कभी सोचा है कि इतने आधातों को सहकर भी आज हिन्दू कैसे बचे हैं, ये धर्म कैसे बचा है?

आपने कभी सोचा है कि इतने आधातों को सहकर भी हम आज हिन्दू कैसे बचे हैं ? हमारा धर्म कैसे बचा है ? फोटो Source : santabanta.com

ब्लॉग : महावीर प्रसाद खिलेरी (संपादक यूनाइटेड हिन्दी डॉट कॉम) : हिन्दू समाज शायद दो हज़ार सालों से गुलाम रहा है! हमारे ऊपर सदियों तक इस्लामी शासन रहा फिर कई रूपों में ईसाईयों ने हम पर शासन किया फिर 1947 में जब देश तथाकथित रूप से आजाद हुआ तब हमसे हमारा धर्म छीनने मिशनरी लोग आ गये, लालच दिया, कई जगह डर दिखाया, कई जगह अहसान जता कर उसकी कीमत मत-परिवर्तन के रूप में वसूलनी चाही, हमारे ऊपर न जाने कितने मोपला और मीनाक्षीपुरम हुए। आपने कभी सोचा है कि इतने आधातों को सहकर भी हम आज हिन्दू कैसे बचे हैं ? हमारा धर्म कैसे बचा है ?

आज हम हिन्दू इसलिये हैं क्योंकि हमारे पूर्वजों ने अपना धर्म नहीं छोड़ा। डर, हिंसा, प्रपंच, लालच, षड्यंत्र सबके बीच सदियों तक संघर्ष करते रहे। हमारे एक पूर्वज इधर राजस्थान में घास की रोटी खाकर हिन्दू धर्म बचा रहे थे तो उधर पंजाब में हिन्दू धर्म को बचाने के लिये कुछ पूर्वज जीवित ही दीवार में चुनवा दिये गये। अपने उन पूर्वजों के बारे में भी दो मिनट सोचिये जिन्होनें धर्म बदलने की जगह मैला उठाने के काम को चुना था। हकीकत राय के बलिदान के बारे में सोचिये, दक्षिण भारत की माँ रुद्र्माम्बा देवी के त्याग का स्मरण कीजिये, पूरब के वीर लाचित बरफूकन का स्मरण कीजिये और न जाने ऐसे कितने नाम है जिन्होनें अपना सर्वस्व खो कर हिन्दू धर्म को बचाये रखा। ये सब किसी एक जाति-विशेष के नहीं थे !

आप योगी जी की प्रशासनिक क्षमता पर सवाल इसलिये नहीं उठा रहे कि आपको वास्तव में इस बात की कोई फ़िक्र है कि वो शासन कैसे चलायेंगे! दरअसल वजह ये है कि योगी जी में आपने किसी ठाकुर को ढूंढ लिया है जो आपको पीड़ा दे रहा है। योगी जी के ऐब आप इसलिये ढूंढ रहें हैं क्योंकि मोदी जी ने आपके जात वाले को मुख्यमंत्री नहीं बनाया। इसी तरह जब आप योगी जी को ठाकुर अजय सिंह विष्ट लिख रहें हैं तो आप उन्हें एक जाति विशेष से बाँध रहें हैं, जाहिर है फिर बाकी जाति वाले भी उन्हें उसी रूप में लेंगें।

अपनी जातिवादी मानसिकता में जब हम किसी के बारे में कुछ लिखतें हैं, किसी जाति के मूल पर प्रश्न उठाते हैं तो एक बार ये भी सोच लीजिए कि आपने गाली किसको दी है ? आप उनको गाली दे रहें हैं उनके कारण हम हैं वर्ना हम भी आज पीटर या जुम्मन बनकर जी रहे होते ! वो पूर्वज चाहे किसी भी जाति के हों पर वो सब हमारे लिये वन्दनीय है क्योंकि उन्होंने हमारे लिये उस धरोहर (हिंदुत्व) को सहेजे रखा जिसका अनुपालन मनु, परशुराम, श्रीराम, श्रीकृष्ण, श्री बुद्ध से लेकर गुरु गोविन्द सिंह करते थे।

हम या आप जिस जाति में पैदा हुयें हैं वो हमारी या आपकी चॉइस नहीं थी, भगवान की मर्जी थी। ईश्वर की मर्जी पर जो सवाल उठाये, उसके सृजन को किसी भी रूप में लांछित करे उससे कृतघ्न और अज्ञानी कोई नहीं हो सकता। मैं कभी किसी दलित को गाली नहीं देता, इसलिये नहीं कि वो गलत नहीं हो सकते बल्कि इसलिये क्योंकि इतने दंशों, अत्याचारों और प्रलोभनों को सह कर भी आज वो हिन्दू है। इस देश की मुख्य-धारा में है और कम से कम हमारे अस्तित्व को लीलने वाला खतरा नहीं है। मैं कभी किसी क्षत्रिय को गाली नहीं देता क्योंकि उनके पूर्वजों ने सदियों तक हमारे भारत की अखंडता अक्षुण्ण रखने के लिये बलिदान दिया है। मैं किसी ब्राह्मण को गाली नहीं देता क्योंकि दुनिया में भारत को विश्व-गुरु बनाने का गौरव उनके पूर्वजों का था। मैं किसी वैश्य को गाली नहीं देता क्योंकि इन्होंनें अपनी धन-संपत्ति राष्ट्र-रक्षा में कई बार न्योछावर की है। इसी तरह मैं अपने किसी वनवासी बंधू को अपमानित करने का भी पाप नहीं करता, ये तो तबसे धर्म रक्षक रहें हैं जब भगवान राम इस धरती पर आये थे।

अपने जातिगत पूर्वाग्रहों को छोड़िये वरना प्रकृति सौभाग्य को दुर्भाग्य में बदलने में जरा भी देर नहीं करती।

ABP के साथ गुंडा जोड़ते हैं लेकिन Left को चरित्रहीन या गद्दार वामी कहने में कोई दोष नहीं…

विरोधी और उनका विरोध कैसे हो !

