वाशिंगटन पोस्ट ने शलभ कुमार पर छापी ‘गलत’ खबर, भारतीय-अमेरिकी खफा

वाशिंगटन पोस्ट ने भारतीय अमेरिकी बिजनेस मैन शलभ कुमार को लेकर एक खबर छापी थी। जिसमें बताया गया था कि वह ट्रंप के खासमखास हैं और हिंदूवादी विचारधारा को लगातार बढ़ाने की जुगत में लगे हुए हैं। ऐसे में ट्रंप से उनकी नजदीकी को मोदी सरकार भी भुनाने की कोशिश में है और उन्हें अमेरिका का एंबेसडर बनाया जा सकता है। वाशिंगटन पोस्ट की इस लेख में शलभ कुमार को लेकर कई तथ्यों को शामिल किया गया है और बताया गया है कि वह हिंदुओं को लेकर अपना दृष्टिकोण स्पष्ट तौर पर पेश करते हैं और इसी का प्रभाव है कि वह ट्रंप के चहेते लोगों में से हैं। इसी वजह से भारत की नरेंद्र मोदी सरकार अमेरिका में उन्हें बड़ी जिम्मेवारी सौंपने की तैयारी है। अमेरिका में रह रहे हिंदू लोगों के संगठन ने इस खबर को सिरे से खारिज करते हुए लिखा है कि यह मनगढ़ंत खबर है और इसका वास्तविकता से कोई लेना देना नहीं है। इस खबर को लिखे जाने को लेकर वाशिंगटन पोस्ट से रिपब्लिकन हिन्दू कोअलिशन के लोगों ने माफी की भी मांग की है।

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वाशिंगटन पोस्ट की इस खबर को लेकर अमेरिकी संसद के एक सदस्य ने भी इस खबर को सिरे से खारिज कर दिया है। अखबार को अपनी तरफ से कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए लिखा है कि भारत और अमेरिका के बीच संबंधों को मजबूत करने की दिशा में शलभ कुमार हमेशा से प्रयासरत रहे हैं ऐसे में उनके ऊपर किसी भी तरह का सवाल खड़ा करना वाजिब नहीं है। उल्लेखनीय है कि इस बार ट्रंप सरकार का नारा भी शलभ कुमार ने हीं दिया था। जिस कारण ट्रंप को भारतीय अमेरिकन समुदाय के लोगों का अभूतपूर्व समर्थन प्राप्त हुआ था।

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इससे पहले शलभ कुमार कई मुद्दों पर मुखर होकर अपनी राय देते रहे हैं। खासकर आतंकवाद के मुद्दे पर वह खुलकर बोलने से कभी भी पीछ नहीं रहे हैं। हाल ही में उन्होंने कहा था कि अमेरिका-भारत गठबंधन आतंकवाद के लिए एक ‘‘प्रचंड’’ खतरा है।

रिपब्लिकन हिन्दू कोअलिशन के संस्थापक शलभ कुमार ने ब्रीटबर्ट न्यूज से कहा था कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एकसाथ मिलकर अब आतंकवादियों के सबसे बड़े शत्रु हैं। दोनों प्रतिबद्ध राष्ट्रवादी हैं और दोनों ही जनता के लिए अधिक नौकरियों तथा आर्थिक वृद्धि के लिए आगे बढ़ने की इच्छा रखते हैं।

संबित जी ने बोलने को कहा "कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है" ! देखिये क्या किया फिर इसने !

BJP Spokesperson Sambit Patra is known for his aggressive and fearless speeches. Patra does not hold back his thoughts and believes in slapping the oppositions on their face. He is ferocious in his approach and becomes lethal when someone talks against the country.

Recently, Gurmehar Kaur’s and last year’s JNU incident evoked a section of society who is eating our country from inside and making it weak. Last year in February when a group of students (Kanhaiyya Kumar, Umar Khalid, etc) chanted anti-national slogans ‘Bharat tere tukde honge’, the country outraged.

Now, Aaj Tak channel did a debate, where Sambit Patra asked Kavita Krishnan( Secretary of the All India Progressive Women’s Association) to ask Umar Khalid to say, ‘Jammu and Kashmir is an integral part of India’.

