जानिये आखिर क्यों मुस्लिम महिलाएं इस्लाम छोड़कर अपना रही है हिन्दू धर्म ?

आजकल ये बहुत देखने को मिल रहा है कि मुस्लिम महिलायें इस्लाम छोड़कर हिन्दू धर्म अपना रही है। आखिर ऐसा क्या है इस्लाम में जो उन्हें धर्म परिवर्तन अपनाने के लिए मजबूर कर रहा है। हाल ही में गाजियाबाद की शबनम नाम की मुस्लिम महिला हिन्दू धर्म अपनाकर दामिनी बन गई। दामिनी के बाद अब और भी पीड़ित मुस्लिम महिलाओं का हौसला बढ़ा है और वे हिन्दू धर्म कि ओर बढ़ रही है।

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शबनम क्यों बनी दामिनी ?
तीन तलाक और हलाला के नियम से दुखी शबनम ने हिंदू धर्म अपना कर दामिनी बन गई। दामिनी इस्लाम धर्म के नाम पर हो रही महिलाओं की दुर्दशा पर खुलकर उद्गार व्यक्त किए। 25 वर्षीय दामिनी ने कहा कि इस्लाम धर्म के नाम पर लगभग सभी मुस्लिम महिलाएं किसी न किसी प्रकार से यातनाएं झेल रही हैं।

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कम उम्र में उनका निकाह कर दिया जाता है, फिर उन पर जल्दी जल्दी बच्चे पैदा करने का दबाव दिया जाता है। बच्चा न पैदा होने पर उन्हें तमाम शारीरिक यातनाएं दी जाती हैं और छोटी छोटी बातों पर तलाक दे दिया जाता है। तलाक देने के बाद महिलाओं की स्थिति और भी बदतर हो जाती है।

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दामिनी का कहना है कि तलाक के बाद शौहर से दोबारा निकाह करने के लिए मुस्लिम समाज द्वारा चलाई गई प्रथा हलाला से गुजरना होता है। उसने बताया कि तलाक के बाद उसके शौहर ने फिर से साथ रहने के लिए उसका हलाला भी कराया और दोस्त के हवाले कर दिया। तीन महीने बाद जब वह पति के पास पहुंची तो उसे स्वीकार करने के बजाय पति ने वेश्यावृत्ति में धकेल दिया।

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विकास के पापा जी… तो फिर आपको कोई हक़ नहीं है कि 80 करोड़ हिन्दुओं को क्या करना चाहिये ?

ब्लॉग : गुजरात दंगों के बाद मुख्यमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी की किस्मत का फैसला करने के लिये अटल जी गये थे। अटल जी ने प्रेस कांफ्रेंस की, मोदी पास बैठे हुए थे। अटल जी न जाने किस सेकुलर भाव में बह गये और बोलना शुरू किया, “राजा के लिये प्रजा-प्रजा में भेद नहीं होना चाहिये, मैं नरेंद्र भाई को राजधर्म निभाने की सलाह दूँगा”। अटल जी अपने इन शब्दों को विस्तार देने लग गये तो चतुर मोदी ने फ़ौरन उनके कान में कहा, ‘वही तो कर रहा हूँ’ और अटल जी रुक गये। फिर 2005 में आडवाणी जी पाकिस्तान गये और वहां जिन्ना के मजार पर जा कर सेकुलर हो गये, उसे धर्मनिरपेक्ष होने का सर्टिफिकेट दे दिया। 