Read Also : शर्मनाकः वामपंथी येचुरी का बयान – “हमें नहीं लगता कि उरी हमले में पाकिस्तान का हाथ है!”

ब्लॉग : ( अंसुमन गुप्ता ) :- जो वामपंथी हमेशा Sanghi के साथ Goons जोड़ते ही हैं (ट्रेनिंग ही ऐसे मिलती है, संघी कहा तो अपने आप Goon-गुंडा बोलने की) उनका उल्लेख हमेशा Liar Leftists (झूठे) या Leftie Lech क्यों न करें ?

Lech ये lecherous याने लम्पट का शॉर्ट फॉर्म है । हिन्दी में इनका उल्लेख करना है तो इनका उल्लेख किया जाये वहाँ चरित्रहीन या देशद्रोही अवश्य जोड़ा जाये । ये Liar तो होते ही हैं इसलिए संघी के साथ goon जोड़ते हैं लेकिन इन्हें Lech, Liar, Characterless Communist या चरित्रहीन वामी कहने में कोई असत्यभाषण का दोष भी नहीं लगेगा । कभी शुद्ध चरित्र के लोग भी हुआ करते इनमें, लेकिन अपवाद , और उन्हें कोई याद नहीं करता क्योंकि उनके जैसा रहते तो इज्जत पाते । मेरे एक घनिष्ठ मित्र के पिता थे, पहले जुझारू मजदूर नेता थे फिर बुढ़ापे के साथ हाशिये पर रखे गए । फिर भी, बेदाग व्यक्ति थे और इसलिए उनको इज्जत थी । उन्होने भी वक्त का चलन समझकर मिलती इज्जत को ही बेहतर समझा और शांति से जीवन यापन करते रहे अंत तक, सक्रीय रहने की वृथा कोशिश नहीं की।

Read Also : कन्हैया को लेकर आमने-सामने वामपंथी और दक्षिण पंथी विचारधार, टकराव के आसार

हो सकता है एकाध अपवाद मिले जो बिलकुल दुश्चरित्र न हो लेकिन झूठ तो होगा ही । Liar Leftie तो लागू ही होगा। हमेशा ऐसे विशेषण लगाते रहें और ज्यादा बदलाव न करें, predictable होना गलत नहीं होता । जब तक वे आप के विशेषण से विचलित होकर उसका खंडन नहीं करते, लगाते रहिए । यह उनके लिए नहीं, औरों के लिए होता है । जैसे रिलीजन ऑफ पीस कहा तो कोई भी इस्लाम का नाम लेता है हालांकि सच्चाई जानते सभी हैं । इसी तरह अगर Characterless Communist या चरित्रहीन वामपंथी कहते रहें तो वो विशेषण उनके साथ चिपक जाएगा । उनको यही गंवारा नहीं होता। वे आप को अच्छा लगे या आप का दिल न दुखे ऐसा कुछ भी नहीं करते, इसलिए offense best defense ये समझ लीजिये ।

Read Also : ‘Intolerance’ की मिसाल वामपंथियों से भी बड़ी कोई हो सकती है क्या ?

ये नाम देने आवश्यक हैं । वा क ई गिरोह हमेशा जिनसे लड़ने का मन बनाया है उन्हें ऐसे नाम देता है जिसके साथ शत्रुभावना जोड़ी जाये । वामी जैसे संघी गुंडे कहते हैं (श्री श्री 100008 दाऊद इब्राहिम का उल्लेख कैसे करते होंगे पता नहीं, मैंने आजतक किसी वामी को उनका नाम लेते ही सुना नहीं। पुराने खयालात की औरतें अपने पति का नाम नहीं लेती, बस यूंही याद आया) । बाकी अन्यों को गणशत्रु , प्रतिगामी, प्रतिक्रियावादी आदि शब्द होते ही हैं । उनकी अपनी इंटरनल गाली revisionist या संशोधनवादी होती है, जिसको पार्टी के मंच पर दी वो खुद को unperson समझ लें । प्रतिगामी, प्रतिक्रियावादी का हम अर्थ देखें तो यही समझ में आता है कि इनसे अलग विचार रखनेवाला । याने अलग विचार इन्हें बर्दाश्त नहीं, वैसा व्यक्ति कम से कम वैचारिक और मौका मिले तो actual हत्या के योग्य है इनकी नजर में ।

Read Also : जवान वीरगति को प्राप्त होते हैं, उसका कारण युद्ध है या गले की फाँस बन गया पाकिस्तान

देखिये कितने बेशर्म लोग हैं, यही “अभिव्यक्ति की आजादी” के झंडाबरदार कहलाते हैं । इसलिए इनपर “पाखंडी ” भी इतना ही फिट बैठता है। अगर कोई वामपंथी अभिव्यक्ति की आजादी पर बोलता मिले तो उसे प्रतिगामी, प्रतिक्रियावादी तथा revisionist या संशोधनवादी क्या होते हैं ये पूछे और बताएं तो सब के सामने बेइज्जत करें कि ये तुम्हारी सोच है तो किस मुंह से अभिव्यक्ति की आजादी की बात करते हो ?ये न बताएं तो आप बताएं सब को लेकिन बेइज्जत करने का अवसर न गवाएँ । और हाँ, आत्मरक्षा की ट्रेनिंग लें या अपने साथ ट्रेंड लोग रखें । ये वैचारिक लड़ाई में तब तक ही मानते हैं जब तक इन्हें जीत की गैरंटी हो । जहां ये हारते हैं, पहले गाली गलौच पे उतरते हैं फिर हाथापाई पर । अच्छा कैमरा मोबाइल साथ रखे और किसी को विडियो उतारते रहने को कहें । ये हमेशा अपने साथ लड़कियां रखते हैं उनका यह भी उपयोग होता है कि हाथापाई के वक़्त वे सक्रीय होती हैं, काफी हिंसक भी होती हैं और ऊपर से खुद ही खुद के कपड़े फाड़कर आप पर इल्जाम लगाती है पुलिस में । इसलिए विडियो जरूरी है । सोशल मीडिया में उसका प्रसार भी करें ।

Blog: JNU अब शिक्षा का नहीं बल्कि रंडी का कोठा या देश से गद्दारी करने का केंद्र बनकर रह गया है !