But Kavita Krishnan started defending Umar Khalid and did not agree to say that Kashmir belongs to India. What a shame this is ! People are living in India but still are speaking against the nation.

After this what Sambit Patra did to the lady is something you cannot afford to miss out on. Watch Sambit Patra at his fearlessly aggressive best.

Watch video:

Sambit Patra also spoke on Gurmehar Kaur’s controversy and raised a point which many missed out on. Sambit Patra perfectly pointed out the real reason why these kind of unnecessary controversies are being created.

A point raised by Patra which even the main stream media missed. Watch on the next page Sambit exposing Gurmehar and her likes.

Next: Watch Sambit Patra exposing Gurmehar Kaur’s controversy | VIDEO on PAGE 2

'मैं भी शहीद का बेटा पर गुरमेहर से बिल्कुल सहमत नहीं' : मनीष कुमा

नई दिल्ली ( यूनाइटेड हिन्दी डॉट कॉम ) :- दिल्ली के रामजस कॉलेज में लेफ़्ट और राइट विचारधारा वाले स्टूडेंट गुटों के बीच झड़प के बाद दिल्ली के लेडी श्रीराम कॉलेज में पढ़ने वाली गुरमेहर कौर की पोस्ट वायरल हो गई। इसके बाद हंगामा मचा गुरमेहर की उस तस्वीर पर जिसमें वो एक प्लेकार्ड लिए खड़ी हैं। इस पर अंग्रेज़ी में लिखा है, ”पाकिस्तान ने मेरे पिता को नहीं मारा, बल्कि जंग ने मारा है।”

गुरमेहर के पिता कारगिल युद्ध के दौरान शहीद हुए थे। गुरमेहर कौर की इस पोस्ट का जवाब मल्टीनेशनल कंपनी में काम करने वाले मनीष शर्मा ने दिया है। ये पूरी चिट्ठी नीचे पढ़िए।

हाय गुरमेहर कौर,

पिछले कुछ दिनों में वायरल हुए आपके वीडियो और कुछ इंटरव्यू जिनमें आपने अभिव्यक्ति की आज़ादी की बात की और कहा है, ‘पाकिस्तान ने आपके डैड की हत्या नहीं की, युद्ध ने उन्हें मार डाला।’ इस पोस्ट के चलते आपका नाम हर घर तक पहुंच गया है।

मैं सार्वजनिक तौर पर भावनाओं की अभिव्यक्ति से बचता हूं, लेकिन इस बार लगता है कि बहुत हो गया। मुझे नहीं मालूम कि आप ये जानबूझ कर रही हैं या अनजाने में, लेकिन आपकी वजह से डिफेंस से जुड़े परिवारों की भावनाएं आहत हो रही हैं।

पहले मैं अपना परिचय दे दूं, मैं एक मल्टीनेशनल कंपनी में आईटी पेशेवर के तौर पर काम करता हूं। मेरे पिता भारतीय सेना में अधिकारी थे जो श्रीनगर में ऑपरेशन रक्षक के दौरान चरमपंथियों से संघर्ष करते हुए मारे गए थे।

मैं नहीं जानता कि मैं इसके लिए किसे दोष दूं – युद्ध को, पाकिस्तान को, राजनेताओं को और किसे दोष नहीं दूं क्योंकि मेरे पिता वहां संघर्ष कर रहे थे जो विदेशी ज़मीन ही थी क्योंकि वहां के स्थानीय लोग कहते हैं- इंडिया गो बैक

मेरे पिता ने अपनी जान दी उन्हीं लोगों के लिए, हमारे लिए और हमारे देश के लिए। बहरहाल, हम दोनों नैतिकता के एक ही धरातल पर मौजूद हैं- आपके पिता ने भी जान दी और मेरे पिता ने भी जान गंवाई है।

अब क़दम दर क़दम आगे बढ़ते हैं। आपने कहा कि पाकिस्तान ने आपके पिता को नहीं मारा, ये युद्ध था जिसने आपके पिता को मारा।

मेरा सीधा सवाल आपसे है? आपके पिता किससे संघर्ष कर रहे थे? क्या ये उनका निजी युद्ध था या फिर हम एक देश के ख़िलाफ़ लड़ रहे थे?

