आप सभी को नववर्ष एवं नवरात्र मंगलमय हो। धर्मो रक्षति रक्षितः।

भारतीय एवं हिंदू नव वर्ष की शुभकामनाएं यह नव वर्ष आपके जीवन में खुशियां सुख समृद्धि एवं आनंद लेकर आए और आपके जीवन को प्रसन्नता से भर दे आपकी सारी मनोकामनाएं पूरी हो…..

Yashark Pandey : चैत्र प्रतिपदा आज से है या कल से ये मुझे नहीं पता। कुछ विद्वानों को पढ़ा किंतु समझ में नहीं आया। प्रायः अखबार में खबर आती है कि काशी के फलां फलां विद्वानों की बैठक होने वाली है जिसमें पूरे देश में एक पंचांग की व्यवस्था करने पर विचार होगा। ऐसी बैठकों में विमर्श से क्या निष्कर्ष निकलता है पता नहीं। ज्योतिष अपना विषय नहीं है अतः कुछ और कहना उचित नहीं।

अत्रि विक्रमार्क अन्तर्वेदी जी की आईडी बन्द है अन्यथा डांट डपट के कुछ ज्ञान दे ही देते। मांस हम खाते नहीं तो नवरात्र में छोड़ने का प्रश्न भी नहीं उठता। जीव जन्तु herbivore, carnivore और omnivore होते हैं। मैं ‘herbi-fruity-vore’ हूँ। अर्थात् अनाज खाते हुए फलाहार भी भखने वाला।

अपना एक मित्र है। जब बनारस में रहता था तो उसके यहाँ नवरात्र पे ढेर सारा स्वादिष्ट फलाहार बनता था। हम अपने घर में अनाजी खा के उसके यहाँ फलाहार खाने जाते थे। भूखा रहना अपने बस की बात नहीं। वर्ष में केवल दो दिन व्रत रहता हूँ: महाशिवरात्रि और श्रीकृष्ण जन्माष्टमी।

बन्धुओं प्रतिदिन किसी एक ग्रन्थ का पाठ अवश्य करें। संस्कृत ही संस्कृति का मूल है अतः अर्थ समझते हुए स्वाध्याय करें। मेरे परिवार में नित्य चार ग्रन्थों का पाठ होता है। मैं रुद्री करता हूँ, पिताजी गीता और मानस, माँ दुर्गा सप्तशती का पाठ करती हैं। यह बताने का आशय यह है कि आपके कुटुंब में जितने सदस्य हों उतने ग्रन्थ आपस में बाँट लीजिए। शास्त्रों से विमुख होना संस्कृति से विमुख होना है। संस्कृति से विमुख होना अर्थात् राष्ट्र से विमुख होना है।

बिना पूजा पाठ किये झुट्ठै व्रत रखना व्यर्थ है। कहा गया है कि दुर्गा सप्तशती का पाठ करते हुए उच्चारण की अशुद्धि नहीं होनी चाहिये। जिन्हें संस्कृत नहीं आती वे हिंदी संस्करण का मानसिक पाठ करें।

एक बार करपात्री जी महराज हाथ में कोई ग्रन्थ लेकर पाठ कर रहे थे। किसी ने देखा तो टोक दिया कि महराज पोथी को हमेशा लकड़ी के पीढ़े पर रख कर पाठ करना चाहिये अन्यथा आधा फल ही प्राप्त होता है।

करपात्री जी बोले, ‘कलियुग में पूरा फल मिलता कहाँ है, आधा ही मिल जाये तो बहुत है।’ अतः यदि आप संस्कृत से परिचित नहीं हैं तब भी हिंदी में दुर्गा सप्तशती गीता प्रेस से ले आइये। देवी का स्मरण करते हुए पाठ करें। एक बार पूरी कथा पढ़ लेंगे फिर संस्कृत में पढ़ने पर स्वतः सरल प्रतीत होगा।

आप सभी को नववर्ष एवं नवरात्र मंगलमय हो। धर्मो रक्षति रक्षितः। जय जय श्री राम _/\_

कभी सोचा है कि इतने आधातों को सहकर भी आज हिन्दू कैसे बचे हैं, ये धर्म कैसे बचा है?

आपने कभी सोचा है कि इतने आधातों को सहकर भी हम आज हिन्दू कैसे बचे हैं ? हमारा धर्म कैसे बचा है ? फोटो Source : santabanta.com

ब्लॉग : महावीर प्रसाद खिलेरी (संपादक यूनाइटेड हिन्दी डॉट कॉम) : हिन्दू समाज शायद दो हज़ार सालों से गुलाम रहा है! हमारे ऊपर सदियों तक इस्लामी शासन रहा फिर कई रूपों में ईसाईयों ने हम पर शासन किया फिर 1947 में जब देश तथाकथित रूप से आजाद हुआ तब हमसे हमारा धर्म छीनने मिशनरी लोग आ गये, लालच दिया, कई जगह डर दिखाया, कई जगह अहसान जता कर उसकी कीमत मत-परिवर्तन के रूप में वसूलनी चाही, हमारे ऊपर न जाने कितने मोपला और मीनाक्षीपुरम हुए। आपने कभी सोचा है कि इतने आधातों को सहकर भी हम आज हिन्दू कैसे बचे हैं ? हमारा धर्म कैसे बचा है ?

