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कुछ भयावह रूप से गलत हो रहा है। जब भारत में किसान उत्तरोत्तर खुदकुशी के लिए मजबूर किए जा रहे हैं, एेसे समय में मोजांबिक से दालें आयात करने के लिए सरकारों के बीच अनुबंध त्रुटिपूर्ण अर्थनीति का सबूत है, जो अंतत: भारतीय किसानों को जड़ से उखाड़ डालेगी। मैं नहीं जानता कि यह जान-बूझकर किया जा रहा है या इसके गंभीर परिणामों से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अंधकार में रखा जा रहा है।

मुझे याद है कुछ दशकों पहले जब बलराम जाखड़ कृषि मंत्री थे तो उन्होंने भी कुछ अफ्रीकी देशों में दलहनों की खेती कराने और फिर उन्हें आयात करने का प्रस्ताव रखा था। यूपीए सरकार में तब के कृषि मंत्री शरद पवार भी चाहते थे कि भारत म्यांमार और उरुग्वे में दलहन की खेती कराए और बाद में दालों का आयात किया जा सकता है। किंतु इन सारे वर्षों में कृषि मंत्रालय के किसी अज्ञानी नौकरशाह का यह काल्पनिक विचार केवल मीडिया में बयानबाजी तक सीमित रहा। किंतु मुझे बताया गया है कि इस बार प्रधानमंत्री कार्यालय के नौकरशाह अपनी बात मनवाने में कामयाब रहे हैं। खबरों के मुताबिक भारत स्थानीय एजेंटों के माध्यम से मोजांबिक में किसानों के नेटवर्क का पता लगाएगा और उन्हें बीज व उपकरणों सहित उचित टेक्नोलॉजी मुहैया कराएगा। खेती शुरू करने के पहले इन किसानों को आश्वस्त किया जाएगा कि उनकी उपज को भारत सरकार खरेदेगी और खरीदी मूल्य भारत सरकार द्वारा दिए जा रहे न्यूनतम समर्थन मूल्य से कम नहीं होगा।

यदि भारत नियमित रूप से दालों के उत्पादन के लिए मोजांबिक में किसानों का नेटवर्क तैयार कर सकता है तो मैं चकित हूं कि किसानों का ऐसा ही नेटवर्क भारत में क्यों नहीं खड़ा किया जा सकता। सरकार ऊंची कीमत देने और निश्चित खरीदी का ऐसा ही आश्वासन क्यों नहीं देती, जिससे आसानी से घरेलू उत्पादन बढ़ सकता था और दालों की उपलब्धता बढ़ जाती।

दालों का घरेलू उत्पादन बढ़ाने की कुंजी निश्चित खरीदी में है। सरकार ने चाहे कुछ महत्वपूर्ण खरीफ दलहनों का न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ा दिया है जैसे अरहर के लिए प्रति क्विंटल 425 रुपए का बोनस देकर मूल्य 5,050 रुपए प्रति क्विंटल किया गया है, लेकिन दीर्घावधि में सिर्फ कीमत के बल पर उत्पादन नहीं बढ़ाया जा सकता। मैंने हमेशा कहा है कि जब तक सरकार गेहूं-चावल की तर्ज पर दालहन की खरीद नहीं करती, घरेलू उत्पादन बढ़ाने की गुंजाइश नहीं है। यदि सरकार मोजांबिक के किसानों को आश्वासन दे सकती है कि वे जो भी पैदा करेंगे, उसे वह खरीदेगी तो यही आश्वासन देश के भीतर नहीं देने का कोई कारण मुझे नज़र नहीं आता। भारत को उम्मीद है कि वह मोजांबिक से 1 लाख टन दालें आयात कर सकेगा, जो कुछ ही वर्षों में बढ़कर 2 लाख टन तक पहुंच जाएगा। इसके अलावा तंजानिया, केन्या और मलावी सहित कुछ अन्य अफ्रीकी देशों में भी दालहनों की खेती कराने की संभावनाएं तलाशी जाएंगी। दालों की लगातार बढ़ती घरेलू मांग की पूर्ति के लिए अफ्रीकी उत्पादन पर बढ़ती निर्भरता भारतीय कृषि के मोर्चे पर विनाश का सिलसिला छोड़ जाएगी, जिसके बारे में शायद ठीक से सोचा नहीं गया है। मैं मानता हूं कि खाद्य सुरक्षा किसी भी सरकार की प्राथमिक जवाबदारी है, लेकिन सिंगापुर जैसे देशों की तरह भारत में यह सुरक्षा आयात से सुनिश्चित नहीं की जानी चाहिए। जब भारत के पास 60 करोड़ किसानों की विशाल फौज हो जो पिछले कुछ दशकों से खेती में संकट का सामना कर रही है तो ऐसी दशा में भारत को चाहिए कि वह व्यापक जनसमूह से उत्पादन करवाएं न कि व्यापक जन-समूह के लिए उत्पादन करवाएं (प्रोडक्शन बाय मासेस, नॉट फॉर मासेस)। 1966 में जब हरित क्रांति शुरू की गई तो यही तो किया गया था। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की बुद्धिमत्ता की दाद देनी चाहिए कि उन्होंने परिश्रमपूर्वक सरकारी खरीद का तंत्र खड़ा करके देश को भूखमरी के लंबे दुश्चक्र से बाहर निकाला।