ज़ाहिर है ये पाकिस्तान और उसकी हरकतें ही थीं, जिसके चलते आपके पिता और उनके जैसे कई सेना अधिकारियों को कश्मीर में तनावपूर्ण माहौल में अपनी जान गंवानी पड़ी।

अपने पिता की मौत की वजह युद्ध बताना तर्कसंगत लगता है, लेकिन ज़रा सोचिए उनकी मौत की कई वजहें थीं-

1. पाकिस्तान और उसका विश्वासघाती कृत्य

2. भारत के राजनीतिक नेतृत्व में राजनीतिक इच्छाशक्ति का अभाव

3. हमारे नेतृत्व की एक के बाद एक ग़लतियां

4. धार्मिक कट्टरता

5. भारत में मौजूद स्लीपर सेल जो भारत में रहकर पाकिस्तानी आईएसआई की मदद करते हैं.

और इन सबके अलावा, उनकी मौत की वजह- अपनी ड्यूटी के प्रति उनका पैशन और उनकी प्रतिबद्धता थी। ये वजह थी।

मैं इसे एक्सप्लेन करता हूं……

आपके पिता ने अपनी जान तब गंवाई जब उनकी उम्र काफ़ी कम थी, आप महज दो साल की थीं। ये देश के प्रति उनका पैशन था, राष्ट्रीय झंडे और अपने रेजिमेंट के प्रति सम्मान का भाव जिसने उन्हें शहीद होने का साहस दिया।

नहीं तो हम लोग देख रहे हैं कि आपके पिता से ज़्यादा उम्र के लोग अभी भी जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी में पढ़ रहे हैं और देश के ख़िलाफ़ काम कर रहे हैं- किसी क़ुर्बानी की इनसे उम्मीद के बारे में तो भूल ही जाइए।

क्या आपको मालूम है कि आपके पिता ने जिस कश्मीर के लिए अपनी जान दी, उसी कश्मीर की आज़ादी के लिए ये जेएनयू में नारे लगाते हैं।

वे किस आज़ादी की बात करते हैं, वे कश्मीर को पाकिस्तान का हिस्सा बता रहे हैं, ये उनके लिए आज़ादी है और इसके ख़िलाफ़ हम दोनों के पिता ने संघर्ष किया था।

आप जागरूक नागरिक होने के बाद भी इनकी वकालत कर रही हैं। ये वो लोग हैं जो अपने कभी ना ख़त्म होने वाले प्रोपगैंडे के लिए आपको प्यादे की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं।

मैंने आपका आज सुबह इंटरव्यू सुना जिसमें आप कह रही हैं कि आप किसी राजनीतिक पार्टी के ख़िलाफ़ नहीं हैं, आप केवल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बात कर रही हैं।

मेरा आपसे सीधा सवाल है – आपके लिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता क्या है? क्या आपके लिए यह भारत के टुकड़े हों, जैसे नारे लगाना है ?

क्या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मतलब आपके लिए लोगों- मेरे और आपके अपने पिता और उनकी तरह सीमा पर दिन रात गश्त लगा रहे जवानों के अपमान करने का अधिकार मिल जाना है?

मिस कौर, यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं है. अगर आपके पिता आज जीवित होते तो वे आपको बेहतर बता पाते।

मेरा आपसे विनम्र अनुरोध है- आप अपने पिता से कुछ सीखिए. कम से कम अपने देश का सम्मान करना सीखिए क्योंकि देश हमेशा पहले आता है।

मुझे उम्मीद है कि मैं अपनी बात स्पष्टता से रख पाया हूं।

जय हिंद !!

जवान वीरगति को प्राप्त होते हैं, उसका कारण "युद्ध" है या गले की फाँस बन गया "पाकिस्तान" ?