ब्लॉग: ( विनय झा ) यूनाइटेड हिन्दी डॉट कॉम के पाठकों के लिए स्पेशल : देशद्रोहियों में इतनी हिम्मत है कि सरेआम राजधानी की सड़कों पर देश के विरुद्ध नारेबाजी कर लेते हैं और उन्हें दण्डित करने की हिम्मत सरकार नहीं दिखा रही है। इसका एकमात्र कारण यह है कि अभी भी बहुमत देशवासी सरकार के साथ नहीं हैं |

पिछले लोक सभा चुनाव में भाजपा को कितने मत मिले थे ? उनमें भी कितने लोग ऐसे थे जिन्होंने जीवनभर भाजपा का विरोध किया किन्तु पिछली सरकार के भ्रष्टाचार से आजिज आकर इस बार भाजपा को वोट दिया।

वह वोट हिन्दुत्व का समर्थक नहीं है | कोई सरकार अपने मतदाताओं के विरुद्ध नहीं जा सकती | अतः दोष मतदाताओं का है | उन्हें सुधारने के लिए शिक्षा और मीडिया को सुधारना पडेगा जिसमें बहुत समय लगेगा और जिसे सुधारने का सामर्थ्य अकेले भाजपा में नहीं है | जनता को जागरूक करने के लिए आप/हमारे जैसे सामान्य नागरिकों का भी दायित्व बनता है |

→ केन्द्र सरकार को सुझाव कैसे भेजें : भाजपा राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सभी सदस्यों की ईमेल ID भाजपा के वेबसाईट पर है, उसमें प्रधानमन्त्री को छोड़कर सभी प्रमुख नेता हैं, जैसे कि राजनाथ सिंह और अमित शाह, PMO को सुझाव भेजने का वेबसाईट गूगल सर्च से मिल जाएगा | अधिक लम्बे सन्देश कोई नहीं पढ़ेगा | कम शब्दों में सार्थक और व्यवहारिक सुझाव भेजें जिन्हें लागू करना सम्भव हो |

मोदी के विरुद्ध सारी पार्टियां एकजुट हो गयीं, आडवाणी के नेतृत्व में भाजपा भी, तो मोदी के पक्ष में बाँकी देश इकट्ठा हो गया और मोदी को जिता दिया |

अब ABVP के विरुद्ध सारे छात्र संगठन एकजुट होकर कश्मीर और नक्सल-बहुल (बस्तर जैसे) क्षेत्रों की आज़ादी के लिए एकजुट हो रही हैं ! शुभ संकेत है, लगता है शीघ्र ही सभी विश्वविद्यालयों में ABVP की शक्ति इतनी बढ़ जायेगी कि देशद्रोही तत्वों पर मुकदमा करने की भी आवश्यकता नहीं पड़ेगी !

अगले पृष्ठ पर जरूर पढे 

‘Intolerance’ की मिसाल वामपंथियों से भी बड़ी कोई हो सकती है क्या ?

ब्लॉग: ( पारिजात सिन्हा ) :- फ्रैंज काफ्का ने कुछ यूं कहा था कि बस आपको प्रतीक्षा करनी होती है और सामने वाले के मुखौटे अपने आप उतरने लगते हैं । अपने ‘फ्रीडम ऑफ़ स्पीच’ की दुहाई देने वाले इन वामपंथियों का ‘लिबरल’ मुखौटा कुछ समय से तेजी से उतरा है और इनका ‘इनटॉलेरेंस’ तब खुल कर सामने आया है जब मामला दूसरों की फ्रीडम ऑफ़ स्पीच का रहा है :-

– मुंबई के एक संस्थान में राजीव मल्होत्रा को बोलने से रोकने के लिए ये वामपंथी हाथापाई पर उतर आते हैं ।

– दिल्ली के श्रीराम कॉलेज में एक संविधान-सम्मत मुख्यमंत्री की स्पीच को रोकने के लिए ये वामपंथी-जमात सारी हदें पार कर जाती है ।

– दिल्ली के ही जामिया में स्त्री-अधिकार के विषय पर आयोजित एक परिचर्चा में आमंत्रण के बावजूद शाजिया इल्मी को परिचर्चा में हिस्सा लेने से आख़िरी मिनट में रोक दिया जाता है ।

– जेएनयू में आमंत्रित बाबा रामदेव को ये बोलने नहीं देते ।

– जेएनयू और कलकत्ता में विवेक अग्निहोत्री को वामपंथी-जमात उनकी फिल्म ‘बुद्धा इन ट्रैफिक जाम’ के प्रदर्शन को रोक देती है ।

– सेना के सम्मानित और रिटायर्ड जेनेरल बख्शी समेत कई समानित अतिथियों द्वारा पाकिस्तान को बे-नकाब करते एक कार्यक्रम को ये पाखंडी रद्द करवा देते हैं ।

