रोम में शादियों के दौरान होता है किस तरह का डांस देख कर आप रोमांचित हो उठेंगे… देखें वीडियो!

दुनिया में कलाकारों की कमी नहीं है। हर किसी के अन्दर कोई ना कोई हुनर जरूर होता है। कई बार तो लोगों को खुद भी पता नहीं होता है कि वह किसी एक काम में बहुत ज्यादा माहिर हैं। जो लोग जानते हैं कि उनमें कौन सा हुनर है, वह समय-समय पर अपना हुनर दिखाते रहते हैं। अपने हुनर की वजह से ही वह लोगों के बीच खासे लोकप्रिय भी रहते हैं। जिसे देखो उसके बारे में ही बात करता रहता है।

प्राचीन काल से है डांस लोकप्रिय:

आप तो जानते ही हैं कि आजकल के लोगों को डांस खूब पसंद है। हालांकि डांस कोई नई चीज नहीं है। यह प्राचीन काल से ही लोगों के मनोरंजन का साधन रहा है। पहले के समय में बड़े-बड़े राजा-महाराजा अपना और अपने मंत्रियों का मनोरंजन करने के लिए नर्तकियों को रखा करते थे। आज भी डांस का वैसा ही क्रेज बना हुआ है। भारत में ही नहीं शादियों के समय विदेशों में भी डांस किया जाता है और वहां भी डांसर के ऊपर जमकर पैसे उड़ाए जाते हैं। यकीन नहीं आता है तो खुद ही देख लीजिये।

डांस देखने वालों के उड़े होश:

अभी हाल ही में यू-ट्यूब पर डांस का एक ऐसा वीडियो देखा गया है, जो लोगों को दीवाना बना रहा है। इस डांस वीडियो में लड़की के डांस को देखने के बाद कोई भी हैरान हुए बिना नहीं रह सकता है। दरअसल इस डांस वीडियो में लड़की ने इतना जबरदस्त हॉट डांस किया है और साथ ही ऐसे कमर हिलाई है, जिसे देखने के बाद लोगों के होश उड़े हुए हैं।

डांस से प्रभावित होकर उड़ाए पैसे:

आप भी वीडियो में देख सकते हैं कि किसी फंक्शन के दौरान कुछ लोग डांस कर रहे हैं। वहीँ एक महिला गजब का डांस कर रही है। उसके डांस को देखकर सभी डांस करना बंद कर उसी के डांस को देखने लगते हैं। हालांकि कुछ लोग तब भी डांस करते हैं और उसे हराने की कोशिश करते हैं। लेकिन कोई भी उसे हारने में कामयाब नहीं होता है। एक महिला उसके डांस से इतना प्रभावित होती है कि वह उसके ऊपर पैसे भी उड़ाती है।

अगले पेज पर देखें वीडियो-

शराब के नशे में झूम कर नाची महिला, डांस देखकर उड़ गए सबके होश… देखें वीडियो!

भारत में शादी-विवाह या कोई कार्यक्रम हो और डांस ना हो ऐसा शायद ही होता है। भारत में शादियों के समय डांस का बड़ा महत्व है। दूल्हे के परिवार से लेकर दुल्हन के परिवार तक सभी डांस करते हैं। शादियों के समय हर कोई खुलकर डांस करना चाहता है। यही वजह है कि कुछ लोग खुलकर डांस करने के लिए शराब का भी सहारा लेते हैं। आपने अक्सर शराब के नशे में झूमते हुए लड़कों को देखा होगा, लेकिन शायद ही आपने किसी कार्यक्रम के दौरान किसी महिला को शराब के नशे में झूमता हुआ देखा होगा।

शादी के समय नहीं पीती हैं महिलाएं:

क्योंकि हमारे यहां महिलाओं का शराब पीना आम बात नहीं है। उनपर कई तरह के सामाजिक प्रतिबन्ध होते हैं, इसलिए महिलाएं ऐसे मौकों पर सबके सामने पीने से बचती हैं। शादी के समय सबके सामने महिलाएं शराब पीकर डांस नहीं करती हैं, लेकिन आज हम आपको एक ऐसी महिला का डांस दिखाने जा रहे हैं, जिसने शराब के नशे में ऐसा झूमकर डांस किया कि देखने वालों के होश उड़ गए।

हो रही थी पैसे की बारिश:

दरअसल एक कार्यक्रम के दौरान दो महिलाएं शराब हाथ में लेकर नशे में डांस कर रही थीं। उनके सामने कई लोग कुर्सी लगाकर उनका डांस देख रहे थे। महिला केवल शराब लेकर डांस ही नहीं कर रही थी बल्कि बीच-बीच में शराब पी भी रही थी। महिला के डांस से प्रभावित होकर कुछ लोग उसपर पैसे की बारिश भी कर रहे थे।

