देखिये : 26 जनवरी पर भारत के मुसलमानों को इससे बेस्ट स्पीच कहीं नहीं मिलेगी….

ये स्पीच है मौलाना अबुल कलाम आज़ाद की। जो 1947 में बकरीद के मौके पर दिल्ली की जामा मस्जिद में दी। उन्होंने आज़ादी मिलने पर मुसलमानों को उस वक़्त ख़िताब किया। लेकिन उनकी ये बातें पढ़कर ऐसा लगता है जैसे अभी के लिए कही हैं। इस स्पीच को अमेरिकन स्कॉलर चौधरी मोहम्मद नईम ने उर्दू में तहरीर किया है। आप इसे हिंदी में पढ़िए। और हर मुसलमान को पढ़नी चाहिए। जो हालत आजतक मुसलमानों के बने हुए हैं वो खुद के बनाये हुए हैं। ये स्पीच बताती है कि जब तक हम खुद को नहीं बदलेंगे, कुछ नहीं हो सकता। चाहे कितनी ही सच्चर रिपोर्टें आती रहें। नेता आते रहें। कोई फर्क नहीं पड़ेगा. तो पढ़िए और सोचिए।

मेरे अज़ीज़ो! आप जानते हैं कि वो कौन सी ज़ंजीर है जो मुझे यहां ले आई है। मेरे लिए शाहजहां की इस यादगार मस्जिद में ये इज्तमा नया नहीं। मैंने उस ज़माने में भी किया। अब बहुत सी गर्दिशें बीत चुकी हैं. मैंने जब तुम्हें ख़िताब किया था, उस वक्त तुम्हारे चेहरों पर बेचैनी नहीं इत्मीनान था। तुम्हारे दिलों में शक के बजाए भरोसा था। आज जब तुम्हारे चेहरों की परेशानियां और दिलों की वीरानी देखता हूं तो भूली बिसरी कहानियां याद आ जाती हैं।

तुम्हें याद है? मैंने तुम्हें पुकारा और तुमने मेरी ज़बान काट ली। मैंने क़लम उठाया और तुमने मेरे हाथ कलम कर दिए। मैंने चलना चाहा तो तुमने मेरे पांव काट दिए। मैंने करवट लेनी चाही तो तुमने मेरी कमर तोड़ दी। हद ये कि पिछले सात साल में तल्ख़ सियासत जो तुम्हें दाग़-ए-जुदाई दे गई है। उसके अहद-ए शबाब (यौवनकाल, यानी शुरुआती दौर) में भी मैंने तुम्हें ख़तरे की हर घड़ी पर झिंझोड़ा। लेकिन तुमने मेरी सदा (मदद के लिए पुकार) से न सिर्फ एतराज़ किया बल्कि गफ़लत और इनकारी की सारी सुन्नतें ताज़ा कर दीं। नतीजा मालूम ये हुआ कि आज उन्हीं खतरों ने तुम्हें घेर लिया। जिनका अंदेशा तुम्हें सिरात-ए-मुस्तक़ीम (सही रास्ते ) से दूर ले गया था।

सच पूछो तो अब मैं जमूद (स्थिर) हूं। या फिर दौर-ए-उफ़्तादा (हेल्पलेस) सदा हूं। जिसने वतन में रहकर भी गरीब-उल-वतनी की जिंदगी गुज़ारी है। इसका मतलब ये नहीं कि जो मक़ाम मैंने पहले दिन अपने लिए चुन लिया, वहां मेरे बाल-ओ-पर काट लिए गए या मेरे आशियाने के लिए जगह नहीं रही। बल्कि मैं ये कहना चाहता हूं. मेरे दामन को तुम्हारी करगुज़ारियों से गिला है। मेरा एहसास ज़ख़्मी है और मेरे दिल को सदमा है। सोचो तो सही तुमने कौन सी राह इख़्तियार की? कहां पहुंचे और अब कहां खड़े हो? क्या ये खौफ़ की ज़िंदगी नहीं। और क्या तुम्हारे भरोसे में फर्क नहीं आ गया है। ये खौफ तुमने खुद ही पैदा किया है।