ब्लॉग: ( कुमार प्रियांक ) :- 1965 का वर्ष एक ऐसा वर्ष था जब भारत के तमाम विरोधियों को ऐसा लग रहा था कि भारत एक अत्यंत कमजोर देश है। कारण थे:- 1962 में वामपंथी चीन पर भरोसा कर नेहरू जी ने जरूरत से ज्यादा अच्छा दिखने के चक्कर में भद्द पिटा ली थी.., दूसरे अकाल का दौर था, तीसरे नेहरू जी की मृत्यु के बाद प्रधानमन्त्री बने थे छोटे कद के और पतली आवाज़ वाले चकाचौंध से दूर रहने वाले लाल बहादुर शास्त्री जी..!!

शास्त्री जी की पार्टी काँग्रेस भी यही मान कर चल रही थी कि शास्त्री जी सिर्फ एक अल्पकालिक व्यवस्था के तहत प्रधानमन्त्री हैं और देर-सबेर चापलूस संस्कृति के तहत नेहरू-गाँधी परिवार के वारिस को सत्ता मिलनी ही है..!!

पर जिस नियति ने शास्त्री जी के माथे पर ताज सजाया था, उसके मन में कुछ और ही था। पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति जनरल अयूब खान को नई दिल्ली आना था, पर नेहरू जी की मृत्यु के चलते उन्होंने दिल्ली आने का कार्यक्रम रद्द कर दिया क्योंकि उन्हें लगा कि शास्त्री जी का कद इतना नहीं कि वह जाकर मिले..!!

तब सौम्य शास्त्री जी आगे अपनी काहिरा की शासकीय यात्रा से वापस लौटते हुए अचानक से कराँची में उतर गए और अयूब खान को दंग कर दिया..अयूब खान खुद एअरपोर्ट आये शास्त्री जी को छोड़ने। अयूब खान समझ गए थे कि ये छोटे कद का आदमी बात नहीं मानता..!!

इधर 1965 की गर्मियों में तत्कालीन पाकिस्तानी विदेश मंत्री ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो को लगा कि कश्मीर को जीतने का इससे अच्छा मौका फिर न मिलेगा। भुट्टो ने पाकिस्तानी सेनाध्यक्ष मोहम्मद मूसा को टॉप सीक्रेट सन्देश भेजा कि कश्मीर को हासिल करने का यह बहुत बढ़िया वक़्त है। अगर उपयुक्त समय और स्थान पर हमला किया जाये तो सामान्य धारणा के अंतर्गत, दो तगड़े झटके इन हिंदुओं का मनोबल तोड़ने को पर्याप्त होंगे..!!

पाकिस्तान ने ऑपरेशन जिब्राल्टर के तहत लगभग 33 हजार सैनिकों की फ़ौज़ को कश्मीरी कपड़े पहना कर अगस्त 1965 के पहले हफ्ते में कश्मीर में घुसपैठ करा दिया..पाकिस्तानी हुक्मरान को यह फुलटूस भ्रम था कि कश्मीरी उन्हें हाथों-हाथ लेंगे..!!

पर यह क्या.. उल्टे 15 अगस्त 1965 को कश्मीरियों के माध्यम से ही भारतीय सेना को इस घुसपैठ की जानकारी मिली। तब तक पाकिस्तानी फ़ौज़ उरी, पूँछ आदि सेक्टर में घुस चुकी थी..!! भारतीय सेना ने जवाबी कार्रवाई शुरू की..और ग़ुलाम कश्मीर के हाजी पीर दर्रे पर कब्ज़ा कर लिया..!!

गलिवर में मुझे भारत का हिन्दू दिखता है, वर्तमान में हिन्दू की दशा गलिवर जैसी ही है!