आज हम हिन्दू इसलिये हैं क्योंकि हमारे पूर्वजों ने अपना धर्म नहीं छोड़ा। डर, हिंसा, प्रपंच, लालच, षड्यंत्र सबके बीच सदियों तक संघर्ष करते रहे। हमारे एक पूर्वज इधर राजस्थान में घास की रोटी खाकर हिन्दू धर्म बचा रहे थे तो उधर पंजाब में हिन्दू धर्म को बचाने के लिये कुछ पूर्वज जीवित ही दीवार में चुनवा दिये गये। अपने उन पूर्वजों के बारे में भी दो मिनट सोचिये जिन्होनें धर्म बदलने की जगह मैला उठाने के काम को चुना था। हकीकत राय के बलिदान के बारे में सोचिये, दक्षिण भारत की माँ रुद्र्माम्बा देवी के त्याग का स्मरण कीजिये, पूरब के वीर लाचित बरफूकन का स्मरण कीजिये और न जाने ऐसे कितने नाम है जिन्होनें अपना सर्वस्व खो कर हिन्दू धर्म को बचाये रखा। ये सब किसी एक जाति-विशेष के नहीं थे !

आप योगी जी की प्रशासनिक क्षमता पर सवाल इसलिये नहीं उठा रहे कि आपको वास्तव में इस बात की कोई फ़िक्र है कि वो शासन कैसे चलायेंगे! दरअसल वजह ये है कि योगी जी में आपने किसी ठाकुर को ढूंढ लिया है जो आपको पीड़ा दे रहा है। योगी जी के ऐब आप इसलिये ढूंढ रहें हैं क्योंकि मोदी जी ने आपके जात वाले को मुख्यमंत्री नहीं बनाया। इसी तरह जब आप योगी जी को ठाकुर अजय सिंह विष्ट लिख रहें हैं तो आप उन्हें एक जाति विशेष से बाँध रहें हैं, जाहिर है फिर बाकी जाति वाले भी उन्हें उसी रूप में लेंगें।

अपनी जातिवादी मानसिकता में जब हम किसी के बारे में कुछ लिखतें हैं, किसी जाति के मूल पर प्रश्न उठाते हैं तो एक बार ये भी सोच लीजिए कि आपने गाली किसको दी है ? आप उनको गाली दे रहें हैं उनके कारण हम हैं वर्ना हम भी आज पीटर या जुम्मन बनकर जी रहे होते ! वो पूर्वज चाहे किसी भी जाति के हों पर वो सब हमारे लिये वन्दनीय है क्योंकि उन्होंने हमारे लिये उस धरोहर (हिंदुत्व) को सहेजे रखा जिसका अनुपालन मनु, परशुराम, श्रीराम, श्रीकृष्ण, श्री बुद्ध से लेकर गुरु गोविन्द सिंह करते थे।

हम या आप जिस जाति में पैदा हुयें हैं वो हमारी या आपकी चॉइस नहीं थी, भगवान की मर्जी थी। ईश्वर की मर्जी पर जो सवाल उठाये, उसके सृजन को किसी भी रूप में लांछित करे उससे कृतघ्न और अज्ञानी कोई नहीं हो सकता। मैं कभी किसी दलित को गाली नहीं देता, इसलिये नहीं कि वो गलत नहीं हो सकते बल्कि इसलिये क्योंकि इतने दंशों, अत्याचारों और प्रलोभनों को सह कर भी आज वो हिन्दू है। इस देश की मुख्य-धारा में है और कम से कम हमारे अस्तित्व को लीलने वाला खतरा नहीं है। मैं कभी किसी क्षत्रिय को गाली नहीं देता क्योंकि उनके पूर्वजों ने सदियों तक हमारे भारत की अखंडता अक्षुण्ण रखने के लिये बलिदान दिया है। मैं किसी ब्राह्मण को गाली नहीं देता क्योंकि दुनिया में भारत को विश्व-गुरु बनाने का गौरव उनके पूर्वजों का था। मैं किसी वैश्य को गाली नहीं देता क्योंकि इन्होंनें अपनी धन-संपत्ति राष्ट्र-रक्षा में कई बार न्योछावर की है। इसी तरह मैं अपने किसी वनवासी बंधू को अपमानित करने का भी पाप नहीं करता, ये तो तबसे धर्म रक्षक रहें हैं जब भगवान राम इस धरती पर आये थे।

अपने जातिगत पूर्वाग्रहों को छोड़िये वरना प्रकृति सौभाग्य को दुर्भाग्य में बदलने में जरा भी देर नहीं करती।

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मच्छरों से मुक्ति

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विनय झा :- जहरीले रसायनों से बने मच्छर भगाने या मारने वाले उत्पाद बाज़ार में धड़ल्ले से मिल जायेंगे, किन्तु मच्छरों से अधिक मनुष्यों को उनसे क्षति पहूँचती है | मच्छरों को मारना जीवहत्या भी है, उन्हें भगाने का उपाय होना चाहिए | ऐसे बहुत से उपाय हैं, किन्तु जहरीले रसायन बेचने वाली कम्पनियां तो विज्ञापन पर पैसा खर्च कर सकती है, जबकि स्वस्थ और प्राकृतिक उपायों के प्रचार से मीडिया को लाभ नहीं है !