बोतल में शराब नहीं बल्कि है कोल्डड्रिंक:

आप वीडियो में देख सकते हैं कि दो महिलाएं हाथ में शराब की बोतल लेकर शराबियों की तरह डांस कर रही हैं। केवल यही नहीं वह शराबियों की तरह जमीन पर भी गिर जा रही हैं। उनको डांस करता हुआ देख हर कोई यही सोचेगा कि महिलाओं ने सच में शराब पी हो। लेकिन आपको बता दें कि महिलाएं बोतल में कोल्डड्रिंक पी रही हैं। वह केवल शराब पीकर डांस करने का अभिनय कर रही हैं।

अगले पेज पर वीडियो देखें-

शहीद हुए तो अकेले भगत ही हीरो क्यों ? सिर्फ इसलिए कि वो जेल में लेनिन को पढते थे ।

भगत के मिट्टी की खुशबू हम सबके जेहन में रच-बस चुकी है, तुम्हारे षड्यंत्र अब सफल नहीं होंगे….

ब्लॉग : शिवेश प्रताप ( यूनाइटेड हिन्दी डॉट कॉम ) :- ॥ कड़वा सच ॥

जब भगत सिंह के साथ राजगुरु और सुखदेव भी बराबर शहीद हुए तो अकेले भगत ही हीरो क्यों ? सिर्फ इसलिए कि वो जेल में लेनिन को पढते थे ।

दरअसल “केवल भगत सिंह” का ही महिमामण्डन करना दूषित राष्ट्र वाद और वामपंथी मुस्लिम विचारधारा पर खडे सामाजिक विज्ञान को सह देना है ।

आजादी के पहले से ही मुसलमान बिकाऊ रहे और अंग्रेजी हुकूमत की चाटुकारिता में रहे । आजादी के बाद इस्लाम पोषित वामपंथी दरअसल हिंदुओं के राष्ट्रवादी विचारों के तोड़ के रूप में एक सिख भगत सिंह को हीरो के रूप में ज्यादा हाईलाइट कर एक तीर से कई निसाने साधते रहे । जिसमें सिखों को वामपंथ की ओर मोड़ देश को तोड़ा जाए भी एक कारण है । दूसरा कि क्रांति नायक के रूप में भगत को खडा कर चंद्रशेखर आजाद के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के स्वरूप को भी मंद किया जाए । दरअसल वामपंथियों को चंद्रशेखर के जनेऊ से हमेशा समस्या रही ।

भगत सिंह के बलिदान का मैं बहुत सम्मान करता हूँ पर “केवल भगत सिंह” के अतिशय महिमा मंडन के खिलाफ हूँ । सुखदेव और राजगुरु का बलिदान भगत से रत्ती भर कम नहीं है ।

और यदि बलिदान की बात है तो फिर यह देश सबसे कम उम्र में फांसी पर चढे खुदीराम बोस को सिर्फ इसलिए भूल जाता है कि वो हिंदू थे ???

कृपया वामपंथी कुचक्र से बाहर निकल कर तीनों वीर बलिदानियों को बराबर सम्मान देकर नोटों पर छापने की बात करें । अकेले भगत क्यों ?

कश्मीर के लिए पांच ट्रेन बिहार से चला दीजिये तो सारी धारायें सही से काम करेगी !!

ब्लॉग : आनंद कुमार ( यूनाइटेड हिन्दी डॉट कॉम ) :- कई बार जो बातें हम आपस में करते हैं वो अनजान लोगों के बीच नहीं करते। सोशल मीडिया पर पोस्ट करने से परहेज भी रखते हैं। बिहारियों की हालत ऐसी होती है कि हम अक्सर चुटकुले किसी संता-बंता, पप्पू-टीपू, या फजलु-अफ़जल पर भी नहीं सुनाते। हमारे चुटकुले भी हमपर ही होते हैं। जैसे अगर पूछा जाए की कश्मीर के आतंकवाद की समस्या का आसान इलाज क्या है ? तो जवाब होता है वहां के लिए बिहार से कुछ डायरेक्ट ट्रेन चलवा दो ! 

