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आदरणीय राष्ट्रप्रेमी भाईयों और बहनों

आज मैं भारत में जारी एक बहुत बड़े षड़यंत्र के ऊपर आप लोगों का ध्यान आकृष्ट करना चाहूँगा जिसे आप “मौत का व्यापार” कह सकते हैं और ये व्यापार है अंग्रेजी दवाओं का, क्यों कि भारत अंग्रेजी दवाओं का Dumping Ground बन गया है | जो दवाई विश्व में कहीं नहीं मिलेगी वो भारत में आपको मिल जाएगी और ऐसी कई दवाये हैं जिनका कोई लेबोरेटरी टेस्ट भी नहीं हुआ रहता है और वो भारत के बाज़ार में धड़ल्ले से बिक रहा हैं | और हमेशा की तरह ये लेख भी परम सम्मानीय भाई राजीव दीक्षित जी के व्याख्यानों से जोड़ के मैंने बनाया है |

मौत का व्यापार  

भारत सरकार ने 1974 में श्री जयसुखलाल हाथी की अध्यक्षता में एक कमिटी बनाई थी, जिसे हम हाथी कमिटी या हाथी कमीशन के रिपोर्ट के रूप में जानते हैं और  जिसे कहा गया था कि बाज़ार में कौन कौन से दवाएं हैं जो हमारे लिए सबसे जरूरी हैं और जिनके बिना हमारा काम नहीं चल सकता | हाथी कमिटी ने अपनी रिपोर्ट 1975 में तैयार कर सरकार को बताया कि भारत के मौसम, वातावरण और जरूरत के हिसाब से 117 दवाएं काफी जरूरी हैं | इन 117 दवाओं में छोटे बीमारी (खांसी, बुखार, आदि)  से लेकर बड़ी बिमारियों  (कैंसर) तक की दवा थी | कमिटी ने कहा कि ये वो दवाएं हैं जिनके बिना हमारा काम नहीं चल सकता | कुछ सालों बाद विश्व स्वस्थ्य संगठन (WHO) ने कहा कि ये लिस्ट कुछ पुरानी हो गयी हैं और उसने हाथी कमिटी की लिस्ट को बरक़रार रखते हुए कुछ और दवाएं इसमें जोड़ी और ये लिस्ट हो गया 350 दवाओं का | मतलब हमारे देश के लोगों को केवल 350 दवाओं की जरुरत है किसी भी प्रकार की बीमारी से लड़ने के लिए, चाहे वो बुखार हो या कैंसर लेकिन हमारे देश में बिक रही है 84000 दवाएं |

हमारे भारत में एक मंत्रालय है जो परिवार कल्याण एवं स्वास्थ्य मंत्रालय कहलाता है | हमारी भारत सरकार प्रति वर्ष करीब 23700 करोड़ रुपये लोगों के स्वास्थ्य पर खर्च करती है  | फिर भी हमारे देश में ये बीमारियाँ बढ़ रही है | आइये कुछ आंकड़ों पर नजर डालते है –

  • भारत सरकार के आंकड़े बताते है कि सन 1951 में भारत की आबादी करीब 34 करोड़ थी  जो सन 2012 तक 120 करोड़ हो गई है |
  • सन 1951 में पूरे भारत में 4780 अंग्रेजी डॉक्टर थे, जो सन 2012 तक बढ़कर करीब 18,00,000 (18 लाख) हो गयी है |
  • सन 1947 में भारत में एलोपेथी दवा बनाने वाली करीब 10-12 कंपनिया ही हुआ करती थी जो आज बढ़कर करीब 20 हजार हो गई है |
  • सन 1951 में पूरे भारत में करीब 70 प्रकार की दवाइयां बिका करती थी और आज इन दवाओं की संख्या बढ़कर करीब 84000 (84 हजार) हो गई है|
  • सन 1951 में भारत में बीमार लोगों की संख्या करीब 5 करोड़ थी आज बीमार लोगों की संख्या करीब 100 करोड़ हो गई है |