अटल जी के बयान के बाद गुजरात दंगों की आड़ लेकर जब-जब मोदी और भाजपा को घेरना होता तो सारे सेकुलर और हिन्दू विरोधी खेमा अटल जी के राजधर्म वाले बयान की सी0डी0 बजाने लगते थे और भाजपा समर्थकों को कोई जबाब देना मुश्किल हो जाता था। सेकुलर और हिन्दू विरोधी खेमा कहता, आप कैसे गुजरात दंगों के लिये उन्हें दोषी नहीं मानोगे जबकि मोदी को तो आपके अपने अटल जी ने राजधर्म की सीख दी थी ? राष्ट्रवादी खेमे को यही सब फिर तब झेलना पड़ा जब आडवानी जी जिन्ना की आरती उतार कर आये। मजे की बात ये भी है कि मई, 2014 में मोदी विजय के बाद उर्दू अखबारों के लिये मोदी को घेरने का कोई रास्ता नहीं बचा था तब अटल जी का राजधर्म वाला बयान ही था जिसने उन्हें मोदी को जलील करने की संजीवनी दी थी। अजीज बर्नी ने अपने अखबार अजीजुल-हिन्द का पहला पेज पूरा काला रखा था सिवाय एक कोने के जहाँ उसने अटल की उस राजधर्म वाले उक्ति को जगह दी थी।

ब्लॉग : और ये भ्रम सिर्फ और सिर्फ विनाश की ओर ले जायेगा…

ब्लॉग: (अभिजीत सिंह) – स्वामी विवेकानंद जी के यात्रा विवरणों पर रामकृष्ण मिशन, बेलूर मठ, कोलकाता से प्रकाशित एक किताब पढ़ रहा था। किताब स्वामी जी के कश्मीर भ्रमण प्रसंग पर लिखता है…..

नव-रामकृष्ण मिशन के साहित्यों से समझने की भूल मत करिये।

“एक बार स्वामी विवेकानंद कश्मीर की अपनी यात्रा के दौरान माँ खीर भवानी के दर्शनार्थ यहाँ पहुँचे और माँ की विधिवत पूजा अर्चना की तभी पूजा अर्चना करते समय मंदिर की क्षतिग्रस्त अवस्था देख कर उन्होंनें कहा कि कई मुस्लिम आक्रमणकारियों ने यहाँ कितनी क्षति पहुचाई है अगर मैं उस काल में जीवित होता तो अन्य हिन्दुओं की तरह चुप नहीं रहता और माँ की रक्षा करता। तभी उन्होंने सहसा देवी माँ की आवाज सुनी और माँ ने कहा, पुत्र यह मेरी ही इच्छा थी कि मुस्लिम आक्रमणकारी मेरे मंदिर को नुकसान पहुचाये और यह मेरी ही इच्छा है कि मै इस खंडित मंदिर में ही निवास करूँ अन्यथा क्या मैं स्वयं ही उनका विनाश तत्काल न कर देती और स्वयं के लिए स्वर्ण भवन का निर्माण करवा लेती। तुम ही मुझे बताओ मै तुम्हारी रक्षक हूँ या तुम मेरे ? यह सुन स्वामी जी ने माँ को प्रणाम किया और इसे माँ की इच्छा समझ कर उनकी विधिवत पूजा अर्चना कर वहां से बाहर निकल गये “।

इस प्रसंग को सुनाने के बाद वो किताब आगे लिखता हैं, क्या अयोध्या के श्रीराम जन्मभूमि मसले पर भी हमारी दृष्टि यही नहीं होनी चाहिये ? अब थोड़ी भी अक्ल रखने वाले के लिये ये समझना मुश्किल नहीं है नव-रामकृष्ण मिशन वालों की रामलला के जन्मस्थान पर मंदिर निर्माण के विषय पर क्या सोच है?

क्या आपको लगता है कि स्वामी विवेकानंद के खीर भवानी यात्रा में ऐसा कोई प्रसंग वास्तव में घटित हुआ होगा ?

विवेकानंद को पढ़ने और जानने के बाद आपको कहीं से भी ये लगता है कि उन्होंने कभी ये कहा होगा कि प्राचीन भारत में पांच ब्राह्मण मिलकर एक गाय को चट कर जाते थे ?

घरवापसी के समर्थक स्वामी विवेकानंद की जीसस के बारे में क्या वही मान्यता थी जो आज 25 दिसंबर पर राम और कृष्ण की तरह ईसा का जन्मदिन मनाने वाले नव-रामकृष्ण मिशन का है ?