कश्मीर के लिए पांच ट्रेन चला दीजिये बिहार से तो वो भी सुधर जायेगा।

गौर कीजिये तो ये दिख भी जाएगा। सत्तर के दशक में कभी बंगाल राजनैतिक हत्याओं से पीड़ित हुआ करता था। बिहारी जाकर उसी दौर में वहां नौकरी करने लगे और धीरे धीरे मार काट ख़त्म। पूर्वोत्तर कई उल्फा जैसी उग्रवादी-आतंकी विचारधाराओं से ग्रस्त था। बिहारी वहां बसने लगे, वो भी ठीक हो चला। पंजाब आतंकवाद से ग्रस्त हुआ, बिहारी मजदूर वहां के खेतों में जाने लगे तो वो भी ठीक। दक्षिण में एल.टी.टी.इ. थी, बिहारी आज वहां होते हैं तो एल.टी.टी.ई. नहीं रही।

कश्मीर के लिए पांच ट्रेन चला दीजिये बिहार से तो वो भी सुधर जायेगा।

ये मेरा ही चुटकुला है या बेबसी पर मुस्कान वो तय करना जरा मुश्किल है। अकेले मुंबई में करीब 50 लाख बिहारी होते हैं। सभी मेट्रो और बड़ी जगहों को मिलायेंगे तो बिहार के तीन करोड़ से ऊपर लोग वहीँ प्रवासी के तौर पर मिल जायेंगे। जैसी की आम धारणा है वैसे बिहार कृषि प्रधान भी नहीं होता। बिहार की आबादी का 55-60% हिस्सा नौकरीपेशा है, काम करने वालों की लगभग 30-35 प्रतिशत की आबादी ही कृषि पर निर्भर है। ये तब है जब करीब 12% आबादी ही शहरी है, बाकी सब बिहार में ग्रामीण ही होते हैं। हिमांचल के पहाड़ी इलाकों के बाद ये सबसे कम शहरी आबादी वाला इलाका है। 80 प्रतिशत ग्रामीण आबादी और 35% कृषक, बाकी कहाँ नौकरी करते होंगे अंदाजा करना मुश्किल नहीं।

यानि जिस सर्विस इंडस्ट्री और नॉलेज प्रोसेस आउटसोर्सिंग की यदा कदा, बड़ी बैठकों में चर्चा होती है उसके लिए बिहार में श्रम शक्ति उपलब्ध थी। हाँ, उसकी इंडस्ट्री कभी यहाँ नहीं आई, ये और बात है। अब कई स्वनामधन्य बुद्धिजीवी बताएँगे कि देखो इस से बाहर से पैसा बिहार आ रहा है और उस से बहार आएगी। लेकिन समस्या ये है कि इन कामगारों के बच्चों की शिक्षा के लिए बिहार में कोई व्यवस्था नहीं। परीक्षाएं समय पर नहीं होती इसलिए आप तीन साल में ग्रेजुएशन नहीं कर सकते तो बाहर पढ़ना मजबूरी है। इस तरह आया हुआ पैसा वापिस दिल्ली, कोटा, बंगलौर, भोपाल चला जाता है।

ये चीज़ें आसानी से कल के कार्यक्रम में मंच पर भी दिख गई होंगी। सिर्फ पटना शहर का ही इतिहास 2000 साल से ज्यादा का निकल आएगा। किस्मत से जब मंच पर से इसी शहर में “बिहार दिवस” के सांस्कृतिक कार्यक्रम चल रहे थे तो बिहार के कितने कलाकार दिखे ? हजारों साल का सांस्कृतिक इतिहास कहाँ गया ? मंच से नितीश बाबू को ये क्यों कहना पड़ता है कि बिहारियों के काम ना करने से दिल्ली बंद हो जायेगी, ये क्यों नहीं पूछते कि बिहारियों को दिल्ली जाकर नौकरी क्यों करनी पड़ती है ?

आपके भाषण में मेरी रूचि नहीं सुशासन बाबु। मुझे उस कॉइन कलेक्टर को देखना था जो इतिहास सचमुच संजो के रख रहा था और आपकी अकर्मण्यता के वजह से हाल में ही डूब गया। मुझे उन किसानों को देखना था जिनके प्रति हेक्टेयर धान और आलू की उपज को तो अपनी पीठ थपथपाने के लिए आप अपने प्रकाशनों में छापते है, लेकिन मंच पर बुला कर उन्हें सम्मानित करने में शायद आपके जातीय-सियासी आंकड़े गड़बड़ाने लगते हैं। मुझे उस लड़के को भी देखना था जो बिना लोभ लालच लोगों को किताब खरीदने के लिए प्रेरित करता, अनजान लोगों को पोस्टकार्ड लिख रहा होता है। मुझे उसे भी देखना था जो बच्चों को नशा मुक्त कर के शिक्षित करने का प्रयास आपके गांधी मैदान वाले मंच से थोड़ी ही दूर पर हर रोज़ करता है।

बाकी ये अनपढ़ जाहिलों को भी मंच पर से उतारिये जनाब। इनकी तस्वीर छपने पर जैसा बिहार दिखता है, वो तो बिलकुल भी मेरा चेहरा नहीं।