ब्लॉग: ( केशर देवी ) :- यह चित्र आप पहचान ही गए होंगे, गलिवर का है । गलिवर की कहानियाँ बचपन में पढ़ी ही होंगी आप ने । जब समु:द्र यात्रा में उसका जहाज टूटता है, किसी लकड़ी के सहारे वो तैरता हुआ किनारा पा लेता है । किनारे पर चला आता है और थक कर वहीं सो जाता है । नींद नहीं, यह बेहोशी होती है ।

इस बेहोशी से जागता है तो पाता है कि कसकर जकड़ा गया है । दिखने में तो उसको जकड़नेवाली रस्सियाँ छोटी छोटी लगती हैं लेकिन वे इतनी हैं कि वो उन्हें तोड़ नहीं पाता । कुछ इस कदर जगह जगह से जकड़ा गया है कि हाथ पाँव नहीं हिला सकता करवट बादल नहीं सकता, उसके अपने बाल ही बल बनाकर खूँटों से बांधे गए हैं सो गर्दन हिलाना भी नामुमकिन है ।

वो देखता है कि जैसे वो जाग जाता है, आजूबाजू चहल पहल देखता है । शरीर पर कुछ जीव चलने का एहसास होता है तो जैसे तैसे गर्दन उठाकर देखता है तो सैंकड़ों अंगूठे से भी छोटे लोग उसके शरीर पर और इर्द गिर्द विचरते होते हैं। वे भी ऐसे वैसे नहीं। बिलकुल सैनिक टुकड़ियाँ । कोई ढाल तलवार लिए, कोई भाला तो कोई तीर कमान । गलिवर जो कोशिश करता है उसपर हमला होता है । बाण तो सुइयां होते हैं लेकिन चुभते जरूर है । बदन में सेंकड़ों जगह चुभते शास्त्रों की पीड़ा से वो बेहाल हो जाता है और ठंडा पड जाता है । उसे पूरी तरह वश में लाने के बाद ही उसे कुछ शर्तें समझाई जाती हैं और उन्हें मानने के बाद ही उसे सीमित हालचाल की अनुमति दी जाती है, बंधन जरा से ढीले किए जाते हैं ।

फिर कुछ दिनों बाद जब उन्हें विश्वास हो जाता है कि अब ये अपना पालतू हुआ है तब उससे काम करवाए जाते हैं । चूंकि इसके पास वहाँ से भागने के लिए कोई जहाज नहीं होता, नैया भी नहीं होती, यह मान लेता है । उनके लिए पड़ोसी देश पर आक्रमण भी करता है । उनके युद्धक पोत खींचकर ले आता है । राजा रानी से शाबासी पता है ।

लेकिन उसके कोई शत्रु भी बन जाते हैं जो उसको मरवाने के चक्कर में रहते हैं । अपने खिलाफ हुए एक षडयंत्र की भनक लगते ही ये जैसे तैसे देश त्याग करता है ।

गलिवर में मुझे भारत का हिन्दू दिखता है । ताकत तो गलिवर की पूरे लिलीपुट राज्य से अधिक थी, लेकिन वो इस कदर बांध दिया गया था कि हिलना मुश्किल था। अपनी मर्जी से कुछ कर नहीं पाता था, यहाँ हाथ हिलाने की कोशिश की तो उँगलियाँ कुछ इस कदर बंधी थी कि हिला ही न सका । बंधन ऐसे कि हिल न पाये लेकिन शरीर जब अलग अलग मांगें करें और आप हिल न पाओ तो अपने आप आदमी सरेंडर कर देता है ।

गलिवर जब बेहोश था तब उसे जकड़ लिया गया, बेहोशी टूटी तो खुद को बंधा पाया । यहाँ हमें बेहोश रखा गया और नियम के नाम पर ऐसे ऐसे बंधन लादे गए हैं जो हमारा सांस्कृतिक बधियाकरण करने में सहायक हैं । संस्कृति का क्या महत्व है अगर आप ऐसे पूछेंगे तो उत्तर है कि राजनीति की उपधारा संस्कृति की मुख्यधारा से ही निकलती है । संस्कृति वो नदी है जो आप को पोषण देती है । उसी का प्रवाह विष मिश्रित कर दो, हो गया आप का काम । कई परिणाम अपने आप होते रहेंगे जैसे विष अपना धीमा असर दिखाता जाएगा। आपको सांस्कृतिक, मानसिक और आर्थिक dhimmi बना देगा और ऊपर से यही समझाएगा कि यही सही है, अभी जाकर आप सुसंस्कृत प्रजा बन रहे हैं ।

क्या हमारे साथ यही छल कपट हुआ नहीं है ?

