शहीद हुए तो अकेले भगत ही हीरो क्यों ? सिर्फ इसलिए कि वो जेल में लेनिन को पढते थे ।

भगत के मिट्टी की खुशबू हम सबके जेहन में रच-बस चुकी है, तुम्हारे षड्यंत्र अब सफल नहीं होंगे….

ब्लॉग : शिवेश प्रताप ( यूनाइटेड हिन्दी डॉट कॉम ) :- ॥ कड़वा सच ॥

जब भगत सिंह के साथ राजगुरु और सुखदेव भी बराबर शहीद हुए तो अकेले भगत ही हीरो क्यों ? सिर्फ इसलिए कि वो जेल में लेनिन को पढते थे ।

दरअसल “केवल भगत सिंह” का ही महिमामण्डन करना दूषित राष्ट्र वाद और वामपंथी मुस्लिम विचारधारा पर खडे सामाजिक विज्ञान को सह देना है ।

आजादी के पहले से ही मुसलमान बिकाऊ रहे और अंग्रेजी हुकूमत की चाटुकारिता में रहे । आजादी के बाद इस्लाम पोषित वामपंथी दरअसल हिंदुओं के राष्ट्रवादी विचारों के तोड़ के रूप में एक सिख भगत सिंह को हीरो के रूप में ज्यादा हाईलाइट कर एक तीर से कई निसाने साधते रहे । जिसमें सिखों को वामपंथ की ओर मोड़ देश को तोड़ा जाए भी एक कारण है । दूसरा कि क्रांति नायक के रूप में भगत को खडा कर चंद्रशेखर आजाद के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के स्वरूप को भी मंद किया जाए । दरअसल वामपंथियों को चंद्रशेखर के जनेऊ से हमेशा समस्या रही ।

भगत सिंह के बलिदान का मैं बहुत सम्मान करता हूँ पर “केवल भगत सिंह” के अतिशय महिमा मंडन के खिलाफ हूँ । सुखदेव और राजगुरु का बलिदान भगत से रत्ती भर कम नहीं है ।

और यदि बलिदान की बात है तो फिर यह देश सबसे कम उम्र में फांसी पर चढे खुदीराम बोस को सिर्फ इसलिए भूल जाता है कि वो हिंदू थे ???

कृपया वामपंथी कुचक्र से बाहर निकल कर तीनों वीर बलिदानियों को बराबर सम्मान देकर नोटों पर छापने की बात करें । अकेले भगत क्यों ?

कम्युनिस्ट खेमे के इन इतिहासकारों ने भगत सिंह की इस तरह से की निर्मम हत्या…

भगत के मिट्टी की खुशबू हम सबके जेहन में रच-बस चुकी है, तुम्हारे षड्यंत्र अब सफल नहीं होंगे….

ब्लॉग : ( अभिजीत सिंह, यूनाइटेड हिन्दी डॉट कॉम ) :- 1931, फरवरी-मार्च का महीना, सेन्ट्रल जेल, लाहौर के 14 नम्बर वार्ड में फाँसी की प्रतीक्षा कर रहे बंदियों में से एक ने अपनी माँ को एक पत्र लिखा। माँ ने बेटे का पत्र खोला तो उसमें लिखा था, माँ, मार्च की 23 तारीख को तेरे बेटे की शादी है, आशीर्वाद देने जरूर आना। माँ सोचने लगी जेल में तो लडकियाँ होती नहीं तो फिर ये पगला किससे प्यार कर बैठा, कहीं किसी जेलर की बेटी पर तो मेरे बेटे का दिल नहीं आ गया ? माँ से पूछे बिना बेटा शादी कर लेगा इस आशंका से पीड़ित माँ ने तस्दीक करने के लिये अपने छोटे भाई को भेजा, जा जरा देख के आ कि ये किस कुड़ी को दिल दे बैठा है। कैदी ने मिलने आने वाले को एक कागज पर कुछ लिख कर दिया और कहा, इसे माँ को दे देना और ध्यान रहे इसे और कोई न खोले। माँ ने बेटे का पत्र खोला तो लिखा था, मेरी होने वाले दुल्हन का नाम है “मौत”।

मौत को माशूका बना लेने वाले इस शख्स का नाम था भगत सिंह। ये वो नाम है जिसके सामने आते ही देशप्रेम और बलिदान मूर्त हो उठता है। भगत वो नाम है जिसकी राह रूप, यौवन और सौन्दर्य नहीं रोक सकी, भगत वो नाम है जिसने एक अत्यंत धनी परिवार से आये विवाह प्रस्ताव को ये कहते हुए ठुकरा दिया था कि मेरा विवाह तो अपने ध्येय के साथ हो चुका है अब दुबारा विवाह क्या करना, भगत वो नाम भी है जिसके लिये उसकी अपनी धार्मिक परंपरा के अनुपालन से अधिक महत्व भारत की आजादी का था। वो चाहता तो फांसी की सजा से बच सकता था पर उसने इसके लिये कोई कोशिश नहीं की, इसलिये नहीं की क्योंकि उसे पता था कि अपना बलिदान देकर वो तो सो जायेगा पर सारा भारत जाग उठेगा और फिरंगी हूकूमत की जड़ उखड़ जायेगी।