एक हिंदू की हत्या के बदले 10 की हत्‍या करवाएंगे- वायरल हुआ योगी आदित्‍य नाथ का यह वीडियो

लखनऊ के हजरतंगज थाने का औचक निरीक्षण करते यूपी सीएम योगी आदित्‍य नाथ। (Source: PTI)

उत्‍तर प्रदेश के नए मुख्‍यमंत्री भगवाधारी महंत योगी आदित्‍य नाथ अपनी हिंदूवादी छवी की वजह से कई बार विवादों में रहे हैं। अब उत्‍तर प्रदेश मुख्यमंत्री पद के लिए भारतीय जनता पार्टी द्वारा चुना कई लोगों के गले नहीं उतर रहा। इसके पीछे थे उनके पुराने हिन्दू सुरक्षा को लेकर दिये गये कई बयान, जो एक समुदाय विशेष के कुछ असामाजिक लोगों के प्रति नफरत में डूबे हुए थे। जब भगवाधारी महंत योगी आदित्‍य नाथ मुख्यमंत्री बने तो ऐसे पुराने भाषण फिर से इन्टरनेट पर शेयर होने लगे है। ऐसा ही एक वीडियो यूट्यूब पर मुख्यमंत्री योगी के शपथ-ग्रहण के ठीक एक दिन बाद (20 मार्च, 2017) को अपलोड किया गया है, जिसमें मुख्यमंत्री योगी कहते दिख रहे हैं कि ”अगर एक निर्दोष हिंदू का खून बहेगा तो एक हिंदू के खून के बदले, आने वाले समय में हम प्रशासन से एफआईआर दर्ज नहीं करवाएंगे बल्कि कम से कम 10 ऐसे लोगों की हत्‍या उससे करवाएंगे जो उस हिंदू की हत्‍या में शामिल होंगे।”

यूट्यूब पर मात्र तीन दिन में इस वीडियो को 33 लाख से ज्‍यादा लोग देख चुके हैं। इसमें मुख्यमंत्री योगी के पुराने भाषण दिखाए गए हैं। आजमगढ़ में एक सभा में वह कहते दिखते हैं, ”वंदेमातरम का गायन नहीं कर सकते, भारत माता की जय नहीं कह सकते। भारत की धरती पर रहेंगे, भारत का अन्‍न खाएंगे, भारत में सारे कर्म-कुकर्म करेंगे और उसके बाद कहेंगे कि भारत माता की जय नहीं कहेंगे। इतना दुस्‍साहस आया कैसे। इस आजमगढ़ के अंदर कोई भारत माता की जय बोलने से मना नहीं कर सकता। अगर पूर्वी यूपी के अंदर किसी भी संस्‍थान में किसी ने ‘भारत माता की जय’ और वंदेमातरम पर प्रतिबंध लगाया तो बाबरी ढांचे की तरह उस संस्‍थान की इमारत ढहा दी जाएगी।”

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बीएसएफ जवान तेज बहादुर यादव की मौत की खबर का सच आया सामने….

तेज बहादुर यादव पूरी तरह स्वस्थ हैं, मौत की खबरें पाकिस्तानियों का एजेंडा : बीएसएफ

नई दिल्ली (यूनाइटेड हिन्दी डॉट कॉम): कुछ महीने पहले भारतीय सीमा पर तैनात बीएसएफ के एक जवान ने खाने की गुणवत्ता पर सवाल उठाया और facebook पर एक वीडियो शेयर करके कहा कि बीएसएफ में जवानों को अच्छा खाना नहीं दिया जाता है ! बीएसएफ ने तत्काल उसपर जांच बिठाई और आरोपों को नकार दिया। लेकिन अब यह बात सामने आ रही है कि पाकिस्तान में सोशल मीडिया पर यह बताया जा रहा है कि भारत में यह शिकायत करने वाले जवान की मौत हो चुकी है। वहीं, बीएसएफ ने सोशल मीडिया पर जवान तेज बहादुर यादव की मौत की तस्वीरों को पूरे तौर पर सिरे से खारिज कर दिया है। बीएसएफ ने कहा है कि तेज बहादुर यादव पूरी तरह स्वस्थ हैं। दरअसल सोशल मीडिया पर घूम रही कुछ तस्वीरों में बीएसएफ में खान-पान की शिकायत करने वाले जवान तेज बहादुर की मौत की झूठी खबर प्रचारित की जा रही है। इन तस्वीरों में तेजबहादुर को चोटें लगी हुईं भी नज़र आ रही हैं।

pakistani tweet on tej bahadur

पाकिस्तान में सोशल मीडिया पर बीएसएफ जवान तेज बहादुर को लेकर चल रहा ट्वीट…

बीएसएफ का कहना कि ज़ाहिर है यह तस्वीरें फ़र्ज़ी प्रोपेगेंडा का हिस्सा हैं। पड़ताल में यह पता चला है कि यह प्रोपेगेंडा सीमापार से संचालित हो रहा है। इन तस्वीरों को प्रमुखता से ट्वीट करने वाले लोगों के सोशल मीडिया अकाउंट्स इसकी तस्दीक करते हैं कि वे पाकिस्तान के हैं।