यह चित्र तो भगवा धवल है लेकिन कथा में सभी व्यक्तिरेखाएँ अन्य रंगों में हैं । कपड़े लाल, हरे, नीले, सफ़ेद, सब हैं । बाकी इन सब का हमारे लिए संदर्भ आप समझ ही गए होंगे ।

गलिवर यात्रा को निकला और दुर्घटना के कारण लिलीपुट जा पहुंचा। फिर अवसर देखकर भाग निकला, आजाद हुआ । हमें कहीं भागना नहीं है, यह भूमि हमारी है, आवश्यक निर्णयों से मुंह मोड़ना मुमकिन नहीं ।

कुछ कहना है ? नहीं तो शेयर – कॉपी पेस्ट कर के अन्य गलिवरों को जगाएँ।

Video: क्या पहली बार $ex करने से टूटती है सील, निकलता है खून ? जानिए सच्चाई….

वीडियो डेस्क. शारी-रिक सं-बंधो के बारे आजकल हर कोई विस्तार से जानना चाहता हैं | जहां विदेशो में शारी-रिक सं-बंधो के बारे में खुलकर चर्चा की जा सकती हैं वही हमारे देश में शारी-रिक संबं-धो की बात करना उचित नहीं माना जाता हैं | इसी को ध्यान में रखते हुए हम आज आपके लिए एक ऐसा वीडियो लाये हैं जिसको देखने के बाद आपके मन में जितने भी शारी-रिक सं-बंधो को लेकर मिथक पल रहे हैं वो चुटकी बजाने जितने समय में गायब हो जायेगे | शारी-रिक सं-बंधो को लेकर आज का युवा  मुख्यतः भारतीय युवा बहुत असमंजस और भ्रम की स्थिति में रहता हैं | इसका एक कारण यह भी हैं की इसकी चर्चा वह किसी से कर भी नहीं सकता | और कई बार देखा गया हैं की इसके बहुत गम्भीर परिणाम भी देखे गये है|

इसी के चलते आज हम  जो वीडियो आपके लिए लाये हैं उसको ना केवल आपको ध्यान से देखना चाहिए बल्कि इस वीडियो के माध्यम से इन पर अमल भी करना चाहिए  | $ex को लेकर आजकल कई तरह के मिथक चल रहे हैं | और कमाल इस बात का हैं अधिकतर लोगो को सलाह भी ऐसे लोग देते हैं जिनको $ex का या तो अल्प ज्ञान हैं अथवा अनभिज्ञ हैं परन्तु सलाह देने में पीछे नहीं हटते |

अतः आपसे हमार अनुरोध यह हैं की आप जो विडियो हम आपके लिए लाये हैं उसको ध्यान से देखिये और इस पर विचार कीजिये | क्या पहली बार $ex करते समय टूटती है सील, निकलता है खून. कई लोग $ex को लेकर कई तरह के भ्रम में जीते हैं जैसे की सुहागरात के समय यदि शारी-रिक सम्ब-न्ध स्थापित करते हुए पत्नी के प्राइ-वेट पार्ट से खू-न नही आया तो उसका को-मार्य पहले ही भंग हुवा हुआ हैं या फिर कई को लोग इसी उधेड़बुन में लगे रहते हैं की उनके प्राइ-वेट पा-र्ट की लम्बाई बहुत कम हैं|

जिसके कारण वह अपनी पार्टनर को सं-तुष्टि प्रदान नहीं कर पायेगा तो कई युवाओं का मन अगर कभी  कभार स्व-प्नदोष हो जाये परेशान रहता हैं की शायद कोई बिमारी हो गयी हैं | अब आपको चिंता करने की कोई आवश्यकता नही हैं | क्योकि आपकी परेशानी को समझते हुए हम आपके लिए इस वीडियो के माध्यम से आपकी सब समस्या का समाधान लाये हैं जिसमे एक महिला आपके सब भ्रम दूर कर देगी |

अगले पेज पर देखे विडियो….

अपने जमाने में कई महिलाओं के साथ शारीरिक संबंधों के लिए

नोबेल पुरस्कार विजेता और मशहूर कवि रवींद्रनाथ टैगोर के बारे में तो सब लोग जानते होगे. लेकिन उनकी प्रेम कहानी के बारे में बहुत कम लोग हैं जो जानते है. रवींद्रनाथ टैगोर और अर्जेंटीना की प्रसिद्ध लेखिका विक्टोरिया ओकैंपो की प्रेम कहानी। 

सन 1914, अर्जेंटीना में 25-26 साल की एक लड़की ने फ्रेंच में रवींद्रनाथ टैगोर की  किताब गीतांजलि पढ़ी. विक्टोरिया टैगोर की लेखनी की मुरीद हो गई. उसके बाद से विक्टोरिया रवींद्रनाथ टैगोर से मिलने के लिए बेताब हो गई. वो कोई सामान्य लड़की नहीं थी बल्कि बहुत बड़ी नारीवादी लेखिका एक साहित्यिक मैग्जीन की एडिटर, सांस्कृतिक कार्यकर्ता भी थी. वो वहां की पहली महिला थी जिसे अर्जेंटीना एकेडमी ऑफ लैटर्स का सदस्य भी बनाया गया था। 

1924 में विक्टोरिया की टैगोर से मुलाकात की तमन्ना पूरी हुई. रवींद्रनाथ टैगोर उस वक्त पेरु की यात्रा पर थे, रास्ते में बीमार हुए तो आराम करने के लिए उन्हें ब्यूनस आयर्स में रुकना पड़ा. विक्टोरिया को जैसे ही ये खबर मिली वो उनसे मिलने पहुंच गईं. टैगोर को ठहराने के लिए वहां एक कमरा किराए पर लिया जहां वो 2 महीने से ज्यादा रुके थे.

आगे पढ़िए 34 साल की विक्टोरिया को कैसे हुआ 63 साल के टैगोर से प्यार

आत्महत्या से पहले 60 पन्नों के सुसाइड नोट में AP के पूर्व मुख्यमंत्री कलिखो पुल नें खोली थी कांग्रेस की पोल कहा..

कायदे से भारत की राजनीति में आज भूचाल होना चाहिए। इसलिए कि अरुणाचल प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिवंगत कलिखो पुल के 60 पन्नों के सुसाइड नोट में देश की सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी कांग्रेस के कई नेताओं के नाम हैं। उन्होंने कई मशहूर वकीलों और जजों के नाम भी लिखे हैं, जिनकी ओर से उनसे संपर्क किया गया था और फैसले बदलने के लिए मोटी रकम मांगी गई थी। उन्होंने दिन, तारीख और समय के साथ पूरा विवरण लिखा है। 60 पन्नों का नोट हिंदी में लिखा गया है और टाइप किए गए हर पन्ने पर पुल ने बाकायदा दस्तखत किए हैं। इसलिए इसे बनाया हुआ यानि फर्जी दस्तावेज भी करार नहीं दिया जा सकता है।

जी हाँ इस सुसाइड नोट में कुछ ऐसा लिखा हुआ है जो कई लोगों को बेनकाब कर देगा..यह सुसाइड नोट भ्रष्टाचार के खिलाफ एक व्यक्ति का निजी चार्जशीट है..देश में हो रहे इसी भ्रष्टाचार नें पूर्व मुख्यमंत्री को आत्महत्या करने के लिए विवश किया था..इस नोट में अरुणाचल प्रदेश के कई बड़े नेताओं, सुप्रीम कोर्ट के सिटींग जज, कांग्रेस पार्टी के कई बड़े नेताओं के अलावा भी प्रदेश के कई सरकारी अधिकारीयों का कच्चा चिटठा लिखा हुआ है|

अगले पेज पर देखें वीडियो और जानिए कैसे कांग्रेस नें कलिखो पुल पर लगाये थे कैसे संगीन आरोप जिसकी वजह से..