अभी कुछ ज़्यादा वक़्त नहीं बीता, जब मैंने तुम्हें कहा था कि दो क़ौमों का नज़रिया मर्ज़े मौत का दर्जा रखता है। इसको छोड़ दो। जिनपर आपने भरोसा किया, वो भरोसा बहुत तेज़ी से टूट रहा है, लेकिन तुमने सुनी की अनसुनी सब बराबर कर दी। और ये न सोचा कि वक़्त और उसकी रफ़्तार तुम्हारे लिए अपना वजूद नहीं बदल सकते। वक़्त की रफ़्तार थमी नहीं। तुम देख रहे हो! जिन सहारों पर तुम्हार भरोसा था। वो तुम्हें लावारिस समझकर तक़दीर के हवाले कर गए हैं। वो तक़दीर जो तुम्हारी दिमागी मंशा से जुदा है।

अंग्रेज़ों की बिसात तुम्हारी ख्वाहिशों के ख़िलाफ़ उलट दी गई। और रहनुमाई के वो बुत जो तुमने खड़े किए थे। वो भी दगा दे गए। हालांकि तुमने सोचा था ये बिछाई गई बिसात हमेशा के लिए है और उन्हीं बुतों की पूजा में तुम्हारी ज़िंदगी है। मैं तुम्हारे ज़ख्मों को कुरेदना नहीं चाहता और तुम्हारे इज़्तिराब (बेचैनी) में मज़ीद इज़ाफा करना मेरी ख्वाहिश नहीं है। लेकिन अगर कुछ दूर माज़ी (पास्ट) की तरफ पलट जाओ तो तुम्हारे लिए बहुत से गिरहें खुल सकती हैं।

एक वक़्त था कि मैंने हिंदुस्तान की आज़ादी का एहसास दिलाते हुए तुम्हें पुकारा था। और कहा था कि जो होने वाला है उसको कोई कौम अपनी नहुसियत (मातम मनाने वाली स्थिति) से रोक नहीं सकती। हिंदुस्तान की तक़दीर में भी सियासी इंक़लाब लिखा जा चुका है और उसकी गुलामी की जंजीरें 20वीं सदी की हवाएं हुर्रियत से कट कर गिरने वाली हैं। और अगर तुमने वक़्त के पहलू-बा-पहलू क़दम नहीं उठाया तो फ्यूचर का इतिहासकार लिखेगा कि तुम्हारे गिरोह ने, जो सात करोड़ मुसलमानों का गोल था। मुल्क की आज़ादी में वो रास्ता इख्तियार किया जो सफहा हस्ती से ख़त्म हो जाने वाली कौमों का होता है। आज हिंदुस्तान आज़ाद है और तुम अपनी आंखों से देख रहे हो वो सामने लालकिला की दीवार पर आज़ाद हिंदुस्तान का झंडा शान से लहरा रहा है। ये वही झंडा है जिसकी उड़ानों से हाकिमा गुरूर के दिल आज़ाद कहकहे लगाते थे।

ये ठीक है कि वक़्त ने तुम्हारी ख्वाहिशों के मुताबिक अंगड़ाई नहीं ली बल्कि उसने एक कौम के पैदाइशी हक़ के एहतराम में करवट बदली है और यही वो इंकलाब है, जिसकी एक करवट ने तुम्हें बहुत हद तक खौफजदा कर दिया है। तुम ख्याल करते हो तुमसे कोई अच्छी शै (चीज़) छिन गई है और उसकी जगह कोई बुरी शै आ गई है। हां तुम्हारी बेक़रारी इसलिए है कि तुमने अपने आपको अच्छी शै के लिए तैयार नहीं किया था और बुरी शै को अपना समझ रखा था। मेरा मतलब गैरमुल्की गुलामी से है। जिसके हाथों तुमने मुद्दतों खिलौना बनकर जिंदगी बसर की! एक वक़्त था जब तुम किसी जंग के आगाज़ की फिक्र में थे और आज उसी जंग के अंजाम से परेशान हो। आखिर तुम्हारी इस हालत पर क्या कहूं? इधर अभी सफर की जुस्तजू ख़त्म नहीं हुई और उधर गुमराही का ख़तरा भी दर पेश आ गया।

मेरे भाई मैंने हमेशा सियासत की ज्यादतियों से अलग रखने की कोशिश की है। कभी इस तरफ कदम भी नहीं उठाया। क्योंकि मेरी बातें पसंद नहीं आती लेकिन आज मुझे जो कहना है उसे बेरोक होकर कहना चाहता हूं। हिंदुस्तान का बंटवारा बुनियादी तौर पर गलत था। मज़हबी इख्तिलाफ़ को जिस तरह से हवा दी गई उसका नतीजा और आसार ये ही थे जो हमने अपनी आंखों से देखे। और बदकिस्मती से कई जगह पर आज भी देख रहे हैं।