यूनाइटेड हिन्दी डॉट कॉम ने इसी वायरल खबर की जाँच पड़ताल की तो पता चला की तेजबहादुर यादव के मौत की जो तस्वीर चलाई जा रही है वो सुकमा में मारे गए 12 जवानों में से किसी एक जवान की है ।

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तेजबहादुर के मौत की जो तस्वीरें इस फेसबुक में दिखाई जा रही है वो किसी और जवान की है। तेजबहादुर यादव के मौत की जो तस्वीर चलाई जा रही है वो 11 मार्च को सुकमा में मारे गए 12 जवानों में से किसी एक जवान की है।

टीम ने इस बारे में तेजबहादुर यादव की पत्नी से भी बात की है। उन्होंने ने भी तेजबहादुर के मौत की खबर को झूठी खबर कहा और यह बताया कि तेजबहादुर पूरी तरह स्वस्थ हैं।

साथ ही बीएसएफ का भी कहना कि जाहिर है यह तस्वीरें फर्जी प्रोपेगेंडा का हिस्सा हैं। जांच में यह पता चला है कि यह प्रोपेगेंडा सीमापार से संचालित हो रहा है।

कम्युनिस्ट खेमे के इन इतिहासकारों ने भगत सिंह की इस तरह से की निर्मम हत्या…

भगत के मिट्टी की खुशबू हम सबके जेहन में रच-बस चुकी है, तुम्हारे षड्यंत्र अब सफल नहीं होंगे….

ब्लॉग : ( अभिजीत सिंह, यूनाइटेड हिन्दी डॉट कॉम ) :- 1931, फरवरी-मार्च का महीना, सेन्ट्रल जेल, लाहौर के 14 नम्बर वार्ड में फाँसी की प्रतीक्षा कर रहे बंदियों में से एक ने अपनी माँ को एक पत्र लिखा। माँ ने बेटे का पत्र खोला तो उसमें लिखा था, माँ, मार्च की 23 तारीख को तेरे बेटे की शादी है, आशीर्वाद देने जरूर आना। माँ सोचने लगी जेल में तो लडकियाँ होती नहीं तो फिर ये पगला किससे प्यार कर बैठा, कहीं किसी जेलर की बेटी पर तो मेरे बेटे का दिल नहीं आ गया ? माँ से पूछे बिना बेटा शादी कर लेगा इस आशंका से पीड़ित माँ ने तस्दीक करने के लिये अपने छोटे भाई को भेजा, जा जरा देख के आ कि ये किस कुड़ी को दिल दे बैठा है। कैदी ने मिलने आने वाले को एक कागज पर कुछ लिख कर दिया और कहा, इसे माँ को दे देना और ध्यान रहे इसे और कोई न खोले। माँ ने बेटे का पत्र खोला तो लिखा था, मेरी होने वाले दुल्हन का नाम है “मौत”।

मौत को माशूका बना लेने वाले इस शख्स का नाम था भगत सिंह। ये वो नाम है जिसके सामने आते ही देशप्रेम और बलिदान मूर्त हो उठता है। भगत वो नाम है जिसकी राह रूप, यौवन और सौन्दर्य नहीं रोक सकी, भगत वो नाम है जिसने एक अत्यंत धनी परिवार से आये विवाह प्रस्ताव को ये कहते हुए ठुकरा दिया था कि मेरा विवाह तो अपने ध्येय के साथ हो चुका है अब दुबारा विवाह क्या करना, भगत वो नाम भी है जिसके लिये उसकी अपनी धार्मिक परंपरा के अनुपालन से अधिक महत्व भारत की आजादी का था। वो चाहता तो फांसी की सजा से बच सकता था पर उसने इसके लिये कोई कोशिश नहीं की, इसलिये नहीं की क्योंकि उसे पता था कि अपना बलिदान देकर वो तो सो जायेगा पर सारा भारत जाग उठेगा और फिरंगी हूकूमत की जड़ उखड़ जायेगी।