मैं अपने व्यक्तिगत अनुभव के आधार पर सप्तसूत्री उपाय प्रस्तुत कर रहा हूँ :–

1 → सबसे कारगर है एक पौधा जिसका नाम किसी को पता नहीं है | दक्षिण भारत (उडुपी, कर्नाटक) से मार्च 2011 में कार द्वारा लौटते समय मध्यप्रदेश के जंगल में एक साधु की कुटी में यह पौधा मैंने देखा था जिसकी गन्ध मनुष्य को नहीं लगती, किन्तु तुलसी पौधे के आकार के इस पौधे के कारण कई एकड़ तक जंगल में एक भी मच्छर (और अन्य कीटाणु) नहीं मिला ! वह स्थान है जबलपुर नगर के दक्षिणी छोर से बीस किलोमीटर दक्षिण | जबलपुर-नागपुर राष्ट्रीय राजमार्ग के ठीक किनारे लगभग बीस-पच्चीस मीटर ऊँची हनुमान जी की लाल मूर्ति है | वह मन्दिर और संलग्न आश्रम हिनौता ग्राम के अन्तर्गत पड़ता है, यद्यपि गाँव हटकर है, आश्रम का क्षेत्र जंगली है | उसी आश्रम में यह पौधा है | वहाँ के साधु महाराज ने मुझे बताया कि वे एक स्थान पर अधिक दिनों तक नहीं टिकते, अतः हो सकता है अब वे वहाँ नहीं मिले और उस पौधे की जानकारी वहाँ किसी अन्य व्यक्ति को न हो ! पिछले पाँच वर्षों के दौरान मैंने बहुत लोगों को यह जानकारी दी जिनमे कुछ तो उसी क्षेत्र के हैं, किन्तु किसी ने उस आश्रम तक जाने का कष्ट नहीं किया | उस पौधे का प्रचार हो जाय तो पूरी मानवजाति का भला होगा | साधु महाराज ने कहा कि वर्षा के मौसम में उस पौधे के बीज निकलते हैं, किन्तु वर्षा के दौरान वहाँ जाने का मुझे अवसर नहीं मिला |

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2 → इन्टरनेट पर सर्च करने से बहुत से पौधों के विवरण मिल जायेंगे जिनके प्रभाव से मच्छर भागते हैं | वे पौधे दुर्लभ हैं, कुछ पौधे नर्सरी में मिल जायेंगे | उनमें से एक पौधा सर्वसुलभ है जिसका प्रभाव मच्छर ही नहीं, लगभग सभी कीटों पर पड़ता है, यद्यपि प्रभाव अधिक नहीं है — गेन्दा | प्लास्टिक की बाल्टी में गेन्दा का पौधा लगाएं, दिन भर धूप में रखे और सायं कमरे में ले आयें | सारे मच्छर तो नहीं भागेंगे, किन्तु अधिकाँश भाग जायेंगे और जो बचेंगे उनकी शक्ति अपनी जान बचाने में लग जायेगी, बहुत कम मच्छर ही आपको काट पायेंगे | कीड़े-मकोड़े भी भाग जायेंगे | बनारस में मैं इस विधि का प्रयोग तब करता था जब मैं काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के भीतर रहता था | बाद में जहाँ मेरा आवास था वहाँ ऐसा सम्भव नहीं हो सका, क्योंकि सबसे ऊपर की मंजिल पर केवल मेरा ही फ्लैट था जहाँ मेरी अनुपस्थिति में पानी देने वाला कोई नहीं था जिस कारण सारे पौधे सूख गए | किन्तु बगल में अस्सी नाले की गन्दगी के बावजूद वहाँ मच्छर बहुत कम थे |

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3 → भोजन में तेल, मसाले, मिर्च, आदि मैंने बीस वर्ष पहले त्याग दिया था जिस कारण मच्छरों को मेरा रक्त स्वादिष्ट नहीं लगता था ! इन्द्रियाँ सभी जीवों के पास होती हैं, भले ही वैज्ञानिकों को दिखे या न दिखे | मच्छर आसुरी योनि का जीव है जिसकी उत्पत्ति एक राक्षसी से हुई है (योग वासिष्ठ)| असुरों में ऐन्द्रिकता अत्यधिक होती है, अतः स्वाद के प्रति मच्छर आकर्षित होता है | सात्विक भोजन करने वालों पर मच्छर का आक्रमण तभी होता है जब स्वादिष्ट रक्त वाले मनुष्य आसपास न हो | इस बात को हँसी में न लें | मेरे कमरे में बैठे दूसरे लोगों को मच्छर काटते रहते थे जिनके कारण मुझे जहरीले रसायन वाले उत्पाद खरीदने पड़ते थे |

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4 → सरसों का तेल चमड़ी पर रोजाना मालिश करें | भोजन में तेल बिलकुल न लें, सम्भव हो तो भोजन में देसी गाय का शुद्ध घी प्रयुक्त करें | किन्तु मालिश में सरसों का तेल न केवल मच्छरों को बल्कि बैक्टीरिया से लेकर अन्य सभी कीटों को दूर भगाएगा | चमड़ी पर जबतक तेल का प्रभाव रहेगा तबतक मच्छर चाहकर भी नहीं काटेंगे | जहाँ अधिक समय तक बैठना हो और मच्छर परेशान करें वहाँ खुले अंगों, जैसे कि हाथ-पाँव, पर सरसों का तेल मल लिया करें | बाजारू रसायनों का दुष्प्रभाव सरसों के तेल में नहीं होता | सरसों का तेल प्राकृतिक एन्टी-बायोटिक है | आपने देखा होगा कि आम के अचार को गृहिणियां सरसों के तेल में डुबाकर सालों-साल सुरक्षित रखती हैं | किन्तु शरीर के भीतर देशी गाय का घी सर्वोत्तम एन्टी-बायोटिक है जो इम्यून प्रणाली को शक्ति देकर सभी रोगों से लड़ने की क्षमता देता है |

