्ली सरकार उनकी फीस देने में अक्षम है, तो वह मुफ्त में केजरीवाल के केस लड़ेंगे। उन्होंने तंज कसते हुए कहा था कि मैं गरीबों का केस मुफ्त में लड़ता है और केजरीवाल को गरीब मानकार ही केस लडूंगा l

शर्मनाक: वो बच्चा वहां एम्बुलेंस में मौत से लड़ रहा था और इधर इस VIP का काफिला….

आजकल के समय के हिसाब से सही ही कहा गया है कि हम इस भागदौड़ भरी ज़िन्दगी में इंसान की जान की कोई कीमत नहीं समझते और शायद तभी तो कभी सड़क लहूलुहान पड़े इंसान के साथ फोटो खींचना लोगों को ज़्यादा ज़रूरी लगता है तो कभी एम्बुलेंस रोक कर वीआईपी लोगों की गाड़ी गुजरने के लिए की जान से खेलना आजकल ट्रेंड बनता जा रहा है|

ऐसा ही एक दुर्भाग्यपूर्ण मामला सामने आया है जहाँ एक बार फिर दिल्ली पुलिस का यह ग़ैरज़िम्मेदाराना रवैये ने लोगों को गहरा झटका दिया है| दरअसल दिल्ली के इंदिरा गांधी राष्ट्रीय स्टेडियम के सामने एक एम्बुलेंस को आगे बढ़ने से रोक दिया गया क्योंकि वहां से एक वीआईपी काफ़िला गुज़र रहा था| एम्बुलेंस एक ज़ख़्मी, खून से लथपथ बच्चे को अस्पताल लेकर जा रही थी|

सोशल मीडिया पर ये वीडियो इस वक़्त वायरल हो रहा है| इस वीडियो में स्पष्ट रूप से दिख रहा है कि पुलिस ने रास्ता रोक रखा है और आस-पास खड़े लोग पुलिस से एम्बुलेंस को आगे जाने देने के लिए कोशिश कर रहे हैं| घटना दिल्ली के इंदिरा गांधी राष्ट्रीय स्टेडियम के गेट संख्या 14 के सामने आईपी एस्टेट की है| उस मार्ग से मलेशिया के प्रधानमंत्री का काफ़िला गुज़रने वाला  था| पुलिस ने बैरिकेड लगाकर रास्ता रोक रखा था|

देखिये वीडियो: 

हालाँकि इस पूरे मामले में पुलिस का कहना है कि वो लोग सिर्फ प्रोटोकॉल और आदेशों का पालन कर रहे थे| एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि वह एम्बुलेंस भीड़ में काफी पीछे फंसी थी जिसे उनके द्वारा गाड़ियों की पंक्ति में सबसे आगे लाया गया और कुछ ही मिनटों में उसे रवाना भी कर दिया गया|

रिपोर्ट पढ़िये: भारतीय मीडिया का ज्ञान कितना घटिया है, देश की असलियत से कितने कटे हुए हैं….

ब्लॉग : पुष्पेंद्र राणा ( यूनाइटेड हिन्दी डॉट कॉम ) :-  अवैध बूचड़खानों की बंदी का विरोध कर विपक्ष, मीडिया, महानगरों में बैठे तथाकथित बुद्धिजीवियों ने ना केवल अपनी बेवकूफी का प्रदर्शन किया है बल्कि उनका ज्ञान कितना सिमित है और महानगरो से बाहर के भारत की असलियत से कितने कटे हुए हैं इस सच्चाई के दर्शन भी करा दिए हैं।

लेकिन दुर्भाग्य यह है कि अधिकतर समर्थक भी इस मुद्दे से ठीक से परिचित नही है ?
पहली बात तो मुद्दा सिर्फ गौ हत्या का नही था ! गौ हत्या पर उत्तर प्रदेश में पहले से ही कानूनी प्रतिबन्ध है। हालांकि सपा और बसपा की सरकारों में इस कानून की धज्जियां उड़ाई गई और बड़े पैमाने पर सरकारी संरक्षण में गौहत्या की जाती रही।

