कम्युनिस्ट खेमे के इन इतिहासकारों ने भगत सिंह की इस तरह से की निर्मम हत्या…

भगत के मिट्टी की खुशबू हम सबके जेहन में रच-बस चुकी है, तुम्हारे षड्यंत्र अब सफल नहीं होंगे….

भगत के लिए वाम-श्रद्धा देखनी है तो एक वरिष्ठ पूर्व कम्युनिस्ट नेता सत्येन्द्र नारायण मजूमदार की 1979 में पीपुल्स पब्लिशिंग हाउस द्वारा प्रकाशित पुस्तक “इन सर्च आफ ए रिवोल्यूशनरी आइडियोलाजी” को पढ़ना पर्याप्त है। इस किताब में उन्होंने भगत सिंह की निंदा करते हुए उन्हें एक मूर्ख, अति उत्साही, भावुक और रोमांटिक क्रांतिकारी बताते हुये उनके बारे में कहा है कि उस मूर्ख को सामूहिकता के साथ काम करने नहीं आता था। एक और कामरेड थे अजय घोष जो भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी में 1951 से 1962 तक महामंत्री रहे थे और दावा करते थे भगत सिंह के साथ उनका संबंध 1923 में ही आ गया था। इस महानुभाव ने भी “भगतसिंह और उनके कामरेड” शीर्षक से लिखे एक लेख में स्पष्ट कहा था कि भगत सिंह सच्चे अर्थों में मार्क्सवादी थे ही नहीं क्योंकि केन्द्रीय असेम्बली में बम फेंककर बिना किसी प्रतिरोध के स्वयं को गिरफ्तार कराने और फांसी पर चढ़ने के उनका निर्णय व्यक्तिगत था, जिसे कम्युनिस्ट पार्टी व्यक्तिगत हिमाकत मानती है।

भगत को अपने खेमे में लाने की कोशिश करते हुए उन्हें ये पता है कि उनकी मृत विचारधारा तब भी जीवित नहीं रखेगी पर भगत को अपने खेमे में दिखाने का उनका दूरगामी उद्देश्य ये है कि भारत का युवा इस विष-प्रचार से भ्रमित होकर भगत से घृणा करने लग जाये।

ये कम्युनिस्ट खेमे का कितना बड़ा अपराध है कि उन्होंने देश के लिये बलिदान होने वाले को उस विचारधारा में शामिल कर दिया जहाँ देश-भक्ति के बलिदान तो दूर देशप्रेम के लिये भी रत्ती भर गुंजाइश नहीं है। इन्होंनें उस भगत को जबरदस्ती नास्तिक बना दिया जिसने 6 मई, 1925 को कलकत्ता से प्रकाशित साप्ताहिक “मतवाला” में बलवंत सिंह के छद्म नाम से प्रकाशित अपने लेख में भारत के युवाओं से आह्वान करते हुए लिखा था, “तेरी माता, तेरी प्रात: स्मरणीया, तेरी परम वन्दनीया, तेरी जगदम्बा, तेरी अन्नपूर्णा, तेरी त्रिशूलधारिणी, तेरी सिंहवाहिनी, तेरी शस्य श्यामलाञ्चला आज फूट-फूट कर रो रही है क्या उसकी विकलता तुझे तनिक भी चंचल नहीं करती ? धिक्कार है तेरी निर्जीवता पर, तेरे पितर भी शर्मसार हैं तेरे इस नपुंसत्व पर। यदि अब भी तेरे किसी अंग में थोड़ी हया बाकी हो तो उठ माता के दूध की लाज रख, उसके उद्धार का बीड़ा उठा, उसके आंसुओं के एक-एक बूंद की सौगंध ले, उसका बेड़ा पार कर और बोल मुक्त कण्ठ से- वन्दे मातरम्।

कम्युनिस्टों, है हौसला कि भगत के इस आह्वान को अपना ध्येय-वाक्य मानने की ? है हौसला भगत के वन्दे-मातरम् के नारे के साथ सुर मिलाने की ? है हौसला भारत को सिंहवाहिनी, त्रिशूलवाहिनी देवी रूप में स्मरण करने की ? नहीं है न, तो भगत के बलिदान के अपहरण का कुत्सित पाप भी मत करो, जाग्रत भारत तुम्हारे हर प्रपंच को विफल करने को तैयार बैठा है।

भगत ने गाया था, दिल से जायेगी न मरकर भी वतन की उल्फ़त, मेरी मिट्टी से भी खुशबू-ए-वतन आयेगी।

(भगत सिंह के बलिदान दिवस 23 मार्च, 1931 पर उनके श्रीचरणों में सादर)