जिस हुतात्मा का सिर्फ जिक्र भर आज उसके बलिदान के 86 साल बाद भी युवकों में जोश भर देता है, तो जाहिर है कि वो लोग जिनकी विचारधारा का अवसान हो चुका है वो अगर भगत को अपने खेमे का साबित कर दें तो शायद उनकी मृत विचारधारा कुछ अवधि के लिये जी उठे। इसी सोच को लेकर कम्युनिस्टों ने बड़ी बेशर्मी से भगत सिंह के बलिदान का अपहरण कर लिया। विपिन चन्द्र, सुमित सरकार, इरफान हबीब, रोमिला थापर जैसे वाम-परस्त इतिहासकारों ने सैकड़ों लीटर स्याही ये साबित करने में उड़ेल दी थी कि भगत सिंह तो कम्युनिस्ट थे। भगत के “मैं नास्तिक क्यों हूँ” वाले लेख को बिना किसी आधार का ये लोग ले उड़े और उसे लेनिन के उस कथन से जोड़ दिया जिसमें उसने कहा था कि ‘नास्तिकता के बिना मार्क्सवाद की कल्पना संभव नहीं है और नास्तिकता मार्क्सवाद के बिना अपूर्ण तथा अस्थिर है’।

यानि इनके अनुसार भगत सिंह मनसा, वाचा, कर्मणा एक प्रखर मार्क्सवादी थे। भगत सिंह के प्रति ममत्व जगने के वजह ये भी है कि जिस लेनिन, स्टालिन, माओ-चाओ, पोल पोट वगैरह को वो यूथ-आइकॉन बना कर बेचते रहे थे उनके काले कारनामे और उनके नीतियों की विफलता दुनिया के सामने आने लगी थी और स्वभाव से राष्ट्रप्रेमी भारतीय युवा मानस के बीच उनको मार्क्सवादी आइकॉन के रूप में बेचना संभव नहीं रख गया था इसलिए इन्होने भगत सिंह को कम्युनिस्ट बना कर हाईजैक कर लिया।

इसलिये किसी व्यक्ति के मृत्यु के उपरांत उसकी विचारधारा को लेकर जलील करने का सबसे अधिक काम अगर किसी ने किया है तो वो यही लोग हैं जिन्होनें भगत सिंह जैसे हुतात्मा को कम्युनिस्ट घोषित करने का पाप किया। ऐसे में इस बात की तहकीक भी आवश्यक हो जाती है कि क्या कम्युनिस्टों के मन में हमेशा से भगत सिंह के प्रति आदर था या अपने राजनीतिक फायदे और अस्तित्व रक्षण के लिए उन्होंने उगला हुआ थूक निगल लिया ? भगत सिंह के प्रति कम्युनिस्ट आदर जानने के आवश्यक है कुछ कम्युनिस्टों की किताबों को पढ़ा जाए और भगत सिंह के संबंध में कुछ कम्युनिस्ट नेताओं की स्वीकारोक्तियों को सुना जाए।

अगले पृष्ठ पर जरूर पढ़िये 

हिन्दुओं के रक्त में सेक्युलर नामक वायरस घुस गया है, इसलिए हिन्दू रामनवमी कैसे मनाएंगे ?

बहिष्कृत सिंधी शिया मुस्लिम साईं बाबा ने दिखाया था जो इसे भगवान् ही मान लिया ?

ब्लॉग : ( वैष्णवी कुमारी, यूनाइटेड हिन्दी डॉट कॉम ) :- अजमेर में स्थित सूफ़ी संत हजरत मोईनुद्दीन चिस्ती की दरगाह को कोई मुसलमान अल्लाह मानकर नहीं पूजता, बल्कि अल्लाह का बंदा मानकर ही पूजते है।

सतयुग में ऋषि विश्वामित्र ने तो अपने योग बल से एक नकली स्वर्ग ही बना दिया था। इतना सामर्थ्य होने के बाद भी उन्हें केवल एक बहुत बड़ा योगी ही माना जाता है, भगवान् नहीं! अगस्त्य मुनि ने पूरे खारे सागर को ही पी लिया था (कुम्भोदार अगस्त्य मुनि) लेकिन इतना महान चमत्कार दिखाने के बाद भी अगस्त्य को ईश्वर या ब्रह्म नहीं माना गया!

प्रश्न ये है कि इनमें से कौनसा चमत्कार इस बहिष्कृत सिंधी शिया मुस्लिम साईं बाबा ने दिखाया था जो इसे भगवान् ही मान लिया ? अगर चमत्कार दिखाया भी होता तो इसे केवल एक महान योगी और ईश्वर भक्त ही माना जा सकता था, ईश्वर तो स्वप्न में भी नहीं ?