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हमारी भारत सरकार ने पिछले 64 सालों में अस्पतालों पर, दवाओ पर, डॉक्टर और नर्सों पर, ट्रेनिंग वगेरह वगेरह में सरकार ने जितना खर्च किया उसका 5 गुना यानी करीब 50 लाख करोड़ रूपया खर्च कर चुकी है | आम जनता ने जो अपने इलाज के लिए पैसे खर्च किये वो अलग है | आम जनता का लगभग 50 लाख करोड़ रूपया बर्बाद हुआ है पिछले 64 सालों में इलाज के नाम पर, बिमारियों के नाम पर | इतना सारा पैसा खर्च करने के बाद भी भारत में रोग और बीमारियाँ बढ़ी है |

  • हमारे देश में आज करीब 5 करोड़ 70 लाख लोग डाईबिटिज (मधुमेह) के मरीज है | और भारत सरकार के आंकड़े बताते है कि करीब 3 करोड़ लोगों को डाईबिटिज होने वाली है |
  • हमारे देश में आज करीब 4 करोड़ 80 लाख लोग ह्रदय सम्बन्धी विभिन्न रोगों से ग्रसित है |
  • करीब 8 करोड़ लोग कैंसर के मरीज है | भारत सरकार कहती है कि 25 लाख लोग हर साल कैंसर के कारण मरते है |
  • 12 करोड़ लोगों को आँखों की विभिन्न प्रकार की बीमारियाँ है |
  • 14 करोड़ लोगों को छाती की बीमारियाँ है |
  • 14 करोड़ लोग गठिया रोग से पीड़ित है |
  • 20 करोड़ लोग उच्च रक्तचाप (High Blood Pressure ) और निम्न रक्तचाप (Low Blood Pressure ) से पीड़ित है |
  • 27 करोड़ लोगों को हर समय 12 महीने सर्दी, खांसी, जुकाम, कलरा, हैजा आदि सामान्य बीमारियाँ लगी ही रहती है |
  • 30 करोड़ भारतीय महिलाएं एनीमिया की शिकार है | एनीमिया यानी शरीर में खून की कमी | महिलाओं में खून की कमी से पैदा होने वाले करीब 56 लाख बच्चे जन्म लेने के पहले साल में ही मर जाते है | यानी पैदा होने के एक साल के अन्दर-अन्दर उनकी मृत्यु हो जाती है |  क्यों कि खून की कमी के कारण महिलाओं में दूध प्रयाप्त मात्र में नहीं बन पाता | प्रति वर्ष 70 लाख बच्चे कुपोषण के शिकार होते है | कुपोषण के मायने उनमे खून की कमी, फास्फोरस की कमी, प्रोटीन की कमी, वसा की कमी, वगैरह-वगैरह …….

ऊपर बताये गए सारे आंकड़ों से एक बात साफ़ तौर पर साबित होती है कि भारत में एलोपेथी का इलाज कारगर नहीं हुआ है, एलोपेथी का इलाज सफल नहीं हो पाया है | इतना पैसा खर्च करने के बाद भी बीमारियाँ कम नहीं हुई बल्कि और बढ़ गई है | यानि हम बीमारी को ठीक करने के लिए जो एलोपेथी दवा खाते है उससे और नई तरह की बीमारियाँ सामने आने लगी है |
पहले मलेरिया हुआ करता था | मलेरिया को ठीक करने के लिए हमने जिन दवाओ का इस्तेमाल किया उनसे डेंगू, चिकनगुनिया और न जाने क्या-क्या नई-नई तरह की बुखारे, बिमारियों के रूप में  पैदा हो गई है | किसी ज़माने में सरकार दावा करती थी कि हमने छोटी माता / बड़ी माता और टी.बी. जैसी घातक बिमारियों पर विजय प्राप्त कर ली है लेकिन हाल ही में ये बीमारियाँ फिर से अस्तित्व में आ गई है, फिर से लौट आई है |  यानी एलोपेथी दवाओं ने बीमारियाँ कम नहीं की और ज्यादा बढ़ायी है |
यानि धीरे धीरे ये दवा कम्पनियां भारत में व्यापार बढाने लगी और इनके व्यापार को बढ़ावा दिया हमारी सरकारों ने | ऐसा इसलिए हुआ क्यों कि हमारे नेताओं को इन दवा कंपनियों ने खरीद लिया | हमारे नेता लालच में आ गए और अपना व्यापार धड़ल्ले से शुरू करवा दिया | इसी के चलते जहाँ हमारे देश में सन 1951 में 10-12 दवा कंपनिया हुआ करती थी वो आज बढ़कर 20000 से ज्यादा हो गई है | 1951 में जहाँ लगभग 70 कुल दवाइयां हुआ करती थी आज की तारीख में ये 84000 से भी ज्यादा हो गयी हैं | फिर भी रोग कम नहीं हो रहे है, बिमारियों से पीछा नहीं छूट रहा है |
आखिर सवाल खड़ा होता है कि इतनी सारे जतन करने के बाद भी बीमारियाँ कम क्यों नहीं हो रही है | इसकी गहराई में जाए तो हमे पता लगेगा कि मानव के द्वारा निर्मित ये दवाए किसी भी बीमारी को जड़ से समाप्त नहीं करती बल्कि उसे कुछ समय के लिए रोके रखती है | जब तक दवा का असर रहता है तब तक ठीक, दवा का असर खत्म हुआ तो बीमारियाँ फिर से हावी हो जाती है | दूसरी बात इन दवाओं के साइड इफेक्ट बहुत ज्यादा है यानी एक बीमारी को ठीक करने के लिए दवा खाओ तो एक दूसरी बीमारी पैदा हो जाती है |  आपको कुछ उदहारण दे कर समझाता हूँ  –

