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आहार अर्थात भोजन। यदि आपका खान-पान सही और समयबद्ध नहीं है तो आप किसी भी गंभीर रोग की चपेट में आ सकते हैं। विहार का अर्थ है पैदल चलना या भ्रमण करना। क्या आप इतना पैदल चल लेते हैं जिससे की आपकी पाचन क्रिया बलशाली बनीं रहे। यदि नहीं तो आपके लिए खतरे की सूचना है।
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1.आहार- यह बहुत जरूरी है अन्यथा आप कितने ही आसन-प्राणायाम करते रहें, वे निरर्थक ही सिद्ध होंगे। उचित आहार का चयन करें और निश्चित समय पर खाएं। आहार में शरीर के लिए उचित पोषक तत्व होना जरूरी है। ना कम खाएं और ना ज्यादा, मसालेदार तो बिल्कुल ही नहीं। निरोगी रहकर लम्बी उम्र चाहते हैं तो आहार पर ध्यान दें। यौगिक आहार का चयन करें।

2.विहार- विहार करना बौद्ध काल में प्रचलित था। जिसका अर्थ पुण्य स्थल होता है। दूसरा अर्थ अभयारण्य होता है अर्थात जंगल की खुली हवा में पैदल विचरण करना। कहते हैं कि सौ दवाई और एक घुमाई।

जरा घुमने-फिरने जाएं और थोड़ा नंगे पैर भी चले। और आयुर्वेद में कहा गया है कि पैर यदि ज्यादा देर तक ढंके या बंधे हैं तो इसका असर हमारी श्वास पर होता है। विहार करने से शरीर में अतिरिक्त चर्बी इकट्ठी नहीं होती तथा स्पूर्ति बनी रहती है। पाचन क्रिया के लिए यह लाभदायक है।

3.योग- समय नहीं है कि किया जाए तो योग की हस्त मुद्राओं का सहारा लें। अंग संचालन, हास्य योग, ध्यान, प्राणायाम और योग निंद्रा का अभ्यास करते रहने से अतिरिक्त ऊर्जा का संचार होगा। यह बहुत ही कम समय में हो सकता है। सभी को पांच-पांच मिनट में किया जा सकता है। आप चाहें तो योग निंद्रा रात में बिस्तर पर सोते वक्त कर सकते हैं।

*योगा पैकेज- आहार में नींबू पानी के अलावा सेवफल का सेवन कर सकते हैं। कम से कम तीन किलोमिटर पैदल चलें। हस्त मुद्राओं में -ज्ञान मुद्रा, पृथवि मुद्रा, वरुण मुद्रा, वायु मुद्रा, शून्य मुद्रा, सूर्य मुद्रा, प्राण मुद्रा, लिंग मुद्रा, अपान मुद्रा, और अपान वायु मुद्रा का अभ्यास किया जा सकता है।

हंसने पर कोई पाबंदी नहीं जब चाहें तब मुंह खोल कर हंसे। प्राणायाम में अनुलोम-विलोम और ध्यान में विपश्यना का सहारा ले सकते हैं। यदि आसन करना चाहें तो हनुमानासन, पादहस्त आसन, चंद्रासन, योग मुद्रा, उष्ट्राषन, पवन मुक्तासन करें तथा इनके विलोम आसनों को भी जानें।

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