जानिए New Year या जीसस खतना दिवस, क्या आपने आज अपना खतना (लूल्ली काटन) कराया है?

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ब्लॉग: पंडित यशार्क  (यूनाइटेड हिन्दी) –  भारतीय समाज उत्सवधर्मी समाज है। हिन्दू प्रत्येक पर्व को उत्सव की भाँति मनाते हैं फिर चाहे वह किसी अन्य मत सम्प्रदाय का ही क्यों न हो। ध्यातव्य है कि प्राचीन काल से ही हमारे यहाँ ‘दिनांक’ की नहीं अपितु ‘तिथि’ की परिपाटी रही है। उत्सवधर्मिता के आधुनिक संस्करण में तिथियाँ गौण हो गयीं तथा दिनांक का प्रभाव व्यापक होता गया। समस्या यह नहीं कि लोग ग्रेगोरियन कैलेंडर का नया साल जोश-ओ-ख़रोश से क्यों मनाते हैं, समस्या यह है कि आमजन सरकारी शक और त्यौहारी विक्रमी सम्वत् से परिचित ही नहीं हैं। तीज त्यौहार भी आजकल गूगल से पूछ लिया जाता है। यदि कोई उलाहना दे तो उसे संघी, हिंदूवादी, दकियानूसी बकलोल जैसे विशेषण परोस दिए जाते हैं।

आज से बीस पच्चीस वर्ष पहले तक गृहणियाँ ‘परिवा’, ‘दूज’, ‘पूर्णमासी’, ‘अमवसा’ इत्यादि सम्बोधन से व्रत पर्व, सपूत की नौकरी लगने का दिन और जन्मदिन तक याद रखती थीं। उनके लिए अप्रैल की फलां तारीख का कोई महत्व नहीं था। चैत्र नवरात्र में जब ऋतु परिवर्तन होता था तब देवी आराधन के साथ ही नया वर्ष भी उत्सव के रूप में मना लिया जाता था। जैसे-जैसे दूरदर्शन का विस्तार हुआ 1 जनवरी का महत्व बढ़ गया। दिसंबर की 31 तारीख की रात हम सभी परिवार के साथ टीवी पर प्रोग्राम देखते और अगले दिन मित्रों को ₹1 के ग्रीटिंग कार्ड बाँटते। स्कूल में टीचर जी को ₹10 के कार्ड दिए जाते थे। नाते रिश्तेदार शुभकामना सन्देश बुक पोस्ट से प्राप्त करते। सन्देश प्रसारित करने के माध्यम में बदलाव के साथ ही यह परम्परा आज भी यथावत है।

कैलेंडर, एल्मानैक, पंचांग जो कुछ भी कह लीजिए किसी राष्ट्र की संस्कृतिमूलक सभ्यता के उद्भव एवं विकासयात्रा का प्रमाणिक लेखा जोखा होता है। भारतीय संस्कृति अपने मौलिक स्वरूप में एक वैज्ञानिक संस्कृति है। हमारी संस्कृति जनित ऋषि परंपरा ने ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति और परमात्मा के अस्तित्व से लेकर कारण-कारक सिद्धांत के औचित्य पर भी प्रश्न किये हैं। ग्रह नक्षत्रों की चाल की वैज्ञानिक व्याख्या और उनका गणितीय निरूपण इस चिंतन की विशेषता है। प्रो० मेघनाद साहा की अध्यक्षता में 1952 में गठित कैलेंडर सुधार समिति की रिपोर्ट में यह कहा गया था कि ग्रेगोरियन कैलेंडर सर्वथा अवैज्ञानिक पद्धति पर आधारित है। विश्व भर में प्रचलित सभी कैलेंडरों के अध्ययन के उपरांत शक संवत् को राष्ट्रीय कैलेंडर घोषित किया गया था।

प्रसिद्ध समाज विज्ञानी थॉमस कुह्न ने Structure of Scientific Revolutions में लिखा है कि कोई वैज्ञानिक क्रांति तब होती है जब कोई सिद्धांत किसी स्थापित मान्यता को ध्वस्त करता है अन्यथा वह सामान्य विज्ञान ही कहलायेगा जो पहले कही गयी बात को ही आगे बढ़ाता है। संयुक्त राष्ट्र द्वारा गठित वर्ल्ड कैलेंडर प्लान के अनुसार ग्रेगोरियन कैलेंडर में संशोधन कर उसे अंतर्राष्ट्रीय कैलेंडर का स्वरूप देना कोई वैज्ञानिक उपलब्धि नहीं बल्कि विश्व समुदाय को अपने समय से चलने को बाध्य करने की पश्चिमी देशों की रणनीति थी। अंग्रेजी भाषा और कैलेंडर ये दोनों ही यूरोपीय सॉफ्ट पॉवर का उदाहरण हैं। हम उनकी भाषा बोलते हैं, उनके समय से कार्य करते हैं और जब वे उत्सव मनाते हैं तब हम भारतवासी भी एक दूसरे को हैप्पी न्यू इयर कहने को तैयार खड़े होते हैं। गूगल, मोबाइल और कम्प्यूटर तकनीक सभी इस पद्धति पर चलते ही नहीं हमें चलाते भी हैं। एक मजेदार उदाहरण है कि वीडियो चलाने वाला VLC सॉफ्टवेयर क्रिसमस से पहले सांता क्लॉज़ की टोपी पहन लेता है।

अंतर्राष्ट्रीय सम्बन्धों में Realism के सिद्धांत पर शक्ति की परिभाषा दी जाती है। शक्ति वह है जो किसी देश को कुछ ऐसा करने पर बाध्य कर दे जो अन्यथा सम्भव न हो। राष्ट्र के सन्दर्भ में ‘राष्ट्रीय शक्ति’ उन सभी संसाधनों का योग है जो राष्ट्रीय लक्ष्य को प्राप्त कराने के लिए आवश्यक हैं। अतः यदि हम चाहते हैं कि भारत विश्व शक्ति बने तो हमें अपनी बौद्धिक वैज्ञानिक सम्पदा को उचित सम्मान देना सीखना होगा। हंटिंगटन लिखते हैं कि सभ्यता एक वृहद् सांस्कृतिक समूह है जहाँ लोगों की एक विशिष्ट पहचान होती है। पहनावा, खानपान, भाषा, ज्ञान परम्परा इत्यादि किसी भी संस्कृति की अक्षुण्ण विरासत होती हैं। यदि हम अपनी ही विरासत को तज कर विदेशी परम्पराओं को ओढ़ लेंगे तो हमारी पहचान क्या रह जायेगी?

विकास की होड़ में विश्व से प्रतियोगिता करना कहीं से भी बुरा नहीं। दौड़ में अव्वल तो हमें ही आना है। बस इतना याद रखें कि इस यात्रा में भारत की सांस्कृतिक विरासत हमारे लिए ‘पाथेय’ का कार्य करेगी। बिना इसके हम दो पग भी नहीं चल सकते।

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