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5 → शहर में कूड़े के भण्डार से, रुके हुए जल के सड़ने से, आदि कारणों से शहर में मच्छर का प्रकोप बढ़ता है यह तो सर्वविदित है | नागरिक समितियां बनाकर नगरपालिका पर भी दवाब बनाएं और स्वयंसेवक बनकर स्वयं भी शहर की सफाई करें | घर और आसपास गन्दगी न रहने दें, और यदि गन्दगी है तो (फिनाइल या) रामदेव के गोनाइल का प्रयोग करें |

6 → सायंकाल मच्छरों के गृहप्रवेश का मुहूर्त होता है | गाँवों में लोग उस समय गोबर के उपले (गोइठे) का धूआँ करते हैं ताकि मनुष्यों और मवेशियों के वासस्थल से मच्छर दूर भाग जाएँ | शहर में भी सायंकाल कुछ देर के लिए छोटे से मिटटी के गमले में गोबर के उपले का धूआँ करके बाद में दरवाजे और खिड़कियाँ बन्द कर दें या जालीदार खिड़कियों का प्रयोग करें | सोने के कमरे में बाजारू रसायनों के स्थान पर मसहरी का प्रयोग करें | वैसे भी बाजारू रसायनों के प्रति मच्छरों में प्रतिरोधक शक्ति बहुत बढ़ गयी है जिस कारण अब बहुत अधिक बाजारू रसायनों का प्रयोग करना पड़ता है जिनका दुष्प्रभाव मनुष्यों पर भी पड़ता है, खासकर बच्चों पर |

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7 → आजकल लोग सफ़ेद सीमेंट से ह्वाईट-वाश कराने लगे हैं | यदि ऐसा ही करना हो तब भी उसपर (पान आदि में प्रयुक्त) खाने वाले चूने की एक परत ह्वाईट-वाश करा दें — बहुत से कीड़े-मकोड़े घट जायेंगे, कम से कम छ मास तक |

तीस वर्ष पहले मैंने खाने वाले चूने में DDT पाउडर मिलाकर ह्वाईट-वाश कराया था तो लगभग एक वर्ष तक घर में मच्छर का दर्शन नहीं हुआ था | किन्तु सम्भवतः कैंसर की सम्भावना के कारण उस पाउडर पर पाबन्दी लग गयी है, ऐसा लोगों ने बताया है | वैसे भी मैं कृत्रिम रसायनों का विरोधी हूँ | उनके दीर्घकालीन साइड-इफ़ेक्ट वैज्ञानिकों को भी ठीक से पता नहीं रहते | अतः प्राकृतिक साधनों का प्रयोग करें, प्रकृति माँ की सन्तान बनें | मच्छरों की हत्या से बचें, वे तो अचेत और विवश हैं, आप तो चेतन हैं ! मच्छर में ठीक वैसा ही जीव है जो आपमें है, केवल संस्कारों में तमगुण अधिक होने से कोई मच्छर बन गया और कम होने से मनुष्य ! अतः अहंकार न करें |

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अन्य कोई उपाय हों तो मुझे भी सूचित करें  : नीम के तेल से बेहतर है नीम के पत्तों को पीसकर एक चौथाई कर्पूर मिला दें और उसे तरल बनाने के लिए मिटटी का तेल मिलाकर All-Out की खाली रिफिल में भरकर प्रयोग करें | गेंदे के फूल को पीसकर उसे भी उक्त तरल में मिला सकते हैं |

बनारस में मेरे आवास के बगल में नीम का विशाल पेड़ है जिस कारण बगल में अस्सी नाले की गन्दगी के बावजूद बहुत कम मच्छर मेरे आवास की ओर आते हैं | मेरे आवास में मैं अकेला रहता हूँ और मेरा रक्त स्वादिष्ट भी नहीं है, एक बार जो मच्छर चख लेगा वह दुबारा पास नहीं फटकेगा |

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'मैं भी शहीद का बेटा पर गुरमेहर से बिल्कुल सहमत नहीं' : मनीष कुमा

नई दिल्ली ( यूनाइटेड हिन्दी डॉट कॉम ) :- दिल्ली के रामजस कॉलेज में लेफ़्ट और राइट विचारधारा वाले स्टूडेंट गुटों के बीच झड़प के बाद दिल्ली के लेडी श्रीराम कॉलेज में पढ़ने वाली गुरमेहर कौर की पोस्ट वायरल हो गई। इसके बाद हंगामा मचा गुरमेहर की उस तस्वीर पर जिसमें वो एक प्लेकार्ड लिए खड़ी हैं। इस पर अंग्रेज़ी में लिखा है, ”पाकिस्तान ने मेरे पिता को नहीं मारा, बल्कि जंग ने मारा है।”

गुरमेहर के पिता कारगिल युद्ध के दौरान शहीद हुए थे। गुरमेहर कौर की इस पोस्ट का जवाब मल्टीनेशनल कंपनी में काम करने वाले मनीष शर्मा ने दिया है। ये पूरी चिट्ठी नीचे पढ़िए।