एक अलग मुल्क बनाने वाले जिन्ना की बेटी ने जब एक गैर-मुस्लिम के लिए कर दी अपने पिता से बगावत

मोहम्मद अली जिन्ना चाहते थे कि हिंदुस्तान से अलग मुस्लिमों के लिये एक देश बने जहाँ हिंदुस्तान के सारे मुस्लिम एक साथ रहें। उनका सपना सच तो हुआ लेकिन पूरी तरह से नहीं मुस्लिमों के लिए पाकिस्तान नाम से एक नया मुल्क तो जरुर बना पर भारत के सारे मुस्लिम वहां नहीं गए. जिन्ना को लगा था कि भारत के सारे मुस्लिम पाकिस्तान आ जाएंगे लेकिन वो गलत साबित हुए।

जिन्ना को इससे भी बड़ा झटका इस बात से लगा कि उनकी बेटी ने एक मुस्लिम से शादी न करके एक पारसी से शादी कर ली। बंटवारे के बाद उनकी बेटी हिंदुस्तान आकर रहने लगी। वो आज भी भारत में ही रहती हैं। कहा जाता है कि इस घटना का जिन्ना पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ा था।

अगले पेज पर जानें, क्यों टूटा जिन्ना का परिवार 

केंद्रीय सचिव ने अन्य वरिष्ठ अधिकारी के साथ मिलकर गांव वालों को दी ‘ऐसी सीख’ जिसके बाद दुनिया कर रही है सलाम…

पीएम मोदी के स्वच्छ भारत अभियान के चलते तेलंगाना के नौकरशाहों ने दुनिया के आगे पेश की अनोखी मिसाल

सभी को याद होगा कि बीते साल 2014 को नई दिल्ली में राजपथ पर स्वच्छ भारत अभियान का शुभारंभ करते हुए पीएम नरेन्द्र मोदी ने कहा, “2019 में महात्मा गांधी की 150वीं जयंती के अवसर पर भारत उन्हें स्वच्छ भारत के रूप में सर्वश्रेष्ठ श्रद्धांजलि दे सकता हैl” 2 अक्टूबर 2014 को देश भर में एक राष्ट्रीय आंदोलन के रूप में स्वच्छ भारत मिशन की शुरुआत स्वयं पीएम मोदी ने की थीl

पीएम मोदी ने अपने कार्यकाल में VIP कल्चर को खत्म करने पर भी खासा जोर दिया हैl जहा आज जब कोई अफसर घर से निकलता है तो अपने साथ पूरा गाडियों का काफिला लेकर चलता है जिसे दूर से ही देख कर कोई भी अंदाज़ा लगा ले की कोई बड़ा अफसर आ रहा हैl

नौकरशाही के ज़माने  में आज जहां बड़े अफसर एक नहीं 2-2 सरकारी गाडियों का प्रयोग करना अपनी शान समझते हैं वहीं VIP कल्चर त्याग कर बिल्कुल आम युवा की तरह बीते महीने फ़रवरी में 23 राज्यों के करीब एक दर्जन वरिष्ठ नौकरशाहों ने ऐसा ही करके दिखाया हैl इनमें केंद्रीय स्वच्छता सचिव परमेश्वरन अय्यर भी शामिल हैंl

सफाई की बात करना और लोगों को इसके महत्व की सीख देना एक बात है, लेकिन इसे खुद करके मिसाल कायम करना बिल्कुल अलग ही बात हैl आपको बता दें कि केंद्रीय स्वच्छता सचिव परमेश्वरन अय्यर के साथ इन सभी अधिकारियों ने बीते दिनों चार घंटे लंबी बस यात्रा की और हैदराबाद से तेलंगाना स्थित वारंगल पहुंचेl तेलंगाना पहुँच कुछ अन्य अधिकारियों के साथ मिलकर इन सभी नौकरशाहों ने गंगादेवीपल्ली गांव में पहुँच पीएम मोदी के स्वच्छ भारत अभियान और नौकरशाही का त्याग कर ईमानदारी की ऐसी मिसाल पेश की है जिसे सुन खुद पीएम मोदी दंग रह गयेl

आगे पढ़ें पीएम मोदी की अपील के चलते केंद्रीय सचिव को घुसना पड़ा शौचालयों के गड्ढों में और फिर…