लेकिन गौ हत्या से भी बड़ा मुद्दा (विशेषकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश के लिये) भैंसों के अवैध कटान का रहा है। उदाहरण के लिये कुछ साल पहले तक मेरठ में शहर के बीचों बीच सरकारी कमेला होता था जिसे हर साल नगर निगम मामूली रकम के एवज में याकूब कुरैशी और शाहिद अख़लाक़ जैसे कसाई नेताओ को ठेके पर देता था। मेरठ शहर की रोजाना की मांस की खपत 250 भैंस की है और इसीलिए इस कमेले में कानूनी रूप से रोजाना 250-300 भैंस काटे जाने की अनुमति थी लेकिन स्थानीय मीडिया रिपोर्ट के अनुसार इसमें रोजाना 5-7 हजार तक भैंस काटी जाती थी। इसके अलावा कई हजार मेरठ शहर के एक हिस्से के गली मुहल्लों में बने छोटे कमेलो में कटती थी। मेरठ शहर के मुस्लिम बहुल इलाकों का यह हाल है कि वहां पानी में भी खून आता है। दुर्गन्ध और बीमारियों की वजह से कई इलाको से लोग पलायन कर गए। कोर्ट ने कई सालों पहले ही इस कमेले को बंद करने और शिफ्ट करने का आदेश दिया हुआ था लेकिन उसे हटाने की इक्षाशक्ति किसी सरकार में नही थी।

सबसे बड़ी बात ये है कि ये सारा मांस गल्फ में एक्सपोर्ट होता था। लोकल सप्लाई के लिये इतने कटान की आवश्यकता नही थी ! याकूब कुरैशी और शाहिद अख़लाक़ जैसे नेता रातो-रात करोड़पति से खरबपति हो गए। बसपा की सरकार में तो इनका खुद का ही राज था। सुविधा अनुसार पार्टी भी बदल लेते थे। पैसो और सत्ता के दम पर इन्होंने मेरठ में आतंक कायम किया। सपा में आजम खान की वजह से इनकी दाल नही गली क्योंकि उसकी कसाईयो से नही बनती थी। आजम खान ने मेरठ की पीड़ित मुस्लिम जनता की गुहार पर कमेला शहर से बाहर शिफ्ट करवा दिया। हालांकि याकूब कुरैशी जैसे इतने पैसे वाले हो गए कि उन्होंने खुद अपने आधुनिक संयंत्र स्थापित कर लिए लेकिन इनमे अवैध कटान चालू रहा।

अगले पृष्ठ पर पढ़िये : बिसाहड़ा जैसे कितने काण्ड हुए

शहीद हुए तो अकेले भगत ही हीरो क्यों ? सिर्फ इसलिए कि वो जेल में लेनिन को पढते थे ।

भगत के मिट्टी की खुशबू हम सबके जेहन में रच-बस चुकी है, तुम्हारे षड्यंत्र अब सफल नहीं होंगे….

ब्लॉग : शिवेश प्रताप ( यूनाइटेड हिन्दी डॉट कॉम ) :- ॥ कड़वा सच ॥

जब भगत सिंह के साथ राजगुरु और सुखदेव भी बराबर शहीद हुए तो अकेले भगत ही हीरो क्यों ? सिर्फ इसलिए कि वो जेल में लेनिन को पढते थे ।

दरअसल “केवल भगत सिंह” का ही महिमामण्डन करना दूषित राष्ट्र वाद और वामपंथी मुस्लिम विचारधारा पर खडे सामाजिक विज्ञान को सह देना है ।

