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जी हां, मिस्र (Egypt) ने सारी दुनिया को यही ताज़ा पैग़ाम भेजा है. मिस्र वही कट्टरवादी इस्लामी देश है जहां पांच साल पहले राजधानी कैरो के तहरीर चौक पर लाखों लोगों ने लोकतंत्र और आज़ादी की मांग को लेकर सड़कों पर प्रदर्शन किया था. इस्लामी परम्पराओं पर गर्व करने वाले उसी मिस्र ने कवियत्री और लेखिका फ़ातिमा नऊत को इसलिए सींखचों के पीछे डाल दिया है क्योंकि 1 अक्टूबर 2014 को उन्होंने अपने फ़ेसबुक वॉल पर लिखा था कि बकरीद (ईद-अल-अधाह या ईद-उल-ज़ुहा) के मौक़े पर इंसान सबसे बड़ा कत्लेआम (Massacre) करता है. फ़ातिमा नऊत का ये विचार ‘इस्लाम का अपमान’ माना गया. उन्हें 26 जनवरी को तीन साल जेल और 20 हज़ार मिस्री पाउंड (1.7 लाख रुपये) ज़ुर्माने की सज़ा दी गयी.273-572x395

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ख़ाड़ी के देशों समेत दुनिया के तमाम कट्टरवादी इस्लामी देशों की जेलों में सैकड़ों ऐसे लोग पहले से ठूंसे हुए हैं जिन्होंने फ़ातिमा नऊत की तरह ‘इस्लाम का अपमान’ करने की ज़ुर्रत की है. कट्टरवादी इस्लामी देशों की तो हिम्मत नहीं है कि वो फ़ातिमा नऊत जैसे लोगों के आचरण को किसी उदारता से देख सकें. लेकिन भारत जैसे बहुलतावादी (Pluralistic), धर्मनिरपेक्ष और उदारवादी लोकतंत्र में रहने वाले करोड़ों मुसलमान इस बात पर चिन्तन करें कि क्या इस्लाम का मतलब स्वतंत्र ज़ज़्बातों और विचारों का ग़ला घोट देना है? क्या इस्लाम बुनियादी तौर पर इतना असहिष्णु है कि वहां किसी नये चिन्तन की कोई गुंज़ाइश नहीं है? क्या धर्म यानी ‘धारण करने योग्य आचरण’ में कुछ भी विचारणीय नहीं हो सकता? क्या आचरण को देश, काल और परिस्थिति से निरपेक्ष ही होना चाहिए?

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