– “कला और राजनीति की असंबद्धता” की दुहाई देते हुए पाकिस्तानी कलाकारों के बैन का विरोध करने वाले ये वही वामपंथी हैं जिन्होंने दिल्ली में आयोजित इंटरनेश्नल आर्ट फेस्टिवल में इस्रायली थिएटर ग्रुप ‘कैमेरी’ के वहिष्कार के लिए ये लिखित दुहाई दी थी की कला को राजनीति से अलग कर के नहीं देखा जा सकता ।

– दिल्ली में सुब्रमण्यम स्वामी को स्पीच देने से रोकने के लिए ये वामपंथी हंगामा कर बैठते हैं ।

– तारेक फतह के साथ मारपीट और उनके फ्रीडम ऑफ़ स्पीच पर हमले पर ये वामपंथी गैंग चुप्पी लगा जाता है ।

– तसलीमा नसरीन को बोलने से रोकने के लिए उनके साथ मारपीट की जाती है लेकिन ये वामपथी-गिरोह मुंह बंद कर लेता है ।

– अब आप बताइये कि ‘इल्लिबरल’ वामपंथी-गैंग के इस वैचारिक-दोगलेपन और ‘इनटॉलेरेंस’ की मिसाल कहीं और मिलेगी क्या ?

( फ्रेंज काफ्का के शब्द उनकी पुस्तक “The Zurau Aphorism” से)

टट्टी खाकर सूअर कितना हृष्ट-पुष्ट रहता है! अतः मनुष्यों को भी टट्टी खाना चाहिए!

ब्लॉग: ( विनय झा ) यूनाइटेड हिन्दी डॉट कॉम के पाठकों के लिए स्पेशल : देशद्रोहियों में इतनी हिम्मत है कि सरेआम राजधानी की सड़कों पर देश के विरुद्ध नारेबाजी कर लेते हैं और उन्हें दण्डित करने की हिम्मत सरकार नहीं दिखा रही है। इसका एकमात्र कारण यह है कि अभी भी बहुमत देशवासी सरकार के साथ नहीं हैं |

पिछले लोक सभा चुनाव में भाजपा को कितने मत मिले थे ? उनमें भी कितने लोग ऐसे थे जिन्होंने जीवनभर भाजपा का विरोध किया किन्तु पिछली सरकार के भ्रष्टाचार से आजिज आकर इस बार भाजपा को वोट दिया।

वह वोट हिन्दुत्व का समर्थक नहीं है | कोई सरकार अपने मतदाताओं के विरुद्ध नहीं जा सकती | अतः दोष मतदाताओं का है | उन्हें सुधारने के लिए शिक्षा और मीडिया को सुधारना पडेगा जिसमें बहुत समय लगेगा और जिसे सुधारने का सामर्थ्य अकेले भाजपा में नहीं है | जनता को जागरूक करने के लिए आप/हमारे जैसे सामान्य नागरिकों का भी दायित्व बनता है |

→ केन्द्र सरकार को सुझाव कैसे भेजें : भाजपा राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सभी सदस्यों की ईमेल ID भाजपा के वेबसाईट पर है, उसमें प्रधानमन्त्री को छोड़कर सभी प्रमुख नेता हैं, जैसे कि राजनाथ सिंह और अमित शाह, PMO को सुझाव भेजने का वेबसाईट गूगल सर्च से मिल जाएगा | अधिक लम्बे सन्देश कोई नहीं पढ़ेगा | कम शब्दों में सार्थक और व्यवहारिक सुझाव भेजें जिन्हें लागू करना सम्भव हो |

मोदी के विरुद्ध सारी पार्टियां एकजुट हो गयीं, आडवाणी के नेतृत्व में भाजपा भी, तो मोदी के पक्ष में बाँकी देश इकट्ठा हो गया और मोदी को जिता दिया |

अब ABVP के विरुद्ध सारे छात्र संगठन एकजुट होकर कश्मीर और नक्सल-बहुल (बस्तर जैसे) क्षेत्रों की आज़ादी के लिए एकजुट हो रही हैं ! शुभ संकेत है, लगता है शीघ्र ही सभी विश्वविद्यालयों में ABVP की शक्ति इतनी बढ़ जायेगी कि देशद्रोही तत्वों पर मुकदमा करने की भी आवश्यकता नहीं पड़ेगी !

अगले पृष्ठ पर जरूर पढे 

जवान वीरगति को प्राप्त होते हैं, उसका कारण "युद्ध" है या गले की फाँस बन गया "पाकिस्तान" ?

ब्लॉग: ( कुमार प्रियांक ) :- 1965 का वर्ष एक ऐसा वर्ष था जब भारत के तमाम विरोधियों को ऐसा लग रहा था कि भारत एक अत्यंत कमजोर देश है। कारण थे:- 1962 में वामपंथी चीन पर भरोसा कर नेहरू जी ने जरूरत से ज्यादा अच्छा दिखने के चक्कर में भद्द पिटा ली थी.., दूसरे अकाल का दौर था, तीसरे नेहरू जी की मृत्यु के बाद प्रधानमन्त्री बने थे छोटे कद के और पतली आवाज़ वाले चकाचौंध से दूर रहने वाले लाल बहादुर शास्त्री जी..!!

शास्त्री जी की पार्टी काँग्रेस भी यही मान कर चल रही थी कि शास्त्री जी सिर्फ एक अल्पकालिक व्यवस्था के तहत प्रधानमन्त्री हैं और देर-सबेर चापलूस संस्कृति के तहत नेहरू-गाँधी परिवार के वारिस को सत्ता मिलनी ही है..!!

पर जिस नियति ने शास्त्री जी के माथे पर ताज सजाया था, उसके मन में कुछ और ही था। पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति जनरल अयूब खान को नई दिल्ली आना था, पर नेहरू जी की मृत्यु के चलते उन्होंने दिल्ली आने का कार्यक्रम रद्द कर दिया क्योंकि उन्हें लगा कि शास्त्री जी का कद इतना नहीं कि वह जाकर मिले..!!