आजादी के पहले से ही मुसलमान बिकाऊ रहे और अंग्रेजी हुकूमत की चाटुकारिता में रहे । आजादी के बाद इस्लाम पोषित वामपंथी दरअसल हिंदुओं के राष्ट्रवादी विचारों के तोड़ के रूप में एक सिख भगत सिंह को हीरो के रूप में ज्यादा हाईलाइट कर एक तीर से कई निसाने साधते रहे । जिसमें सिखों को वामपंथ की ओर मोड़ देश को तोड़ा जाए भी एक कारण है । दूसरा कि क्रांति नायक के रूप में भगत को खडा कर चंद्रशेखर आजाद के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के स्वरूप को भी मंद किया जाए । दरअसल वामपंथियों को चंद्रशेखर के जनेऊ से हमेशा समस्या रही ।

भगत सिंह के बलिदान का मैं बहुत सम्मान करता हूँ पर “केवल भगत सिंह” के अतिशय महिमा मंडन के खिलाफ हूँ । सुखदेव और राजगुरु का बलिदान भगत से रत्ती भर कम नहीं है ।

और यदि बलिदान की बात है तो फिर यह देश सबसे कम उम्र में फांसी पर चढे खुदीराम बोस को सिर्फ इसलिए भूल जाता है कि वो हिंदू थे ???

कृपया वामपंथी कुचक्र से बाहर निकल कर तीनों वीर बलिदानियों को बराबर सम्मान देकर नोटों पर छापने की बात करें । अकेले भगत क्यों ?

बीएसएफ जवान तेज बहादुर यादव की मौत की खबर का सच आया सामने….

तेज बहादुर यादव पूरी तरह स्वस्थ हैं, मौत की खबरें पाकिस्तानियों का एजेंडा : बीएसएफ

नई दिल्ली (यूनाइटेड हिन्दी डॉट कॉम): कुछ महीने पहले भारतीय सीमा पर तैनात बीएसएफ के एक जवान ने खाने की गुणवत्ता पर सवाल उठाया और facebook पर एक वीडियो शेयर करके कहा कि बीएसएफ में जवानों को अच्छा खाना नहीं दिया जाता है ! बीएसएफ ने तत्काल उसपर जांच बिठाई और आरोपों को नकार दिया। लेकिन अब यह बात सामने आ रही है कि पाकिस्तान में सोशल मीडिया पर यह बताया जा रहा है कि भारत में यह शिकायत करने वाले जवान की मौत हो चुकी है। वहीं, बीएसएफ ने सोशल मीडिया पर जवान तेज बहादुर यादव की मौत की तस्वीरों को पूरे तौर पर सिरे से खारिज कर दिया है। बीएसएफ ने कहा है कि तेज बहादुर यादव पूरी तरह स्वस्थ हैं। दरअसल सोशल मीडिया पर घूम रही कुछ तस्वीरों में बीएसएफ में खान-पान की शिकायत करने वाले जवान तेज बहादुर की मौत की झूठी खबर प्रचारित की जा रही है। इन तस्वीरों में तेजबहादुर को चोटें लगी हुईं भी नज़र आ रही हैं।

pakistani tweet on tej bahadur

पाकिस्तान में सोशल मीडिया पर बीएसएफ जवान तेज बहादुर को लेकर चल रहा ट्वीट…

बीएसएफ का कहना कि ज़ाहिर है यह तस्वीरें फ़र्ज़ी प्रोपेगेंडा का हिस्सा हैं। पड़ताल में यह पता चला है कि यह प्रोपेगेंडा सीमापार से संचालित हो रहा है। इन तस्वीरों को प्रमुखता से ट्वीट करने वाले लोगों के सोशल मीडिया अकाउंट्स इसकी तस्दीक करते हैं कि वे पाकिस्तान के हैं।

यूनाइटेड हिन्दी डॉट कॉम ने इसी वायरल खबर की जाँच पड़ताल की तो पता चला की तेजबहादुर यादव के मौत की जो तस्वीर चलाई जा रही है वो सुकमा में मारे गए 12 जवानों में से किसी एक जवान की है ।

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तेजबहादुर के मौत की जो तस्वीरें इस फेसबुक में दिखाई जा रही है वो किसी और जवान की है। तेजबहादुर यादव के मौत की जो तस्वीर चलाई जा रही है वो 11 मार्च को सुकमा में मारे गए 12 जवानों में से किसी एक जवान की है।

