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यादों में, 1857 की क्रांति और वे वीरांगनाएं!

10 मई 1857, मुझे यकीन है कि आपको याद आ गया होगा कि इस दिन क्या हुआ था। यही वह दिन था जब सैकड़ों सालों की गुलामी सहने वाला भारत का स्वाभिमान एक बार फिर जाग उठा था। अंग्रेजों की नीतियों से आजादी के लिए प्रत्येक वर्ग को लड़ने की प्रेरणा देने वाली क्रांति, इसी दिन शुरू हुई थी। यह भारत में महाभारत के बाद लड़ा गया सबसे बड़ा युद्ध था। इस संग्राम की मूल प्रेरणा स्वधर्म की रक्षा के लिए स्वराज की स्थापना करना था।

यह स्वाधीनता हमें बिना संघर्ष, बिना खड़ग-ढाल के नहीं मिली है अपितु लाखों हुतात्माओं द्वारा इस महायज्ञ में स्वयं की आहुति देने से मिली है। एसी कमरों में बैठकर, सब्सिडी वाली शराब पीकर ‘भारत में आजादी’ की मांग करना बहुत आसान लगता है लेकिन जो हमारे पास आज है, उसके लिए हमारे पूर्वजों ने क्या-क्या किया है, इसे महसूस करना संभव नहीं। पत्रकारिता की पढ़ाई के दौरान मेरे गुरुदेव श्री राकेश योगी कहते थे कि आजाद भारत में जन्म लेने वाले लोग समझ ही नहीं सकते कि गुलामी क्या होती है। उस गुलामी को न मैं महसूस कर सकता हूं और ना ही आप, लेकिन हम इतना जरूर कर सकते हैं कि अपने पूर्वजों के संघर्ष का सम्मान करें।

भारत में नारी को हमेशा देवी की संज्ञा दी गई है। जब आवश्यकता पड़ी तो उसने ज्ञान की प्रतिमूर्ति बनकर स्वरों से देश को एक नई दिशा दी और जब अवसर आया तो उसी नारी ने शक्ति स्वरूपा चंडी का भी रूप धारण कर अदम्य शक्ति का लोहा मनवाया। ‘शासन और समर से स्त्रियों का सरोकार नहीं’ जैसी पुरुषवादी धारणाओं को ध्वस्त करती भारतीय वीरांगनाओं का जिक्र किए बिना संपूर्ण स्वाधीनता आंदोलन की दास्तान अधूरी है, जिन्होंने अंग्रेजों को लोहे के चने चबवा दिए। आज जब महिला सशक्तिकरण और महिला ‘स्वतंत्रता’ की बातें हो रही हैं, ऐसे समय में मैं आपको इस ब्लॉग के माध्यम से 1857 की क्रांति से संबन्धित 6 ऐसी महिलाओं की याद दिलाऊंगा जिन्होंने उस दौर में भी राष्ट्र को सर्वोपरि माना।

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