अब अगर वेदों में प्रतिपादित भगवान् विष्णु हमारी लौकिक और तुच्छ मनोकामनाओं को फटाफट पूर्ण न कर सकें तो कोई बात नहीं; हम हिन्दू सौदेबाज लम्पट हैं। हमारे भगवान् वही है जो हमारी इच्छाओं को पूर्ण करे। फिर चाहे हमें पाकिस्तान के सिंध प्रांत से आये मानसिक बीमार मुस्लिम चाँद मियाँ उर्फ साई को ही क्यों न पूजना हो; जिसे उसकी बिरादरी वालों ने इसलिए निकाल दिया था कि वो ‘अनलहक अनलहक'(मैं अल्लाह हूँ, मैं अल्लाह हूँ) बकता रहता था। वही चाँद मियाँ महाराष्ट्र के शिरडी प्रान्त में मस्जिद में जैसे तैसे जीवन काटता था छोटे मोटे चमत्कार पाखंड दिखाकर। विचित्र है कि जो बात उसकी कौम वालों ने नहीं मानी वो आज के सेक्युलर हिन्दू मूर्ख तुरंत मान गए (कि वो भगवान् है)।

वैसे भी आज के वर्तमान हिन्दू समाज में किसी भी तरह की कोई लाज/शर्म तो है ही नहीं ! क्योंकि वैसे भी हज़ारों सालों से गुलामी के आदि हो चुके हैं। अब आज के सेक्युलर हिन्दू के पास स्वाभिमान नाम जैसा कुछ बचा नहीं है; सो हम इस कौम से बेदखल किये हुए साई बाबा को अपने नए भगवान् के रूप में पूजें। और हाँ इस मुस्लिम, अवैदिक, अपौरानिक साई बाबा को पूजने के बाद भी हम हिन्दू धर्मावलंबी ही कहलायेंगे और हिंदुओं के माथे पर काला दाग लगाएंगे!

अब और क्या बचा है? राम नवमी को हम अयोध्या या फिर राम मंदिर नहीं जाएंगे बल्कि नवविकसित तीरथ शिरडी जायेंगे और राम की जगह इस शिया मुस्लिम साई को साई ॐ साई राम (अर्थात माता जानकी के पति) कहकर पूजेंगे। हम हिन्दु इस ‘निष्कासित सिन्धी मुस्लिम साईबाबा’ को तो अब ‘भगवान् राम जो कि सनातन परब्रह्म है’ – उनके रूप में पूज रहे हैं न!

इस प्रश्न को हिन्दू-मुस्लिम विवाद का रूप देने वालों को तत्काल जेल में बन्द कर देना चाहिए

यह शुद्ध रूप से राजनैतिक मसला हो गया है।नहीं तो वास्तविकता तो हर मुसलमान जनता है।आम मुसलमान भूमि छोड़ना भी चाहे तो कथित मुस्लिम धर्म ठीकेदार ऐसा नहीं होने देंगे।

ब्लॉग : विनय झा ( यूनाइटेड हिन्दी डॉट कॉम ) :- बाबरी मस्जिद के नीचे विशाल हिन्दू मन्दिर के साक्ष्य भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने सर्वोच्च न्यायालय को सौंप दिया था जिसपर सर्वोच्च न्यायालय वर्षों से कुण्डली मारकर बैठी है और अब कहती है कि (इस पुरातात्विक साक्ष्य को किनारे करके) “बातचीत” द्वारा हल ढूँढना चाहिए !

सर्वोच्च न्यायालय ने ही रामजन्मभूमि मन्दिर के साक्ष्य माँगे थे जिसपर पहले तो मनमोहन सरकार ने कहा था कि राम जी काल्पनिक हैं, जिस कारण पुरातात्विक उत्खनन हुआ, और अब उस साक्ष्य को सर्वोच्च न्यायालय द्वारा ही अनदेखा किया जा रहा है ।

यही कारण है कि बाबरी एक्शन कमिटी को सर्वोच्च न्यायालय पर पूरा भरोसा है। क्या आप लोगों को सर्वोच्च न्यायालय पर पूरा भरोसा है ?

बाबरी एक्शन कमिटी का कहना है कि बातचीत से कोई हल नहीं निकलेगा, अदालत को फैसला करना चाहिए, जबकि हिन्दुत्ववादियों ने बातचीत का स्वागत किया है।

मस्जिद में अल्लाह या मुहम्मद साहब पैदा नहीं हुए थे और न ही उनकी मूर्ति की प्राणप्रतिष्ठा की जाती है, मस्जिद केवल नमाज पढने की सुविधा हेतु बनाया स्थान है जिसे आवश्यकता पड़ने पर विस्थापित करने से मजहब को कोई क्षति नहीं पंहुचती। किन्तु रामजन्मभूमि को अन्यत्र विस्थापित करना असम्भव है। यह साधारण बात बाबरी एक्शन कमिटी और मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के पल्ले नहीं पड़ती, पुरातात्विक साक्ष्य भी उनके लिए बेमतलब हैं। वे भली-भांति जानते हैं कि श्रीराम के मन्दिर को तोड़कर मस्जिद बनाया गया था, फिर भी मस्जिद हटाने के लिए तैयार नहीं हैं।

अतः मामला गुण्डागर्दी का है, मजहब का नहीं ! इस्लाम तो नहीं कहता कि हिन्दू मन्दिर को तोड़कर उसके मूर्ति वाली दीवारों द्वारा मस्जिद बनाना चाहिए। जिस बाबरी मस्जिद को 1992 में तोड़ा गया था उसके प्रवेश द्वार के एक खम्बे का एक फोटो मैं संलग्न कर रहा हूँ जो सिद्ध करता है कि प्राचीन हिन्दू मन्दिर की दीवारों और खम्बों द्वारा ही बाबरी मस्जिद बनी थी (यह फोटो और अनेक अन्य फोटो 1992 में ही मस्जिद टूटने से कुछ पहले एक सांसद द्वारा लोकसभा में दिखाए गए थे)।  जिस मस्जिद की दीवारों में हिन्दू मूर्तियाँ हों उसे मस्जिद नहीं माना जा सकता, उसमें नमाज पढ़ना कुफ्र है। अतः जो लोग बाबरी मस्जिद में नमाज पढ़ना चाहते हैं वे काफिर हैं। बाबरी एक्शन कमिटी के नेताओं ने भी बाबरी मस्जिद में कभी नमाज नहीं पढ़ी, वे लोग केवल हिन्दूओं का मानमर्दन करने की जिद ठाने हुए हैं। सुब्रह्मण्यम स्वामी भी यह बात अदालत को नहीं बता पा रहे हैं कि हिन्दू मन्दिर के अवशेषों से बने मस्जिद में नमाज नहीं पढ़ा जा सकता।

जिन हिन्दू मन्दिरों को तोड़कर वहाँ मस्जिदें बनायी गयी वहाँ पुनः मन्दिर बनाना ही पडेगा। इस प्रश्न को हिन्दू-मुस्लिम विवाद का रूप देने वालों को जेल में बन्द कर देना चाहिए, क्योंकि महमूद गजनवी और बाबर जैसे विदेशी डाकुओं द्वारा मन्दिरों का ध्वंस करने का मामला है, भारतीय मुस्लिम बनाम हिन्दू का मामला नहीं है।

कभी सोचा है कि इतने आधातों को सहकर भी आज हिन्दू कैसे बचे हैं, ये धर्म कैसे बचा है?

आपने कभी सोचा है कि इतने आधातों को सहकर भी हम आज हिन्दू कैसे बचे हैं ? हमारा धर्म कैसे बचा है ? फोटो Source : santabanta.com

ब्लॉग : महावीर प्रसाद खिलेरी (संपादक यूनाइटेड हिन्दी डॉट कॉम) : हिन्दू समाज शायद दो हज़ार सालों से गुलाम रहा है! हमारे ऊपर सदियों तक इस्लामी शासन रहा फिर कई रूपों में ईसाईयों ने हम पर शासन किया फिर 1947 में जब देश तथाकथित रूप से आजाद हुआ तब हमसे हमारा धर्म छीनने मिशनरी लोग आ गये, लालच दिया, कई जगह डर दिखाया, कई जगह अहसान जता कर उसकी कीमत मत-परिवर्तन के रूप में वसूलनी चाही, हमारे ऊपर न जाने कितने मोपला और मीनाक्षीपुरम हुए। आपने कभी सोचा है कि इतने आधातों को सहकर भी हम आज हिन्दू कैसे बचे हैं ? हमारा धर्म कैसे बचा है ?

आज हम हिन्दू इसलिये हैं क्योंकि हमारे पूर्वजों ने अपना धर्म नहीं छोड़ा। डर, हिंसा, प्रपंच, लालच, षड्यंत्र सबके बीच सदियों तक संघर्ष करते रहे। हमारे एक पूर्वज इधर राजस्थान में घास की रोटी खाकर हिन्दू धर्म बचा रहे थे तो उधर पंजाब में हिन्दू धर्म को बचाने के लिये कुछ पूर्वज जीवित ही दीवार में चुनवा दिये गये। अपने उन पूर्वजों के बारे में भी दो मिनट सोचिये जिन्होनें धर्म बदलने की जगह मैला उठाने के काम को चुना था। हकीकत राय के बलिदान के बारे में सोचिये, दक्षिण भारत की माँ रुद्र्माम्बा देवी के त्याग का स्मरण कीजिये, पूरब के वीर लाचित बरफूकन का स्मरण कीजिये और न जाने ऐसे कितने नाम है जिन्होनें अपना सर्वस्व खो कर हिन्दू धर्म को बचाये रखा। ये सब किसी एक जाति-विशेष के नहीं थे !