क्या विवेकानंद ने कभी मिशन स्थापित करते समय ये कहा था कि खुद को हिन्दू से अलग इतर संप्रदाय कहलवाने के लिये तुम अदालत में चले जाना ?

क्या अयोध्या, मथुरा और काशी में भग्न मंदिरों की पीड़ा को स्वामी जी ईश्वरेच्छा समझ कर पी जाते रहे होंगे ?

क्या आपको लगता है कि हर वक़्त माँ काली के स्नेहांचल में रहने वाले रामकृष्ण देव को किसी मलेच्छ रीति से ईश्वर प्राप्ति हेतू साधना की आवश्यकता हुई होगी ?

मतलब साफ़ है कि “सर्वधर्म समान” की मूढ़ता में जकड़े नव-रामकृष्ण मिशन ने अपने शब्द स्वामी जी के मुंह में जबर्दस्ती ठूंसे हैं। स्वामी विवेकानंद के संदेशों को नव-रामकृष्ण मिशन के साहित्यों से समझने की भूल मत करिये। भारत और हिन्दू धर्म की सेवा में रामकृष्ण मिशन का योगदान बहुत अधिक है पर इस नव-रामकृष्ण मिशन से सतर्क रहने की आवश्यकता है।

स्वामी विवेकानंद के संदेशों को समझना है तो “विवेकानंद केन्द्रम” से प्रकाशित साहित्यों को पढ़िए जो स्वामी जी के संदेशों को बिना मिलावट प्रस्तुत करती है। ढाका में कई सारे मठ बंद होने और वहां से मारपीट कर खदेड़ दिये जाने के बाबजूद जिनकी बुद्धि अभी भी “सर्वधर्म समान” की मूढ़ता से उबर नहीं पाई है वहां से कुछ “ज्ञान” लेंगे तो सिवाय भ्रम के आपको कुछ नहीं मिलेगा और ये भ्रम सिर्फ और सिर्फ विनाश की ओर ले जायेगा।

~ अभिजीत सिंह

मीडिया बता रही है कि, म्यांमार वाले मुस्लिमो पर अत्याचार कर रहे है, पर क्यों ? ये नहीं बता रही ?

पर क्यों ? ये नहीं बता रही ?

ब्लॉग : (डॉक्टर संतोष राय) – आपने ये शब्द तो सुन ही लिया होगा, “रोहिंग्या मुसलमान” हां, आजकल भारत के सेक्युलर तत्व, मीडिया वाले और बुद्धिजीवी बहुत इनका नाम लेकर बता रहे है की, इनपर भारी अत्याचार हो रहा है, म्यांमार वाले इनको जीने नहीं दे रहे, बिचारे दर-दर ठोकरें खा रहे है। कुल मिलाकर 30 लाख आतंकवादी मानसिकता के रोहिंग्या मुसलमानो को ये सेक्युलर और वामपंथी तत्व भारत में शरण दिलवाना चाहते है।

मीडिया वाले ये तो बता रहे है की, रोहिंग्या मुसलमानो पर विराथु नाम के बौद्ध भिक्षु ने हमले शुरू करवाये, पर ऐसा हुआ क्यों हुआ ? क्या कारण था की हिंसा को मन में भी न लाने वाला बौद्ध भिक्षु आखिर रोहिंग्या मुसलमानो को भगा देने पर आमादा क्यों हुआ ?

मीडिया वाले ये नहीं बता रहे की, म्यांमार में तो ईसाई और हिन्दू भी रहते है, पर म्यांमार वाले केवल मुसलमानो को ही क्यों भगा रहे है ? ऐसी कोई बात मीडिया वाले आपको बिलकुल नहीं बता रहे और न ही कभी बताएँगे।

1930 तक रोहिंग्या मुसलमान म्यांमार में थे ही नहीं। म्यांमार भी भारत में ही था। म्यांमार में केवल हिन्दू था फिर बौद्ध हो गया। 1947 में पूर्वी पाकिस्तान बना, फिर 1971 आते-आते पश्चिमी पाकिस्तान ने पूर्वी पाकिसान पर जुल्म शुरू किये, जिस से बहुत से मुस्लिम भारत तो बहुत से म्यांमार भाग गए ।

