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अलका सक्सेना, पत्रकार

आतंकी बुरहान वानी की मौत के बाद से कश्मीर में हिंसक प्रदर्शन हो रहे हैं। अब तक 30 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है। आदत से मजबूर पाकिस्तान भारतीय सेना पर कश्मीरियों के दमन का आरोप मढ़ रहा है। हमेशा की तरह इस्लामाबाद के वार पर भारत सरकार ने पलटवार करने में जरा भी देर  नहीं की। लेकिन यहां बड़ा सवाल यह है कि क्या केंद्र सरकार उन राजनेताओं, चिंतकों, पत्रकारों और कश्मीरियों को उचित जवाब दे सकी है, जिनमें कोई बुरहान  को मार गिराने के तरीके पर सवाल उठा रहा है तो कोई आतंकवाद की नई परिभाषा गढ़ रहा है।

सोशल मीडिया के इस दौर में लोकतांत्रिक व्यवस्‍था का मतलब कुछ और ही हो चला है। फिर मुद्दा चाहे कितना ही संवेदनशील हो। कोई आम आदमी ऐसी नादानी  करे तो फिर भी बात को नजरअंदाज किया जा सकता है, लेकिन जम्मू-कश्मीर के पूर्व सीएम उमर अब्दुल्ला अगर बुरहान को मार गिराने के तरीके पर सवाल उठाएं  तो बात ज्यादा गंभीर हो जाती है। वैसे नसीहत देने के मामले में उमर अब्दुल्ला को कई और लोग भी टक्कर दे रहे हैं। इनमें कुछ का कहना है कि बुरहान को मारने की बजाय पकड़ना चाहिए था। देशद्रोह के मामले में आरोपी जेएनयू के एक छात्र ने भी बुरहान को अपना खुला समर्थन दिया। लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है, जिसका इस्तेमाल आतंकियों का खुलकर समर्थन करने के लिए भी किया जा सकता है। हां, जब सेना या बीएसएफ के जवानों को घात लगाकर आतंकी मारते हैं, तब कुछ तथाकथित विश्लेषक और राजनेता अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का प्रयोग करना भूल जाते हैं।

एक वर्ग ऐसा भी है जो कि खुद को मीडिया मानता है, लेकिन ‘विचारों का कारोबार’ करने में लगे ये खास लोग, जो कि पत्रकार या विशेषज्ञ होने के साथ ही किसी न किसी राजनीतिक दल की विचारधारा का भी बोझ ढोते हैं। ये कश्मीरियों की हर बात का समर्थन बंद आंखों से करते दिखते हैं। वे चाहें तो आईएसआईएस के झंडे लहराएं, मन करे तो सुरक्षाबलों पर पत्‍थरबाजी करें, जुमे की नमाज के बाद पाकिस्तान जिंदाबाद भी बोल दें तो भी कोई बड़ी बात नहीं।

जहां तक मोदी सरकार की कश्मीर नीति का सवाल है, तो उसे सफल तो नहीं ही कहा जा सकता। क्योंकि कश्मीर में आज जो हालात हैं, 90 दशक के बाद पहली बार इतने विस्फोटक होकर सामने आए हैं। वो भी तब, जब सरकार के पास अजित डोवाल जैसे अनुभवी और कश्मीर पर खासी पकड़ रखने वाले राष्‍ट्रीय सुरक्षा सलाहकार हैं। दूसरी ओर कश्मीर के जो नेता हैं, वे कई बार ऐसे मामलों में एक ही सुर में बोलते दिखाई देते हैं, चाहे वे सत्ता पक्ष में हो, या फिर विपक्ष में बैठे हों।

उमर अब्दुल्ला का यह कहना कि कब्र में दफन बुरहान ज्यादा खतरनाक होगा, इसी ओर इशारा करता है। यह बयान न केवल धमकी है बल्कि युवाओं को उकसाने वाला भी है। उमर अब्दुल्ला इतने साल सत्ता में रहे, लेकिन कश्‍मीरी पंडितों के हक में इस प्रकार से कभी नहीं बोले। हाल ही में एक वरिष्ठ पत्रकार ने सोशल मीडिया पर आतंकवाद की अपनी परिभाषा लिखी। उन्होंने गलत लिखा या सही, मुझे उस बहस में नहीं पड़ना है, लेकिन आतंकवाद की परिभाषा तय करने से पहले कश्मीर-कश्मीर करने वालों को कश्मीरियत के बारे में भी बात कर लेनी चाहिए। कश्मीरियत के नाम पर सिर्फ और सिर्फ पाकिस्तान और कश्मीरी मुसलमान की ही बात क्यों हो रही है? आतंकवाद के खिलाफ इतने कड़े शब्दों में बात क्यों नहीं की जा रही है? क्या आतंकियों को खुला छोड़ा जा सकता है? क्या वे जिन लोगों को मार रहे हैं, वे हिंदुस्तानी नहीं हैं?

कोई कुछ भी कहे, जवाबदेही राज्य की पीडीपी-बीजेपी और केंद्र की मोदी सरकार पर ही आती है। कश्मीर के मौजूदा हालात केंद्र के लिए बड़ी चुनौती बनकर उभरे हैं। इससे हम कैसे निपट रहे हैं, इस पर अंतर्राष्ट्रीय ताकतों की भी नजर है।

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