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श्री लिंग पुराण के अनुसार “सृष्टि का प्रारंभ”12310652_697152930385116_2335580359858137526_n

प्राथमिक रचना का जो समय है वह ब्रह्म का दिन है। संक्षेप से वह प्राकृतिक पदार्थों का वर्णन है। संक्षेप से वह प्राकृतिक पदार्थों का वर्णन है। वह प्रभु दिन में सृष्टि करने का समय रात कहलाता है। दिन में विकार (16 प्रकार के) विश्वेदेवा, सभी प्रजापति, सभी ऋषि स्थिर रहते हैं। रात्रि में सभी फिर उत्पन्न होते हैं। ब्रह्मा का एक दिन ही कल्प है और उसी प्रकार की रात्रि है।

चारों युगों के हजार बार बीतने पर 14 मनु होते हैं। चार हजार वर्ष वाला सतयुग कहा है, उतने ही सैंकड़ा तक तीन, दो एक शतक क्रम से संध्या और संध्यांश होते हैं। संध्या की संख्या और संध्याश होते हैं। संध्या की संख्या 600 है जो संध्यांश के बिना कही गई है।

अब त्रेता, द्वापर आदि युगों को कहता हूं। 15 निमेष की एक काष्ठा होती है। मनुष्यों के नेत्रों के 30 पलक मारने के समय को कला कहते हैं। 30 कला का एक मुहूर्त होता है। 15 मुहूर्त की रात्रि तथा उतना ही दिन होता है।

फिर पित्रीश्वरों के रात, दिन, महीना और विभाग कहते हैं। कृष्ण पक्ष उनका तथा शुक्ल पक्ष उनकी रात हैं। पित्रीश्वरों का एक दिन रात मनुष्यों के 30 महीना होते है। 360 महीनों का उनका एक वर्ष होता है। मनुष्यों के मान से जब 100 वर्ष होता हैं तब पित्रीश्वरों के तीन वर्ष होते हैं।

पुनः देवताओं के दिन, रात्रि का विभाग बतातें हैं। उत्तरायण सूर्य रहें तब तक दिन तथा दक्षिणायन में रात्रि का होती है। यही दिन रात देवताओं के विशेष रुप से कहे हैं। 30 वर्षों का दिव्य वर्ष होता है। मनुष्यों के 100 महीने देवताओं के तीन महीने होते हैं। मनुष्यों के हिसाब से 360 वर्ष का देवताओं का एक वर्ष होता है।

मनुष्यों के वर्षों के अनुसार तीन हजार तीन सौ वर्षों का सप्त ऋषियों का एक वर्ष होता है। नौ हजार नब्बे वर्षों का ध्रुव वर्ष होता है। इस प्रकार 36 हजार मनुष्यों के वर्ष के अनुसार दिव्य (देवताओं) के सौ वर्ष होते हैं। तीन लाख साठ हजार मनुष्यों के वर्षों का देवताओं का एक हजार वर्ष होता है। ऐसा जानने वाले विद्वान कहते हैं।

                    आगे पढ़े >> दिव्य वर्ष के परिमाण से ही युगों की कल्पना

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