1950 तक रोहिंग्या मुसलमानो की आबादी म्यांमार में 3 लाख थी, जो 2001 आते-आते 30 लाख हो गयी (औरत को ओलाद की फेक्ट्री बनाएँगे तो होनी भी थी)। यानि केवल 50 सालों में 10 गुना हो गयी इनकी संख्या।

आगे पढ़िये : अब हम आपको बताते है असल बात क्या है

केरल में हिन्दू आस्था का अंतिम सशक्त केन्द्र अब इस्लामी व इसाईओं के निशाने पर….

केरल में बचा रह गया हिन्दू आस्था का अंतिम सशक्त केन्द्र

ब्लॉग : (केशर देवी) सबरीमाला : केरल में बचा रह गया हिन्दू आस्था का अंतिम सशक्त केन्द्र क़ौमी-इस्लामी-इसाई दुरभिसन्धि के निशाने पर है। कुछ दिनों पहले एक मित्र केरल गये थे तो उनके एक स्टेटस पर मैंने पूछा था – वहाँ के 54% हिन्दू कहाँ हैं? उत्तर यह है कि apartheid अर्थात नस्लभेद के केरलीय संस्करण के शिकार हो दोयम श्रेणी के नागरिक बन चुके हैं।

हिन्दुओं की जनसंख्या में 20% पिछड़े समुदाय से आने वाले एझावा हैं जिनसे कसाई-इसाई युति के सत्ताधारी इसलिये नाराज हैं कि ‘पिछड़े’ मोदी के उदय के साथ ही यह वर्ग राजनीतिक निष्ठा बदलने लगा। अस्तु।

वहाँ सबरीमाला एकमात्र स्थान है जो वर्ष में एक करोड़ श्रद्धालु आकृष्ट करता है। तमाम तीर्थों की तरह यह तीर्थ भी हिन्दू एकता को पुख्ता करने वाला केन्द्र है और इसलिये अयोध्या, काशी, मथुरा व प्रयाग की तरह इलहामियों की आँखों में खटकता रहा है। आधुनिक समय में धावा बोल मन्दिर तोड़ा तो नहीं जा सकता (तभी तक जब तक भारत में वे 1:2 अनुपाती अर्थात 33% नहीं हो जाते!) इसलिये क़ौमी विधि अर्थात कथित कुरीति गढ़ कर आक्रमण की नीति अपनायी गयी है।

सबरीमाला तमाम प्राचीन हिन्दू स्थानों की तरह ही नाक्षत्रिक प्रेक्षण का भी केन्द्र था। कारण – इसकी स्थिति, अक्षांश और ऊँचाई। हिन्दू धर्म में नाक्षत्रिक घटनाओं को धार्मिक रूपक के साथ सुरक्षित कर दिया जाता है, यहाँ भी वही हुआ। शीत अयनांत अर्थात 22 दिसम्बर के आसपास प्राची में उष:काल के समय अभिजित (Vega) नक्षत्र का उदय प्रारम्भ होता जिसका कि उस ऊँचाई से प्रेक्षण आसान होता।

मकर संक्रांति तक आते आते एक घटना और होती, हमारे रुद्र देवता अर्थात लुब्धक नक्षत्र (Sirius) ब्रह्म मुहुर्त में पश्चिम में अस्त होते और विष्णु स्वरूप अभिजित नक्षत्र पूरब में उसी समय उदित होते। इन दो का दर्शन ‘मकर ज्योति’ का दर्शन कहा जाता और इस तरह सबरीमाला वैष्णव और शैव दोनों का समन्वय स्थान हो हिन्दू आस्था के विराट केन्द्र के रूप में उभरा।

केरल बहुत पहले से गणित ज्योतिष का केन्द्र रहा है, यहाँ तक कि कुछ विद्वान आर्यभट को भी केरल से जोड़ते हैं क्योंकि प्रमाण हैं। जैसा कि शेष भारत में हुआ, सैद्धांतिक ज्योतिष के प्रभाव में हमलोग आकाश निहारना भूलते गये और सबरीमाला में भी मकरज्योति मनुष्यों द्वारा दूर ऊँचे स्थान पर जला कर दिखाई जाने लगी। 2011 में इस पर विवाद भी हुआ था।

आगे पढ़िये: रजस्वला स्त्रियों के इस मन्दिर में प्रवेश प्रतिबन्ध पर

जानिए इस्लाम में हलाल से हलाला तक का सफर, देखिये कैसे मौलवी बहु, बेटियों से मजे करते हैं !

इस्लामी पारिभाषिक शब्दों में “हलाल और “हलाला ” यह ऐसे दो शब्द हैं, जिनका कुरान और हदीसों में कई जगह प्रयोग किया गया है। दिखने में यह दौनों शब्द एक जैसे लगते हैं। यह बात तो सभी जानते हैं कि, जब मुसलमान किसी जानवर के गले पर अल्लाह के नाम पर छुरी चलाकर मार डालते हैं, तो इसे हलाल करना कहते हैं। हलाल का अर्थ “अवर्जित ” होता है।

लेकिन हलाला के बारे में बहुत कम लोग ही जानते हैं। क्योंकि इस शब्द का सम्बन्ध मुसलमानों के वैवाहिक जीवन और कुरान के महिला विरोधी कानून से है। क्योंकि कुरान में अल्लाह के बनाये हुए इस जंगली, और मूर्खता पूर्ण कानून की आड़ में मुल्ले, मौलवी और मुफ्ती खुल कर अय्याशी करते हैं।

इस बात को ठीक से समझने के लिए अल्लाह की औरतों के प्रति घोर नफ़रत, और मुसलमानों की पारिवारिक स्थितियों के बारे में जानना बहुत जरूरी है। मुसलमानों में दो-दो , तीन-तीन औरतें रखना साधारण सी बात है। और फिर ज़्यादातर मुसलमान अपनी ही बहनों से भी शादियाँ कर लेते हैं। और अक्सर संयुक्त परिवार में रहना पसंद करते हैं। इसलिए पति पत्नी में झगड़े होते रहते हैं। और कभी पति गुस्से में पत्नी को तलाक भी दे देता है। चूंकि अल्लाह की नजर में औरतें पैदायशी अपराधी होती है, इसलए कुरान में पति की जगह पत्नी को ही सजा देने का नियम है। यद्यपि तलाक देने के कई कारण और तरीके हो सकते हैं, लेकिन सजा सिर्फ औरत को ही मिलती है। इसे विस्तार से प्रमाण सहित बताया गया है। जो कुरान और हदीसों पर आधारित है।

अगले पृष्ठ पर पढ़िये : कुरान और हदीसों पर आधारित

कम्युनिस्ट इंशा अल्लाह क्यों बोलता है, मुझे उम्मीद है ये पोस्ट पढ़कर अब तक आपको समझ में आ गया होगा!

Chennai: Muslim children hug each other during the celebration of 'Eid-ul-Fitr' at a School ground in Chennai August 9, 2013. The Eid al-Fitr festival marks the end of the Islamic holy fasting month of Ramadan. ..Photo by SL Shanth Kumar

ब्लॉग : शरद श्रीवास्तव –  धर्म जनता के लिए अफीम है। ये मार्क्सवाद का मूलभूत सिद्धान्त है। लेकिन ये कभी भी आश्चर्य की बात नहीं रही की एक धर्म हीन कम्युनिस्ट कब कैसे और क्यों एक मुस्लिम कम्युनलिस्ट के साथ खड़ा मिलता है।

साम्प्रदायिकता से लड़ने वाले मुस्लिम सांप्रदायकिता से हाथ मिलाते हमेशा नजर आते हैं। तमाम सेक्युलरिज्म एक धर्म के आगे नतमस्तक नजर आता है।

हकीकत ये है की मार्क्सवाद और मुस्लिम साम्प्रदायिकता एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। दोनों में बहुत सी समानताएं हैं। कॉमन गोल यानी उद्देश्य हैं। इसीलिए दोनों एक दूसरे के पूरक और सहायक हैं।

अब विस्तार से : मुस्लिम धर्म एक किताब कुरान से चलता है। कुरान में जो लिखा है वो बदला नहीं जा सकता उसमे कोई फेरबदल मुमकिन नहीं। मार्क्सवाद या कंम्युनिस्ट मार्क्स की किताब दास कैपिटल को वही दर्जा देते हैं। करीब डेढ़ सौ साल पहले लिखी किताब में कोई फेरबदल मुमकिन नहीं। पूर्णतया वैज्ञानिक लेखन। समस्त सृष्टि कैसे चले इसका पूरा विवरण कुरान और दास कैपिटल में मौजूद है।

यूँ तो बाकी लोगों को किसी विषय पर बात करने के लिए उसे समझना पड़ता है , पढ़ना पड़ता है। मेहनत करनी होती है। लेकिन एक मौलवी साहब और एक मार्क्सवादी साहब दुनिया में किसी भी विषय पर बोल सकते हैं , अपनी बात कह सकते हैं। बल्कि ये भी बता सकते हैं की जनता को उस विषय के बारे में क्या करना चाहिए।

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मौलवी साहब और मार्क्सवादी साहब दोनों लोग ये काम कुरान शरीफ और दास कैपिटल शरीफ की रौशनी में करते हैं। यकीन न हो तो आप किसी भी विषय पर इनकी राय लेकर देख लीजिये , एक फतवा देगा दूसरा जनता को होने वाली तकलीफो के बारे में बताएगा।

अगर आप एक मुस्लिम भाई से इस बारे में चर्चा करना चाहेंगे वो कहेगा की पहले कुरान पढ़कर आओ। यही बात आपसे कम्युनिस्ट भाई भी कहेगा , जाओ पहले मार्क्स को पढ़कर आओ।

अगले पृष्ठ पर और बढ़िए कड़वी दवाई 

जानिए New Year या जीसस खतना दिवस, क्या आपने आज अपना खतना (लूल्ली काटन) कराया है?

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भारतीय समाज उत्सवधर्मी समाज है।

यूनाइटेड हिन्दी संपादक : जैसे की आप सब लोगो को विदित है कि नया साल अर्थात ईसाई नववर्ष आने वाला है और ईसाई इसे बड़ी धूमधाम से अपने अपने देशों में मनाते हैं। लेकिन भारत देश में ईसाइयों की आबादी लगभग २.५% है, फिर भी यहाँ इस देश में इस नववर्ष को ईसाई तो मनाते हैं लेकिन अधिकतर हिन्दू भी इस नववर्ष को बड़ी ही धूम धाम से मनाते हैं। भले ये वो हिन्दू हैं जिन्हें दीपावली, होली आदि में आतिशबाजी और रंग बिरंगे गुलालों से परहेज हो, मगर ईसाइयों के नववर्ष में ऐसे जोश में होते हैं कि आतिशबाजी भी करते हैं और मद्य आदि पेय तथा मांसाहार से परहेज नहीं करते। इन लोगों को क्या कहें ज्यादातर समस्या तथाकथित स्वघोषित धार्मिक गुरुओं ने ही प्रारम्भ की है। सांता के सफ़ेद दाढ़ी मूछ में कृष्ण को रंगना और धर्म की शिक्षा न देकर ईसाइयों के नये साल के बारे में न समझाकर मौन रहना, इन्हीं कारणों से हिन्दू समाज ईसाई और मुस्लिम त्योहारों में झूलता रहता है और अपने धार्मिक, ऐतिहासिक तथा वैज्ञानिक त्योहारों के प्रति उदासीन रवैया धारण करता है।

खैर आज हम चर्चा कर रहे हैं कि ये नया साल जो प्रत्येक १ जनवरी को मनाया जाता है वह क्या है?

आइये देखे : नया साल अर्थात् प्रत्येक १ जनवरी को ख़ुशी और जोश से मनाया जाने वाल दिन नया साल है क्योंकि क्रिसमस के दिन ईसा साहब पैदा हुए और इस क्रिसमस के आठवें दिन जो ईसा साहब का “खतना” (लिंग की रक्षार्थ चमड़ा ‘खिलड़ी’ काटना) हुआ था। ये खतना मुस्लिम समुदाय में भी किया जाता है। अतः ये तो सिद्ध हुआ कि ये दोनों संस्कृति कुछ भेद से एक हैं। अतः ईसा साहब के पैदा होने से आठवें दिन जो “लिंगचर्म छेदन संस्कार” अर्थात् खतना हुआ वह नया साल है। On the eighth day, when it was time to circumcise the child, he was named Jesus, the name the angel had given him before he was conceived. [ Luke 2:21 ]

और जब बालक के खतने का आठवाँ दिन आया तो उसका नाम यीशु रखा गया। उसे यह नाम उसके गर्भ में आने से पूर्व भी पहले स्वर्गदूत द्वारा दे दिया गया था। [ लूका २ | २१ ]

अब ये खतना तो हुआ ईसा साहब का और मनाते हिन्दू समाज के लोग हैं। वो भी पुरे जोशो खरोश से, ये बात समझ से बाहर है।

तो जो भी हिन्दू ये नया साल मनाते हैं, उन्हें जान लेना चाहिए कि खतना की परंपरा मूसा का नियम है। मूसा ईसाइयों और मुस्लिमो के बड़े पैगम्बर हुए हैं। खैर ये जान लीजिये की इसी मूसा के नियमानुसार ईसा का “लिंगचर्म छेदन संस्कार” खतना हुआ था।

And every male among you who is eight days old shall be circumcised throughout your generations, a servant who is born in the house or who is bought with money from any foreigner, who is not of your descendants. [ Genesis 17:12 ]

जब बच्चा आठ दिन का हो जाए, तब उसका खतना करना। हर एक लड़का जो तुम्हारे लोगों में पैदा हो या कोई लड़का जो तुम्हारे लोगों का दास हो, उसका खतना अवश्य होगा। [ उत्पत्ति १७ | १२ ]

On the eighth day the flesh of his foreskin shall be circumcised. [ Leviticus 12:3 ]

आठवें दिन बच्चे का खतना होना चाहिए। [ लैव्यव्यवस्था १२ | ३ ]

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इस पर यदि कोई ईसाई कहे कि ये तो पुराना नियम है और इसे नहीं मानता। तो ये देखें यीशु ने स्वयं कहा:

Think not that I am come to destroy the law, or the prophets: I am not come to destroy, but to fulfil.

For verily I say unto you, Till heaven and earth pass, one jot or one tittle shall in no wise pass from the law, till all be fulfilled. [ Matthew 5:17-18 ]

यह न समझो, कि मैं मूसा के धर्म नियम और भविष्यद्वक्ताओं की पुस्तकों को लोप करने आया हूँ।लोप करने नहीं, परन्तु पूरा करने आया हूँ।

मैं तुम से सच कहता हूँ कि जब तक आकाश और पृथ्वी समाप्त नो जाएँ, तब तक मूसा की व्यवस्था का एक एक शब्द और एक एक अक्षर बना रहेगा। वह तब तक बना रहेगा जब तक वह पूरा नहीं हो लेता। [ मत्ती ५ | १७-१८ ]

उपरोक्त प्रमाणों से सिद्ध होता है कि ईसा का खतना  यानी “लिंगचर्म छेदन संस्कार” जन्म के आठवें दिन हुआ था जो ग्रैगोरियन कैलेंडर के अनुसार १ जनवरी होता है। यीशु के इसी “लिंगचर्म छेदन संस्कार” की खुशी में हर वर्ष नया साल के रूप में मनाया जाता है। वास्तव में तो ये खतना दिवस ही है, भले ही कोई इसे नया साल के रूप में मनाये।

आज तो कोई ईसाई शायद ही खतना कराता है। जबकि यीशु ने तो स्वयं खतना कराया। साथ ही साथ सभी को मूसा के नियमानुसार खतना कराने का आदेश भी दिया। क्या ये ईसाइयों द्वारा बाइबिल और यीशु के आदेश का उल्लंघन नहीं?