हाय गुरमेहर कौर,

पिछले कुछ दिनों में वायरल हुए आपके वीडियो और कुछ इंटरव्यू जिनमें आपने अभिव्यक्ति की आज़ादी की बात की और कहा है, ‘पाकिस्तान ने आपके डैड की हत्या नहीं की, युद्ध ने उन्हें मार डाला।’ इस पोस्ट के चलते आपका नाम हर घर तक पहुंच गया है।

मैं सार्वजनिक तौर पर भावनाओं की अभिव्यक्ति से बचता हूं, लेकिन इस बार लगता है कि बहुत हो गया। मुझे नहीं मालूम कि आप ये जानबूझ कर रही हैं या अनजाने में, लेकिन आपकी वजह से डिफेंस से जुड़े परिवारों की भावनाएं आहत हो रही हैं।

पहले मैं अपना परिचय दे दूं, मैं एक मल्टीनेशनल कंपनी में आईटी पेशेवर के तौर पर काम करता हूं। मेरे पिता भारतीय सेना में अधिकारी थे जो श्रीनगर में ऑपरेशन रक्षक के दौरान चरमपंथियों से संघर्ष करते हुए मारे गए थे।

मैं नहीं जानता कि मैं इसके लिए किसे दोष दूं – युद्ध को, पाकिस्तान को, राजनेताओं को और किसे दोष नहीं दूं क्योंकि मेरे पिता वहां संघर्ष कर रहे थे जो विदेशी ज़मीन ही थी क्योंकि वहां के स्थानीय लोग कहते हैं- इंडिया गो बैक

मेरे पिता ने अपनी जान दी उन्हीं लोगों के लिए, हमारे लिए और हमारे देश के लिए। बहरहाल, हम दोनों नैतिकता के एक ही धरातल पर मौजूद हैं- आपके पिता ने भी जान दी और मेरे पिता ने भी जान गंवाई है।

अब क़दम दर क़दम आगे बढ़ते हैं। आपने कहा कि पाकिस्तान ने आपके पिता को नहीं मारा, ये युद्ध था जिसने आपके पिता को मारा।

मेरा सीधा सवाल आपसे है? आपके पिता किससे संघर्ष कर रहे थे? क्या ये उनका निजी युद्ध था या फिर हम एक देश के ख़िलाफ़ लड़ रहे थे?

ज़ाहिर है ये पाकिस्तान और उसकी हरकतें ही थीं, जिसके चलते आपके पिता और उनके जैसे कई सेना अधिकारियों को कश्मीर में तनावपूर्ण माहौल में अपनी जान गंवानी पड़ी।

अपने पिता की मौत की वजह युद्ध बताना तर्कसंगत लगता है, लेकिन ज़रा सोचिए उनकी मौत की कई वजहें थीं-

1. पाकिस्तान और उसका विश्वासघाती कृत्य

2. भारत के राजनीतिक नेतृत्व में राजनीतिक इच्छाशक्ति का अभाव

3. हमारे नेतृत्व की एक के बाद एक ग़लतियां

4. धार्मिक कट्टरता

5. भारत में मौजूद स्लीपर सेल जो भारत में रहकर पाकिस्तानी आईएसआई की मदद करते हैं.

और इन सबके अलावा, उनकी मौत की वजह- अपनी ड्यूटी के प्रति उनका पैशन और उनकी प्रतिबद्धता थी। ये वजह थी।

मैं इसे एक्सप्लेन करता हूं……

आपके पिता ने अपनी जान तब गंवाई जब उनकी उम्र काफ़ी कम थी, आप महज दो साल की थीं। ये देश के प्रति उनका पैशन था, राष्ट्रीय झंडे और अपने रेजिमेंट के प्रति सम्मान का भाव जिसने उन्हें शहीद होने का साहस दिया।

नहीं तो हम लोग देख रहे हैं कि आपके पिता से ज़्यादा उम्र के लोग अभी भी जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी में पढ़ रहे हैं और देश के ख़िलाफ़ काम कर रहे हैं- किसी क़ुर्बानी की इनसे उम्मीद के बारे में तो भूल ही जाइए।

क्या आपको मालूम है कि आपके पिता ने जिस कश्मीर के लिए अपनी जान दी, उसी कश्मीर की आज़ादी के लिए ये जेएनयू में नारे लगाते हैं।

वे किस आज़ादी की बात करते हैं, वे कश्मीर को पाकिस्तान का हिस्सा बता रहे हैं, ये उनके लिए आज़ादी है और इसके ख़िलाफ़ हम दोनों के पिता ने संघर्ष किया था।

आप जागरूक नागरिक होने के बाद भी इनकी वकालत कर रही हैं। ये वो लोग हैं जो अपने कभी ना ख़त्म होने वाले प्रोपगैंडे के लिए आपको प्यादे की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं।

मैंने आपका आज सुबह इंटरव्यू सुना जिसमें आप कह रही हैं कि आप किसी राजनीतिक पार्टी के ख़िलाफ़ नहीं हैं, आप केवल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बात कर रही हैं।

मेरा आपसे सीधा सवाल है – आपके लिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता क्या है? क्या आपके लिए यह भारत के टुकड़े हों, जैसे नारे लगाना है ?

क्या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मतलब आपके लिए लोगों- मेरे और आपके अपने पिता और उनकी तरह सीमा पर दिन रात गश्त लगा रहे जवानों के अपमान करने का अधिकार मिल जाना है?

