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देश के सरकारी स्कूलों में 5 साल में 882 आदिवासी बच्चों की मौत का जिम्मेदार कौन ?

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नई दिल्ली : क्या सचमुच देश में व्यवस्था को चलाने वाले सत्ता मिलने के बाद व्यवस्था से ही बेखबर हो जाते हैं। आजादी के इतने साल बाद भी स्कूलों में भेदभाव और छुआ-छूत जैसी मानसिकता को हम अभी ख़त्म नहीं कर पाए हैं। अख़बार ‘इकॉनोमिक टाइम्स के अनुसार उसे 10 राज्यों से आरटीआई के जरिये मिली जानकारी के अनुसार साल 2010 से लेकर साल 2015 के बीच 882 आदिवासी बच्चों की स्कूलों में मौत क्यों हो गई इसका जवाब सरकार के पास भी नही है।  
बताया जा रहा है कि मौत की ज्यादातर घटनाओं में बच्चों का यौन उत्पीडन किया गया। ये मामले सबसे ज्यादा केंद्र सरकार की और से बनाए गए रेजिडेंशियल स्कूलों में हुए हैं। इस सूची में सबसे आगे महाराष्ट्र है जहाँ 684 बच्चों की मौत हुई जबकि ओडिशा में 155, गुजरात में 30, आन्ध्र प्रदेश में 13 की मृत्यु हुई है। रिपोर्ट के मुताबिक़ ऐसे ज्यादातर मामले में अभिभावकों को मुवावजा तक नही मिलता है। 
आदिवासी मामलों में केंद्र सरकार के मंत्री जुआल ओराम का कहना है कि केंद्र सरकार के पास आदिवासी बच्चों मौत पर निगरानी रखने का कोई तरीका नही है। हम सिर्फ रेसिडेंशियल स्कूल बनाने के लिए फंड देते हैं लेकिन  इसका प्रबंधन राज्यों के हाथ में है।  
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