टीम ने इस बारे में तेजबहादुर यादव की पत्नी से भी बात की है। उन्होंने ने भी तेजबहादुर के मौत की खबर को झूठी खबर कहा और यह बताया कि तेजबहादुर पूरी तरह स्वस्थ हैं।

साथ ही बीएसएफ का भी कहना कि जाहिर है यह तस्वीरें फर्जी प्रोपेगेंडा का हिस्सा हैं। जांच में यह पता चला है कि यह प्रोपेगेंडा सीमापार से संचालित हो रहा है।

कम्युनिस्ट खेमे के इन इतिहासकारों ने भगत सिंह की इस तरह से की निर्मम हत्या…

भगत के मिट्टी की खुशबू हम सबके जेहन में रच-बस चुकी है, तुम्हारे षड्यंत्र अब सफल नहीं होंगे….

ब्लॉग : ( अभिजीत सिंह, यूनाइटेड हिन्दी डॉट कॉम ) :- 1931, फरवरी-मार्च का महीना, सेन्ट्रल जेल, लाहौर के 14 नम्बर वार्ड में फाँसी की प्रतीक्षा कर रहे बंदियों में से एक ने अपनी माँ को एक पत्र लिखा। माँ ने बेटे का पत्र खोला तो उसमें लिखा था, माँ, मार्च की 23 तारीख को तेरे बेटे की शादी है, आशीर्वाद देने जरूर आना। माँ सोचने लगी जेल में तो लडकियाँ होती नहीं तो फिर ये पगला किससे प्यार कर बैठा, कहीं किसी जेलर की बेटी पर तो मेरे बेटे का दिल नहीं आ गया ? माँ से पूछे बिना बेटा शादी कर लेगा इस आशंका से पीड़ित माँ ने तस्दीक करने के लिये अपने छोटे भाई को भेजा, जा जरा देख के आ कि ये किस कुड़ी को दिल दे बैठा है। कैदी ने मिलने आने वाले को एक कागज पर कुछ लिख कर दिया और कहा, इसे माँ को दे देना और ध्यान रहे इसे और कोई न खोले। माँ ने बेटे का पत्र खोला तो लिखा था, मेरी होने वाले दुल्हन का नाम है “मौत”।

मौत को माशूका बना लेने वाले इस शख्स का नाम था भगत सिंह। ये वो नाम है जिसके सामने आते ही देशप्रेम और बलिदान मूर्त हो उठता है। भगत वो नाम है जिसकी राह रूप, यौवन और सौन्दर्य नहीं रोक सकी, भगत वो नाम है जिसने एक अत्यंत धनी परिवार से आये विवाह प्रस्ताव को ये कहते हुए ठुकरा दिया था कि मेरा विवाह तो अपने ध्येय के साथ हो चुका है अब दुबारा विवाह क्या करना, भगत वो नाम भी है जिसके लिये उसकी अपनी धार्मिक परंपरा के अनुपालन से अधिक महत्व भारत की आजादी का था। वो चाहता तो फांसी की सजा से बच सकता था पर उसने इसके लिये कोई कोशिश नहीं की, इसलिये नहीं की क्योंकि उसे पता था कि अपना बलिदान देकर वो तो सो जायेगा पर सारा भारत जाग उठेगा और फिरंगी हूकूमत की जड़ उखड़ जायेगी।

