loading...

कालियानाग एवं काकभुशुण्डि के पूर्वजन्म, पुराणों में वर्णित पुनर्जन्म की कथा-5

विदेहराज बहुलाश्वने देवर्षि नारद से पूछा कि ‘ महाराज ! भगवान् की चरणरजकी महीमा अपार है।’ रामादि अवतारों में उसके संस्पर्श से अहल्यादि का तत्काल ही श्रेय हुआ। योगीजन भी उसके लिये तरसते हैं, फिर कालियका क्या पुण्य था जो भगवान् घंटो उसके सिरों पर नृत्य करते रहे –

maxresdefault

loading...

तन्मूर्धक्निकरस्पर्शातिताम्र-
पादाम्बुजोऽखिलकलादिगुरुर्ननर्त।।

‘कालियनाग के मस्तक पर सुशोबित मणियों के स्पर्श से जिनके कमल-सदृश चरणों के तलवे और भी लाल हो गये हैं, वे सम्पूर्ण कलाओं के आदि प्रवतर्क भगवान् उनपर (कलापूर्ण) नृत्य करने लगे।’

नारदजी ने कहा कि स्वायंभुव मन्वन्तर में वेदशिरा मुनि विन्ध्याचल के एक बाग में तपस्या कर रहे थे। उन्हीं के बगल में तप करनें की इच्छा से अश्वशिरा भी ऐ गये। इस पर सांप – जैसे फुफकारते हुए वेदशिराने कहा कि ‘ब्राह्मण देव! क्या सारे विश्व में आपको तपस्या के लिये कहीं स्थान ही नहीं मिल रहा है। यहां आप तप करें, यह ठीक नहीं होगा। इससे मेरा एकान्त भङ्ग होगा।’

इस पर अश्वशिरा भी बिगड़कर कहने लगे –

1 of 2
CLICK ON NEXT BUTTON FOR NEXT SLIDE

loading...