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नई दिल्ली। पर्सनल लॉ में सुधार के लिए मुस्लिम महिलाओं की सबसे बड़ी जमात ने आवाज बुलंद की है। देशभर की मुसलमानों की नुमाइंदगी का दावा करने वाली संस्था भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन ने मुस्लिम पर्सनल लॉ को भेदभाव भरा बताया है।

संस्था ने पीएम मोदी को एक चिट्ठी लिखकर इसमें सुधार की मांग की है। जाहिर है, इस मांग के बाद इस मुद्दे पर जोरदार बहस होगी और कई सियासी दलों को अपना रुख साफ करने के लिए मजबूर होना पड़ेगा।

केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली संविधान दिवस पर बहस के दौरान जिस मुद्दे पर चिंता जता रहे थे। उस पर संसद के भीतर और बाहर बहुत कम चर्चा होती है। वोट बैंक और सियासी नफा-नुकसान के चक्कर में एक बड़ी आबादी की परेशानियों पर आंखें बंद कर लेने का चलन नया नहीं।

लेकिन अब ऐसे भेदभाव के खिलाफ आवाज उठने लगी है। जब आवाज उठी है तो कई सवाल भी उठे हैं। सवाल ये कि क्या मुस्लिम पर्सनल लॉ में सुधार की जरूरत है, क्या मुस्लिम महिलाओं को लिंग के आधार पर भेदभाव का सामना करना पड़ता है, क्या मुस्लिम पर्सनल लॉ में सबको बराबरी का हक हासिल नहीं है? क्या मुस्लिम पर्सनल लॉ संविधान की भावना के खिलाफ है?

देशभर में ज्यादातर सियासी दल मुस्लिम पर्सनल लॉ के मुद्दे पर भले ही चुप हों, बार-बार आवाज उठाने के बाद एक बार फिर मुस्लिम महिलाओं ने ही भेदभाव के खिलाफ आवाज बुलंद की है। देशभर की मुस्लिम महिलाओं की नुमाइंदगी करने वाले संगठन भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन ने फिर से मुस्लिम पर्सनल लॉ में सुधार की जरूरत बताई है। इस बार भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन ने इस संबंध में प्रधानमंत्री को चिट्ठी लिखी है। इस संस्था के 13 राज्यों में करीब 70 हजार सदस्य हैं। पीएम मोदी को लिखी चिट्ठी में कहा गया है।  

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