आप योगी जी की प्रशासनिक क्षमता पर सवाल इसलिये नहीं उठा रहे कि आपको वास्तव में इस बात की कोई फ़िक्र है कि वो शासन कैसे चलायेंगे! दरअसल वजह ये है कि योगी जी में आपने किसी ठाकुर को ढूंढ लिया है जो आपको पीड़ा दे रहा है। योगी जी के ऐब आप इसलिये ढूंढ रहें हैं क्योंकि मोदी जी ने आपके जात वाले को मुख्यमंत्री नहीं बनाया। इसी तरह जब आप योगी जी को ठाकुर अजय सिंह विष्ट लिख रहें हैं तो आप उन्हें एक जाति विशेष से बाँध रहें हैं, जाहिर है फिर बाकी जाति वाले भी उन्हें उसी रूप में लेंगें।

अपनी जातिवादी मानसिकता में जब हम किसी के बारे में कुछ लिखतें हैं, किसी जाति के मूल पर प्रश्न उठाते हैं तो एक बार ये भी सोच लीजिए कि आपने गाली किसको दी है ? आप उनको गाली दे रहें हैं उनके कारण हम हैं वर्ना हम भी आज पीटर या जुम्मन बनकर जी रहे होते ! वो पूर्वज चाहे किसी भी जाति के हों पर वो सब हमारे लिये वन्दनीय है क्योंकि उन्होंने हमारे लिये उस धरोहर (हिंदुत्व) को सहेजे रखा जिसका अनुपालन मनु, परशुराम, श्रीराम, श्रीकृष्ण, श्री बुद्ध से लेकर गुरु गोविन्द सिंह करते थे।

हम या आप जिस जाति में पैदा हुयें हैं वो हमारी या आपकी चॉइस नहीं थी, भगवान की मर्जी थी। ईश्वर की मर्जी पर जो सवाल उठाये, उसके सृजन को किसी भी रूप में लांछित करे उससे कृतघ्न और अज्ञानी कोई नहीं हो सकता। मैं कभी किसी दलित को गाली नहीं देता, इसलिये नहीं कि वो गलत नहीं हो सकते बल्कि इसलिये क्योंकि इतने दंशों, अत्याचारों और प्रलोभनों को सह कर भी आज वो हिन्दू है। इस देश की मुख्य-धारा में है और कम से कम हमारे अस्तित्व को लीलने वाला खतरा नहीं है। मैं कभी किसी क्षत्रिय को गाली नहीं देता क्योंकि उनके पूर्वजों ने सदियों तक हमारे भारत की अखंडता अक्षुण्ण रखने के लिये बलिदान दिया है। मैं किसी ब्राह्मण को गाली नहीं देता क्योंकि दुनिया में भारत को विश्व-गुरु बनाने का गौरव उनके पूर्वजों का था। मैं किसी वैश्य को गाली नहीं देता क्योंकि इन्होंनें अपनी धन-संपत्ति राष्ट्र-रक्षा में कई बार न्योछावर की है। इसी तरह मैं अपने किसी वनवासी बंधू को अपमानित करने का भी पाप नहीं करता, ये तो तबसे धर्म रक्षक रहें हैं जब भगवान राम इस धरती पर आये थे।

अपने जातिगत पूर्वाग्रहों को छोड़िये वरना प्रकृति सौभाग्य को दुर्भाग्य में बदलने में जरा भी देर नहीं करती।

जवान वीरगति को प्राप्त होते हैं, उसका कारण "युद्ध" है या गले की फाँस बन गया "पाकिस्तान" ?

ब्लॉग: ( कुमार प्रियांक ) :- 1965 का वर्ष एक ऐसा वर्ष था जब भारत के तमाम विरोधियों को ऐसा लग रहा था कि भारत एक अत्यंत कमजोर देश है। कारण थे:- 1962 में वामपंथी चीन पर भरोसा कर नेहरू जी ने जरूरत से ज्यादा अच्छा दिखने के चक्कर में भद्द पिटा ली थी.., दूसरे अकाल का दौर था, तीसरे नेहरू जी की मृत्यु के बाद प्रधानमन्त्री बने थे छोटे कद के और पतली आवाज़ वाले चकाचौंध से दूर रहने वाले लाल बहादुर शास्त्री जी..!!

शास्त्री जी की पार्टी काँग्रेस भी यही मान कर चल रही थी कि शास्त्री जी सिर्फ एक अल्पकालिक व्यवस्था के तहत प्रधानमन्त्री हैं और देर-सबेर चापलूस संस्कृति के तहत नेहरू-गाँधी परिवार के वारिस को सत्ता मिलनी ही है..!!

पर जिस नियति ने शास्त्री जी के माथे पर ताज सजाया था, उसके मन में कुछ और ही था। पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति जनरल अयूब खान को नई दिल्ली आना था, पर नेहरू जी की मृत्यु के चलते उन्होंने दिल्ली आने का कार्यक्रम रद्द कर दिया क्योंकि उन्हें लगा कि शास्त्री जी का कद इतना नहीं कि वह जाकर मिले..!!

तब सौम्य शास्त्री जी आगे अपनी काहिरा की शासकीय यात्रा से वापस लौटते हुए अचानक से कराँची में उतर गए और अयूब खान को दंग कर दिया..अयूब खान खुद एअरपोर्ट आये शास्त्री जी को छोड़ने। अयूब खान समझ गए थे कि ये छोटे कद का आदमी बात नहीं मानता..!!

इधर 1965 की गर्मियों में तत्कालीन पाकिस्तानी विदेश मंत्री ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो को लगा कि कश्मीर को जीतने का इससे अच्छा मौका फिर न मिलेगा। भुट्टो ने पाकिस्तानी सेनाध्यक्ष मोहम्मद मूसा को टॉप सीक्रेट सन्देश भेजा कि कश्मीर को हासिल करने का यह बहुत बढ़िया वक़्त है। अगर उपयुक्त समय और स्थान पर हमला किया जाये तो सामान्य धारणा के अंतर्गत, दो तगड़े झटके इन हिंदुओं का मनोबल तोड़ने को पर्याप्त होंगे..!!

पाकिस्तान ने ऑपरेशन जिब्राल्टर के तहत लगभग 33 हजार सैनिकों की फ़ौज़ को कश्मीरी कपड़े पहना कर अगस्त 1965 के पहले हफ्ते में कश्मीर में घुसपैठ करा दिया..पाकिस्तानी हुक्मरान को यह फुलटूस भ्रम था कि कश्मीरी उन्हें हाथों-हाथ लेंगे..!!

पर यह क्या.. उल्टे 15 अगस्त 1965 को कश्मीरियों के माध्यम से ही भारतीय सेना को इस घुसपैठ की जानकारी मिली। तब तक पाकिस्तानी फ़ौज़ उरी, पूँछ आदि सेक्टर में घुस चुकी थी..!! भारतीय सेना ने जवाबी कार्रवाई शुरू की..और ग़ुलाम कश्मीर के हाजी पीर दर्रे पर कब्ज़ा कर लिया..!!

अपने जमाने में कई महिलाओं के साथ शारीरिक संबंधों के लिए

नोबेल पुरस्कार विजेता और मशहूर कवि रवींद्रनाथ टैगोर के बारे में तो सब लोग जानते होगे. लेकिन उनकी प्रेम कहानी के बारे में बहुत कम लोग हैं जो जानते है. रवींद्रनाथ टैगोर और अर्जेंटीना की प्रसिद्ध लेखिका विक्टोरिया ओकैंपो की प्रेम कहानी। 

सन 1914, अर्जेंटीना में 25-26 साल की एक लड़की ने फ्रेंच में रवींद्रनाथ टैगोर की  किताब गीतांजलि पढ़ी. विक्टोरिया टैगोर की लेखनी की मुरीद हो गई. उसके बाद से विक्टोरिया रवींद्रनाथ टैगोर से मिलने के लिए बेताब हो गई. वो कोई सामान्य लड़की नहीं थी बल्कि बहुत बड़ी नारीवादी लेखिका एक साहित्यिक मैग्जीन की एडिटर, सांस्कृतिक कार्यकर्ता भी थी. वो वहां की पहली महिला थी जिसे अर्जेंटीना एकेडमी ऑफ लैटर्स का सदस्य भी बनाया गया था। 

1924 में विक्टोरिया की टैगोर से मुलाकात की तमन्ना पूरी हुई. रवींद्रनाथ टैगोर उस वक्त पेरु की यात्रा पर थे, रास्ते में बीमार हुए तो आराम करने के लिए उन्हें ब्यूनस आयर्स में रुकना पड़ा. विक्टोरिया को जैसे ही ये खबर मिली वो उनसे मिलने पहुंच गईं. टैगोर को ठहराने के लिए वहां एक कमरा किराए पर लिया जहां वो 2 महीने से ज्यादा रुके थे.

आगे पढ़िए 34 साल की विक्टोरिया को कैसे हुआ 63 साल के टैगोर से प्यार

एक अलग मुल्क बनाने वाले जिन्ना की बेटी ने जब एक गैर-मुस्लिम के लिए कर दी अपने पिता से बगावत

मोहम्मद अली जिन्ना चाहते थे कि हिंदुस्तान से अलग मुस्लिमों के लिये एक देश बने जहाँ हिंदुस्तान के सारे मुस्लिम एक साथ रहें। उनका सपना सच तो हुआ लेकिन पूरी तरह से नहीं मुस्लिमों के लिए पाकिस्तान नाम से एक नया मुल्क तो जरुर बना पर भारत के सारे मुस्लिम वहां नहीं गए. जिन्ना को लगा था कि भारत के सारे मुस्लिम पाकिस्तान आ जाएंगे लेकिन वो गलत साबित हुए।

जिन्ना को इससे भी बड़ा झटका इस बात से लगा कि उनकी बेटी ने एक मुस्लिम से शादी न करके एक पारसी से शादी कर ली। बंटवारे के बाद उनकी बेटी हिंदुस्तान आकर रहने लगी। वो आज भी भारत में ही रहती हैं। कहा जाता है कि इस घटना का जिन्ना पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ा था।

अगले पेज पर जानें, क्यों टूटा जिन्ना का परिवार 

ताबिश सिद्दीकी का ब्लॉग: क्या हम उन्ही पतंजलि के वंशज हैं जिहोंने मन और शरीर पर विजय पायी थी?