पिछले सात बरस के हालात दोहराने से कोई फायदा नहीं और न उससे कोई अच्छा नतीजा निकलने वाला है। अलबत्ता मुसलमानों पर जो मुसीबतों का रैला आया है वो यक़ीनन मुस्लिम लीग की ग़लत क़यादत का नतीजा है। ये सब कुछ मुस्लिम लीग के लिए हैरत की बात हो सकती है। मेरे लिए इसमें कुछ नई बात नहीं है। मैं पहले से ही इस नतीजे का अंदाजा था।

अब हिंदुस्तान की सियासत का रुख बदल चुका है। मुस्लिम लीग के लिए यहां कोई जगह नहीं है। अब ये हमारे दिमागों पर है कि हम अच्छे अंदाज़-ए-फ़िक्र में सोच भी सकते हैं या नहीं। इसी ख्याल से मैंने नवंबर के दूसरे हफ्ते में हिंदुस्तान के मुसलमान रहनुमाओं को देहली में बुलाने का न्योता दिया है। मैं तुमको यकीन दिलाता हूं. हमको हमारे सिवा कोई फायदा नहीं पहुंचा सकता।

मैंने तुम्हें हमेशा कहा और आज फिर कहता हूं कि नफरत का रास्ता छोड़ दो। शक से हाथ उठा लो और बदअमली को तर्क (त्याग) दो। ये तीन धार का अनोखा खंजर लोहे की उस दोधारी तलवार से तेज़ है, जिसके घाव की कहानियां मैंने तुम्हारे नौजवानों की ज़बानी सुनी हैं। ये फरार की जिंदगी, जो तुमने हिजरत (पलायन) के नाम पर इख़्तियार की है। उसपर गौर करो तुम्हें महसूस होगा कि ये ग़लत है।

अपने दिलों को मज़बूत बनाओ और अपने दिमागों को सोचने की आदत डालो और फिर देखो ये तुम्हारे फैसले कितने फायदेमंद हैं। आखिर कहां जा रहे हो? और क्यों जा रहे हो? ये देखो मस्जिद की मीनारें तुमसे उचक कर सवाल कर रही हैं कि तुमने अपनी तारीख के सफ़हात को कहां गुम कर दिया है? अभी कल की बात है कि यही जमुना के किनारे तुम्हारे काफ़िलों ने वज़ू (नमाज़ से पहले मुंह हाथ धोने का प्रोसेस) किया था और आज तुम हो कि तुम्हें यहां रहते हुए खौफ़ महसूस होता है। हालांकि देल्ही तुम्हारे खून की सींची हुई है।

अज़ीज़ों! अपने अंदर एक बुनियादी तब्दीली पैदा करो जिस तरह आज से कुछ अरसे पहले तुम्हारे जोश-ओ-ख़रोश बेजा थे। उसी तरह से आज ये तुम्हारा खौफ़ बेजा है। मुसलमान और बुज़दिली या मुसलमान और इश्तआल (भड़काने की प्रक्रिया) एक जगह जमा नहीं हो सकते। सच्चे मुसलमान को कोई ताक़त हिला नहीं सकती है और न कोई खौफ़ डरा सकता है। चंद इंसानी चेहरों के गायब हो जाने से डरो नहीं। उन्होंने तुम्हें जाने के लिए ही इकट्ठा किया था आज उन्होंने तुम्हारे हाथ में से अपना हाथ खींच लिया है तो ये ताज्जुब की बात नहीं है। ये देखो तुम्हारे दिल तो उनके साथ रुखसत नहीं हो गए। अगर अभी तक दिल तुम्हारे पास हैं तो उनको अपने उस ख़ुदा की जलवागाह बनाओ।

मैं क़लाम में तकरार का आदी नहीं हूं लेकिन मुझे तुम्हारे लिए बार-बार कहना पड़ रहा है। तीसरी ताक़त अपने घमंड की गठरी उठाकर रुखसत हो चुकी है। और अब नया दौर ढल रहा है अगर अब भी तुम्हारे दिलों का मामला बदला नहीं और दिमागों की चुभन ख़त्म नहीं हुई तो फिर हालत दूसरी होगी। लेकिन अगर वाकई तुम्हारे अंदर सच्ची तब्दीली की ख्वाहिश पैदा हो गई है तो फिर इस तरह बदलो, जिस तरह तारीख (इतिहास) ने अपने को बदल लिया है। आज भी हम एक दौरे इंकलाब को पूरा कर चुके, हमारे मुल्क की तारीख़ में कुछ सफ़हे (पन्ने) ख़ाली हैं और हम उन सफ़हो में तारीफ़ के उनवान (हेडिंग) बन सकते हैं मगर शर्त ये है कि हम इसके लिए तैयार भी हो।

अज़ीज़ों, तब्दीलियों के साथ चलो! ये न कहो इसके लिए तैयार नहीं थे, बल्कि तैयार हो जाओ। सितारे टूट गए, लेकिन सूरज तो चमक रहा है। उससे किरण मांग लो और उस अंधेरी राहों में बिछा दो। जहां उजाले की सख्त ज़रुरत है।

मैं तुम्हें ये नहीं कहता कि तुम हाकिमाना इक्तेदार के मदरसे से वफ़ादारी का सर्टिफिकेट हासिल करो। मैं कहता हूं कि जो उजले नक्श-ओ-निगार तुम्हें इस हिंदुस्तान में माज़ी की यादगार के तौर पर नज़र आ रहे हैं, वो तुम्हारा ही काफ़िला लाया था. उन्हें भुलाओ नहीं। उन्हें छोड़ो नहीं उनके वारिस बनकर रहो और समझ लो तुम भागने के लिए तैयार नहीं तो फिर कोई ताक़त तुम्हें नहीं भगा सकती। आओ अहद (क़सम) करो कि ये मुल्क हमारा है। हम इसी के लिए हैं और उसकी तक़दीर के बुनियादी फैसले हमारी आवाज़ के बगैर अधूरे ही रहेंगे।

आज ज़लज़लों से डरते हो? कभी तुम ख़ुद एक ज़लज़ला थे। आज अंधेरे से कांपते हो! क्या याद नहीं रहा कि तुम्हारा वजूद ख़ुद एक उजाला था। ये बादलों के पानी की सील क्या है कि तुमने भीग जाने के डर से अपने पायंचे चढ़ा लिए हैं।’ वो तुम्हारे ही इस्लाफ़ थे जो समुंदरों में उतर गए। पहाड़ियों की छातियों को रौंद डाला। आंधियां आईं तो उनसे कह दिया कि तुम्हारा रास्ता ये नहीं है। ये ईमान से भटकने की ही बात है जो शहंशाहों के गिरेबानों से खेलने वाले आज खुद अपने ही गिरेबान के तार बेच रहे हैं। और ख़ुदा से उस दर्जे तक गाफ़िल हो गये हैं कि जैसे उसपर कभी ईमान ही नहीं था।

अज़ीज़ों मेरे पास कोई नया नुस्ख़ा नहीं है वही चौहदा सौ बरस पहले का नुस्ख़ा है. वो नुस्ख़ा जिसको क़ायनात का सबसे बड़ा मोहसिन (मोहम्मद साहब) लाया था। और वो नुस्ख़ा है क़ुरान का ये ऐलान, ‘बददिल न होना, और न गम करना, अगर तुम मोमिन (नेक, ईमानदार) हो, तो तुम ही ग़ालिब होगे।’

आज की सोहबत खत्म हुई। मुझे जो कुछ कहना था वो कह चुका, लेकिन फिर कहता हूं, और बार-बार कहता हूं अपने हवास पर क़ाबू रखो। अपने गिर्द-ओ-पेश अपनी जिंदगी के रास्ते खुद बनाओ। ये कोई मंडी की चीज़ नहीं कि तुम्हें ख़रीदकर ला दूं। ये तो दिल की दुकान ही में से अमाल (कर्म) की नक़दी से दस्तयाब (हासिल) हो सकती हैं।

वस्सलाम अलेक़ुम!

सुभाष चन्द्र बोस के जन्म दिवस पर विशेष, धर्म और देश के लिये जीवित रहना ही यथार्थ जीवन है…

हिन्दू माता के एक महान पुत्र का पुण्य-स्मरण उनके अवतरण दिवस पर

ब्लॉग : अभिजीत सिंह ( यूनाइटेड हिन्दी ) :-  भारतीय स्वाधीनता आन्दोलन हिन्दू पुनरुत्थान का आन्दोलन भी था क्योंकि इस रण के जो भी सच्चे नायक थे उन सबकी आस्था और मान्यता यही थी कि हिन्दू आदर्श, हिन्दू दर्शन, हिन्दू जीवन-परंपरा, हिन्दू जीवन-मूल्य, हिन्दू तत्व-दर्शन और हिन्दू शासन-व्यवस्था को अंगीकार किया जाना और उसके संरक्षण पर बल देना ही भारत के स्थायी स्वाधीनता की गारंटी है। इसलिये वो चाहे जहाँ भी रहे इस जीवन-प्रवाह के साथ न केवल उनका सतत संबंध बना रहा बल्कि उनको जब भी मौका मिला इस शाश्वत मूल्य को प्रतिस्थापित करने के लिये वो कृतसंकल्पित भी रहे।

प्रसिद्ध क्रांतिकारी रास बिहारी बोस भारत से निकलने के बाद आठ साल जापान में अज्ञातवास में रहे, इस दौरान जापानी कन्या से विवाह भी किया और उनसे संतान प्राप्ति भी हुई, जापान सरकार और जापानी जनता का असीम स्नेह भी उन्हें प्राप्त था पर इन सबके बाबजूद उनके अन्तस्थ: में हिंदुत्व की ज्वाला कभी भी धूमिल नहीं हुई। जब जीवन की अंतिम संध्या आई तो रासू दा ने दो ही चीज़ माँगी थी, एक था तुलसी दल और दूसरी थी रुद्राक्ष की माला। जाने से पहले अपना विरासत उन्होंने सुभाष चंद्र बोस को सौंप दिया। सुभाष अधिकांश समय भारत से बाहर ही रहे पर उन्हें राम और रामायण विस्मृत नहीं हुए, गंगा उनसे दूर नहीं हुई, गोदावरी की कल-कल धारा उनके कानों में गूंजती रही। एक बार अपने रिश्तेदार को लिखे पत्र में उन्होंने स्वतंत्र भारत देश की अपना परिकल्पना बताते हुए लिखा था…

“अपना ये भारतवर्ष भगवान का बड़ा प्रिय स्थान रहा है। यहाँ भगवान ने अवतार लेकर पाप से बोझिल धरती का उद्धार किया और यहाँ के लोगों के हृदय में सत्य और धर्म को स्थापित किया। दक्षिण में स्वच्छ जल से परिपूर्ण पवित्र गोदावरी दोनों किनारों का स्पर्श करती है और कल-कल ध्वनि के साथ सागर की ओर निरंतर भागती जाती है। कैसी विचित्र है वह. उसे स्मरण करते ही रामायण की पंचवटी याद आ जाती है फिर स्मरण आतें हैं राम, लक्ष्मण और सीता जो समस्त राज्य और संपदाओं का परित्याग कर स्वर्गिक सुख की अनुभूति करते हुये गोदावरी के तट पर समय व्यतीत कर रहें हैं।”

आगे अपने पत्र में सुभाष पवित्र जाहनवी का, ऋषि वाल्मीकि की तपः-स्थली का, लव और कुश का तथा पावन भारत के वातावरण में गूँज रहे वेद-मन्त्रों का स्मरण करतें हैं। भारत वर्ष से लुप्त हो गये उन मंत्रोच्चारों को सुभाष याद करने के बाद सुभाष की आँखों में यज्ञ करने के लिये हवन-सामग्री इकठ्ठा करते ऋषि कुमार घुमने लगतें हैं वो खुद से पूछ्तें हैं, कहाँ हैं उन ऋषिकुमारों के पवित्र मंत्रोच्चार और कहाँ हैं उनके यज्ञ-पूजनादि ?

यानि स्वाधीन भारत का ये चित्र था सुभाष की आँखों में, वेद-कालीन भारत का…..

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1500 वर्ष पहले इस भारतीय ने खोजा था मंगल पर पानी, चोरी हुई ज्ञान की किताब

49_1456651279खगोलविद् वराहमिहिर।

इंदौर।यूएस का वैज्ञानिक संस्थान नासा और भारत का इसरो मंगल ग्रह के बारे में जिन तथ्यों पर रिसर्च कर रहे हैं, उनका उल्लेख तो 1500 साल पहले ही एक भारतीय वैज्ञानिक ने अपनी किताब में कर दिया था। ये खगोलविद् और कोई नहीं वराह मिहिर थे। उनकी इस रिसर्च से वैज्ञानिक अाज भी हैरान हैं। उज्जैन जिले के कपिथा गांव में हुआ था जन्म… (28 फरवरी को वर्ल्ड साइंस डे है। इस मौके पर awarepress.com आपको प्रख्यात खगोलविद वराहमिहिर की मंगल पर रिसर्च के कुछ हैरतअंगेज तथ्यों की जानकारी दे रहा है)

इस रानी को बिना देखे ही अकबर दे बैठे थे अपना दिल, ये हुआ था प्यार का हश्र

Real Story Of Rani Roopmati And King Akbar
Real Story Of Rani Roopmati And King Akbar

इंदौर : मध्यप्रदेश  में पर्यटकों की मनपसंद जगहों में से एक है मांडू । यहाँ 2016 को अलविदा कहने और नए वर्ष का स्वागत करने लाखों की संख्या में लोग पहुंचे। पर्यटकों ने यहां रानी रूपमती महल, जहाज महल, बाज-बहादुर का महल सहित अन्य स्मारकों को निहारा।

पर्यटकों की पसंदीदा जगहों में से एक मांडू से जुड़ा एक ऐसा इतिहास unitedhindi.com आपको बता रहा है, जो रानी रूपमती और बाज-बहादुर की प्रेम कहानी को अमर बनाता है। जब भी प्रेम कथाओं का जिक्र होता है तो रानी रूपमती और बाज बहादुर की प्रेम कहानी उसमें जरूर शामिल होती है। विंध्याचल की पहाड़ियों पर बसा मांडू इन दोनों की प्रेम कहानी का साक्षी है, लेकिन इनके प्रेम को शहंशाह अकबर की नजर लग गई और कहानी का दुखद अंत हुआ।

आगे पढ़ें : अकबर की अधूरी प्रेम कहानी…

सबसे पहले इन्होंने किया था मृत्युंजय मंत्र का जप, जानें इतिहास के अनोखे बच्चों के बारे में

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Inspirational story of kinds in Hindu religion

कहते हैं बच्चे साक्षात ईश्वर का स्वरूप होते हैं, क्योंकि उनके मन में किसी के लिए भी बुरे विचार नहीं होते। उनका मन एकदम साफ होता है। वो जो भी कहते हैं या करते हैं सच्चे मन से करते हैं। किसी बच्चे को खुशी देकर हम ईश्वर को प्रसन्न कर सकते हैं।

हमारे धर्म ग्रंथों में ऐसे अनेक बच्चों के बारे में बताया गया है जिन्होंने कम उम्र में ही कुछ ऐसे काम किए, जिन्हें करना किसी के बस में नहीं था, लेकिन अपनी ईमानदारी, निष्ठा व समर्पण के बल पर उन्होंने मुश्किल काम भी बहुत आसानी से कर दिए। आइए जानते हैं ऐसे ही कुछ बच्चों के बारे में ….

मार्कण्डेय ऋषि

धर्म ग्रंथों के अनुसार मार्कण्डेय ऋषि अमर हैं। आठ अमर लोगों में मार्कण्डेय ऋषि का भी नाम आता है। इनके पिता मर्कण्डु ऋषि थे। मर्कण्डु ऋषि को जब कोई संतान नहीं हुई तो उन्होंने सपत्नीक भगवान शिव की आराधना की। तपस्या से प्रकट हुए शिव ने उनसे पूछा कि वे गुणहीन दीर्घायु पुत्र चाहते हैं या गुणवान 16 साल का अल्पायु पुत्र। तब मर्कण्डु ऋषि ने दूसरी बात को चुना, यानी गुणी अल्पायु पुत्र।

बड़ा होने पर मार्कण्डेय को जब यह बात पता चली तो वे शिव भक्ति में लीन हो गए। इस दौरान सप्तऋषियों की सहायता से ब्रह्मदेव से उनको महामृत्युंजय मंत्र की दीक्षा मिली। इस मंत्र का प्रभाव यह हुआ कि जब यमराज उनकी मृत्यु के नियत दिन उन्हें लेने आए तो स्वयं भगवान शिव ने यमराज के वार को बेअसर कर दिया और बालक मार्कण्डेय को दीर्घायु होने का वरदान दिया।

आगे पढ़ें- कुछ और भी कहानियां….

जानिए New Year या जीसस खतना दिवस, क्या आपने आज अपना खतना (लूल्ली काटन) कराया है?

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भारतीय समाज उत्सवधर्मी समाज है।

यूनाइटेड हिन्दी संपादक : जैसे की आप सब लोगो को विदित है कि नया साल अर्थात ईसाई नववर्ष आने वाला है और ईसाई इसे बड़ी धूमधाम से अपने अपने देशों में मनाते हैं। लेकिन भारत देश में ईसाइयों की आबादी लगभग २.५% है, फिर भी यहाँ इस देश में इस नववर्ष को ईसाई तो मनाते हैं लेकिन अधिकतर हिन्दू भी इस नववर्ष को बड़ी ही धूम धाम से मनाते हैं। भले ये वो हिन्दू हैं जिन्हें दीपावली, होली आदि में आतिशबाजी और रंग बिरंगे गुलालों से परहेज हो, मगर ईसाइयों के नववर्ष में ऐसे जोश में होते हैं कि आतिशबाजी भी करते हैं और मद्य आदि पेय तथा मांसाहार से परहेज नहीं करते। इन लोगों को क्या कहें ज्यादातर समस्या तथाकथित स्वघोषित धार्मिक गुरुओं ने ही प्रारम्भ की है। सांता के सफ़ेद दाढ़ी मूछ में कृष्ण को रंगना और धर्म की शिक्षा न देकर ईसाइयों के नये साल के बारे में न समझाकर मौन रहना, इन्हीं कारणों से हिन्दू समाज ईसाई और मुस्लिम त्योहारों में झूलता रहता है और अपने धार्मिक, ऐतिहासिक तथा वैज्ञानिक त्योहारों के प्रति उदासीन रवैया धारण करता है।

खैर आज हम चर्चा कर रहे हैं कि ये नया साल जो प्रत्येक १ जनवरी को मनाया जाता है वह क्या है?

आइये देखे : नया साल अर्थात् प्रत्येक १ जनवरी को ख़ुशी और जोश से मनाया जाने वाल दिन नया साल है क्योंकि क्रिसमस के दिन ईसा साहब पैदा हुए और इस क्रिसमस के आठवें दिन जो ईसा साहब का “खतना” (लिंग की रक्षार्थ चमड़ा ‘खिलड़ी’ काटना) हुआ था। ये खतना मुस्लिम समुदाय में भी किया जाता है। अतः ये तो सिद्ध हुआ कि ये दोनों संस्कृति कुछ भेद से एक हैं। अतः ईसा साहब के पैदा होने से आठवें दिन जो “लिंगचर्म छेदन संस्कार” अर्थात् खतना हुआ वह नया साल है। On the eighth day, when it was time to circumcise the child, he was named Jesus, the name the angel had given him before he was conceived. [ Luke 2:21 ]

और जब बालक के खतने का आठवाँ दिन आया तो उसका नाम यीशु रखा गया। उसे यह नाम उसके गर्भ में आने से पूर्व भी पहले स्वर्गदूत द्वारा दे दिया गया था। [ लूका २ | २१ ]

अब ये खतना तो हुआ ईसा साहब का और मनाते हिन्दू समाज के लोग हैं। वो भी पुरे जोशो खरोश से, ये बात समझ से बाहर है।

तो जो भी हिन्दू ये नया साल मनाते हैं, उन्हें जान लेना चाहिए कि खतना की परंपरा मूसा का नियम है। मूसा ईसाइयों और मुस्लिमो के बड़े पैगम्बर हुए हैं। खैर ये जान लीजिये की इसी मूसा के नियमानुसार ईसा का “लिंगचर्म छेदन संस्कार” खतना हुआ था।

And every male among you who is eight days old shall be circumcised throughout your generations, a servant who is born in the house or who is bought with money from any foreigner, who is not of your descendants. [ Genesis 17:12 ]

जब बच्चा आठ दिन का हो जाए, तब उसका खतना करना। हर एक लड़का जो तुम्हारे लोगों में पैदा हो या कोई लड़का जो तुम्हारे लोगों का दास हो, उसका खतना अवश्य होगा। [ उत्पत्ति १७ | १२ ]

On the eighth day the flesh of his foreskin shall be circumcised. [ Leviticus 12:3 ]

आठवें दिन बच्चे का खतना होना चाहिए। [ लैव्यव्यवस्था १२ | ३ ]

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इस पर यदि कोई ईसाई कहे कि ये तो पुराना नियम है और इसे नहीं मानता। तो ये देखें यीशु ने स्वयं कहा:

Think not that I am come to destroy the law, or the prophets: I am not come to destroy, but to fulfil.

