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भारत के साथ विश्वभर मे छाने वाली तेजी और मंदी के मुल कारणो का आर्थीक विश्लेषण करने वाले भारत के “अर्थशास्त्री” आज तक उसके कारण को लेकर सहमत नही हुए । निदान के लिये अनेक तर्क पेश किये गये पर मंदी के मुलभूत लक्षणो से एक भी मेल नही खाता । कहने का मतलब यह है के मंदी के निवारण हेतु लिया गया हर एक कदम बॅकफायर हो जाता है और परीणामवश और भयंकर मंदी को ले आता है । औरों की बात तो मै नही बता सकता पर भारत के (पढे-लीखे) अर्थशास्त्री सही कारण का पता लगा ले उसकी संभावना भी बहुत कम है — इस लिये क्योंकी अगर गहराई मे जाओ तो उसका मुल अर्थशास्त्र मे नही है – लेकीन विज्ञान मे है (आश्चर्य) !! विविध औधोगीक क्षेत्रों को बुस्ट देने के लिये हमेशा कीसी नये वैज्ञानिक आविश्कार के टॉनीक की आवश्यकता होती है जिससे उधोगों मे उसका प्रोडक्शन जारी रहे और नये रोजगार की संभावनायें बढ जाये ।
विज्ञान और टॅक्नोलोजी के क्षेत्र मे होने वाले आविश्कारों के टॉनिक ने अर्थतंत्र को किस हद तक बुस्ट देके मंदी को टाल दीया और तेजी को टीकाये रखा इसके कुछ कीस्से मै यहा देना चाहुंगा ।
I. स्कॉटलॅन्ड के जेम्स वॉट ने स्टिम यंत्र की खोज की उसके बाद होर्सपावर्ड के बदले स्टिम पावर्ड मशिनरी ने पुरबहार क्रांती ला दी । वॉट की खोज को स्प्रिंग बोर्ड की तरह उपयोग कर के रॉबर्ट फल्ट ने स्टिमर बनायी । ज्योर्ज स्टिफनसन ने 1814 मे स्टिम ईन्जन से रेल्वे को दौडते कीया । 1884 मे चार्ल्स पार्स ने स्टिम टर्बाईन बना के बिजली को पैदा कर दीखाया जिस वजह से थॉमस एडीसन ने पांच वर्ष पहले बनाये बल्ब को घर घर मे प्रकाशित कर दीया । वाष्पयंत्र की एकमात्र खोज ने न जाने कितनी दीशायें बदल डाली और दुनिया भर के अर्थतंत्र उसकी वजह से सद्धर हो गये । पत्थरयुग मे जीने वाले युरोपी नागरीकों का जिवन सुधार के उसे नये स्तर पर लाया !!
II. जर्मनी के कार्ल बॅन्ज ने 1885 की हुई मोटरकार की खोज भी आर्थिक रूप से व्यापक असर पैदा करने वाली थी । मध्यम आकार की मोटर बनाने के लिये लगभग 810 कि.ग्रा. स्टिल, 170 कि.ग्रा. लोखंड, 110 कि.ग्रा. प्लास्टिक, 100 कि.ग्रा. एल्युमिनियम और 60 कि.ग्रा. रब्बर की आवश्यकता होती है । हाईवे से ले कर पेट्रोलपंप तक की अनेक सुविधायें चाहिये । मोटरकार का उत्पादन 6 दर्जन उधोगों को इसा फला के अमेरीका के अर्थतंत्र के लिये तो मोटर उधोग रीढ की हड्डी समान साबित हुआ ।
III. इलेक्ट्रोनिक ट्रांझिस्टर्स का उदाहरण तो कभी नही भुला जा सकता – विलीयम शॉक्ली और उसके दो साथीयों ने 1947 मे प्रथम ट्रांझिस्टर की खोज की तब जमाना काच के तकलादी और तोस्तान वाल्व का था । इस वाल्व को रॅडीयो जैसे बहुत कम साधनों मे इस्तेमाल किया जा सकता था । 1959 मे जॅक कॉल्बी ने ट्रांझीस्टर को सुक्ष्म रूप दे कर चिप मे जड दीया और intel कंपनी ने उस के आधार पर माईक्रोप्रोसेसर बनाया और परीणामवश कम्प्युटर, सॅटेलाईट, कॉम्पेक्ड डिस्क, मोबाईल फोन जैसे अनगीनत आविश्कार शक्य हुए और एक ट्रांझीस्टर की खोज ने कम से कम 12000 उधोगों को नया जन्म या तो बुस्टर डॉज दीया ।
IV. विकसीत देशों के अर्थतंत्र को प्लास्टिक (1911), टॅलीव्हिजन (1928), जॅट ईंजीन (1930) नायलॉन (1937), झेरोग्राफी (1938), हॅलीकॉप्टर (1339), लॅसर (1959) इत्यादी खोजों ने भी वर्षों तक अपना प्रभाव दीखा के पश्चिमी उधोगों को बुस्टर डोज दीया है ।

ःःःः अमेरीका जैसे विकसीत देश क्या करते है ःःःः

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