तब सौम्य शास्त्री जी आगे अपनी काहिरा की शासकीय यात्रा से वापस लौटते हुए अचानक से कराँची में उतर गए और अयूब खान को दंग कर दिया..अयूब खान खुद एअरपोर्ट आये शास्त्री जी को छोड़ने। अयूब खान समझ गए थे कि ये छोटे कद का आदमी बात नहीं मानता..!!

इधर 1965 की गर्मियों में तत्कालीन पाकिस्तानी विदेश मंत्री ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो को लगा कि कश्मीर को जीतने का इससे अच्छा मौका फिर न मिलेगा। भुट्टो ने पाकिस्तानी सेनाध्यक्ष मोहम्मद मूसा को टॉप सीक्रेट सन्देश भेजा कि कश्मीर को हासिल करने का यह बहुत बढ़िया वक़्त है। अगर उपयुक्त समय और स्थान पर हमला किया जाये तो सामान्य धारणा के अंतर्गत, दो तगड़े झटके इन हिंदुओं का मनोबल तोड़ने को पर्याप्त होंगे..!!

पाकिस्तान ने ऑपरेशन जिब्राल्टर के तहत लगभग 33 हजार सैनिकों की फ़ौज़ को कश्मीरी कपड़े पहना कर अगस्त 1965 के पहले हफ्ते में कश्मीर में घुसपैठ करा दिया..पाकिस्तानी हुक्मरान को यह फुलटूस भ्रम था कि कश्मीरी उन्हें हाथों-हाथ लेंगे..!!

पर यह क्या.. उल्टे 15 अगस्त 1965 को कश्मीरियों के माध्यम से ही भारतीय सेना को इस घुसपैठ की जानकारी मिली। तब तक पाकिस्तानी फ़ौज़ उरी, पूँछ आदि सेक्टर में घुस चुकी थी..!! भारतीय सेना ने जवाबी कार्रवाई शुरू की..और ग़ुलाम कश्मीर के हाजी पीर दर्रे पर कब्ज़ा कर लिया..!!

गलिवर में मुझे भारत का हिन्दू दिखता है, वर्तमान में हिन्दू की दशा गलिवर जैसी ही है!

ब्लॉग: ( केशर देवी ) :- यह चित्र आप पहचान ही गए होंगे, गलिवर का है । गलिवर की कहानियाँ बचपन में पढ़ी ही होंगी आप ने । जब समु:द्र यात्रा में उसका जहाज टूटता है, किसी लकड़ी के सहारे वो तैरता हुआ किनारा पा लेता है । किनारे पर चला आता है और थक कर वहीं सो जाता है । नींद नहीं, यह बेहोशी होती है ।

इस बेहोशी से जागता है तो पाता है कि कसकर जकड़ा गया है । दिखने में तो उसको जकड़नेवाली रस्सियाँ छोटी छोटी लगती हैं लेकिन वे इतनी हैं कि वो उन्हें तोड़ नहीं पाता । कुछ इस कदर जगह जगह से जकड़ा गया है कि हाथ पाँव नहीं हिला सकता करवट बादल नहीं सकता, उसके अपने बाल ही बल बनाकर खूँटों से बांधे गए हैं सो गर्दन हिलाना भी नामुमकिन है ।

वो देखता है कि जैसे वो जाग जाता है, आजूबाजू चहल पहल देखता है । शरीर पर कुछ जीव चलने का एहसास होता है तो जैसे तैसे गर्दन उठाकर देखता है तो सैंकड़ों अंगूठे से भी छोटे लोग उसके शरीर पर और इर्द गिर्द विचरते होते हैं। वे भी ऐसे वैसे नहीं। बिलकुल सैनिक टुकड़ियाँ । कोई ढाल तलवार लिए, कोई भाला तो कोई तीर कमान । गलिवर जो कोशिश करता है उसपर हमला होता है । बाण तो सुइयां होते हैं लेकिन चुभते जरूर है । बदन में सेंकड़ों जगह चुभते शास्त्रों की पीड़ा से वो बेहाल हो जाता है और ठंडा पड जाता है । उसे पूरी तरह वश में लाने के बाद ही उसे कुछ शर्तें समझाई जाती हैं और उन्हें मानने के बाद ही उसे सीमित हालचाल की अनुमति दी जाती है, बंधन जरा से ढीले किए जाते हैं ।

फिर कुछ दिनों बाद जब उन्हें विश्वास हो जाता है कि अब ये अपना पालतू हुआ है तब उससे काम करवाए जाते हैं । चूंकि इसके पास वहाँ से भागने के लिए कोई जहाज नहीं होता, नैया भी नहीं होती, यह मान लेता है । उनके लिए पड़ोसी देश पर आक्रमण भी करता है । उनके युद्धक पोत खींचकर ले आता है । राजा रानी से शाबासी पता है ।

लेकिन उसके कोई शत्रु भी बन जाते हैं जो उसको मरवाने के चक्कर में रहते हैं । अपने खिलाफ हुए एक षडयंत्र की भनक लगते ही ये जैसे तैसे देश त्याग करता है ।

गलिवर में मुझे भारत का हिन्दू दिखता है । ताकत तो गलिवर की पूरे लिलीपुट राज्य से अधिक थी, लेकिन वो इस कदर बांध दिया गया था कि हिलना मुश्किल था। अपनी मर्जी से कुछ कर नहीं पाता था, यहाँ हाथ हिलाने की कोशिश की तो उँगलियाँ कुछ इस कदर बंधी थी कि हिला ही न सका । बंधन ऐसे कि हिल न पाये लेकिन शरीर जब अलग अलग मांगें करें और आप हिल न पाओ तो अपने आप आदमी सरेंडर कर देता है ।