Read Also : ब्लॉग: जब गाँव में होता था तो सुबह मेरी आँख दादी की तिलावत (कुरान पढ़ना) से खुलती थी

ब्लॉग: ( Tabish Siddiqui ) – कहते हैं पतंजलि ने ईसा से लगभग 400 वर्ष पूर्व अपने सूत्र लिखे थे जिन्हें हम “पतंजलि योग सूत्र” के नाम से जानते हैं। और ये सूत्र उन्होंने अपने से भी कहीं पहले हुवे पूर्वजों के ज्ञान से लिए थे। जब मनोविज्ञान का कहीं अता पता भी न था उस समय पतांजलि ने मन यानि माइंड को प्रमुख चार हिस्सों में विभाजित किया था। मनस, चित्त, बुद्धि और अहंकार।

Read Also : ब्लॉग : खुद अपने हाथ से शहजाद उसको काट दिया

हमारा मन इस संसार और उसकी चीज़ों को इंद्रियों (ध्वनि, स्पर्श, दृष्टि, स्वाद और गंध) द्वारा ग्रहण करता है। और मन का जो हिस्सा ये काम करता है वो मनस कहलाता है। मन का वो हिस्सा जो सोचता है और रूपरेखा बनाता है चीजों की, घटनाओं और अनुभवों की , भूत और भविष्य से, उसे चित्त कहते हैं। ये एक तरह से मेमोरी होती हैं। मन का जो हिस्सा इन घटनाओं और अनुभवों को रिकॉर्ड करता है और ज़रूरत पड़ने पर उन्हें इस्तेमाल में लाता है वो बुद्धि कहलाता है। और मन के इन तीनो हिस्सों को मन का जो जागृत हिस्सा स्वयं से जोड़ता है और साक्षी होता है उसे अहंकार कहते हैं। अहंकार कहता है मैं ये हूँ, मुझे ये आता है या मुझे इतना ज्ञान है। मन एक नहीं होता है। मन चरणों में काम करता है और एक ध्यानी या योगी इन सभी हिस्सों को अलग अलग कर के देख सकता है।

Read Also : ब्लॉग: अलग-अलग हैं पाकिस्‍तान के दमादम मस्त कलंदर व झूलेलाल ?

मन शरीर को बस में कर सकता है इसलिए मन शरीर से बड़ा होता है। मगर मन का बस चित्त पर नहीं चलता है इसलिए चित्त मन से बड़ा होता है। बुद्धि के आगे चित्त हार जाता है इसलिए बुद्धि, चित्त और मन से बड़ी होती है मगर अहंकार के आगे सब घुटने टेक देते हैं इसलिए अहंकार, शरीर, मन, चित्त और बुद्धि से भी बड़ा होता है। अहंकार जिसे अंग्रेजी में ईगो कहते हैं ये सुप्रीम होता है.. सब से बड़ा।

Read Also : अभिजीत सिंह का ब्लॉग: पढ़िये जमात-अहमदिया, खालिस्तान और आर्य समाज की सच्चाई

मन के जिस विज्ञान को आधुनिक चिकित्सा जगत ने तमाम प्रयोगों और परिश्रम के बाद अब जा के जाना और स्वीकारा है उसे भारत में 400 ईसा पूर्व ही जान लिया गया था मगर उस समय और उसकी बाद की कई सभ्यताओं और देशों के लिए ये ज्ञान इतना गूढ़ और कठिन था कि इसे लगभग भुला दिया गया था। ये धार्मिक सूत्र नहीं हैं.. ये चिकित्सा विज्ञान के सूत्र हैं।

Read Also : मनीष सिंह का ब्लॉग : 14 फरवरी को विश्व मातृ-पितृ पूजन दिवस के लिए स्पेशल

इतने अद्भुत ज्ञान और समझ को अब भी खिल्ली में उड़ा दिया जाता है। भारत एक ऐसे दोराहे पर खड़ा है जहाँ दो कौड़ी की चीजों को बचाने के लिए दंगे हो रहे हैं और जंग हो वही है, और करोड़ों अरबों रुपए फूंके जा रहे हैं और जिस ज्ञान को बचाना है और जिस पर शोध करनी है उसे न तो कोई समाझता है और न ध्यान देता है। आध्यात्म मखौल बन के रह गया है और योग टीवी शो। अगर स्वामी बाबा रामदेव जी भगवा लपेट के पतांजलि को अपना आदर्श बना के न चले होते तो हम आज भी “पतंजलि योग सूत्र” का नाम तक नहीं जान पाते। “पतंजलि योग सूत्र” को पुन: प्रचारित करने वाले स्वामी रामदेव जी का मैं आभार प्रकट करना चाहता हूँ।

Read Also : ब्लॉग : दिल्ली का मौहम्मद तुगलक और अरविन्द केजरीवाल

स्वामी रामदेव जी को बिना समझे कुछ भी बोलने वालों को देखकर मुझे लगता है भारत भटक चुका है.. हमारा सारा मन भटक चुका है। हमारा अहंकार बर्बर सभ्यताओं की प्रस्तिस्पर्धा में लगा है और सारी बुराईयां जानते हुवे भी उन्ही जैसा बनना चाहता है। मुझे बहुत दुःख होता है और गहरी निराशा होती है ये सब देख कर।