  • Antipyretic   बुखार को ठीक करने के लिए हम एंटीपायिरेटिक दवाएं खाते है जैसे – पैरासिटामोल, आदि | बुखार की ऐसी सैकड़ों दवाएं बाजार में बिकती है | ये एंटीपायिरेटिक दवाएं हमारे गुर्दे ख़राब करती है | गुर्दा ख़राब होने का सीधा मतलब है कि पेशाब से सम्बंधित कई बिमारियों का पैदा होना, जैसे पथरी, मधुमेह, और न जाने क्या क्या | एक गुर्दा खराब होता है, उसके बदले में नया गुर्दा लगाया जाता है तो ऑपरेशन का खर्चा करीब 3.50 लाख रुपये का होता है |
  • Antidiarrheal – इसी तरह से हम लोग दस्त की बीमारी में antidiarrheal  दवाए खाते है | ये antidiarrheal  दवाएं हमारी आँतों में घाव करती है जिससे कैंसर, अल्सर, आदि भयंकर बीमारियाँ पैदा होती है |
  • Analgesic (commonly known as a Painkiller)  इसी तरह हमें सरदर्द होता है तो हम एनाल्जेसिक दवाए खाते है जैसे एस्प्रिन, डिस्प्रिन, कोल्डरिन, ऐसी और भी सैकड़ो दवाए है | ये एनाल्जेसिक दवाए हमारे खून को पतला करती है | आप जानते है कि खून पतला हो जाये तो शरीर की प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है और कोई भी बीमारी आसानी से हमारे ऊपर हमला बोल सकती है |

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आप आये दिन अखबारों में या टी वी पर सुना होगा की किसी का एक्सिडेंट हो जाता है तो उसे अस्पताल ले जाते ले जाते रस्ते में ही उसकी मौत हो जाती है | समझ में नहीं आता कि अस्पताल ले जाते ले जाते मौत कैसे हो जाती है ? होता क्या है कि जब एक्सिडेंट होता है तो जरा सी चोट से ही खून शरीर से बाहर  आने लगता है और क्यों कि खून पतला हो जाता है तो खून का थक्का नहीं बनता जिससे खून का बहाव रुकता नहीं है और खून की कमी लगातार होती जाती है और कुछ ही देर में उसकी मौत हो जाती है |
पिछले करीब 30 से 40 सालों में कई सारे देश है जहाँ पे ऊपर बताई गई लगभग सारी दवाएं बंद हो चुकी है | जैसे अमेरिका, ब्रिटेन, फ़्रांस, जर्मनी, इटली, और भी कई देश में जहा ये दवाए न तो बनती और न ही बिकती है लेकिन हमारे देश में ऐसी दवाएं धड़ल्ले से बन रही है, बिक रही है |  इन 84000 दवाओं में अधिकतर तो ऐसी है जिनकी हमारे शरीर को जरुरत ही नहीं है | यानी जिन दवाओं कि जरूरत ही नहीं है वो डॉक्टर हमे लिखते है | मजेदार बात ये है कि डॉक्टर कभी भी इन दवाओं का इस्तेमाल नहीं करता और न अपने बच्चो को खिलाता है | ये सारी दवाएं तो आप जैसे और हम जैसे लोगों को लिखी जाती है | वो ऐसा इसलिए करते है क्यों कि उनको इन दवाओं के साइड इफ़ेक्ट पता होता है और कोई भी डॉक्टर इन दवाओं के साइड इफ़ेक्ट के बारे में कभी किसी मरीज को नहीं बताता | अगर भूल से पूछ बैठो तो डॉक्टर कहता है कि “तुम ज्यादा जानते हो या मैं ?” दूसरी और चौकाने वाली बात ये है कि ये दवा कंपनिया बहुत बड़ा कमीशन देती है डॉक्टर को | यानी डॉक्टर कमिशनखोर हो गए है या यूँ कहे कि डॉक्टर दवा कम्पनियों के एजेंट हो गए है तो गलत नहीं होगा |