मिस कौर, यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं है. अगर आपके पिता आज जीवित होते तो वे आपको बेहतर बता पाते।

मेरा आपसे विनम्र अनुरोध है- आप अपने पिता से कुछ सीखिए. कम से कम अपने देश का सम्मान करना सीखिए क्योंकि देश हमेशा पहले आता है।

मुझे उम्मीद है कि मैं अपनी बात स्पष्टता से रख पाया हूं।

जय हिंद !!

दहेज नहीं तो दूल्हे ने बरात रोकी, लड़की ने दूल्हे के सामने ही दूसरी शादी कर ली…

जयपुर : राजस्थान के खालसा गांव में एक अनोखा मामला सामने आया है। दूल्हे ने दहेज में कार मांगी तो दुल्हन ने बारात वापस लौटा दी और इसके बाद उसी मंडप में दूसरी शादी रचा ली।

जानकारी के अनुसार रावतसर के पास खालसा एक छोटा गांव है। इस गांव की बीएड कर रही बेटी रेणु अन्य लड़कियों के लिए रोल मॉडल बनकर उभरी है। उसने दहेज लोभी दूल्हे से शादी के एन वक्त इंकार कर ऐसा साहसिक कदम उठाया कि अब इस बात की आस-पास क्षेत्र में खूब चर्चा के साथ प्रशंसा हो रही है। जैसे ही अगली सुबह हुई लोगों को इस बात का पता चला। देखते ही देखते लोग दुल्हन के पिता राजेंद्र के घर लोग बधाई देने आने लगे।

ये है मामला : दरअसल रेणु कासनियां की शादी हरियाणा के सिरसा जिले के गांव निरवाणा में रहने वाले पवन कस्वां से 19 फरवरी की रात को होने वाली थी। 18 फरवरी की रात पवन ने फोन पर रेणु से कहा कि उसे शादी में 11 लाख रुपए नकदी और एक लग्जरी गाड़ी ससुराल से गिफ्ट चाहिए। उस रात रेणु ने इसे मजाक समझकर टाल दिया। अगली सुबह 19 फरवरी को फिर पवन ने रेणु के सामने अपनी डिमांड रखी और नहीं देने पर बरात नहीं लाने की धमकी दी। रेणु ने फोन पर हुई बात की जानकारी अपने पिता राजेंद्र कासनियां और मां को दी। परिजनों ने रिश्ता करवाने वाले बिचौले से संपर्क कर मामले की जानकारी दी।

बिचौले ने लड़के पवन अौर उसके पिता से संपर्क कर पंचायत बुलाई। करते करते 19 फरवरी की रात हो गई। मुहूर्त के हिसाब से अब बरात दुल्हन के दरवाजे पर आने का समय हो चला था। लड़के वालों की तरफ से अपनी डिमांड नहीं छोड़ने पर दुल्हन रेणु ने साहसिक निर्णय लिया। उसने पवन से शादी से ही इंकार कर दिया। 

Video: नाबालिग हिंदु लड़कियों के बलात्कार और धर्म परिवर्तन का वीडियो वायरल

नई दिल्ली : पूरे विश्व की मानवता जानती है कि पाकिस्तान में हिन्दुओं के साथ कैसा-कैसा व्यवहार किया जाता है। ऐसे में एक ऐसा वीडियो सामने आया है जिसने पूरे विश्व में तहलका मचा दिया है। इस वीडियो में पाकिस्तान में हिन्दुओं पर होने वाले सभी अत्याचारों को एक साथ दिखाया गया है। वीडियो इंटरनेट पर तेजी से वायरल हो रहा है।

पाकिस्तान में हिदुओं मानवों को जानवरों से भी बदतर माना जाता है। अभी पाकिस्तान में मात्र 2 फीसदी आबादी हिंदुओं की बची हुई है, लेकिन उन्हें जिस तरह से टॉर्चर किया जाता है उसे सुनकर आपके रौंगटे खड़े हो जाएंगे। पाकिस्तानी हिंदुओं इन्सानों के घरों की लड़कियों को किडनैप कर रेप किया जाता है, तो कभी उनका जबरन धर्म परिवर्तन कराया दिया जाता है:

Video देखे 

अगर मां जीजाबाई जैसी महान हो तो देश को शिवाजी जैसा ही पुत्र मिलेगा….

जीजाबाई जैसी महान मां हो तो देश को शिवाजी जैसा ही पुत्र मिलेगा
जीजाबाई जैसी महान मां हो तो देश को शिवाजी जैसा ही पुत्र मिलेगा

माँ जीजाबाई के प्रति उनकी श्रद्धा ओर आज्ञाकारिता उन्हे एक आदर्श सुपुत्र सिद्ध करती है। शिवाजी का व्यक्तित्व इतना आकर्षक था कि उनसे मिलने वाला हर व्यक्ति उनसे प्रभावित हो जाता था।

ब्लॉग: ( प्रीति झा ) – हिन्दू-राष्ट्र के गौरव क्षत्रपति शिवाजी की माता जीजाबाई का जन्म सन् 1597 ई. में सिन्दखेड़ के अधिपति जाघवराव के यहां हुआ। जीजाबाई बाल्यकाल से ही हिन्दुत्व प्रेमी, धार्मिक तथा साहसी स्वभाव की थीं। सहिष्णुता का गुण तो उनमें कूट-कूटकर भरा हुआ था। इनका विवाह मालोजी के पुत्र शाहजी से हुआ। प्रारंभ में इन दोनों परिवारों में मित्रता थी, किंतु बाद में यह मित्रता कटुता में बदल गई; क्योंकि जीजाबाई के पिता मुगलों के पक्षधर थे।