जिस हुतात्मा का सिर्फ जिक्र भर आज उसके बलिदान के 86 साल बाद भी युवकों में जोश भर देता है, तो जाहिर है कि वो लोग जिनकी विचारधारा का अवसान हो चुका है वो अगर भगत को अपने खेमे का साबित कर दें तो शायद उनकी मृत विचारधारा कुछ अवधि के लिये जी उठे। इसी सोच को लेकर कम्युनिस्टों ने बड़ी बेशर्मी से भगत सिंह के बलिदान का अपहरण कर लिया। विपिन चन्द्र, सुमित सरकार, इरफान हबीब, रोमिला थापर जैसे वाम-परस्त इतिहासकारों ने सैकड़ों लीटर स्याही ये साबित करने में उड़ेल दी थी कि भगत सिंह तो कम्युनिस्ट थे। भगत के “मैं नास्तिक क्यों हूँ” वाले लेख को बिना किसी आधार का ये लोग ले उड़े और उसे लेनिन के उस कथन से जोड़ दिया जिसमें उसने कहा था कि ‘नास्तिकता के बिना मार्क्सवाद की कल्पना संभव नहीं है और नास्तिकता मार्क्सवाद के बिना अपूर्ण तथा अस्थिर है’।

यानि इनके अनुसार भगत सिंह मनसा, वाचा, कर्मणा एक प्रखर मार्क्सवादी थे। भगत सिंह के प्रति ममत्व जगने के वजह ये भी है कि जिस लेनिन, स्टालिन, माओ-चाओ, पोल पोट वगैरह को वो यूथ-आइकॉन बना कर बेचते रहे थे उनके काले कारनामे और उनके नीतियों की विफलता दुनिया के सामने आने लगी थी और स्वभाव से राष्ट्रप्रेमी भारतीय युवा मानस के बीच उनको मार्क्सवादी आइकॉन के रूप में बेचना संभव नहीं रख गया था इसलिए इन्होने भगत सिंह को कम्युनिस्ट बना कर हाईजैक कर लिया।

इसलिये किसी व्यक्ति के मृत्यु के उपरांत उसकी विचारधारा को लेकर जलील करने का सबसे अधिक काम अगर किसी ने किया है तो वो यही लोग हैं जिन्होनें भगत सिंह जैसे हुतात्मा को कम्युनिस्ट घोषित करने का पाप किया। ऐसे में इस बात की तहकीक भी आवश्यक हो जाती है कि क्या कम्युनिस्टों के मन में हमेशा से भगत सिंह के प्रति आदर था या अपने राजनीतिक फायदे और अस्तित्व रक्षण के लिए उन्होंने उगला हुआ थूक निगल लिया ? भगत सिंह के प्रति कम्युनिस्ट आदर जानने के आवश्यक है कुछ कम्युनिस्टों की किताबों को पढ़ा जाए और भगत सिंह के संबंध में कुछ कम्युनिस्ट नेताओं की स्वीकारोक्तियों को सुना जाए।

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हिन्दुओं के रक्त में सेक्युलर नामक वायरस घुस गया है, इसलिए हिन्दू रामनवमी कैसे मनाएंगे ?

बहिष्कृत सिंधी शिया मुस्लिम साईं बाबा ने दिखाया था जो इसे भगवान् ही मान लिया ?

ब्लॉग : ( वैष्णवी कुमारी, यूनाइटेड हिन्दी डॉट कॉम ) :- अजमेर में स्थित सूफ़ी संत हजरत मोईनुद्दीन चिस्ती की दरगाह को कोई मुसलमान अल्लाह मानकर नहीं पूजता, बल्कि अल्लाह का बंदा मानकर ही पूजते है।

सतयुग में ऋषि विश्वामित्र ने तो अपने योग बल से एक नकली स्वर्ग ही बना दिया था। इतना सामर्थ्य होने के बाद भी उन्हें केवल एक बहुत बड़ा योगी ही माना जाता है, भगवान् नहीं! अगस्त्य मुनि ने पूरे खारे सागर को ही पी लिया था (कुम्भोदार अगस्त्य मुनि) लेकिन इतना महान चमत्कार दिखाने के बाद भी अगस्त्य को ईश्वर या ब्रह्म नहीं माना गया!

प्रश्न ये है कि इनमें से कौनसा चमत्कार इस बहिष्कृत सिंधी शिया मुस्लिम साईं बाबा ने दिखाया था जो इसे भगवान् ही मान लिया ? अगर चमत्कार दिखाया भी होता तो इसे केवल एक महान योगी और ईश्वर भक्त ही माना जा सकता था, ईश्वर तो स्वप्न में भी नहीं ?