जिस हुतात्मा का सिर्फ जिक्र भर आज उसके बलिदान के 86 साल बाद भी युवकों में जोश भर देता है, तो जाहिर है कि वो लोग जिनकी विचारधारा का अवसान हो चुका है वो अगर भगत को अपने खेमे का साबित कर दें तो शायद उनकी मृत विचारधारा कुछ अवधि के लिये जी उठे। इसी सोच को लेकर कम्युनिस्टों ने बड़ी बेशर्मी से भगत सिंह के बलिदान का अपहरण कर लिया। विपिन चन्द्र, सुमित सरकार, इरफान हबीब, रोमिला थापर जैसे वाम-परस्त इतिहासकारों ने सैकड़ों लीटर स्याही ये साबित करने में उड़ेल दी थी कि भगत सिंह तो कम्युनिस्ट थे। भगत के “मैं नास्तिक क्यों हूँ” वाले लेख को बिना किसी आधार का ये लोग ले उड़े और उसे लेनिन के उस कथन से जोड़ दिया जिसमें उसने कहा था कि ‘नास्तिकता के बिना मार्क्सवाद की कल्पना संभव नहीं है और नास्तिकता मार्क्सवाद के बिना अपूर्ण तथा अस्थिर है’।

यानि इनके अनुसार भगत सिंह मनसा, वाचा, कर्मणा एक प्रखर मार्क्सवादी थे। भगत सिंह के प्रति ममत्व जगने के वजह ये भी है कि जिस लेनिन, स्टालिन, माओ-चाओ, पोल पोट वगैरह को वो यूथ-आइकॉन बना कर बेचते रहे थे उनके काले कारनामे और उनके नीतियों की विफलता दुनिया के सामने आने लगी थी और स्वभाव से राष्ट्रप्रेमी भारतीय युवा मानस के बीच उनको मार्क्सवादी आइकॉन के रूप में बेचना संभव नहीं रख गया था इसलिए इन्होने भगत सिंह को कम्युनिस्ट बना कर हाईजैक कर लिया।

इसलिये किसी व्यक्ति के मृत्यु के उपरांत उसकी विचारधारा को लेकर जलील करने का सबसे अधिक काम अगर किसी ने किया है तो वो यही लोग हैं जिन्होनें भगत सिंह जैसे हुतात्मा को कम्युनिस्ट घोषित करने का पाप किया। ऐसे में इस बात की तहकीक भी आवश्यक हो जाती है कि क्या कम्युनिस्टों के मन में हमेशा से भगत सिंह के प्रति आदर था या अपने राजनीतिक फायदे और अस्तित्व रक्षण के लिए उन्होंने उगला हुआ थूक निगल लिया ? भगत सिंह के प्रति कम्युनिस्ट आदर जानने के आवश्यक है कुछ कम्युनिस्टों की किताबों को पढ़ा जाए और भगत सिंह के संबंध में कुछ कम्युनिस्ट नेताओं की स्वीकारोक्तियों को सुना जाए।

अगले पृष्ठ पर जरूर पढ़िये 

बाबरी मस्जिद विवाद और वामपंथी फरेब के कारण हुई राम मंदिर निर्माण में इतने वर्ष की देरी

क्रॉस एग्जामिनेशन में पकड़े गए इनके फरेबों के कुछ दृष्टांत आपको हैरत में डाल देंगे :-

ब्लॉग : ( पारिजात सिन्हा ) :- इलाहाबाद उच्च न्यायालय के ऐतिहासिक फैसले ने विवादित स्थल पर मंदिर होने के शोधपूर्ण वैज्ञानिक निष्कर्षों की पुष्टि तो की ही थी, साथ ही साथ वामपंथी इतिहासकार इरफ़ान हबीब की अगुवाई में मस्जिद-कमिटी की ओर से गवाह के तौर पर पेश हुए देश के तमाम वामपंथी इतिहासकारों के फरेब को उजागर भी किया था । न्यायालय को ये टिप्पणी करनी पडी थी कि इन इतिहासकारों ने अपने रवैये से उलझाव, विवाद, और सम्प्रदायों में तनाव पैदा करने की कोशिश की और इनका विषय-ज्ञान छिछला है । क्रॉस एग्जामिनेशन में पकड़े गए इनके फरेबों के कुछ दृष्टांत आपको हैरत में डाल देंगे :-