For verily I say unto you, Till heaven and earth pass, one jot or one tittle shall in no wise pass from the law, till all be fulfilled. [ Matthew 5:17-18 ]

यह न समझो, कि मैं मूसा के धर्म नियम और भविष्यद्वक्ताओं की पुस्तकों को लोप करने आया हूँ।लोप करने नहीं, परन्तु पूरा करने आया हूँ।

मैं तुम से सच कहता हूँ कि जब तक आकाश और पृथ्वी समाप्त नो जाएँ, तब तक मूसा की व्यवस्था का एक एक शब्द और एक एक अक्षर बना रहेगा। वह तब तक बना रहेगा जब तक वह पूरा नहीं हो लेता। [ मत्ती ५ | १७-१८ ]

उपरोक्त प्रमाणों से सिद्ध होता है कि ईसा का खतना  यानी “लिंगचर्म छेदन संस्कार” जन्म के आठवें दिन हुआ था जो ग्रैगोरियन कैलेंडर के अनुसार १ जनवरी होता है। यीशु के इसी “लिंगचर्म छेदन संस्कार” की खुशी में हर वर्ष नया साल के रूप में मनाया जाता है। वास्तव में तो ये खतना दिवस ही है, भले ही कोई इसे नया साल के रूप में मनाये।

आज तो कोई ईसाई शायद ही खतना कराता है। जबकि यीशु ने तो स्वयं खतना कराया। साथ ही साथ सभी को मूसा के नियमानुसार खतना कराने का आदेश भी दिया। क्या ये ईसाइयों द्वारा बाइबिल और यीशु के आदेश का उल्लंघन नहीं?

ग्रीक आॅर्थोडाॅक्स चर्च तो आज भी १ जनवरी को नया साल नहीं बल्कि खतना दिवस के रूप में ही मनाते हैं।
प्रमाण स्वरूप उनके 2017 के कैलेंडर को नीचे क्लिक करके देख सकते हैं –

On Sunday, January 1, 2017 we celebrate

खैर जो भी है। सबसे बड़ी बात है कि खतना करना, करवाना, ईसाई और मुस्लिम संस्कार है। हिन्दू समुदाय में ये घृणित कार्य माना जाता है क्योंकि यदि ईश्वर की रचना में कोई कमी होती तो ये खाल नहीं होती। लेकिन ईश्वर अपनी रचना में कभी कोई कमी नहीं करता, न ही किसी को इस शरीर में कांट छांट करने का अधिकार ही प्रदान करता है। अतः आप सबसे हाथ जोड़कर विनती है कि अपने अपने संस्कार सबको मानने चाहिए।

मगर हिन्दू समाज यदि १ जनवरी को “लिंगचर्म छेदन संस्कार” अर्थात खतना दिवस को सामूहिक रूप से अपने परिवार सहित मनाना ही चाहता है तो कृपया ईसा, मूसा और यहोवा की आज्ञा पालन करते हुए अपना भी खतना अर्थात “लिंगचर्म छेदन संस्कार” स्वयं करवा लेवे तभी इस संस्कार को ख़ुशी से मनाये।

हालाँकि वो हिन्दू जो इस “लिंगचर्म छेदन संस्कार” खतना दिवस को जोशो खरोश से मनाते हैं उनके लिए :

“बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना”

थोड़ा विचार कीजिए कि किसी आठ दिवसीय बालक के लिंगचर्म छेदन संस्कार के अवसर पर हर वर्ष पटाखे फोड़ेना, शायरियाँ भेजना, तरह तरह के पकवान खाना, मौज मस्ती करना क्या ये सब काम भले मानव के हो सकते हैं भला?

जो बोले हाँ! तो उनसे अनुरोध है कि अपने भी बच्चों के खतना दिवस पर हर वर्ष पार्टी का आयोजन करें, पटाखे जलाएँ, लोगों को ग्रिटिंग्स कार्ड बाँटेंऔर मौज मस्ती करें। साथ में अपने खतने किये हुए पुत्र को अवश्य बताएँ कि सुन आज ही के दिन तेरा खतना हुआ था। सो इस खुशी में हर वर्ष पार्टी चलती है। तू भी अपने आगे के बाल बच्चों का ऐसे ही करीयो।

अपने धर्म से प्रेम करने वाले हिन्दुओं से अनुरोध है कि अब से सेक्युलर हिन्दुओं को १ जनवरी पर “Happy Circumcision Day‘ या ‘खतना दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ‘ अवश्य भेजें।

बहरहाल इतने सब प्रमाणों के बाद भी यदि कोई हिन्दू १ जनवरी को मनाना चाहता है। तो पंडित लेखराम वैदिक मिशन की ओर से उन सभी हिन्दुओं को Happy Circumcision Day। खतना दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ।

हाँ अपने परिवार वालों, विशेषकर बच्चों को भी अवश्य बताएँ कि आप १ जनवरी क्यों मनाते हैं।

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