गलिवर जब बेहोश था तब उसे जकड़ लिया गया, बेहोशी टूटी तो खुद को बंधा पाया । यहाँ हमें बेहोश रखा गया और नियम के नाम पर ऐसे ऐसे बंधन लादे गए हैं जो हमारा सांस्कृतिक बधियाकरण करने में सहायक हैं । संस्कृति का क्या महत्व है अगर आप ऐसे पूछेंगे तो उत्तर है कि राजनीति की उपधारा संस्कृति की मुख्यधारा से ही निकलती है । संस्कृति वो नदी है जो आप को पोषण देती है । उसी का प्रवाह विष मिश्रित कर दो, हो गया आप का काम । कई परिणाम अपने आप होते रहेंगे जैसे विष अपना धीमा असर दिखाता जाएगा। आपको सांस्कृतिक, मानसिक और आर्थिक dhimmi बना देगा और ऊपर से यही समझाएगा कि यही सही है, अभी जाकर आप सुसंस्कृत प्रजा बन रहे हैं ।

क्या हमारे साथ यही छल कपट हुआ नहीं है ?

यह चित्र तो भगवा धवल है लेकिन कथा में सभी व्यक्तिरेखाएँ अन्य रंगों में हैं । कपड़े लाल, हरे, नीले, सफ़ेद, सब हैं । बाकी इन सब का हमारे लिए संदर्भ आप समझ ही गए होंगे ।

गलिवर यात्रा को निकला और दुर्घटना के कारण लिलीपुट जा पहुंचा। फिर अवसर देखकर भाग निकला, आजाद हुआ । हमें कहीं भागना नहीं है, यह भूमि हमारी है, आवश्यक निर्णयों से मुंह मोड़ना मुमकिन नहीं ।

कुछ कहना है ? नहीं तो शेयर – कॉपी पेस्ट कर के अन्य गलिवरों को जगाएँ।

ब्लॉग: कलिखो पुल की आत्महत्या और सेकुलर दोगलेपन की इन्तेहा

ब्लॉग: ( अभिजीत सिंह ) यूनाइटेड हिन्दी स्पेशल :- उषाकालीन सूर्य का भारत में प्रथम स्वागत करने वाला राज्य अरुणाचल लगभग पूरा पहाड़ी प्रदेश है। इस राज्य पर ईश्वर की विशेष अनुकंपा का पता इस बात से चलता है कि राज्य की लगभग दो-तिहाई आबादी जहाँ सघन वनों से आच्छादित है जिनमें एक से एक दुर्लभ वृक्ष हैं वहीं इस राज्य के पास प्रचुर जल-संसाधन भी है। इसके अलावा प्रकृति ने इस राज्य को जनजातीय विविधताओं से भी सजाया है। यहाँ कई जनजातियाँ निवास करतीं हैं जिनमें लगभग हरेक की अपनी विशिष्ट भाषा, संस्कृति, परम्परायें और रीति-रिवाज हैं।

( अंग्रेजों के आगमन के पहले पूर्वोत्तर भारत के आदिवासी ब्रह्मवादी अथवा प्रकृतिपूजक थे । असंदिग्ध रूप से इस क्षेत्र में मिशनरी के प्रभाव में इसाई धर्म का प्रसार हुआ । कहा जाता है कि ईस्ट इंडिया कंपनी इस क्षेत्र में व्यापार से अधिक रूचि इसाई धर्म के प्रसार में लेती थी । आदिवासियों को शिक्षित और सभ्य बनाना तो एक बहाना था, असली उद्देश्य तो ईसाइयत का प्रसार करना था । आंकड़े देखने के बाद एक आश्चर्यजनक तथ्य उजागर होता है कि आज़ादी के बाद पूर्वोत्तर में इसाई धर्म के प्रसार में और तेजी आई। )

इन सबसे ऊपर अरुणाचल की सबसे बड़ी खासियत ये है कि पूरे पूर्वोत्तर में यह सबसे शांत प्रदेश है और भारत को कभी भी यहाँ के लोगों की तरफ से अलगाववादी मानसिकता का सामना नहीं करना पड़ा पर ईसाई (कसाई) मिशनरी इस राज्य पर भी कहर बनकर टूटे। जब यहाँ भी ईसाई मिशनरी गतिविधियाँ बढ़ने लगी और यहाँ के लोगों को लगने लगा कि हमें भारत से अलग करने और हममें अलगाववादी मानसिकता विकसित करने की कोशिश हो रही है तो वहां लोगों ने मिशनरियों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। कई चर्च पर हमले हुए और मिशनरियों को अरुणाचल से निकल जाने को कहा गया। इसके बाद वहां छद्म सेकुलर राजनीति का असली खेल शुरू हुआ, लोकसभा सांसद रानो साईजा और मारग्रेट अल्वा (दोनों ईसाई) दोनों ने अरुणाचल में अपना डेरा डाल दिया और छद्म सेकुलर प्रेस का इस्तेमाल कर एक छोटी घटना को बड़ा बनाकर दुनिया भर में इस रूप में कहकर प्रचारित किया कि अरुणाचल के लोग कितने हिंसक है।