एक बार जाधवराव मुगलों की ओर से लड़ते हुए शाहजी का पीछा कर रहे थे। उस समय जीजाबाई गर्भवती थी। शाहजी अपने एक मित्र की सहायता से जीजाबाई को शिवनेर के किले में सुरक्षित कर आगे बढ़ गये। जब जाधवराव शाहजी का पीछा करते हुए शिवनेर पहुंचे तो उन्हें देख जीजाबाई ने पिता से कहा- ‘मैं आपकी दुश्मन हूं, क्योंकि मेरा पति आपका शत्रु है। दामाद के बदले कन्या ही हाथ लगी है, जो कुछ करना चाहो, कर लो।’

इस पर पिता ने उसे अपने साथ मायके चलने को कहा, किंतु जीजाबाई का उत्तर था- ‘आर्य नारी का धर्म पति के आदेश का पालन करना है।’

10 अप्रैल सन् 1627 को इसी शिवनेर दुर्ग में जीजाबाई ने शिवाजी को जन्म दिया। पति की उपेक्षा के कारण जीजाबाई ने अनेक असहनीय कष्टों को सहते हुए बालक शिवा का लालन-पालन किया। उसके लिए क्षत्रिय वेशानुरूप शास्त्रीय-शिक्षा के साथ शस्त्र-शिक्षा की व्यवस्था की। उन्होंने शिवाजी की शिक्षा के लिए दादाजी कोंडदेव जैसे व्यक्ति को नियुक्त किया। स्वयं भी रामायण, महाभारत तथा वीर बहादुरों की गौरव गाथाएं सुनाकर शिवाजी के मन में हिन्दू-भावना के साथ वीर-भावना की प्रतिष्ठा की। वह प्राय: कहा करती- ‘यदि तुम संसार में आदर्श हिन्दू बनकर रहना चाहते हो स्वराज की स्थापना करो। देश से यवनों और विधर्मियों को निकालकर हिन्दू-धर्म की रक्षा करो।’

शादी में 5 लाख से ज्यादा खर्च किया, तो गरीब लड़की की शादी के लिए 10% दान करना होगा

नई दिल्ली : अब विवाह में होने वाली फिजूलखर्ची को रोकने के लिए पार्लियामेंट में नए नया बिल (कानूनी ड्राफ) लाया जा रहा है। इसके तहत विवाहों में आने वाले मेहमानों की संख्‍या पर लिमिट लगाई जा सकती है। यही नहीं, विवाहों में परोसे जाने वाले भोजन की लिस्ट भी सीमित की जा सकती है। नए कानून के अनुसार अगर कोई विवाह में 5 लाख रुपए से ज्यादा खर्च करता है तो उसे 10 फीसदी गरीब लड़कियों की शादी में खर्च लिए कॉन्ट्रीब्यूट करना होगा। लोक सभा में यह बिल कांग्रेस सांसद रंजीत रंजन की ओर से इंट्रोडयूस किया गया है।

जानें विवाहों में होने वाली फिजूलखर्ची को रोकने के लिए क्या है तैयारी : बिल के मुताबिक, अगर कोई परिवार विवाह मे 5 लाख रुपए से ज्यादा खर्च करती है तो उसे इस अमाउंट का 10% गरीब परिवार की लड़की की शादी के लिए दान के रूप में भी करना होगा। इस बिल को (Compulsory Registration and Prevention of Wasteful Expenditure) Bill, 2016, के नाम से लिस्ट किया गया है। ये प्राइवेट मेंबर बिल है जो लोकसभा के अगले सेशन में टेबल किया जाएगा।

60 दिन के अंदर पंजीकरण कराना होगा :  बिल में कहा गया है कि अगर ये बिल कानून में तब्दील होता है तो सभी शादियों का 60 दिन के अंदर पंजीकरण कराना होगा। सरकार मेहमानों की तादाद को फिक्स कर सकती है। इसके अलावा विवाह में परोसी जाने वाली डिशेज की जानकारी भी देनी होगी।

मेहमानों की संख्‍या तय होनी चाहिए : सांसद का कहना है कि इस फिजूलखर्ची को रोकने के लिए विवाहों में मेहमानों की संख्‍या तय होनी चाहिए। खाने-पीने पर बर्बादी रोकने के लिए मेन्यू के लिए भी एक तय सीमा होनी चाहिए। बिल पास हुआ तो नियम के अनुसार ही गेस्ट बुलाने होंगे। साथ ही मेन्यू भी नियम को देखते हुए ही तैयार करना होगा।

बिल लाने का क्या है मकसद : सांसद के अनुसार इस बिल को लाने का मकसद विवाहों में ज्यादा खर्च और बर्बादी को रोकना है। लोगों को मैरिज प्रोग्राम सादा तरीके से करने चाहिए। इन दिनों लोग पैसा और शोहरत दिखाने के लिए बेतहाशा खर्च करते हैं। इसकी वजह से गरीब परिवारों पर इस बात का दबाव बढ़ जाता है कि वो भी अपने यहां शादियों पर ज्यादा खर्च करें।