ग्रीक आॅर्थोडाॅक्स चर्च तो आज भी १ जनवरी को नया साल नहीं बल्कि खतना दिवस के रूप में ही मनाते हैं।
प्रमाण स्वरूप उनके 2017 के कैलेंडर को नीचे क्लिक करके देख सकते हैं –

On Sunday, January 1, 2017 we celebrate

खैर जो भी है। सबसे बड़ी बात है कि खतना करना, करवाना, ईसाई और मुस्लिम संस्कार है। हिन्दू समुदाय में ये घृणित कार्य माना जाता है क्योंकि यदि ईश्वर की रचना में कोई कमी होती तो ये खाल नहीं होती। लेकिन ईश्वर अपनी रचना में कभी कोई कमी नहीं करता, न ही किसी को इस शरीर में कांट छांट करने का अधिकार ही प्रदान करता है। अतः आप सबसे हाथ जोड़कर विनती है कि अपने अपने संस्कार सबको मानने चाहिए।

मगर हिन्दू समाज यदि १ जनवरी को “लिंगचर्म छेदन संस्कार” अर्थात खतना दिवस को सामूहिक रूप से अपने परिवार सहित मनाना ही चाहता है तो कृपया ईसा, मूसा और यहोवा की आज्ञा पालन करते हुए अपना भी खतना अर्थात “लिंगचर्म छेदन संस्कार” स्वयं करवा लेवे तभी इस संस्कार को ख़ुशी से मनाये।

हालाँकि वो हिन्दू जो इस “लिंगचर्म छेदन संस्कार” खतना दिवस को जोशो खरोश से मनाते हैं उनके लिए :

“बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना”

थोड़ा विचार कीजिए कि किसी आठ दिवसीय बालक के लिंगचर्म छेदन संस्कार के अवसर पर हर वर्ष पटाखे फोड़ेना, शायरियाँ भेजना, तरह तरह के पकवान खाना, मौज मस्ती करना क्या ये सब काम भले मानव के हो सकते हैं भला?

जो बोले हाँ! तो उनसे अनुरोध है कि अपने भी बच्चों के खतना दिवस पर हर वर्ष पार्टी का आयोजन करें, पटाखे जलाएँ, लोगों को ग्रिटिंग्स कार्ड बाँटेंऔर मौज मस्ती करें। साथ में अपने खतने किये हुए पुत्र को अवश्य बताएँ कि सुन आज ही के दिन तेरा खतना हुआ था। सो इस खुशी में हर वर्ष पार्टी चलती है। तू भी अपने आगे के बाल बच्चों का ऐसे ही करीयो।

अपने धर्म से प्रेम करने वाले हिन्दुओं से अनुरोध है कि अब से सेक्युलर हिन्दुओं को १ जनवरी पर “Happy Circumcision Day‘ या ‘खतना दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ‘ अवश्य भेजें।

बहरहाल इतने सब प्रमाणों के बाद भी यदि कोई हिन्दू १ जनवरी को मनाना चाहता है। तो पंडित लेखराम वैदिक मिशन की ओर से उन सभी हिन्दुओं को Happy Circumcision Day। खतना दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ।

हाँ अपने परिवार वालों, विशेषकर बच्चों को भी अवश्य बताएँ कि आप १ जनवरी क्यों मनाते हैं।

अगले पृष्ठ पर पढ़िये : पंडित यशार्क का ईसा खतना दिवस पर विशेष