(1) वामपंथी इतिहासकार प्रोफ़ेसर मंडल ने ये स्वीकारा कि खुदाई का वर्णन करती उनकी पुस्तक दरअसल उन्होंने बिना अयोध्या गए ही (मामले को भटकाने के लिए ) लिख दी थी ।

(2) वामपंथी इतिहासकार सुशील श्रीवास्तव ने ये स्वीकार किया कि प्रमाण के तौर पर पेश की गयी उनकी पुस्तक में संदर्भ के तौर पर दिए पुस्तकों का उल्लेख उन्होंने बिना पढ़े ही कर दिया है ।

(3) जेएनयू की इतिहास-प्रोफ़ेसर सुप्रिया वर्मा ने ये स्वीकार किया कि उन्होंने खुदाई से संदर्भित ‘राडार सर्वे’ की रिपोर्ट को पढ़े बगैर ही रिपोर्ट के गलत होने की गवाही दे दी थी ।

(4) अलीगढ मुस्लिम यूनिवर्सिटी की प्रोफ़ेसर जया मेनन ने ये स्वीकारा कि वे तो खुदाई स्थल पर गयी ही नहीं थी लेकिन ये (झूठी) गवाही दे दी थी कि मंदिर के खंभे बाद में वहां रखे गए थे ।

अब प्रस्तावित मंदिर का मॉडल ये नजर आयेगा…

(5) ‘एक्सपर्ट’ के तौर पर उपस्थित वामपंथी सुविरा जायसवाल जब क्रोस एग्जामिनेशन में पकड़ी गयीं तब उन्होंने स्वीकार किया कि उन्हें मुद्दे पर कोई ‘एक्सपर्ट’ ज्ञान नहीं है; जो भी है वो सिर्फ ‘अखबारी खबरों’ के आधार पर ही है ।

(6) पुरात्व्वेत्ता वामपंथी शीरीन रत्नाकर ने सवाल-जवाब में ये स्वीकारा कि दरअसल उन्हें कोई “फील्ड-नॉलेज” है ही नहीं ।

(7) “एक्सपर्ट” प्रोफ़ेसर मंडल ने ये भी स्वीकारा था, “मुझे बाबर के विषय में इसके अलावा – कि वो सोलहवीं सदी का एक शासक था – और कुछ ज्ञान नहीं है! न्यायधीश ने ये सुन कर कहा था कि इनके ये बयान विषय सम्बंधित इनके छिछले ज्ञान को प्रदर्शित करते है ।

(8) वामपंथी सूरजभान मध्यकालीन इतिहासकार के तौर पर गवाही दे रहे थे पर क्रॉस एग्जामिनेशन में ये तथ्य सामने आया कि वे तो इतिहासकार थे ही नहीं, मात्र पुरातत्ववेत्ता थे ।

(9) सूरजभान ने ये भी स्वीकारा कि डी एन झा और आर एस शर्मा के साथ लिखी उनकी पुस्तिका “हिस्टोरियंस रिपोर्ट टू द नेशन” दरअसलद खुदाई की रपट पढ़े बगैर ही (मंदिर संबंधी प्रमाणों को झुठलाने के) दबाव में केवल छै हफ्ते में ही लिख दी गयी थी ।

(10) वामपंथी शिरीन मौसवी ने क्रॉस एग्जामिनेशन में ये स्वीकार किया कि उन्होंने झूठ कहा था कि राम-जन्मस्थली का ज़िक्र मध्यकालीन इतिहास में नहीं है ।

दृष्टान्तों की सूची और लम्बी है । पर विडंबना तो ये है कि लाज हया को ताक पर रख कर वामपंथी इतिहासकार रोमिला थापर ने इन्हीं फरेबी वामपंथी इतिहासकारों व अन्य वामपंथियों का नेतृत्व करते हुए न्यायालय के इसी फैसले के खिलाफ लम्बे लम्बे पर्चे भी लिख डाले थे । पर शर्म इन्हें आती है क्या ?

(सन्दर्भ : Allahabad High court verdict dated 30 September 2010 )