विडियो देखे: शहीद संजीवन सिंह राणा की बेटी की का देश के नाम भावुक संदेश

शहीद जवान की बेटी का देश के नाम भावुक संदेश: विडियो देखे

अगर आज हम खुशी से अपना जीवन जी रहें हैं तो उसकी वजह सीमा पर हमारी सुरक्षा कर रहें जवान हैं। हमारे देश के जवान दिन हो या रात, गर्मी हो या तुफान हमारी सेवा करते हैं। हमारे देश की सीमा पर कई जवान शहिद हो जाते हैं जिनकी हम ज्यादा दिनों तक याद भी नहीं रखते। हर रोज हमारा जवान शहिद होता हैं मगर हम में से कोई शायद ही उनकी याद रखता हो।

पिछले एक वर्ष में पठानकोट और उड़ी पर आतंकी हमले हुए थे जिसमे हमारे कई जवान शहिद हुए थे। इन आतंकी हमले का जवाब भी भारत ने पाकिस्तान में घुसकर सर्जिकल स्ट्राईक करके दिया था और कई आतंकी मार गिराए थे। पठानकोट और उड़ी हमले में हमारे कई जवान शहिद हुए और हम में से कितने लोग उन जवानों की याद करता हैं? शायद कोई नहीं।

अगले पेज पर विडियो में ये संदेश देखे: 

मनीष सिंह का ब्लॉग : 14 फरवरी को विश्व मातृ-पितृ पूजन दिवस के लिए स्पेशल

ब्लॉग : (मनीष सिंह तोमर) – परसों एक मित्र आर्मी की कैंटीन जूते खरीदने गया तो मुझे साथ ले गया। वहां एक छोटी बच्ची (करीब 6-7 साल की) भी जूते देख रही थी। एक वयस्क के दस नम्बर के जूते। बहुत जूते देखने के बाद उसने एक sports shoes का pair चुना और हमको दिखा के पूछा की अंकल ये जूते अच्छे लग रहे हैं न ? (पता नहीं छोटे बच्चे अभी से अंकल क्यों बोलने लगे) मैंने कहा अच्छे तो हैं पर ये आप किसके लिए ले रहे हो?

उसके बाद जो उस बच्ची ने उत्तर दिया मुझे वो सुनकर विश्वास नहीं हुआ पर जब हुआ तब बहुत ख़ुशी हुई। वो बोली की ये मैं 14 फरवरी को अपने पापा को दूँगी, उस दिन मम्मी पापा की पूजा होती है। मैं बहुत खुश हुआ। पेमेंट करने आयीं उसकी माताजी से पता चला की वो लोग किसी संत के साधक नहीं है। पहले इनकी जहाँ पोस्टिंग थी वहां पड़ोस में ये त्यौहार 14 फरवरी को मनाया जाता था वहां से इसने ये सीखा।

फिर याद आया की पिछले साल california की एक गिफ्ट शॉप से 14 feburary parents worship day की कुछ accessories की तस्वीरें भी आयीं थीं जिसमें गिफ्ट कार्ड्स key ring वगैरा थे। इस ‘दिवस’ ने कब ‘त्यौहार’ का रूप ले लिया हमें पता भी नहीं चला। ये अब लोगों के हृदय तक पहुँच चुका है और पहुंचे भी क्यों न आवश्यकता आविष्कार की जननी जो होती है, आपने आवश्यकता पैदा करी तो संत ने उसके विपक्ष में अविष्कार प्रस्तुत कर दिया।

यही होता है आप कई बरसों से उलटे होकर लटके हो, एक टांग पर खड़े होकर valentine day का प्रचार करते हो इतना पैसा बर्बाद करते हो इसके प्रचार में, पर होता क्या है??? हर साल आपको वही याद दिलाना होता है, हर साल कोई नई चमड़ा धारणी या चमड़ा धारक से वासना करना सीखाना होता है। पर किसी को भी उस बच्ची को ये बताने की जरूरत नहीं पड़ी की 14 फरवरी को उसे क्या करना है। क्योंकि इस अविष्कार ने उसके हृदय में जगह बनाई। असल में बात तो ये है कि आप ये भ्रम पाले बैठे थे कि प्रचार तंत्र (मीडिया) के सहयोग के बिना कुछ भी नया नहीं हो सकता। अच्छा है आपका ये भ्रम भी टूट रहा है।

और दूसरा भ्रम ये कि इसी प्रचार तंत्र से बैर लेकर तो कुछ नया सोचा भी नहीं जा सकता। आपका ये भ्रम भी टूट गया। आपने सारे छठकर्म तो किये, क्या कमी छोड़ी ? पर हमारे काम को रोक पाये ? या भविष्य में कभी रोक पाओगे? आप बस परिणामों को छुपा सकते हो पर परिणामों को आने से नहीं रोक सकते।

अब तो हंसी आती है आपकी हालत देख के, क्योंकि वास्तविकता तो ये है कि समाज से आपका बहिष्कार हो रहा है। आपके निर्माणाधीन किले की नींव झड़ रही है, प्रगति पर चल रहा आपका ये कार्य कभी संपन्न नहीं होगा। क्योंकि सुनार कितनी भी चोटें मार ले लुहार की एक ही काफी होती है।

आज 14 फरवरी को मातृ पितृ पूजन कार्यक्रम सम्पूर्ण देशभर में होने वाला है।
आप सभी को विश्व मातृ पितृ पूजन दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं।