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देश की आर्थिक समृद्धि का आधार है गाय (जल्द घोषित किया जाये राष्ट्र माता)

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यह सच है कि स्वतंत्रता के बाद हमारी नैतिकता का ह्रास हुआ है। स्वार्थपरता बढ़ी है। नारों और वह भी फोके नारों से देश की जनता को ठगा गया है। गौरक्षा पर आंदोलन चले, गौमाता की जय-जयकार की गई, परन्तु रास्तों, सड़कों, शहर के कूड़े के ढेरों पर अशक्त, अपंग, बूढ़ी और दूध न देने वाली गायों को खुला छोड़ दिया गया है।

आवारा सांडों की तो शहरों में भरमार हो गई। आवारा सांड आपस में सींग भिड़ाते और मानवीय जिंदगियों को रौंदते जाते हैं। अधिक हुआ तो ऐसे सांडों को महाराष्ट्र के देवनार बूचडख़ाने के हवाले कर दिया। कृषक की खेती की ऊर्जा बैल बेकार हो गया। 1955-56 में जब हम खेती करते थे तो गाय के बछड़े को ‘फलहों’ पर जोत कर ‘हाली’ किया जाता था। उसे सरसों का तेल पिलाते, आटे के पेड़े में मक्खन डालकर खिलाते।

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