अब अगर वेदों में प्रतिपादित भगवान् विष्णु हमारी लौकिक और तुच्छ मनोकामनाओं को फटाफट पूर्ण न कर सकें तो कोई बात नहीं; हम हिन्दू सौदेबाज लम्पट हैं। हमारे भगवान् वही है जो हमारी इच्छाओं को पूर्ण करे। फिर चाहे हमें पाकिस्तान के सिंध प्रांत से आये मानसिक बीमार मुस्लिम चाँद मियाँ उर्फ साई को ही क्यों न पूजना हो; जिसे उसकी बिरादरी वालों ने इसलिए निकाल दिया था कि वो ‘अनलहक अनलहक'(मैं अल्लाह हूँ, मैं अल्लाह हूँ) बकता रहता था। वही चाँद मियाँ महाराष्ट्र के शिरडी प्रान्त में मस्जिद में जैसे तैसे जीवन काटता था छोटे मोटे चमत्कार पाखंड दिखाकर। विचित्र है कि जो बात उसकी कौम वालों ने नहीं मानी वो आज के सेक्युलर हिन्दू मूर्ख तुरंत मान गए (कि वो भगवान् है)।

वैसे भी आज के वर्तमान हिन्दू समाज में किसी भी तरह की कोई लाज/शर्म तो है ही नहीं ! क्योंकि वैसे भी हज़ारों सालों से गुलामी के आदि हो चुके हैं। अब आज के सेक्युलर हिन्दू के पास स्वाभिमान नाम जैसा कुछ बचा नहीं है; सो हम इस कौम से बेदखल किये हुए साई बाबा को अपने नए भगवान् के रूप में पूजें। और हाँ इस मुस्लिम, अवैदिक, अपौरानिक साई बाबा को पूजने के बाद भी हम हिन्दू धर्मावलंबी ही कहलायेंगे और हिंदुओं के माथे पर काला दाग लगाएंगे!

अब और क्या बचा है? राम नवमी को हम अयोध्या या फिर राम मंदिर नहीं जाएंगे बल्कि नवविकसित तीरथ शिरडी जायेंगे और राम की जगह इस शिया मुस्लिम साई को साई ॐ साई राम (अर्थात माता जानकी के पति) कहकर पूजेंगे। हम हिन्दु इस ‘निष्कासित सिन्धी मुस्लिम साईबाबा’ को तो अब ‘भगवान् राम जो कि सनातन परब्रह्म है’ – उनके रूप में पूज रहे हैं न!

पाकिस्तान में बचे 1.8% हिंदूओ को 70 साल बाद मैरिज एक्ट का झुनझुना थमाया गया

ताकि उनको White Tiger की तरह संरक्षण कर, पाकिस्तान में पर्यटन को बढ़ावा दिया जा सके!

ब्लॉग : ( संजय कुमार, यूनाइटेड हिन्दी डॉट कॉम ) :- 1947 में गांधी के कुकर्मों से जन्मे पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान में बचे 1.8% हिंदूओ को 70 साल बाद मैरिज एक्ट का झुनझुना थमाया गया ताकि उनको White Tiger की तरह संरक्षण कर, पाकिस्तान में पर्यटन को बढ़ावा दिया जा सके और यह दुनिया को दिखाया जा सके कि ये बचे पाकिस्तानी हिंदू उस उन्नत आर्य संस्कृति और सभ्यता की देन है जिनके पुर्वज श्रीराम, लव-कुश, श्रीकृष्ण, अर्जुन, बुद्ध हुआ करते थे। जिस सभ्यता-संस्कृति​ से मोहनजोदड़ो​ जैसी उन्नत शहर – सभ्यता निकली थी। जिसके खुदाई से इसी हिंदूओ के धर्मिक प्रतीक “स्वास्तिक” और पशुपति की मुर्तियां मिली है।

उसी तरह एक बंग्लादेश है जहां आज से 70 साल पहले 30% हिंदू हुआ करते थे जो अब सिर्फ 8-9% बचे है। यहां भी ये विलुप्त होने वाले है। फिर जब 2% बच जायेंगे तो यहां भी White Tiger बचाओ की तरह अभियान चलाया जायेगा ताकि शांति दुतो के देश में इनको पिजड़े में बंद कर, पर्यटन को बढ़ावा दिया जा सके।

इसी आर्य संस्कृति का विश्व में एक बहुसंख्य राष्ट्र भारत भी अभी बचा है जहां की पिढ़ी अपने मुल से कटकर, अपनी सभ्यता, संस्कृति और स्वतंत्रा को बचाये रखने के लिए संघर्ष करती दिख रही है क्योंकि इस भारत को सेकुलर बनने का एक ऐसा भयंकर रोग लग चुका है जिससे इसके पुर्वी​ (बंगाल) और दक्षिण (केरल) क्षेत्र भयंकर पिड़ित हो, अपने मरणासन्न की अवस्था में अपने उधार के लिए किसी नायक की आश में है। वैसे इनको एक और रोग है। कभी के कर्मयोग के सिद्धांत को जाति मे बदल। वह हर बात में अपनी-२ जाति खोजते हैं जिससे इनकी एकता भंग होती है और कमजोर साबित होते है।

एक उन्नत सभ्यता और संस्कृति का ऐसा भी हष्र हो सकता है क्योंकि वह पश्चिम से आये विघटनकारी विचारों के बहकावे और अत्याचार से अपनी ज्ञान, विज्ञान, प्राकृति, शुरवीरता को भुल, हीन भावना की शिकार होती गयी है।

लेकिन आज 21वी सदी की युवा पिढ़ी जागरूक हो रही है वह क्षणिक स्वार्थों का त्याग कर, एकताबद्ध हो रही है जो एक सुखद संदेश है।

जागते रहो जगाते रहो!

इस्लाम मजहब से जुड़ जाते ही एक दो पीढ़ियों के व्यक्ति की सोच में ही कैसा फर्क पड़ता है ?

लेकिन यही हिन्दू जब मुसलमान बन गए तो ५:४८ या १३:३१ में कही यही बात को पूर्ण और अंतिम सत्य तो मानते ही हैं।

ब्लॉग: ( केशर देवी, एडिटर – यूनाइटेड हिन्दी डॉट कॉम ) अगर कोई कृष्णभक्त कहे कि कृष्ण ने कहा है कि मैं चाहता तो हर किसी को मेरा भक्त ही पैदा करता लेकिन तुम्हारी परीक्षा लेने के लिए अलग अलग बनाए हैं। जो मुझे नहीं मानेंगे उनपर विपदाओं के पहाड़ टूटेंगे ये मेरा वादा रहा। पता नहीं कितने हिन्दू उसकी सुनते और पता नहीं कितने हिन्दू उसे क्या क्या सुनाते। इतना तो अवश्य सुनाते कि ये तेरा कृष्ण कैसा भगवान है रे, जो दुनिया में लोगों के बीच अपने को ही भगवान मानने के लिए खूनखराबा करवा रहा है ? खुद ही सब को अपना भक्त बनाकर न भेजता ? जो मारे जा रहे हैं उनके घरवालों की हाय का भागी कौन ?

लेकिन यही हिन्दू जब मुसलमान बन गए तो कुरान की आयात ५:४८ या १३:३१ में कही यही बात को पूर्ण और अंतिम सत्य तो मानते ही हैं और उसे सत्य कराने के लिए हथियार भी उठाते हैं और खुद से हथियार न उठे तो जो उठाये उनके लिए अपना धन लुटा रहे हैं क्योंकि वे कुरान आयात ९:३५ से ९:४० को भी इतना ही अंतिम सत्य मानते हैं।

कैसा फर्क पड़ता है व्यक्ति के सोच में, एक दो पीढ़ियों में ही ? कितनी प्रोग्रामिंग होती होगी दिमाग की जो तर्क और तथ्य से चलना छोड़ देता है आदमी ?

यहाँ वो बंदरों वाले प्रयोग का किस्सा याद आता है जहाँ उंचाई पर टंगे केले के घड को एक भी बन्दर के छूते ही सब पर जोर से पानी की धार मारी जाती थी। इसके चलते सब के दिमागों में ये बात प्रोग्राम हो गई कि केले के घड को छूना नहीं है। यहाँ तक कि जब धार मारना बंद हो गया तब भी वे सब न खुद छूते थे न किसी दूसरे बन्दर को छूने देते थे, उस पर हमला कर देते थे। एक एक करके सब बन्दर बदल दिए गए, लेकिन सब में यही भाव बना रहा, कोई भी बन्दर दूसरे बन्दर को केले के घड को छूने से रोकता ही था।

देखने लायक बात यह थी कि बाकी बातों में बन्दर नार्मल थे, बस वो ऊपर टंगे केले के घड़े के बारे में सोचने से भी खुद को ही रोक रहे थे।

कुछ ऐसी ही बात हिन्दू के सेक्युलर हो जाने से होती है जो वो भी ऐसी बातों पर सवाल उठाने से डरता है। हाँ, वेद, पुराण, उपनिषदादि पर आलोचना करते वक्त उसको कोई रोक नहीं सकता, खुद का घोर अज्ञान भी नहीं।

डार्विन बाबा बन्दर को मानव का पूर्वज मानते थे आप को पता ही होगा! और हाँ, मदारियों का धर्म या मजहब क्या होता है यह भी देखिये कभी नाम पूछकर ?

कुछ कहेंगे ? सहमत हैं तो शेयर या कोपी पेस्ट का अनुरोध तो है ही ….