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भारत की संविधान सभा ने अब अपना कार्य शुरू कर दिया था, विभिन्न विषयों पर चर्चा होने लगी थी जैसे मौलिक अधिकार, भाषा आदि! इन्हीं प्रस्तावों के बीच एक दिन आरक्षण का भी मुद्दा उठाया गया। इस विषय पर चर्चा के थोड़ी ही देर बाद पता चल गया कि सभा के ज्यादातर सदस्य इसके खिलाफ थे। 

उस दिन की कार्यवाही समाप्त होने के बाद के.एम. मुंशी जो संविधान सभा के एक वरिष्ठ और विद्वान् सदस्य थे, ने डॉ अम्बेडकर को अपने पास बुलाया और कहा कि शायद आरक्षण देश के लिए ठीक नहीं होगा और चूँकि कांग्रेस के भी ज्यादातर सदस्य इसके खिलाफ ही हैं तो क्यों ना आप इसे संविधान से निकाल ही दें।

मुंशी जी का इतना कहना ही था कि बाबा आंबेडकर चिल्ला उठे और जोर से कहा कि जब तक मैं यहाँ हूँ, संविधान में आरक्षण रहेगा जब आप लोगों को मुझसे इतना घृणा ही है तो में अपना इस्तिफा दे दूंगा। और इस प्रकार उन्होंने संविधान सभा का अपना काम बंद कर दिया और घर बैठ गए।

इन सब बातों की जानकारी जब सरदार पटेल को हुई तो वह बाबा अम्बेडकर के घर गए और उनका पक्ष जानने का प्रयास किया और कहा कि आप क्यों सब काम छोड़कर घर बैठे हुए हैं। डॉ अम्बेडकर ने फिर वही आरक्षण वाली अपनी बात दोहराई, सरदार पटेल ने तब साफ़ कहा कि देखो अम्बेडकर जो बड़े पद हैं उन पर तो हम मेरिट के आधार पर ही लोगों का चयन करेंगें फिर क्यों तुम क्लर्कों के पद के लिए इतना बड़ा जोखिम उठा रहे हो।

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