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भारतीय कथा-साहित्य में उज्जैन का राजा विक्रमादित्य बड़ा लोकप्रिय रहा है। उसके प्रसंग को लेकर हजारों कहानियां देश की विविध भाषाओं में प्रचलित हैं। उसके नवरत्नों की कथा भी सर्वविदित है, परंतु आश्चर्य की बात है कि ऐसे लोक प्रसिद्ध राजा के विषय में कथा-कहानियों के अतिरिक्त कोई जानकारी नहीं मिल पाई है। विदेशी इतिहासकार उसे केवल कल्पित राजा मानते हैं। भारतीय इतिहासकारों के मन में अवश्य उसे ऐतिहासिक महापुरुष मानने का मोह बना हुआ है। उन्होंने इसकी वास्तविकता को सिद्ध करने के लिए अनेक प्रकार के अन्वेषण व अनुसंधान भी किए, फिर भी निश्चित रूप से उसके अस्तित्व को सिद्ध नहीं कर पाए हैं। 

 

विक्रम की नगरी उज्जैन में महाकाल का सुप्रसिद्ध मंदिर है। देश के अन्य किसी भाग में महाकाल का कोई मंदिर नहीं है। अत: निश्चय ही यह प्रश्न उपस्थित होता है कि यह ‘महाकाल’ कौन देवता हैं जिसका केवल देशभर में एक मंदिर है। सामान्यतया ‘महाकाल’ शिव का पर्याय मान लिया गया है और उज्जैन के ‘महाकाल’ के मंदिर को शिव का मंदिर माना जाता है। परंतु प्रश्न यह है कि शिव के अन्य मंदिर ‘महाकाल’ के मंदिर क्यों नहीं कहलाते? हमारे विचार से विक्रमादित्य, उज्जयिनी, नवरत्न और महाकाल इन चारों शब्दों के निर्वचन से इसके वास्तविक अर्थ पर कुछ प्रकाश पड़ सकता है और सुप्रसिद्ध कथा की गुत्थी सुलझ सकती है।

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स्रोतwebdunia.com
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