उतने इस कुकृत्य ने अरुणाचल के राष्ट्रवादी नेताओं को आग-बबूला कर दिया। उस समय पी० के० थुंगन अरुणाचल के राष्ट्रपति और श्री के० ऐ० ऐ० राजा वहां के उप-राज्यपाल थे। इन दोनों ने स्पष्ट ऐलान कर दिया कि अरुणाचल की हिन्दू संस्कृति के साथ किसी भी तरह की छेड़छाड़ बर्दाश्त नहीं की जायेगी। फौरन अरुणाचल सरकार ने राज्यपाल के सहयोग से वहां “अरुणाचल प्रदेश इनडीजिनस फेथ बिल” नाम से एक धर्मांतरण विरोधी कानून पास करवाया। जैसे ही ये कानून पास हुआ मानो पूर्वोत्तर के राज्यों में भूचाल आ गया। शिलांग (जो उत्तर पूर्व में उस समय ईसाईकरण का केंद्र था) से लेकर मिजोरम और कोहिमा से लेकर इम्फाल तक विरोध प्रदर्शन शुरू हो गये। वायस ऑफ़ अमेरिका, बी० बी० सी०, स्पेन और ऑस्ट्रेलिया के समाचारपत्र अरुणाचल के ख़बरों से पट गये। भारत में भी जगह-जगह छद्म सेकुलर पार्टियाँ और मीडिया इस खबर को इस रूप में दिखाने लगी मानो अरुणाचल से अधिक असहिष्णुता कहीं है ही नहीं!

अरुणाचल के लोग इस विश्वव्यापी विशाल ईसाई नेटवर्क का प्रसार देखकर हक्के-बक्के रह गये, उन्हें समझ ही नहीं आया कि ये वही मीडिया और वही लोग हैं जिन्होंने चीन हमले के दौरान भी अरुणाचल को ठीक से कवर नहीं किया था और आज धर्मांतरण विरोधी कानून पास होते ही इतने सक्रिय हो गये कि पूरी दुनिया में अरुणाचल को बदनाम कर दिया।

बहरहाल अरुणाचल के हिम्मती नेताओं ने इन विरोध प्रदर्शनों की जरा भी परवाह न की और धर्मांतरण विरोधी कानून को वापस नहीं लिया। ऐसा नहीं है कि इस बिल के बाद अरुणाचल में ईसाईकरण के प्रयास नहीं हुये, हुये, कैसे हुये ये किसी और पोस्ट में लिखूँगा पर आज इस घटना के स्मरण का हेतू ये है कि हाल में अरुणाचल प्रदेश के पूर्व मुख्यमन्त्री स्वर्गीय कलिखो पुल ने आत्महत्या कर ली थी। कलिखो पुल पिछले वर्ष काँग्रेस से विद्रोह कर भाजपा के समर्थन से अरुणाचल के मुख्यमन्त्री बने थे और माननीय सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में उनकी सरकार को अवैध करार दिया गया था। इस घटना के बाद से ही कलिखो पुल गहरे अवसाद में चले गये थे और अंततः उन्होंने आत्महत्या कर ली थी। आत्महत्या से पहले उन्होंने जो लम्बा पत्र लिखा था उसे जी न्यूज़ को छोड़कर देश की किसी भी भ्रष्ट मीडिया ने संज्ञान में लेना उचित नहीं समझा। ( आश्चर्य की बात है कि कलिखो पूल ने अपने 60 पेज के सूसाइड नोट मे अपनी आत्म हत्या के लिए जिम्मेदार सरकारी तंत्र के अलावे सर्वोच्च न्यायपालिका पर भी आरोप लगाया है। इसके वावजूद भी जी न्यूज छोड़ कर किसी भी चैनल ने कोई समाचार नहीं दिया। )

सोचिये अगर भारत के किसी और राज्य के एक पूर्व- मुख्यमंत्री ने अगर आत्महत्या की होती तो क्या उस खबर को भी ये दोगली मीडिया इसी तरीके से इग्नोर कर देती ?

आधे-पौने राज्य के एक अराजक नेता की मामूली नौटंकी को भी जो मीडिया रात-रात भर दिखाती है उसके लिये एक राज्य के मुख्यमंत्री का आत्महत्या करना सिर्फ एक मामूली खबर है।

सेकुलर (दोगले) चाहे तो दलील दे सकतें हैं कि चूँकि अरुणाचल सूदूर प्रदेश है व लोग उसके बारे में ज्यादा नहीं जानते तो उस राज्य के अधिक समय देना मीडिया के उचित नहीं था । फिर हमारा सवाल ये है कि आज से चालीस साल पहले इसी मीडिया ने और इन्हीं छद्म सेकुलरों ने “अरुणाचल प्रदेश इनडीजिनस फेथ बिल” के विरोध में जो अपनी अखबारें रंगी थी और सारी दुनिया में चीख-चीख कर अरुणाचल को बदनाम किया था वो क्या था और क्यों था ?

आये दिन संघ परिवार को सदभावना की नसीहत देते हुए उसे भारत की एकता के लिये खतरा बताने वाली बिकी हुई मीडिया और छद्म सेकुलरों के इस चरित्र को दोगलेपन की इन्तेहा के रूप में क्यों न देखा जाये ?

तीनों गांधी की हत्या में यही जिम्मेदार क्यों है? हत्या तो इनको बनाने के कारण हुयी थी ?

ब्लॉग: ( केशर देवी ) यूनाइटेड हिन्दी के लिए :- पिछले दिनों रामजस कॉलेज दिल्ली में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के छात्र छात्रों ने देशतोड़क वामपंथी छात्र संगठन के छात्र छात्रों की जो ठुकाई की है, उससे इनका जहाँ मनोबल टुटा है वही उनकी मानसिक विच्छिप्तिता भी खतरे के निशान की तरफ बढ़ गयी है। उसका परिणाम यह हुआ है कि राष्ट्रवादी विचारधारा विरोधी वामियों और उनके प्रचार में लगी सेक्युलर मिडिया, भारतीय जनमानस को मुद्दे से भटका कर, गुमराह पीढ़ी को सामने कर, ‘अमन की आशा’ को नए कलेवर में उतार रही है।
 
इसके प्रतीक के रूप में एक दिल्ली यूनिवर्सिटी की छात्रा, गुरमोहर कौर, जिसके पिता शायद सीमा पर शहीद हुए है, उसको विज्ञापन का चेहरा बनाया गया है। एक फौजी की बेटी, एक बैनर उठाय हुए है जो भारत की जनता को बता रही है कि वह अपने पिता की मौत के लिए, पाकिस्तान को जिम्मेदार नही बल्कि दोषी युद्ध है।
यह कौन सा ज्ञान है और कैसा ज्ञान है जहाँ अपनों से हिकारत और कातिल से मुहब्बत सिखायी जाती है?
 