किसी देश के लिए इससे बढ़कर विनाशक कोई बात नहीं हो सकती कि खाद्य सुरक्षा के लिए खाद्य आत्म-निर्भरता की पूर्व शर्त को त्याग दिया जाए। खाद्य आत्म-निर्भरता सुनिश्चित करना राष्ट्रीय सम्प्रुभता की कसौटी मानी गई है। हम न भूलें कि 2007-08 में भारत अनाज के लिए होने वाले दंगों से बच गया जब दुनिया अपूर्व खाद्य संकट का सामना कर रही थी। उस समय कम से कम 37 देशों में ऐसे दंगे हुए थे और वे सारे देश खाद्य के लिए आयात पर निर्भर देश थे। हमारे पास तब प्रचुर खाद्य भंडार था। यह भंडार बनाए रखने की सतत नीति का परिणाम था। दूसरी बात यह है कि हमने खाद्य तेलों के साथ जो गड़बड़ की उससे सबक लेने चाहिए। इस वक्त देश अपनी जरूरत का 74 फीसदी खाद्य तेल आयात करता है, जिसकी लागत है 70,000 करोड़ रुपए, जबकि हमारे पास देश में ही इसके उत्पादन की क्षमता है। यह सही है कि 2015 में खत्म हुए दशक में खाद्य तेल की खपत दोगुनी हो गई, लेकिन 1993-94 में भारत खाद्य तेलों के मामले में लगभग आत्म निर्भर था। पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी द्वारा 1985-86 में शुरू किए गए ऑयल सीड्स टेक्नोलॉजी मिशन की बदौलत भारत अगले दस वर्षों में जरूरत का 97 फीसदी खाद्य तेल पैदा कर रहा था। गलत व्यापार नीति के कारण आयात शुल्क बहुत गिरा दिए गए अौर देश में खाद्य तेल आयात से बाढ़ आ गई। यदि ऊंचे आयात शुल्क से खाद्य तेल आयात पर रोक जारी रहती तो आयात पर जो 70,000 करोड़ रुपए खर्च हो रहे हैं, वे किसान के फायदे में खर्च होते। चूंकि तिलहन मुख्यत: वर्षा पर निर्भर मध्यभारत की फसल है, तो कल्पना कीजिए कि इससे किसानों को कितना आर्थिक लाभ होता।

अब दलहनों की बारी है, जिस पर आयात शुल्क शून्य है। अब जब भारत यूरोपीय संघ, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, दक्षिण कोरिया सहित अन्य देशों के साथ मुक्त व्यापार समझौता करने वाला है तो यह आशंका बढ़ रही है कि दूध व दूध के उत्पाद, फल-सब्जियां, पोल्ट्री अौर यहां तक कि गेहूं भी निशाने पर आ रहा है। खाद्य सुरक्षा के लिए खाद्य आयात पर निर्भरता के सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक परिणामों को सोचकर मैं कांप जाता हूं। ऐसी नीति जहां एक ओर किसान को कृषि से बाहर कर देगी वहीं, दूसरी ओर वह देश को ‘जहाज से मुंह’ तक वाले वज़ूद के पुराने दिनों में धकेल देगी, जब जहाज से आने वाला अनाज सीधे भूखे लोगों तक पहंुचाया जाता था।

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)
देविंदर शर्मा
पर्यावरणविद व कृषि विशेषज्ञ
hunger55@gmail.com

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