Read Also : ब्लॉग : और ये भ्रम सिर्फ और सिर्फ विनाश की ओर ले जायेगा

क्या हम उन्ही पतांजलि के वंशज हैं जिहोंने मन और शरीर पर विजय पायी थी? जिन्होंने धर्मों और जातियों के उदय से पहले ही हमे ऐसा कुछ बता दिया था जिसे अगर हम अपनाये रहें तो अपने साथ साथ सारी पृथ्वी का सिर्फ कल्याण ही करेंगे।सोचिये इस मन के भेद को और चेतिये। देखिये कि मन का कौन सा हिस्सा आप पर हावी है।

Read Also : ब्लॉग : हे प्रभु, इन्हें क्षमा मत कर देना क्योंकि इन्हें पता है कि ये असत्य प्रचार कर रहें हैं

इस देश की ताकत से चौंक उठी थी दुनिया, एक बार में उड़ा दिए थे 400 जेट विमान

War between Israel and Egypt, international news in hindi, world hindi news War between Israel and Egypt, international news in hindi, world hindi news

इंटरनेशनल डेस्क : मुस्लिम देशों के सबसे कट्टर देश इजरायल ने अपनी एयरफोर्स में एक और घातक जेट शामिल कर लिया है। यह फाइटर जेट्स का सबसे आधुनिक एफ-35 जेट है, जो रात के अंधेरे में भी सैकड़ों किमी की ऊंचाई से अपने शिकार को निशाना बना सकता है। हालांकि, इजरायल एयरफोर्स के लिए यह कोई बड़ी बात नहीं। इजरायल ने अबसे 50 साल पहले ही अपनी एयरफोर्स को इतना मजबूत कर लिया था कि उसने एक साथ 8 देशों से सिर्फ 6 दिन में ही जंग जीत ली थी।

War between Israel and Egypt, international news in hindi, world hindi news
27 मई को इजिप्ट के राष्ट्रपति अब्दुल नासिर ने घोषणा की थी कि अब अरब के लोग इजरायल का विनाश करना चाहते हैं।

दरअसल, 27 मई को इजिप्ट के राष्ट्रपति अब्दुल नासिर ने घोषणा की थी कि अब अरब के लोग इजरायल का विनाश करना चाहते हैं। मई, 1967 के अंत में इजिप्ट और जॉर्डन के बीच एक समझौता हुआ था कि अगर एक मुल्क पर हमला हुआ, तो दूसरा मुल्क उसका साथ देगा। युद्ध तो इजरायल-इजिप्ट सीमा पर ही शुरू हुआ था, लेकिन जल्द ही ये कई और अरब मुल्कों तक फैल गया। इजरायल और इजिप्ट के बीच लड़े गए इस युद्ध में इजरायल के खिलाफ जॉर्डन, इजिप्ट, इराक, कुवैत, सऊदी अरब, सूडान और अल्जीरिया जैसे देश थे । इस युद्ध को ‘जून वॉर’ के नाम भी जाना जाता है। जंग शुरू होने से पहले ही 5 जून को इजरायली एयरफोर्स ने इजिप्ट के तकरीबन 400 फाइटर जेट्स जमीन पर ही उड़ा दिए थे। इससे बाकी देश घबरा गए थे। इसके बाद इजरायल ने अन्य देशों पर भी ताबड़तोड़ हमले शुरू कर दिए थे और इस तरह जंग सिर्फ 6 दिन में ही खत्म हो गई थी।

War between Israel and Egypt, international news in hindi, world hindi news
युद्ध तो इजरायल-इजिप्ट सीमा पर ही शुरू हुआ था, लेकिन जल्द ही ये कई और अरब मुल्कों तक फैल गया।

इजरायल ने क्यों पहले किया हमला
इजरायल का मानना था कि अगर उसे जीतना है तो जंग से पहले ही हमला करना होगा। इसी मकसद से इजरायल ने इजिप्ट सेना के लड़ाकू विमानों पर ताबड़तोड़ हमला कर दिया था। इजरायली हमले के फौरन बाद इजरायल की सीमा पर अरब मुल्कों की फौजों का जमावड़ा शुरू हो गया था। हालांकि, इसके बावजूद छह दिन चले इस युद्ध में जीत इजरायल की हुई और गाजा पट्टी उसके कब्जे में आ गई।

War between Israel and Egypt, international news in hindi, world hindi news
इजरायल का मानना था कि अगर उसे जीतना है तो जंग से पहले ही हमला करना होगा।

हजारों सैनिकों ने गंवाई जान
इस युद्ध में इजरायल के करीब एक हजार सैनिक मारे गए, जबकि साढ़े चार हजार घायल हुए। कई इजरायली सैनिकों को बंधक भी बनाया गया। वहीं, अरब देशों में मौत की संख्या और ज्यादा थी। युद्ध में अकेले इजिप्ट के 10 से 15 हजार सैनिक मारे गए थे, जबकि साढ़े चार हजार के करीब सैनिकों को बंधक बनाया गया था। वहीं, इस जंग में जॉर्डन के 6 हजार और सीरिया के तकरीबन एक हजार सैनिक मारे गए थे।