इसके अलावा ये कंपनियाँ टेलीविजन के माध्यम से, पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से, अख़बारों के माध्यम से फिजूल की दवाएं भारत के बाजार में बेच लेती हैं | आप जानेंगे तो आश्चर्य करेंगे कि दुनिया भर के देशों में एक अंतर्राष्ट्रीय कानून है कि दवाओं का विज्ञापन आप टेलीविजन पर, पत्र-पत्रिकाओं में, अख़बारों में नहीं कर सकते, लेकिन भारत में धड़ल्ले से हर माध्यम में दवाओं का विज्ञापन आता है, और भारत में भी ये कानून लागु है, उसके बावजूद आता है | जब इससे सम्बंधित विभागों के अधिकारियों से बात कीजिये तो वो कहते हैं कि ” हम क्या कर सकते हैं, आप जानते हैं कि भारत में सब संभव है” | तो ऐसी बहुत सारी फालतू की दवाएँ हजारों की संख्या में भारत के बाजार में बेचीं जा रही है |
आपने एक नाम सुना होगा M.R. यानि मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव | ये नाम अभी हाल के कुछ वर्षो में ही अस्तित्व में आया है | ये MR नाम का विचित्र प्राणी कई तरह की दवा कम्पनियों की दवाएं डॉक्टर के पास ले जाते है और इन दवाओं को बिकवाते है | ये दवा कंपनिया 40-40% तक कमीशन डॉक्टर को सीधे तौर पर देती है | जो बड़े बड़े शहरों में दवा कंपनिया है नकद में डॉक्टर को कमिसन देती है | ऑपरेशन करते है तो उसमे कमीशन खाते है, एक्सरे में कमीशन, विभिन्न प्रकार की जांचे करवाते है डॉक्टर , उसमे कमीशन, सबमे इनका कमीशन फिक्स रहता है | जिन बिमारियों में जांचों की कोई जरुरत ही नहीं होती उनमे भी डॉक्टर जाँच करवाने के लिए लिख देते है ये जाँच कराओ, वो जाँच करवाओ आदि आदि | कई बीमारियाँ ऐसी है जिसमे दवाएं जिंदगी भर खिलाई जाती है | जैसे हाई-ब्लड प्रेसर या लो-ब्लड प्रेसर, डाईबिटिज, आदि | यानी जब तक दवा खाओगे आपकी धड़कन चलेगी, दवाएं बंद तो धड़कन बंद | जितने भी डॉक्टर है उनमे से 99% डॉक्टर कमिशनखोर हैं केवल 1% इमानदार डॉक्टर है जो सही मायने में मरीजो का सही इलाज करते है |
सारांश के रूप में अगर हम कहे कि मौत का खुला व्यापार धड़ल्ले से पूरे भारत में चल रहा है तो कोई गलत नहीं होगा | अभी भारत सरकार ने नई ड्रग प्राइसिंग पालिसी लाया है देखिये उसके माध्यम से क्या गुल खिलाती हैं ये दवा कंपनियां |

जय हिंद
राजीव दीक्षित

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