यह कौन सा ज्ञान है जहाँ राष्ट्र की रक्षा और सुरक्षा के लिए युद्ध को दोषी मान कर, राष्ट्र, यानि भारत को ही मुजरिम बनाया जाता है और जो पाकिस्तान दशको से भारत में मौत की सौगात भेजता रहा है, उसके साथ हमबिस्तर होते है?
 
यदि यह ज्ञान सही है तो पिछले 7 दशकों से नाथूराम गोडसे को गांधी का हत्यारा क्यों कहा जाता है, वह हत्या तो भारत के बंटवारे ने की थी?
 
इंदिरा गांधी की हत्या के लिए सिखों को दोष क्यों देते है, वह हत्या इंद्रा गांधी द्वारा भिंडरवाला बनाने के कारण हुयी थी?
 
राजीव गांधी की हत्या के लिए लिट्टे क्यों जिम्मेदार है, वह भी हत्या लिट्टे को बनाने के कारण हुयी थी?
 
यह कोई ज्ञान नही यह विध्वंसक अज्ञान है और इसका सिर्फ एक ही उपाय है कि ये जहाँ जब भी यह मौका दें, इनको मसल डालो क्योंकि यह लोग कुतर्क के पराधीन तर्क से परे, पागल, विक्षिप्त हो चुके है।
 
और पागल कुत्ते को लाठी नही मारी जाती है, उसे गोली मार दी जाती है।

किसी आतंकी के मां बाप को देखा सुना है यह कहते कि इस्लाम ने हमारे बेटे को मारा ?

यूनाइटेड हिन्दी,  ब्लॉग: ( @vishwajeet.official ) :- बन्द करो ये प्रोफाइल पिक्चर पर लिखना “हिंदुस्तान का हर छात्र मेरे साथ है” (Every student of India is with me), क्योंकि ये कोरी बकवास से ज़्यादा कुछ भी नहीं।

जो अक्ल के कच्चे लोग होते हैं मगर उम्र में बड़े, उनकी आदत होती है हर मुद्दे को अवैज्ञानिक रूप से तोड़-तोड़ कर देखने की, बजाय इसके कि किसी भी चर्चा को और विषय को उसकी पूर्णता में देखें। इस देश की उच्च शिक्षा व्यवस्था भी ऐसे ही अक्ल के कच्चे लोग निकालने में माहिर है और यही इस देश के वैचारिक पतन का कारण बनी है।

क्या ये लोग आज़ादी के लिए नारेबाजी करने वालों के साथ हुई हिंसा का विरोध तब भी करते अगर इनके परिवारों को भी जिहादियों के कश्मीर से लात मार कर निकाला होता? जिस फ्रीडम ऑफ़ स्पीच की तुम लोग बात करते हो, अरे इन जिहादियों ने तो हमारा फ्रीडम ऑफ़ लाइफ तक नहीं छोड़ा है जहाँ जहाँ ये बहुसंख्यक हुए हैं! And you have the fucking audacity to demand the freedom of speech for them? So that they can spread more venom more terror?

क्या हमारा खून पर इतना पानी हो चुका है कि अब हम आज़ादी मांगने वालों को उनकी ही दवाई का एक छोटा सा डोज़ नहीं दे सकते, वो भी एक प्रतिक्रिया के तौर पर नहीं वरन एक प्रदर्शन यानि demostration के रूप में?

आज़ादी किससे? कुफ़्र से? आज़ादी “हिन्दू”स्तान से क्योंकि इस्लाम कायनात का असली मज़हब है?

आज़ादी हर उस चीज़ से जो इस्लाम से इत्तेफाक़ नहीं रखती हो? आज़ादी हर उस चीज़ से जो इन वामी-इस्लामियों को नापसंद हो? यानि आज़ादी हिंदुओं से?

वो आज़ादी जो काफिर औरतों और उनके बच्चों को हवस का शिकार बनाने दे? वो आज़ादी जो काफिर की दौलत और ज़मीन को अल्लाह का तोहफा बताये एक सच्चे मुसलमान के लिए? वो आज़ादी जो ये सब पाना चाहती है काफिर मर्दों को क़त्ल करके?

कबसे इन “छात्रों” ने ये फैसला कर लिए कि “आतंक-विरोधी गतिविधि” और “आतंकवाद” दोनों को ही हिंसा माना जायेगा? क्या इन लोगों पर भी हिलेरी समर्थक मूर्ख अमरीकियों का असर आ गया है?

क्या ये “छात्र” अँधे हो गए हैं, देख नहीं पा रहे कि अगर पढ़े लिखे लोग, जो सोशल मीडिया पर हैं, सिर्फ उन्हीं को भी देखें तो भी उनको दिखेगा कि अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद को कितना ज़्यादा समर्थन मिल रहा है? सोशल मीडिया तक सीमित रखने के लिए उनको इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि इस बात की प्रबल संभावना है कि वो सोशल मीडिया के बाहर किसीको भी नहीं जानते होंगे, ख़ास का अपने instagram फॉलोवर्स के अलावा।

और इस लाइन का मतलब क्या है – “Every student of India is with me”? कौनसा सर्वे किया है तुम चूतियों ने जो हर हिंदुस्तानी छात्र के मन की बात तुम तथाकथित “neutral” लोग समझ गए हो? Do you know what they call those who assume things?